अस पथ सन जन सधारन लाह लहे किछु नाह ।
अस प्रगति सों उद्यम पति लाहै लाहहि लाह ।२६३१ ।
भावार्थ
: -- ऐसे राजपथों से जनसाधारण का कुछ भला नहीं होता । ऐसी पथ जनित
प्रगति केवल उद्योग जगत व् उच्च वर्ग के लाभ के लिए होती है ॥
जाके उर बस भय रहे, रच्छक भए सो भूत ।
साजन तब का होइबे मार भगावै जूत ।२६३२।
भावार्थ:
-- भूत के जैसे रक्षक कहीं नहीं होते लोगों में केवल उनका भय ही व्याप्त
रहता । इस भय के कारण अपराध पर नियंत्रण रहता ॥ गेहनियाँ गेहियों से
पूछती अन्याय के जूते पड़ने से यह भय भी नहीं रहेगा तब क्या होगा ॥
देस बन ब्यापत रहे कलुष करम की आगि ।
अन्यानै सासन नवन भरकावन में लागि ।२६३३।
भवार्थ:--
अन्याय पूर्ण वातावरण से राष्ट्र एक ऐसा वन हो चला था जहां भ्रष्टाचार
सहित दुराचरण की तो जैसे आग लग गई थी । अन्यान्य नए शासक भी आते तो वे उसे
भड़काने में लगे रहते ॥
कौन सुने अब दीन की,कासो कहुँ कहँ जाउँ ।
ऐसी दाही दहन सन कहे संतपत राउँ ।२६३४ ।
भावार्थ :-- इस दहन कारी दहनिका से संतप्त होकर राजा कहता अब दीन की कौन सुनेगा अपना दुःख किससे कहूँ कहाँ जाऊं ।।
न्याउ बिकाउ बस्तु कर ,ठौर भयउ पैंठोर ।
न्यायधीस हटुआ भए अधिबक्ता पैंचोर ।२६३५ ।
भावार्थ : -- न्याय को बिकाऊ वस्तु किए न्यायलय जैसे क्रय-विक्रय केंद्र हो चले थे ॥ न्यायाधीश उस केन्द्र के संचालक व् अधिवक्ता गँठ कटिया बिचौलिए हो गए ।।
दंडाधीस धनेस भए जे धन कहँ ते आए ।
ऎसे झूठे ढंग को झूठे ही पतियाए ।२६३६।
दंडाधीस धनेस भए जे धन कहँ ते आए ।
ऎसे झूठे ढंग को झूठे ही पतियाए ।२६३६।
भावार्थ:-- दण्डाधीश कुबेर हो गए धन कहाँ से आया यह एक पूछने योग्य प्रश्न था । ऐसे न्यायलयों पर से जन साधारण का तो विश्वास ही उठ गया, कुबेरी न्यायधीशों वाले न्यायालय भ्रष्टाचारियों के विश्वास पर ही टीके थे ॥
सदा मद भँवर सदन पति करे न बिधिबत काजु ।
ऊँट बिलाई ले गई करे सबहि सद हाँजु । २६३७ ।
भावार्थ :-- चुने हुए सांसद एवं उनके नेता जीत के मद में उन्मत्त रहते हुवे सदैव विदेश -भ्रमण करते दिखते ।सदन में कोई भी कार्य विधिवत नहीं होता, सांसद हाँ जी हाँ जी कहते हुवे अपने नेता की किसी भी अनुचित बात का समर्थन कर दिया करते ॥
भयकारि उपाए संग को आतंक मचाए ।
कोउ कारा बास बसे , शासक देइ छड़ाए ।२६३८ ।
भावार्थ : -- भयोत्पादक उपायों का अवलम्बन कर राष्ट्र का दमन करते हुवे आतंकी आतंक आतत करते । यदि कोई कारावासित होता तो सत्ताधारी उसे मुक्त कर देते ।। क्यों कर देते ?
सासन प्रबंधित न रहे रहे कतहुँ न न्याय ।
देस धाम कुदाम होत कर कर बिकता जाए ।२६३९ ।
भावार्थ : -- इसप्रकार देश में एक अराजकता का वातावरण था न्याय भी नहीं था, परिणामवश देश अवमूल्यन को प्राप्त होकर एक हाथ से दूसरे हाथ बिकता जाता ॥
चमक चाँदनी चाम लिए पुरनइ पटतर ऐहि ।
करे भलाई आपनी भला करे ना केहि ।२६४०-क ।
चमक चाँदनी चाम की काया मँगए न काम ।
काम काम पुकार करे आठों जाम बिश्राम ।२६४०-ख ।
भावार्थ : -- बनी ठनी काया से काम नहीं होता वह परिश्रम नहीं कर सकती । उसके लिए विश्राम भी बहुंत बड़ा काम है । वह चौबीस घंटे विश्राम कर कहती है हाय रे बहुंत काम है । ऐसे बनाव के लिए विलास प्रसाधन की आवश्यकता होती है विलास प्रसाधन के लिए धन चाहिए होता है, सो ये नए भी पुराने के जैसे किसी का भला नहीं करते केवल अपनी भलाई में ही लगे रहते ॥
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