तिनके रीत रीत कहेँ देवें साधू वाद ।
जो कोउ बिपरीत रहेँ तासो संग विवाद ।२६७१ ।
भावार्थ : -- इनके सुर में जो सुर मिलाता वह साधु वाद को प्राप्त होता ।जो कोई करकस कह देता वह फिर विवादित-वस्तु हो जाता और न्यायालयों में पड़ा मिलता ॥
जन जन के धन सम्पदा बन खन खेत खदान ।
किए मन मानी आपनी जानत उत्तरु दान ।२६७२।
भावार्थ:--भारत के साधारण नागरिक जनों की धन सम्पति और उनके वन खंड खेत व् प्राकृतिक सम्पदा को पैतृक सम्पति जान कर ये मन माना व्यवहार करते ।
स्पष्टीकरण :-- संयुक्त परिवार का जब विभाजन होता है तब पारिवारिक सम्पति के सह उसपर अधिरोपित ऋण का भी विभाजन होता है.....
काम बिनु कर नाम चहेँ,रहएँ बिदेसी ठाम ।
चमक चाँदनी चाम किए आठो जाम बिश्राम ।२६७३।
भावार्थ : -- ये सत्ताधारी विदेशों में रहकर बिना काम के ही नाम करना चाहते । इनकी बनी-ठनी काया चौबीस घंटे विश्राम की ही मांग करती ॥
स्पष्टीकरण : - खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है सो बाद वाले भी इन्ही के रंग में रंग गए ॥
लाख राख रख आपने देवे लाखों लाख ।
जहाँ देस का राखिया, तहँ गड़ावैं आँख । २६७४।
भावार्थ : -- लाखों लाख पारिश्रमिक दे करये बिचौलिये अपने लाखों रक्षक रखते । जहाँ देश की कोई रक्षा कर रहा होता वहां इनकी कुदृष्टि रहती ॥
काल बरन के मानिके गौर परन अवगूँठ ।
बाहिर साँचा पट दियो, भीतर झूठहि झूठ ।२६७५।
भावार्थ : -- काल वर्ण के मनकों को गौर पर्ण में गोपन कर इन्होने ऐसा संविधान रचा जिसके मुख पृष्ठ पर सत्य लिखा था भीतर झूठ ही झूठ ॥
आन पास छूटत फसे संविधान के फास ।
जुग जुग के गोसाइयाँ रहे दास के दास ।२६७६।
भावार्थ :-- पराई अधीनता से मुक्त हुवा तो इस असंवैधानिक संविधान के फंद में फंस गया । युगों का स्वामी होकर भी यह भारतीय जन मानस दास का दास ही रहा ॥
सासक सेवक जान के पड़े भरम मैं लोग ।
जीवति बिहीन होत भए जीवन जोग बिजोग ।२६७७।
भावार्थ : -- शासक को सेवक व् स्वयं को स्वामी मानकर लोग भ्रमित रहे और इस दासता को वरण किए रहे । आजीविका रहित होकर इन दासों का जीवन आधार भूत आवश्यकताओं से भी विहीन रहता ॥
सुजल सुफल सरूप रही जाकी अगद अगानि ।
नाज तोले तोल मिले मोल मिले तहँ पानि ।२६७८।
भावार्थ :-- देश वासी जिस देश का पवित्र जल से फल से शस्य सम्पद् से परिपूर्ण रूप में अगद जय गान करते ॥ वहां अब अन्न तोले के तोल व् जल मोल मिलने लगा ॥
निर्झर रहे न निरझरी रहे न सरिबर ताल ।
कलजंत्रि मल संग मिले , नदी भई परनाल । २६७९।
भावार्थ : -- निर्झर रहे न निर्झरणी ही रही सरोवर ताल आदि जल के स्त्रोत समाप्त हो गए । कलयंत्रों के अवशिष्ट का सांगत प्राप्त कर नदियाँ परनालों में परिणित होने लगी ॥
काल कलुषि क्लजंत्र की कला पसारे पाँउ ।
देस रहे न देस अजहुँ, गाँउ रहे नहि गाँउ ।२६८०।
भावार्थ : -- प्रदुषण कारी कलुषित कलयंत्रों की कला अपने पाँव पसार चुकी थीं । भारत अब भारत नहीं रहा उसके गाँव अब गांव नहीं रहे वे काले मरुस्थल में परिवर्तित होने लगे ॥
जो कोउ बिपरीत रहेँ तासो संग विवाद ।२६७१ ।
भावार्थ : -- इनके सुर में जो सुर मिलाता वह साधु वाद को प्राप्त होता ।जो कोई करकस कह देता वह फिर विवादित-वस्तु हो जाता और न्यायालयों में पड़ा मिलता ॥
जन जन के धन सम्पदा बन खन खेत खदान ।
किए मन मानी आपनी जानत उत्तरु दान ।२६७२।
भावार्थ:--भारत के साधारण नागरिक जनों की धन सम्पति और उनके वन खंड खेत व् प्राकृतिक सम्पदा को पैतृक सम्पति जान कर ये मन माना व्यवहार करते ।
स्पष्टीकरण :-- संयुक्त परिवार का जब विभाजन होता है तब पारिवारिक सम्पति के सह उसपर अधिरोपित ऋण का भी विभाजन होता है.....
काम बिनु कर नाम चहेँ,रहएँ बिदेसी ठाम ।
चमक चाँदनी चाम किए आठो जाम बिश्राम ।२६७३।
भावार्थ : -- ये सत्ताधारी विदेशों में रहकर बिना काम के ही नाम करना चाहते । इनकी बनी-ठनी काया चौबीस घंटे विश्राम की ही मांग करती ॥
स्पष्टीकरण : - खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है सो बाद वाले भी इन्ही के रंग में रंग गए ॥
लाख राख रख आपने देवे लाखों लाख ।
जहाँ देस का राखिया, तहँ गड़ावैं आँख । २६७४।
भावार्थ : -- लाखों लाख पारिश्रमिक दे करये बिचौलिये अपने लाखों रक्षक रखते । जहाँ देश की कोई रक्षा कर रहा होता वहां इनकी कुदृष्टि रहती ॥
काल बरन के मानिके गौर परन अवगूँठ ।
बाहिर साँचा पट दियो, भीतर झूठहि झूठ ।२६७५।
भावार्थ : -- काल वर्ण के मनकों को गौर पर्ण में गोपन कर इन्होने ऐसा संविधान रचा जिसके मुख पृष्ठ पर सत्य लिखा था भीतर झूठ ही झूठ ॥
आन पास छूटत फसे संविधान के फास ।
जुग जुग के गोसाइयाँ रहे दास के दास ।२६७६।
भावार्थ :-- पराई अधीनता से मुक्त हुवा तो इस असंवैधानिक संविधान के फंद में फंस गया । युगों का स्वामी होकर भी यह भारतीय जन मानस दास का दास ही रहा ॥
सासक सेवक जान के पड़े भरम मैं लोग ।
जीवति बिहीन होत भए जीवन जोग बिजोग ।२६७७।
भावार्थ : -- शासक को सेवक व् स्वयं को स्वामी मानकर लोग भ्रमित रहे और इस दासता को वरण किए रहे । आजीविका रहित होकर इन दासों का जीवन आधार भूत आवश्यकताओं से भी विहीन रहता ॥
सुजल सुफल सरूप रही जाकी अगद अगानि ।
नाज तोले तोल मिले मोल मिले तहँ पानि ।२६७८।
भावार्थ :-- देश वासी जिस देश का पवित्र जल से फल से शस्य सम्पद् से परिपूर्ण रूप में अगद जय गान करते ॥ वहां अब अन्न तोले के तोल व् जल मोल मिलने लगा ॥
निर्झर रहे न निरझरी रहे न सरिबर ताल ।
कलजंत्रि मल संग मिले , नदी भई परनाल । २६७९।
भावार्थ : -- निर्झर रहे न निर्झरणी ही रही सरोवर ताल आदि जल के स्त्रोत समाप्त हो गए । कलयंत्रों के अवशिष्ट का सांगत प्राप्त कर नदियाँ परनालों में परिणित होने लगी ॥
काल कलुषि क्लजंत्र की कला पसारे पाँउ ।
देस रहे न देस अजहुँ, गाँउ रहे नहि गाँउ ।२६८०।
भावार्थ : -- प्रदुषण कारी कलुषित कलयंत्रों की कला अपने पाँव पसार चुकी थीं । भारत अब भारत नहीं रहा उसके गाँव अब गांव नहीं रहे वे काले मरुस्थल में परिवर्तित होने लगे ॥