शनिवार, 16 मई 2015

--- ॥ दोहा-दशम २६४ ॥ -----

 
अन्यानए नए सासनहु   अनुहरि  आपा पंथ  ।
पाखन बाद बिस्तारै,गुपुत होंहि सतग्रंथ  ।२६४१ । 
भावार्थ:-   शासक नए नए हुवे किन्तु संविधान वही रहा ये नए भी  आपापंथीयों का ही अनुशरण करते  ।  पाखंड वाद (गांधी वाद - सार्वजनिक जीवन में साधु बने रहो व्यक्तिक जीवन में रावण  )  के प्रचार-प्रसार ने सद्ग्रन्थों को विलुप्त  कर  दिया था  ॥

अबिधानि संबिधान ने, अर्थार्थ  किए परम । 
कर्म रहे न कर्म अजहुँ धर्म रहे नहि धर्म ।२४२
भावार्थ :- विधि विरुद्ध संविधान ने अर्थ व् उसके प्रयोजनों को ही श्रेष्ठ कहा । परिणामतस्  यह देश शास्त्रविहित कर्मों से विमुख  हो गया लोगों का कोई धर्म ही नहीं रहा ।।

साख पराई बिआ बुए होवै पेड़ बबूल ।
जाके साखा फलफुले काटे बाकी मूल ।२४३। 
भावार्थ : -- परधर्मावलम्बी अपने बीज बोते  उससे तो बबुल के पेड जागते । फिर ये जिसके पेड़ से फलते फूलते उसी की जड़ को काटने  में लगे रहते ॥

जनम जात सों आपना धर्म धाम बिसराए । 
खरा दाम कुदाम होत कर कर बिकता जाए । २४४ । 
भावार्थ : -- जो  कोई अपना जनम अपनी व्यत्पत्ति अपने धर्म अपने इष्ट देवता के अधिष्ठान को विस्मृत कर देता वह मूलवान मूलहीन (अर्घापचय ) होकर एक हाथ से दूसरे हाथ बिकता जाता ॥ 

को धनी को दीनहीन,कोउ ऊँच को नीच । 
अर्थार्थी विधान ने,दिए अस रेखा दिए खीँच ।२६४५। 
भावार्थ :-- स्वार्थी विधि अधिनियमों कर्म प्रधान देश को अर्थ प्रधान देश घोषित कर ऐसी रेखा खींची कि कोई धनी हो गया  कोई दरिद्र ही रहा कोई ऊँचे  उठकर भी  नीच कोई नीचे रहकर भी ऊँचा ही रहा,  अर्थात आर्थिक दशा समाजिक दशा  को परिवर्तित नहीं कर पाई ।

समाज में अस्पृश्यता अब भी व्याप्त था यह आर्थिक आधार पर होने लगी ।  देसी और विदेशी का तो भेद ही नहीं रहा.....क्या इसे राष्ट्रवाद कहेंगे ॥

इस देश को राष्ट्र रूप में परिकल्पित किसने किया ? मुसलमानों  ने ? ईसाईयों ने ?सिख्खों ने अथवा हिन्दूओं  ने ? इसे खंड खंड किसने किया.....?

कहा गया कि आतंकवदियों का तो कोई धर्मइ नहीं होता । तो जिसका कोई धर्म नहीं हो क्या वो सभी आतंकवादी है यदि होता है तो कौन से धर्म के हैं ये आतंकवादी  ?  इसके कारण क्या है कोई अनुवांशिक रोग है क्या इनको.....?

दिले नादान तुझे हुवा क्या है आखिर इस दर्द की दवा क्या है.....

केवल बम चला  के आतंक नहीं मचता, भयोत्पादन के और भी बहुंत से उपाय हैं  ..... गाडी के चक्कों से भी  आतंक मचता है.....

 जहां कहीं भी इस्लाम की सम्बद्धता है आतंकवाद वहीँ क्यों है.....?

स्पष्टीकरण :--यह कुछ प्रश्न थे जो उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे  । इधर सूचना एवं प्रसारण माध्यम की भूमिका भी संदिग्ध दिखाई दे रही थी यह अपराध व् अपराधी के पक्ष में समर्थन संकलित करने वाली एक अवैधानिक संस्था  हो चली थी शासन  द्वारा इसका पोषण हो रहा था  ।

अजहुँ काल कतिपय लोग जीवन चहें सुपास ।
काम करें न काज करें रहँ सब सम्पद पास ।२६४६ -क ।

जीवन जोग जनाए बिनु,रहैं सुवासस बास । 
जग लग संचित सम्पदा  जब चहँ लेइ निकास ।२६४६-ख । 
 भावार्थ : --इस समय कुछ लोग ऐसे थे जो अकर्मण्य होकर आवश्यक हेतु का उत्पादन किए  बिना युगों तक संचित सम्पदा का चाहें जब निष्कासन कर बढ़िया बढ़िया वस्त्र में अच्छे अच्छे वाहनों और सुविधा से युक्त आवासों  में सुवासित जीवन की अभिलाषा करते, वे धन के लिए कुछ भी कर सकते थे ॥

दारिद दुकाल दुःख भया,दोष घोर घन घाम । 
झींकत सेबक दरसि जन जागत आठों जाम ।२६४७ । 
भावार्थ :--अधिसंख्य जन साधारण दरिद्र व् अति दरिद्र था उनकेलिए  दरिद्रता जैसे दुकाल का दुःख हो गई थी ऊपर अपराध का वैधानिककरण किसी घनघोर धूप के सदृश्य था  न्यायालय कहते मिलते हत्या करना कोई अपराध है क्या ? यह जन साधारण असाधारण जन प्रतिनिधि को दुखित दृष्टि से निहारते चौबीस घंटे जागृत रहता ॥

जब घोर तपस्या करे रत्नाकर स्वमेव । 
जग संताप हरन गगन  प्रगसे तब घन  देउ ।२६४८ । 
भावार्थ:--  जलसे शीतल रत्नाकर भी जब गहन तपस्या करता है  ।  जगत का  संताप हरण करने हेतु तभी  इंद्र देव प्रकट होते हैं ॥

चरे जीवन तपन चरन जन जन सागर रूप । 
दुःख हरण को देव गगन प्रगासे साखि सरूप ।२६४९ । 
भावार्थ:-- जब जन साधारण सिंधु के जैसे तप  करता है  दुःख हरण करने हेतु गगन से तब कोई देव प्रकट होता है ॥

बिगरत जब जम नेम दस छाए तमस घन घोर । 
बिनहि सेबा सेबक बन प्रगसे राकस चोर । २६० । 
भावार्थ:--जब परजका दस यम -नियम बिगड़ जाते हैं  तब ज्ञान का घन घोर अंधेर चा जाता है ।अन्धेरे देवते प्रकट नहीं करतेये तो व्याज वेशीसेवक स्वरूप  राक्षस व्  डाकू चोर ही प्रकट करते हैं ॥ चन्द्रमा  कोई एक ही होता है जो महर्षि वाल्मीकि, चंद्रवंशी कृष्ण कहलाता है ॥ 






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