रविवार, 10 मई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २६२ ॥ -----

सरिद बरा  की धार से पयदबान यह देस ।
तीन देउ रच्छा करे ब्रम्हा बिष्नु महेस ।२६२१। 
भावार्थ:-- तीन देवताओं से रच्छित इस भारत खंड को गंगा जी की  निर्मल धारा पयस्वान करती रही ॥ 

कहँ वो तपोमय तपकर,कहँ वो मुख के ओज । 
अपने मूलधार को देस रहा है खोज ।२६२२। 

कहँ वो तपोमय तपकर,कहँ वो मुख के ओज । 
अपने मूलधार को तदपि रहा था खोज ।२६२२। 
भावार्थ :-  तथापि अपने वंशाधार की टोह लेते  पूछता वह तपोमय तपस्वी कहाँ है उस तपस्वीके मुख का तेज कहाँ है । 

भरमन पथ सों होत रहि सबकी साँझी काल । 
देस भीत के बिदेसी,चले घड़ी की चाल ।२६२३। 
भावार्थ :-- भारतीयों  के सांध्य काल ( भोर दुपहरी साँझ ) पृथ्वी की भ्रमण गति के अनुसार होता , सूर्योदय से इनकी भोर होती अस्त से साँझ । किन्तु भारत में सोते हुवे साइनिंग इण्डिया की सुबह बगुले की बांग से होती और साँझ कौंवे की कांव कांव से । जब तक कौवा  नहीं बताए इनको दाल के भाव ही न पता चले ॥

सासन हर जब आपही,करे ठगी अरु लूट । 
भले करम के कर बँधे मिले बुरे को छूट ।२६२४ । 
भावार्थ :-- जिस देश में सत्ताधारी स्वयं ही ठगता व् लूटता हो उस देश में फिर भले कर्मों के हाथ बांध दिए जाते हैं बुरे कर्मों को पूरी पूरी छूट दी जाती है ॥

जन जन के धन लूट पुनि सासक बाट बनाए । 
करम गुनापकरष करे गर्तक माहि समाए ।२६२५ । 
भावार्थ : -- फिर जन साधारण का  लूट लूट के निवर्त्तमान सत्ताधारी ने सरडकेँ बनाई । पत्र पंक्तियों में ये बड़ी सुन्दर दिखती किन्तु धरातल  पर ठीक कार्य न होने के कारण ये गर्त में समा जाती ।।

करम  अपकृत बहुंत रहे रहे गहीत न कोए । 
पथरौटी पथनार  के पथिन्कार सब होए ।२६२६। 
भावार्थ : -- कर्म अपकृति तो  बहुंत रहती किन्तु पकड़ा कोई नहीं जाता ।  गोबर पाथने वाले  भी सड़क के ए  क्लास ठेकेदार हो चले थे ।

पथकारि को छोड़ करे, कलुष करम  की होड़ । 
अपनी कौड़ी लाख किए, जोड़े लाख करोड़ ।२६७। 
भावार्थ : -- पथकारी छोड़ कर भ्रष्टाचार की होड़ करते हुवे अपनी कौड़ी को लाख बना बना कर इन पथकारियों ने करोड़ों जोड़ लिए । और फिर.....? फिर क्या वे उद्योगपति कहलाने लगे.....

बुरे अर्जन सोषत धन करे देस को दीन । 
भले पोषत जन जन सन करे देस को पीन ।२६८-। 

उत्तम उद्यम देस हुँत संजीवन सम होए । 
अधम सन नित दीन होत, मरनी के पथ जोए ।२६२८-ख 

भावार्थ:--दूषित उपार्जन जन सामान्य में व्याप्त धन का शोषण कर राष्ट्र को निर्धन करता है, संस्कृत उपार्जन जन जन का पोषण कर उस राष्ट्र को परिपुष्ट करता है ॥

भावार्थ : --  उत्तम उद्यम जीवति से युक्त होकर राष्ट्र हेतु जीवनीय होता  है । निकृष्ट उद्यम जीवतिहीन होकर निर्जीव होते है निर्जीव उद्यमी राष्ट्र मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगता है ॥

टिप्पणी :- सबसे उत्तम उद्यम कृषि कर्म है..... ।

राज कोसलुटाए कतहुँ राजसि पंथ बनाए । 
राजा बासत झोपड़ा चरत पयादहि पाए ।२६९ । 
भावार्थ : -- देश के राजस्व  को लुटा कर फिर राजपथों का निर्माण हुवा । तथापि राजा दीन हीन अवस्था में बिन पादुका ही चलता हुवा मिलता,  कारण कि राष्ट्र के  पास जीवन नहीं था उसके पास जीवति नहीं थी ।।

पद पद पदिक दलाए  के पद पद हतत न्याय । 
किलौनि  की सी बाहिनी चले पंथ इतराए ।२६३० । 
भावार्थ :-- पद पद पर पदिकों को कुचल न्याय की हत्या करते इन राजसी मार्गों पर खिलौने से  चौपद  बाहि  के स्वामी ऐसे  इतराते चलते । छुद्र नदी भरि चलीं तोराईं । जस थोरेहु धन खल इतोराईं । जैसे छोटी नदियां भर्री हों तो तटों को भंजित कर चलती हैं थोड़े धन से दुष्ट कैसे मर्यादा  का त्याग कर देते हैं ॥

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