शुक्रवार, 1 मई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २५९ ॥ -----

जहँ असाँच भयहीन तहँ साँच रहए भय भीत । 
सभेय समाजु के माझ, होत सभिक के जीत ।२५९१। 
भावार्थ : -- जहाँ असत्य भयहीन होता है वहां सत्य सदैव भयभीत रहता है  । वहां विद्वानों के समाज के मध्य असभ्य द्युतिकार विजय प्राप्त करते हैं ॥ 

दुर्मतिन्हि की सभा में, मह दुरमति पति होए । 
सकल सदस  को बस करे, दुर्मत सम्मत जोए ।२५९२ । 
भावार्थ : --दुर्बुद्धियों की सभा में महा दरबुद्धि ही पति के पद को प्राप्त होता है । ऐसी सभा में सभी सदस्यों को प्रभावित कर दुर्मत ही सम्मति संकलित करता है ॥ 

 राउ करत कुचालि परत ,पउ बारह के दाँव । 
खेतिहारु बचाई ले खेत सेत घर गाँव 
।२५९३। 
भावार्थ : -- अधिनायक  कुचालि कर रहा है और पौ बारह का दांव पड़ा है  ।  हे खेतिहर तू खेत के संग अपना घर अपने गांव को बचा ॥ 

को वस्तु नहि आपनी,जहँ न होत  को राए । 
मीन सरिस सब  लोग  तहँ लेइ  परस्पर खाएँ ।। 
-----॥ महर्षि  वाल्मीकि ॥ -----
भावार्थ : -- जहाँ कोई राजा नहीं होता वहां कोई भी वस्तु अपनी नहीं होती, जहां  कोई वस्तु अपनी न हो वहां शासन व्यवस्था नहीं होती  । मछली की भांति वहां सब लोग एक दूसरे को खाने में लगे रहते हैं ॥

टू बी कंटिन्यू .....

कतहुँ कलकल करत सरित कतहुँ त गिरी बिसाल । 
सागर घिरी बिसम्भरा फरी फुरी सब काल ।२५९४ । 
भावार्थ : --कहीं कलकल करती हुई सरिता कहीं विशाल गिरीराज । सागर से घिरी विश्व का भरण पोषण करने में समर्थ यह पावन भूमि सभी ऋतुओं  में फलीभूत रही ॥

कल जंत्री मल मुख मले, सीकस  भए  बन खेत । 
काल  कलुषित बरन बरे भयउ खेह मरु  रेत ।२५९५-। 

कुमारग पर चरन धरे, शासक बारे कुनीति । 
बन हरे खेतखन हरे हरे हरित सब रीति ।२५९५-

भावार्थ : -- खेद है कि संयंत्रों के अवशिष्ट रूपी मल को मुख पर मले वन सहित कृषि  क्षेत्र  बंजर कर दिए गए । समय ने ऐसा  कलुषित वर्ण वरण  किया कि स्वर्णमयी मिटटी काले मरुस्थल की रेत  के सदृश्य हो गई ॥

भावार्थ : - कारण यह रहा कि कुमार्ग पर चरण धरते  हुवे स्वार्थी शासकों ने कुरीतियों का वरण किया । उन्होंने वन का हरण किया  खेत खण्डों का हरण किया येन केन प्रकारेण वाली रीति से  इस विश्वंभरा  की हरियाली को ही हर लिया ॥

करम कारि कृपनी करे ,  कलधर धन्वन होइ  । 
खेत करन  बहु कठिन भए हे न हलधर कोइ ।२५९६ । 
भावार्थ : -- ये  कुनीतियाँ श्रमशील धनी किसानों को तो दिनोदिन दीन और संयंत्र धारी निर्धनों को धवन करती चली \से । परिणाम यह हुवा कि धन के अभाव में जुताई बुवाई बहुंत ही कठिन हो गई और हलधर हल को त्यागते चले गए । कृषि उत्पादन  अपने न्यूनतम  स्तर पर पहुँच गया और इस विश्वम्भरा का  बचपन कुपोषित हो गया ॥

कबहु कर बिनु काम गहै कबहु बिनहि देहारि । 
खेतिहारी हरिअरी अस बिनहि करम भए कारि ।२५९७ । 
भावार्थ : -- फिर तो कभी इनके हाथ को  काम न मिला तो कभी दिहाड़ी नहीं मिली । इस प्रकार ये किसान जो विश्व के पालन हारी थे  धीरे धीरे बंधुवा श्रमिक बन गए, और निर्धन रेखा  के नीचे धकेल दिए गए ॥

कलधर के मुख हंस हँसि श्रमहर के मुख पीर । 
हाड़तोड़ श्रम बारि कर जावैं  मोती हीर ।२५९८। 
भावार्थ : -- ये लूट उद्योग पतियों के मुख पर तो  हंस सी हंसी खिलाती  रही । श्रमिकों के मुख पीड़ा गहराती  रही  । ये हाड़  तोड़ परिश्रम करते  श्रम वारि से  सींच  कर हीरे और मोती उगाते रहे ॥


श्रमहर कर बिनु दिहारी, भए  ऐसे असहाए । 
एक समउ के भोजन में अपना सब किछु दाए ।२५९। 
भावार्थ :--इन बंधुआ श्रमिको का हाथ बिना दिहाड़ी के फिर इतना विवश व् असहाय हो गया कि ये एक समय के भोजन में  अपना सब कुछ लुटाते गया  ॥  एक ढोंगी महात्मा कह गया की भूखे पेट बुद्धि नहीं आती यदि सत्ता हथियानी है तो अधिसंख्यक को भूखा रखो । ये नेता उसका अनुशरण करते गए इनका सब कुछ लूट  कर सत्ता धारी बने और बने रहे ॥

कहाँ किसान के किसानी कहँ सचिवनि की जात । 
जे जगत के पेट भरें,अरु जे मारें लात । २६०० । 
भावार्थ :--कहाँ तो किसान की किसानी और कहाँ नेताओं की गंदी जात । ये तो संसार के पेट की पूर्ति करते  और ये उसी पेट पर लात मारते  ।।


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