जहँ असाँच भयहीन तहँ साँच रहए भय भीत ।
टू बी कंटिन्यू .....
कतहुँ कलकल करत सरित कतहुँ त गिरी बिसाल ।
सागर घिरी बिसम्भरा फरी फुरी सब काल ।२५९४ ।
भावार्थ : --कहीं कलकल करती हुई सरिता कहीं विशाल गिरीराज । सागर से घिरी विश्व का भरण पोषण करने में समर्थ यह पावन भूमि सभी ऋतुओं में फलीभूत रही ॥
कल जंत्री मल मुख मले, सीकस भए बन खेत ।
काल कलुषित बरन बरे भयउ खेह मरु रेत ।२५९५-क ।
कुमारग पर चरन धरे, शासक बारे कुनीति ।
बन हरे खेतखन हरे हरे हरित सब रीति ।२५९५-ख।
भावार्थ : -- खेद है कि संयंत्रों के अवशिष्ट रूपी मल को मुख पर मले वन सहित कृषि क्षेत्र बंजर कर दिए गए । समय ने ऐसा कलुषित वर्ण वरण किया कि स्वर्णमयी मिटटी काले मरुस्थल की रेत के सदृश्य हो गई ॥
भावार्थ : - कारण यह रहा कि कुमार्ग पर चरण धरते हुवे स्वार्थी शासकों ने कुरीतियों का वरण किया । उन्होंने वन का हरण किया खेत खण्डों का हरण किया येन केन प्रकारेण वाली रीति से इस विश्वंभरा की हरियाली को ही हर लिया ॥
करम कारि कृपनी करे , कलधर धन्वन होइ ।
खेत करन बहु कठिन भए हे न हलधर कोइ ।२५९६ ।
भावार्थ : -- ये कुनीतियाँ श्रमशील धनी किसानों को तो दिनोदिन दीन और संयंत्र धारी निर्धनों को धवन करती चली \से । परिणाम यह हुवा कि धन के अभाव में जुताई बुवाई बहुंत ही कठिन हो गई और हलधर हल को त्यागते चले गए । कृषि उत्पादन अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँच गया और इस विश्वम्भरा का बचपन कुपोषित हो गया ॥
कबहु कर बिनु काम गहै कबहु बिनहि देहारि ।
खेतिहारी हरिअरी अस बिनहि करम भए कारि ।२५९७ ।
भावार्थ : -- फिर तो कभी इनके हाथ को काम न मिला तो कभी दिहाड़ी नहीं मिली । इस प्रकार ये किसान जो विश्व के पालन हारी थे धीरे धीरे बंधुवा श्रमिक बन गए, और निर्धन रेखा के नीचे धकेल दिए गए ॥
सभेय समाजु के माझ, होत सभिक के जीत ।२५९१।
भावार्थ : -- जहाँ असत्य भयहीन होता है वहां सत्य सदैव भयभीत रहता है । वहां विद्वानों के समाज के मध्य असभ्य द्युतिकार विजय प्राप्त करते हैं ॥
दुर्मतिन्हि की सभा में, मह दुरमति पति होए ।
सकल सदस को बस करे, दुर्मत सम्मत जोए ।२५९२ ।
भावार्थ : --दुर्बुद्धियों की सभा में महा दरबुद्धि ही पति के पद को प्राप्त होता है । ऐसी सभा में सभी सदस्यों को प्रभावित कर दुर्मत ही सम्मति संकलित करता है ॥
भावार्थ : -- अधिनायक कुचालि कर रहा है और पौ बारह का दांव पड़ा है । हे खेतिहर तू खेत के संग अपना घर अपने गांव को बचा ॥
राउ करत कुचालि परत ,पउ बारह के दाँव ।
खेतिहारु बचाई ले खेत सेत घर गाँव ।२५९३।
खेतिहारु बचाई ले खेत सेत घर गाँव ।२५९३।
को वस्तु नहि आपनी,जहँ न होत को राए ।
मीन सरिस सब लोग तहँ लेइ परस्पर खाएँ ।।
-----॥ महर्षि वाल्मीकि ॥ -----
भावार्थ : -- जहाँ कोई राजा नहीं होता वहां कोई भी वस्तु अपनी नहीं होती, जहां कोई वस्तु अपनी न हो वहां शासन व्यवस्था नहीं होती । मछली की भांति वहां सब लोग एक दूसरे को खाने में लगे रहते हैं ॥टू बी कंटिन्यू .....
कतहुँ कलकल करत सरित कतहुँ त गिरी बिसाल ।
सागर घिरी बिसम्भरा फरी फुरी सब काल ।२५९४ ।
भावार्थ : --कहीं कलकल करती हुई सरिता कहीं विशाल गिरीराज । सागर से घिरी विश्व का भरण पोषण करने में समर्थ यह पावन भूमि सभी ऋतुओं में फलीभूत रही ॥
कल जंत्री मल मुख मले, सीकस भए बन खेत ।
काल कलुषित बरन बरे भयउ खेह मरु रेत ।२५९५-क ।
कुमारग पर चरन धरे, शासक बारे कुनीति ।
बन हरे खेतखन हरे हरे हरित सब रीति ।२५९५-ख।
भावार्थ : -- खेद है कि संयंत्रों के अवशिष्ट रूपी मल को मुख पर मले वन सहित कृषि क्षेत्र बंजर कर दिए गए । समय ने ऐसा कलुषित वर्ण वरण किया कि स्वर्णमयी मिटटी काले मरुस्थल की रेत के सदृश्य हो गई ॥
भावार्थ : - कारण यह रहा कि कुमार्ग पर चरण धरते हुवे स्वार्थी शासकों ने कुरीतियों का वरण किया । उन्होंने वन का हरण किया खेत खण्डों का हरण किया येन केन प्रकारेण वाली रीति से इस विश्वंभरा की हरियाली को ही हर लिया ॥
करम कारि कृपनी करे , कलधर धन्वन होइ ।
खेत करन बहु कठिन भए हे न हलधर कोइ ।२५९६ ।
भावार्थ : -- ये कुनीतियाँ श्रमशील धनी किसानों को तो दिनोदिन दीन और संयंत्र धारी निर्धनों को धवन करती चली \से । परिणाम यह हुवा कि धन के अभाव में जुताई बुवाई बहुंत ही कठिन हो गई और हलधर हल को त्यागते चले गए । कृषि उत्पादन अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँच गया और इस विश्वम्भरा का बचपन कुपोषित हो गया ॥
कबहु कर बिनु काम गहै कबहु बिनहि देहारि ।
खेतिहारी हरिअरी अस बिनहि करम भए कारि ।२५९७ ।
भावार्थ : -- फिर तो कभी इनके हाथ को काम न मिला तो कभी दिहाड़ी नहीं मिली । इस प्रकार ये किसान जो विश्व के पालन हारी थे धीरे धीरे बंधुवा श्रमिक बन गए, और निर्धन रेखा के नीचे धकेल दिए गए ॥
कलधर के मुख हंस हँसि श्रमहर के मुख पीर ।
हाड़तोड़ श्रम बारि कर जावैं मोती हीर ।२५९८।
भावार्थ : -- ये लूट उद्योग पतियों के मुख पर तो हंस सी हंसी खिलाती रही । श्रमिकों के मुख पीड़ा गहराती रही । ये हाड़ तोड़ परिश्रम करते श्रम वारि से सींच कर हीरे और मोती उगाते रहे ॥
श्रमहर कर बिनु दिहारी, भए ऐसे असहाए ।
एक समउ के भोजन में अपना सब किछु दाए ।२५९९।
भावार्थ :--इन बंधुआ श्रमिको का हाथ बिना दिहाड़ी के फिर इतना विवश व् असहाय हो गया कि ये एक समय के भोजन में अपना सब कुछ लुटाते गया ॥ एक ढोंगी महात्मा कह गया की भूखे पेट बुद्धि नहीं आती यदि सत्ता हथियानी है तो अधिसंख्यक को भूखा रखो । ये नेता उसका अनुशरण करते गए इनका सब कुछ लूट कर सत्ता धारी बने और बने रहे ॥
कहाँ किसान के किसानी कहँ सचिवनि की जात ।
जे जगत के पेट भरें,अरु जे मारें लात । २६०० ।
भावार्थ :--कहाँ तो किसान की किसानी और कहाँ नेताओं की गंदी जात । ये तो संसार के पेट की पूर्ति करते और ये उसी पेट पर लात मारते ।।
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