शनिवार, 30 मई 2015

--- ॥ दोहा-दशम २६७ ॥ -----

तिनके रीत रीत कहेँ  देवें साधू वाद । 
जो कोउ बिपरीत रहेँ तासो संग विवाद ।२६७१ । 
भावार्थ : -- इनके सुर में जो सुर मिलाता वह साधु वाद को प्राप्त होता ।जो कोई करकस कह देता वह फिर विवादित-वस्तु हो जाता और न्यायालयों में पड़ा मिलता ॥

जन जन के धन सम्पदा बन खन खेत खदान । 
किए मन मानी आपनी जानत उत्तरु दान ।२६७२। 
भावार्थ:--भारत के साधारण नागरिक जनों की धन सम्पति  और उनके वन खंड खेत व् प्राकृतिक सम्पदा को पैतृक सम्पति जान कर ये मन माना व्यवहार करते ।

स्पष्टीकरण :-- संयुक्त परिवार का जब विभाजन होता है तब पारिवारिक सम्पति के सह उसपर अधिरोपित ऋण का भी विभाजन होता है.....

काम बिनु कर नाम चहेँ,रहएँ बिदेसी ठाम । 
चमक चाँदनी चाम किए आठो जाम बिश्राम ।२६७३। 
भावार्थ : -- ये सत्ताधारी विदेशों में रहकर बिना काम के ही नाम करना चाहते । इनकी बनी-ठनी काया चौबीस घंटे विश्राम की ही मांग करती ॥

स्पष्टीकरण : - खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है सो बाद वाले भी इन्ही के रंग में रंग गए ॥

लाख राख रख आपने देवे लाखों लाख । 
जहाँ देस का राखिया, तहँ गड़ावैं आँख । २६७४। 
भावार्थ : -- लाखों लाख पारिश्रमिक दे करये बिचौलिये अपने लाखों रक्षक रखते । जहाँ देश की कोई रक्षा कर रहा होता वहां इनकी कुदृष्टि रहती ॥ 

काल बरन के मानिके गौर परन अवगूँठ । 
बाहिर साँचा पट दियो, भीतर झूठहि झूठ ।२६७५।  
भावार्थ : -- काल वर्ण  के मनकों को गौर पर्ण में गोपन कर इन्होने  ऐसा संविधान रचा  जिसके मुख पृष्ठ पर सत्य लिखा था भीतर झूठ ही झूठ  ॥


आन पास छूटत फसे संविधान के फास । 
जुग जुग के गोसाइयाँ रहे दास के दास ।२६७६।  
भावार्थ :-- पराई अधीनता से मुक्त हुवा तो इस असंवैधानिक संविधान के फंद में  फंस गया  । युगों का  स्वामी होकर भी यह भारतीय जन मानस दास का दास ही रहा ॥

सासक सेवक जान के पड़े भरम मैं लोग ।
जीवति बिहीन होत भए  जीवन जोग बिजोग ।२६७७। 
भावार्थ : -- शासक को सेवक व् स्वयं को स्वामी मानकर लोग भ्रमित रहे और इस दासता को वरण  किए रहे । आजीविका रहित होकर इन दासों का जीवन  आधार भूत  आवश्यकताओं  से भी विहीन रहता ॥

सुजल सुफल सरूप रही जाकी अगद अगानि । 
नाज तोले तोल मिले मोल मिले तहँ पानि ।२६७८। 
भावार्थ :-- देश वासी जिस  देश का पवित्र जल से  फल से शस्य सम्पद् से परिपूर्ण रूप में अगद जय गान करते ॥  वहां अब अन्न  तोले के तोल व् जल मोल मिलने लगा ॥


निर्झर रहे न निरझरी रहे न सरिबर ताल । 
कलजंत्रि मल संग मिले , नदी भई परनाल । २६७९। 
भावार्थ : -- निर्झर रहे न निर्झरणी ही रही सरोवर ताल आदि जल के स्त्रोत समाप्त हो गए । कलयंत्रों के अवशिष्ट का सांगत प्राप्त कर नदियाँ परनालों में परिणित होने लगी ॥ 

काल कलुषि क्लजंत्र की कला पसारे पाँउ । 
देस रहे न देस अजहुँ,  गाँउ रहे नहि गाँउ ।२६८०। 
भावार्थ : -- प्रदुषण कारी  कलुषित कलयंत्रों की कला अपने पाँव  पसार चुकी थीं । भारत अब भारत नहीं रहा उसके गाँव अब गांव नहीं रहे वे काले मरुस्थल में परिवर्तित होने लगे ॥







शुक्रवार, 22 मई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २६६ ॥ -----

सद्जन कहि बिसार के अपने करे प्रचार । 
तिनके पंथ नुहार के,बिगड़े देसाचार ।२६६१ । 
भावार्थ :-सज्जनों के सुविचारों को विस्मृत  कर इन्होने अपने संकीर्ण विचारोंकोपचारित किया । जो मैं और मेरा  तक ही सिमित था  ऐसे संकीर्ण पंथ के अनुकरण ने  इस देश की संस्कृति को छिन्न-भिन्न कर दिया ॥

धर्म कर्म भरमाए  पुनि भयउ पाप के राज । 
बिगड़े देसाचार सों बिगड़े जाति समाज ।२६६२। 
भावार्थ :-- धर्म कर्म को विभ्रमित कर फिर देश पर  पाप का ही राज हो गया । छिन्न-भिन्न संस्कृति के सह जाति  व् समाजों में भी विकृतियां पनपने लगी ॥


प्रिया रहे न पिया रहे रहे न कतहुँ प्यार ।
बँधे बंधन छूट रहे टूट रहे परिवार ।२६६३ । 
भावार्थ : - अब गृह तो रहा किन्तु गृहस्थी न रही, गृहवासी गृहस्थ न रहे  । विदेशी संस्कृति के अनुकरण से विवाह सम्बन्ध छूटने लगे परिवार टूटने लगे ॥ 


सुवासस सबहि तन चहेँ बासन चहेँ सुबास । 
बिंहि करम बिनहि परिश्रम जीवन चाहें सुपास ।२६६४। 
भवार्थ : -- देश भीतर के विदेश की चकाचौंध को देखकर लोगों के विचार पतित हो चले । वे कर्म व् परिश्रम के बिना ही आकर्षक वस्त्र धारण किए हुवे विलसित वसतियों में वास  कर सुखमय जीवन कामना करते॥ 

भारत के धन सम्पदा जब चहँ लेइ निकास ।
 देस भीत बिदेस के दिन दिन करे बिकास ।२६६। 
भावार्थ:-- इसी सुखमय जीवन का सपना दिखाकर स्वेच्छाचारी शासक भारत की धन सम्पद का निष्कासन तो कर लेते उसे देते कुछ नहीं ।  कुछ देते भी तो उससे देश के भीतर बसे विदेश को देते परिणाम स्वरूप यह दिनोंदिन विकसित होता गया ॥

मूल नागरी नगन किए किए गन मान अमूल । 
यापद  सूलहि सूल दिए यापद फूलहि फूल ।२६६। 
भावार्थ :--देश  नगरिकों की अवहेलना कर अन्यान्य मूलहीन को गणमान्य किया । मूल  नागरिको को उसके जीवन हेतु से भी वंचित कर मूल हीन को साधन-संपन्न किया ॥ देश के वास्तविक उत्पादन  (कृषि व् तत्संबंधित अन्य उत्पाद ) में इन मूलहीनों की सहभागिता  लगभग शुन्य रही ॥

भोग परायन होए जब,चित पर छाए प्रमाद ।
सासक  भयउ अधिनायक, सासन सत्ता वाद ।२६६७।
भावार्थ :-- भोग विलासिता के वशीभूत शासक सत्ता से प्रमादित होकर स्वेच्छाचारी हो गए वे कर्त्तव्य से निवृत्त  अकर्त्तव्य को कार्य रूपमें परिणित करने लगे शासन पर सत्तावाद का अधिकार हो गया ॥

सत्तावाद =

आन कही पुरान कहे अपनी  कही नवान । 
जो ताहि अनुमान कहे होइब सोए  बिधान ।२६६८। 
भावार्थ : -- अन्यान्य के कथन को ये पुराण पंथी  कहते  अपने आपा  पंथी विचारों को आधुनिक कहते । ज्ञान विज्ञानं से अन्यथा  इनका अनुमान जो कहता वही विधान होता ॥

स्पष्टीकरण : -- जब संसार में कोई भी धर्म प्रवर्तित नहीं हुवा था यह आपा-पंथ तब से है

धर्म धुरीन के कर भए बिपनन संग बिहीन। 
पबित जात कुलहीन भए कलुखित जात  कुलीन।२६६९। 
भावार्थ:--धर्म की धुरी धारण करने वालों के हस्त विपणन कार्य से विहीन हो गए  । परिणामतस् पवित्र कुलों के जातक कुलहीन व् अपवित्र कुल के जातक  कुलीन हो गए । 

धर्मी कर कृपनी करत  पापी करे धनेस । 
जन जन की धन सम्पदा पहुचे बाहिर देस । २६७० । 
भावार्थ: --इस तथाकथित कुलीनता ने राष्ट्र की आर्थिक शक्ति धर्मधी से पापधी  को हस्तांतरित कर दी  ।  जो जन साधारण की निर्मल सम्पदा थी वह कलुषित होकर द्रुतगति से विदेशों में पहुंचने लगी ॥ 













सोमवार, 18 मई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २६५ ॥ -----

सिंहासन के  रन ठने पुनि दुहु खल दल बीच । 
हाथ ही के साथ  रहे गहे कमल दल कीच ।२६५१ । 
भावार्थ: -- पुनश्च चुनाव हुवे जो इण्डिया की गद्दी के लिए युद्ध ही था ।  दुष्टों के दल आमने-सामने थे । कीचड़ में धंसा कमल हाथ के साथ ही विराजित प्रतीत होता । लड़ाई वही थी शासन तो  अंग्रेजी होगा  अंग्रेज हम बनेंगे ।।

सिंहासन के लालची फिरैं दुआरि  दुआरि । 
रंकु राउ सुपनाए के अपने होइ भिखारि ।२६५२ । 
भावार्थ : -- गद्दी के लालची दुआर दुआर फिरते । ये जन साधारण को राजा बनने के सपने दिखाते, स्वयं भिखारी का छद्म वेश भरे हुवे होते  ॥

 बड़े ठिकाने ठौर के भँवरे पौरहि पौर । 
काढे दंत निहोर किए मांगे मत के  कौर ।२६५३ । 
भावार्थ : -बड़े ठौर ठिकानों के भी स्वान के जैसे मत रूपी टुकड़े के लिए  द्वार द्वार जाते और गिड़गिड़ाते हुवे याचना करते ॥

जनमत जल जन जलधिभए मथे भूत बेताल 
प्रगसि सत्ता सुधा कलस  पावन  करे कुचाल ।२६५४ । 
भावार्थ : --   जन संकुलता सिंधु स्वरूप हो गई तब जनमत जल हो गया । दुष्टों का द्विदल फिर उसका मंथन करने लगा । जब सत्ता का अमृत कलश प्रकट हुवा तब उसे प्राप्त करने हेतु सभी दुष्ट चालें चलने लगे ॥ 


अहिरनिस जग होइ रहए होइ  रहए सब बात । 
जब जागै  तब दिन भया,जब सोया तब रात ।२६५५। 
भावार्थ : -- रात व् प्रभात होते रहे जगत के सारे प्रपंच भी होते ही रहे  । जो सोए रहे उनका अन्धेरा ही रहा जगा सबेरा उसी का हुवा ॥

दरसन मैं तो  हस्ततल  करतन मैं जो ठूँठ ।
धावत ऊँचे पद चढ़े, सुधा कलस अवगूँठ ।२६५५ ।
भावार्थ : --  दर्शन में जोहस्ततल ही काम करने में जो टुंडा हो जाता है जो अपनी समझ के नरेश हैं । वे उस सत्ता के सुधा  कलश को छिपाते हुवे ले भागे और ऊँचे सिंहासन पर जा बैठे ॥ 

सत्ता सुधा खल कर दै  जन जन भए महकाल । 
दुराचार बिष पान किए गहेउ कंठ ब्याल ।२६५६।
भावार्थ : -- सत्ता का सुधा कलश दुष्टों के हाथ लग गया । दुराचार रूपी विष का पान कर जन साधारण महाकाल हो गया उसने अपराधियों, हिंसा व् आतंकवादियों को अपने कंठ में ग्रहण कर लिया ॥

एक लघु दरसी बिअ  भीत एक बट बिटप बिसाल । 
जन जनहि जन पाल रूप  जनहि रूप महकाल ।२५८६ । 
भावार्थ :--एक लघुदर्शी बीज के भीतर  एक विशाल वटवृक्ष होता है ।जन साधारण ही जग पालक  है संचालक है वही महा विनाशक महाकाल का रूप है शासकों को यह संज्ञान न हुवा ॥

भूखे पेट प्रहार को झूठे करे प्यार । 
जीते जी को मार के  जोते हारनि हार ।२६५४ । 
भावार्थ : -- भूखे के पेट पर रोटी का  प्रहार कर किसी ने झूठा प्यार दिखाया । उन्हें जीते जी मार के हारी हुई सत्ता को पुनश्च जीत ली ॥

राम भरोसा भूर के रहे भरोसे और । 
पंच परोसा  दूर के मूरख माँगे कौर ।२६५५। 
----- ॥ गोस्वामि तुलसी दास ॥-----
भावार्थ : -- ईश्वर ने कितना कुछ रचा है जो  ईश्वर का भरोसा छोड़ के अन्यान्य के भरोसे रहता है वह उस मूर्ख के समान है जो पञ्च परोसा छोड़ के टुकड़ा माँगता फिरता हो ।


सत्ता के मदिरा भरे धरे बात के पात । 
पुरुख पान कर डोलिहीं, नारी रही उठात ।२६५६। 
भावार्थ : --   बातों के कुम्भ में भरी सत्ता की मदिरा का पान कर सत्तापुरुष उन कुम्भों को  इधर-उधर फेंकते, डोलते, गिरते, फिरते   स्त्रियां उन्हें और उनकी मद्य पात्रों  को उठातीं  क्या यही है स्वच्छता अभियान.....?

जो केहि जोग नहीं सो बने फिरए जग राए । 
झाँकर घर कर  आपने दूजे झाँक बताए ।२६५७ । 
भावार्थ:-- जो किसी योग्य नहीं थे वे जगन्नाथ बने फिरते ।  अपने घर का  दूर से अपूर्ण दर्शन कर  दूसरे के घरों की झाँकी निकालते ॥ 


जन सेबक एहि देस के अपने समझ नरेस । 
उड़न खटोले उड़ फिरै  पड़े रहे परदेस ।२६५८। 
भावार्थ : -- इस देश के जन सेवक स्वयं को नरेश समझ कर उड़न खटोला उड़ाते फिरते  और विदेशों में पड़े रह कर रंगरलियां मनाते दिखते ॥

टिप्पणी : -- जैसे कई लोग अपने आपको भगवान समझते हैं किन्तु होते नहीं हैं उसी प्रकार ये नेता अपने आपको भारत-नरेश समझते हैं और पुराने जमाने के जैसे भेष बदल के लोगों के घर झाँकते फिरते हैं ॥ 

एक नागरिक को चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हो कितने समय तक विदेश में होना चाहिए.....

बहुंत प्रीति पुजाइब मैं पूजिब मैं नहि थोरि । 
नाउ जन (हरि)सेबक धरिहै, करिहैं डाका चोरि।२६५९। 
भावार्थ : - संविधान ने इनका नाम जनसेवक रखा । इनकी रूचि सेवा करवाने में रहती, करने में नहीं । करने में  करने में तो ये केवल डाके-चोरी ही करते ॥ 

परजन कंठ लगाए के तिनकी कहि पतियाए ।
होत पराया देस सन रहे जोग को नाए ।२६६० । 
भावार्थ :-- जो विदेशियों को अपना कर उनकी कही में आता है । वह अपने देश से पराया होकर किसी योग्य नहीं रहता ॥ 

 

शनिवार, 16 मई 2015

--- ॥ दोहा-दशम २६४ ॥ -----

 
अन्यानए नए सासनहु   अनुहरि  आपा पंथ  ।
पाखन बाद बिस्तारै,गुपुत होंहि सतग्रंथ  ।२६४१ । 
भावार्थ:-   शासक नए नए हुवे किन्तु संविधान वही रहा ये नए भी  आपापंथीयों का ही अनुशरण करते  ।  पाखंड वाद (गांधी वाद - सार्वजनिक जीवन में साधु बने रहो व्यक्तिक जीवन में रावण  )  के प्रचार-प्रसार ने सद्ग्रन्थों को विलुप्त  कर  दिया था  ॥

अबिधानि संबिधान ने, अर्थार्थ  किए परम । 
कर्म रहे न कर्म अजहुँ धर्म रहे नहि धर्म ।२४२
भावार्थ :- विधि विरुद्ध संविधान ने अर्थ व् उसके प्रयोजनों को ही श्रेष्ठ कहा । परिणामतस्  यह देश शास्त्रविहित कर्मों से विमुख  हो गया लोगों का कोई धर्म ही नहीं रहा ।।

साख पराई बिआ बुए होवै पेड़ बबूल ।
जाके साखा फलफुले काटे बाकी मूल ।२४३। 
भावार्थ : -- परधर्मावलम्बी अपने बीज बोते  उससे तो बबुल के पेड जागते । फिर ये जिसके पेड़ से फलते फूलते उसी की जड़ को काटने  में लगे रहते ॥

जनम जात सों आपना धर्म धाम बिसराए । 
खरा दाम कुदाम होत कर कर बिकता जाए । २४४ । 
भावार्थ : -- जो  कोई अपना जनम अपनी व्यत्पत्ति अपने धर्म अपने इष्ट देवता के अधिष्ठान को विस्मृत कर देता वह मूलवान मूलहीन (अर्घापचय ) होकर एक हाथ से दूसरे हाथ बिकता जाता ॥ 

को धनी को दीनहीन,कोउ ऊँच को नीच । 
अर्थार्थी विधान ने,दिए अस रेखा दिए खीँच ।२६४५। 
भावार्थ :-- स्वार्थी विधि अधिनियमों कर्म प्रधान देश को अर्थ प्रधान देश घोषित कर ऐसी रेखा खींची कि कोई धनी हो गया  कोई दरिद्र ही रहा कोई ऊँचे  उठकर भी  नीच कोई नीचे रहकर भी ऊँचा ही रहा,  अर्थात आर्थिक दशा समाजिक दशा  को परिवर्तित नहीं कर पाई ।

समाज में अस्पृश्यता अब भी व्याप्त था यह आर्थिक आधार पर होने लगी ।  देसी और विदेशी का तो भेद ही नहीं रहा.....क्या इसे राष्ट्रवाद कहेंगे ॥

इस देश को राष्ट्र रूप में परिकल्पित किसने किया ? मुसलमानों  ने ? ईसाईयों ने ?सिख्खों ने अथवा हिन्दूओं  ने ? इसे खंड खंड किसने किया.....?

कहा गया कि आतंकवदियों का तो कोई धर्मइ नहीं होता । तो जिसका कोई धर्म नहीं हो क्या वो सभी आतंकवादी है यदि होता है तो कौन से धर्म के हैं ये आतंकवादी  ?  इसके कारण क्या है कोई अनुवांशिक रोग है क्या इनको.....?

दिले नादान तुझे हुवा क्या है आखिर इस दर्द की दवा क्या है.....

केवल बम चला  के आतंक नहीं मचता, भयोत्पादन के और भी बहुंत से उपाय हैं  ..... गाडी के चक्कों से भी  आतंक मचता है.....

 जहां कहीं भी इस्लाम की सम्बद्धता है आतंकवाद वहीँ क्यों है.....?

स्पष्टीकरण :--यह कुछ प्रश्न थे जो उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे  । इधर सूचना एवं प्रसारण माध्यम की भूमिका भी संदिग्ध दिखाई दे रही थी यह अपराध व् अपराधी के पक्ष में समर्थन संकलित करने वाली एक अवैधानिक संस्था  हो चली थी शासन  द्वारा इसका पोषण हो रहा था  ।

अजहुँ काल कतिपय लोग जीवन चहें सुपास ।
काम करें न काज करें रहँ सब सम्पद पास ।२६४६ -क ।

जीवन जोग जनाए बिनु,रहैं सुवासस बास । 
जग लग संचित सम्पदा  जब चहँ लेइ निकास ।२६४६-ख । 
 भावार्थ : --इस समय कुछ लोग ऐसे थे जो अकर्मण्य होकर आवश्यक हेतु का उत्पादन किए  बिना युगों तक संचित सम्पदा का चाहें जब निष्कासन कर बढ़िया बढ़िया वस्त्र में अच्छे अच्छे वाहनों और सुविधा से युक्त आवासों  में सुवासित जीवन की अभिलाषा करते, वे धन के लिए कुछ भी कर सकते थे ॥

दारिद दुकाल दुःख भया,दोष घोर घन घाम । 
झींकत सेबक दरसि जन जागत आठों जाम ।२६४७ । 
भावार्थ :--अधिसंख्य जन साधारण दरिद्र व् अति दरिद्र था उनकेलिए  दरिद्रता जैसे दुकाल का दुःख हो गई थी ऊपर अपराध का वैधानिककरण किसी घनघोर धूप के सदृश्य था  न्यायालय कहते मिलते हत्या करना कोई अपराध है क्या ? यह जन साधारण असाधारण जन प्रतिनिधि को दुखित दृष्टि से निहारते चौबीस घंटे जागृत रहता ॥

जब घोर तपस्या करे रत्नाकर स्वमेव । 
जग संताप हरन गगन  प्रगसे तब घन  देउ ।२६४८ । 
भावार्थ:--  जलसे शीतल रत्नाकर भी जब गहन तपस्या करता है  ।  जगत का  संताप हरण करने हेतु तभी  इंद्र देव प्रकट होते हैं ॥

चरे जीवन तपन चरन जन जन सागर रूप । 
दुःख हरण को देव गगन प्रगासे साखि सरूप ।२६४९ । 
भावार्थ:-- जब जन साधारण सिंधु के जैसे तप  करता है  दुःख हरण करने हेतु गगन से तब कोई देव प्रकट होता है ॥

बिगरत जब जम नेम दस छाए तमस घन घोर । 
बिनहि सेबा सेबक बन प्रगसे राकस चोर । २६० । 
भावार्थ:--जब परजका दस यम -नियम बिगड़ जाते हैं  तब ज्ञान का घन घोर अंधेर चा जाता है ।अन्धेरे देवते प्रकट नहीं करतेये तो व्याज वेशीसेवक स्वरूप  राक्षस व्  डाकू चोर ही प्रकट करते हैं ॥ चन्द्रमा  कोई एक ही होता है जो महर्षि वाल्मीकि, चंद्रवंशी कृष्ण कहलाता है ॥ 






शुक्रवार, 15 मई 2015

--- ॥ दोहा-दशम २६३॥ -----


अस पथ सन जन सधारन लाह लहे किछु नाह । 
 अस प्रगति सों उद्यम पति लाहै लाहहि  लाह ।२६३१ । 
भावार्थ : -- ऐसे राजपथों से जनसाधारण का कुछ भला नहीं होता  । ऐसी पथ  जनित प्रगति केवल उद्योग जगत व् उच्च वर्ग  के लाभ के लिए होती है ॥

जाके उर बस भय रहे, रच्छक भए सो भूत ।  
साजन तब का होइबे मार भगावै जूत ।२६३२। 
भावार्थ: --  भूत के जैसे  रक्षक कहीं नहीं होते लोगों में केवल उनका भय ही व्याप्त रहता । इस भय के कारण  अपराध पर  नियंत्रण रहता ॥ गेहनियाँ  गेहियों से पूछती अन्याय के जूते पड़ने से यह भय भी नहीं रहेगा तब क्या होगा ॥

देस बन ब्यापत रहे कलुष करम की आगि । 
अन्यानै सासन नवन भरकावन में लागि ।२६३३। 
भवार्थ:-- अन्याय पूर्ण वातावरण से राष्ट्र एक ऐसा वन हो चला था जहां भ्रष्टाचार सहित दुराचरण की तो जैसे आग लग गई थी ।  अन्यान्य नए शासक भी आते तो वे उसे भड़काने में लगे रहते ॥

 कौन सुने अब दीन की,कासो कहुँ कहँ जाउँ । 
ऐसी दाही दहन सन कहे संतपत राउँ ।२६३४ । 
भावार्थ :-- इस दहन कारी दहनिका से संतप्त होकर राजा कहता अब दीन की  कौन सुनेगा अपना दुःख   किससे कहूँ कहाँ जाऊं ।।

न्याउ बिकाउ बस्तु कर ,ठौर भयउ पैंठोर । 
न्यायधीस हटुआ भए अधिबक्ता पैंचोर ।२६३५ । 
भावार्थ : -- न्याय को बिकाऊ वस्तु किए न्यायलय जैसे क्रय-विक्रय केंद्र हो चले थे ॥ न्यायाधीश उस केन्द्र के संचालक व् अधिवक्ता गँठ कटिया बिचौलिए हो गए ।। 

  दंडाधीस धनेस भए  जे धन कहँ  ते आए   ।
ऎसे झूठे  ढंग को झूठे  ही पतियाए ।२६३६। 
भावार्थ:--  दण्डाधीश कुबेर हो गए धन कहाँ से आया यह एक पूछने योग्य प्रश्न था ।  ऐसे न्यायलयों पर से जन साधारण का तो विश्वास ही उठ गया,  कुबेरी न्यायधीशों वाले न्यायालय भ्रष्टाचारियों के विश्वास पर ही टीके थे ॥

सदा  मद भँवर सदन पति करे न बिधिबत काजु । 
ऊँट बिलाई ले  गई  करे सबहि सद हाँजु । २६३७ । 
भावार्थ :-- चुने हुए सांसद  एवं उनके नेता जीत के मद में उन्मत्त रहते हुवे सदैव विदेश -भ्रमण करते दिखते ।सदन में कोई भी कार्य विधिवत नहीं होता, सांसद  हाँ जी हाँ जी  कहते हुवे अपने नेता की  किसी भी अनुचित बात का समर्थन कर दिया करते ॥

भयकारि उपाए संग  को आतंक मचाए  । 
कोउ कारा बास  बसे , शासक देइ छड़ाए ।२६३८ । 
भावार्थ : --  भयोत्पादक उपायों का अवलम्बन कर राष्ट्र का दमन करते हुवे आतंकी आतंक आतत करते । यदि कोई कारावासित होता तो सत्ताधारी उसे मुक्त कर देते ।। क्यों कर देते ?

सासन  प्रबंधित न रहे रहे कतहुँ न न्याय । 
देस धाम  कुदाम होत कर कर बिकता जाए ।२६३९ । 
भावार्थ : -- इसप्रकार देश में एक अराजकता का वातावरण था न्याय भी नहीं था,  परिणामवश देश अवमूल्यन को प्राप्त होकर एक हाथ से दूसरे हाथ बिकता जाता ॥

चमक चाँदनी चाम लिए पुरनइ पटतर ऐहि । 
करे भलाई आपनी भला करे ना केहि ।२६४०-क । 

चमक चाँदनी चाम की काया मँगए न काम । 
काम काम पुकार करे आठों जाम बिश्राम ।२६४०-ख ।  
भावार्थ : -- बनी ठनी काया से काम नहीं होता वह परिश्रम नहीं कर सकती  । उसके लिए विश्राम भी बहुंत बड़ा काम है । वह चौबीस घंटे विश्राम कर कहती है हाय रे बहुंत काम है । ऐसे बनाव के लिए विलास प्रसाधन की आवश्यकता होती है विलास प्रसाधन के लिए धन चाहिए होता है, सो ये नए भी पुराने के जैसे किसी का भला नहीं करते केवल अपनी  भलाई में ही लगे रहते ॥ 

रविवार, 10 मई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २६२ ॥ -----

सरिद बरा  की धार से पयदबान यह देस ।
तीन देउ रच्छा करे ब्रम्हा बिष्नु महेस ।२६२१। 
भावार्थ:-- तीन देवताओं से रच्छित इस भारत खंड को गंगा जी की  निर्मल धारा पयस्वान करती रही ॥ 

कहँ वो तपोमय तपकर,कहँ वो मुख के ओज । 
अपने मूलधार को देस रहा है खोज ।२६२२। 

कहँ वो तपोमय तपकर,कहँ वो मुख के ओज । 
अपने मूलधार को तदपि रहा था खोज ।२६२२। 
भावार्थ :-  तथापि अपने वंशाधार की टोह लेते  पूछता वह तपोमय तपस्वी कहाँ है उस तपस्वीके मुख का तेज कहाँ है । 

भरमन पथ सों होत रहि सबकी साँझी काल । 
देस भीत के बिदेसी,चले घड़ी की चाल ।२६२३। 
भावार्थ :-- भारतीयों  के सांध्य काल ( भोर दुपहरी साँझ ) पृथ्वी की भ्रमण गति के अनुसार होता , सूर्योदय से इनकी भोर होती अस्त से साँझ । किन्तु भारत में सोते हुवे साइनिंग इण्डिया की सुबह बगुले की बांग से होती और साँझ कौंवे की कांव कांव से । जब तक कौवा  नहीं बताए इनको दाल के भाव ही न पता चले ॥

सासन हर जब आपही,करे ठगी अरु लूट । 
भले करम के कर बँधे मिले बुरे को छूट ।२६२४ । 
भावार्थ :-- जिस देश में सत्ताधारी स्वयं ही ठगता व् लूटता हो उस देश में फिर भले कर्मों के हाथ बांध दिए जाते हैं बुरे कर्मों को पूरी पूरी छूट दी जाती है ॥

जन जन के धन लूट पुनि सासक बाट बनाए । 
करम गुनापकरष करे गर्तक माहि समाए ।२६२५ । 
भावार्थ : -- फिर जन साधारण का  लूट लूट के निवर्त्तमान सत्ताधारी ने सरडकेँ बनाई । पत्र पंक्तियों में ये बड़ी सुन्दर दिखती किन्तु धरातल  पर ठीक कार्य न होने के कारण ये गर्त में समा जाती ।।

करम  अपकृत बहुंत रहे रहे गहीत न कोए । 
पथरौटी पथनार  के पथिन्कार सब होए ।२६२६। 
भावार्थ : -- कर्म अपकृति तो  बहुंत रहती किन्तु पकड़ा कोई नहीं जाता ।  गोबर पाथने वाले  भी सड़क के ए  क्लास ठेकेदार हो चले थे ।

पथकारि को छोड़ करे, कलुष करम  की होड़ । 
अपनी कौड़ी लाख किए, जोड़े लाख करोड़ ।२६७। 
भावार्थ : -- पथकारी छोड़ कर भ्रष्टाचार की होड़ करते हुवे अपनी कौड़ी को लाख बना बना कर इन पथकारियों ने करोड़ों जोड़ लिए । और फिर.....? फिर क्या वे उद्योगपति कहलाने लगे.....

बुरे अर्जन सोषत धन करे देस को दीन । 
भले पोषत जन जन सन करे देस को पीन ।२६८-। 

उत्तम उद्यम देस हुँत संजीवन सम होए । 
अधम सन नित दीन होत, मरनी के पथ जोए ।२६२८-ख 

भावार्थ:--दूषित उपार्जन जन सामान्य में व्याप्त धन का शोषण कर राष्ट्र को निर्धन करता है, संस्कृत उपार्जन जन जन का पोषण कर उस राष्ट्र को परिपुष्ट करता है ॥

भावार्थ : --  उत्तम उद्यम जीवति से युक्त होकर राष्ट्र हेतु जीवनीय होता  है । निकृष्ट उद्यम जीवतिहीन होकर निर्जीव होते है निर्जीव उद्यमी राष्ट्र मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगता है ॥

टिप्पणी :- सबसे उत्तम उद्यम कृषि कर्म है..... ।

राज कोसलुटाए कतहुँ राजसि पंथ बनाए । 
राजा बासत झोपड़ा चरत पयादहि पाए ।२६९ । 
भावार्थ : -- देश के राजस्व  को लुटा कर फिर राजपथों का निर्माण हुवा । तथापि राजा दीन हीन अवस्था में बिन पादुका ही चलता हुवा मिलता,  कारण कि राष्ट्र के  पास जीवन नहीं था उसके पास जीवति नहीं थी ।।

पद पद पदिक दलाए  के पद पद हतत न्याय । 
किलौनि  की सी बाहिनी चले पंथ इतराए ।२६३० । 
भावार्थ :-- पद पद पर पदिकों को कुचल न्याय की हत्या करते इन राजसी मार्गों पर खिलौने से  चौपद  बाहि  के स्वामी ऐसे  इतराते चलते । छुद्र नदी भरि चलीं तोराईं । जस थोरेहु धन खल इतोराईं । जैसे छोटी नदियां भर्री हों तो तटों को भंजित कर चलती हैं थोड़े धन से दुष्ट कैसे मर्यादा  का त्याग कर देते हैं ॥

गुरुवार, 7 मई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २६१ ॥ -----

जीवन जोग जगाए के,रहि संपत सब काल ।
सुख साधन उपजाए के,भए सब काल अकाल ।२६१ १ ।
भावार्थ : -- जब यह देश  कृषि प्रधान देश था जीवन के आवश्यक हेतु जगाता था तब यह वैभव से परिपूर्ण था । जब से अर्थ प्रधान हुवा तब से यहां सभी समय  दरिद्रता छाई रहती है ॥ 

तब से यहाँ लोग भूखे ही मरते रहते किसी को रोटी की, किसी को बाइफ़ाई की, किसी को चाकरी की तो किसी को सत्ता की भूख थी टुकड़ा मिलते ही बुद्धि भ्रष्ट हो जाती ॥  

कलुषित कल की कला ने जहाँ पसारे पाँव ।
नाउ खतियाए आपने खाए गाँव के गाँव ।२६१२।
भावार्थ : -- कलुषित कल्किकाला करने वाले कलयंत्रो ने जहाँ भी पाँव पसारे ।  वहां के  वन क्या खेत क्या खदान क्या उसने गाँव के गाँव  ही अपने नाम चढ़ाए और खा गए ।। जैसे जैसे गाँव समाप्त होते गए वैसे वैसे भारत का नाम भी मिटता चला गया और इण्डिया चमकने लगा ॥ 

काँख छुरी मुखधर राम पुनि अस सासक होए । 
मरे पड़े हैं आपने आन घराँ को रोए ।२६३ । 
भावार्थ :-- फिर " कंख छुरी मुखधर राम " नाम के  शासक हुवे । जो ऐसे थे मरे पड़े हैं अपने और ये दूसरों को रोने जाते ॥ 
पिछलों ने  इण्डिया डिस्कवर किया अगलों  ने साइनिंग इण्डिया.....

कलुष कल के करम संग जस जस उद्यम बाढ़ि । 
धनि दारिदता की रेख   तस तस गयऊ गाढ़ि । २६४। 
भावार्थ : - प्रदूषणकारी कल यंत्रों का संग प्राप्त कर जैसे जैसे तत्संबंधित अन्य उद्यम बढ़ते गए वैसे वैसे धनाढ्य  व्  दरिद्रता के बीच की रेखा भी गहरी होते होते खाई में परिवर्तित हो गई ॥ 

उद्यमों से दरिद्र बढ़ने चाहिए की घटने चाहिए.....?  

>> घटने चाहिए यदि बढ़ते हैं तो इसका तात्पर्य है  उद्यम दरिद्र की संख्या  का संवर्द्धन  करते हैं कृषिकर्म अपवर्द्धन करते हैं..... 

भ्रंस सासन प्रबंध सन , कलुषि जात  के साथ । 
कलुषित बरन गाढ़त गए बाढ़त गयउ प्रमाथ ।२६५। 
भावार्थ :--उसपर  भ्रष्ट शासन व्यवस्था और संकीर्ण मानसिकता वाली  कलुष योनिज वंशज की बढ़नी के साथ बढ़ती हुई पाप की कालिमा ने बलात्कार, अपहरण,उत्पीड़न, हत्या आदि गंभीर अपराधों को भी बढ़ाया॥

 देसाबर रहे न अबर देस रहे नहि  देस । 
भारत भारतहि मैं अस होत गयौ अवसेस ।२६। 
भावार्थ : --  देसी विदेशी का भेद समाप्त ही कर दिया गया । अब विदेशी विदेशी न होकर देसी हो गए यह देस देस न होकर जैसे विदेश हो गया यहाँ बाहरी लोग अधिक दिखाई देते  । विश्व की क्या कहें भारत  में ही भारत का अस्तित्व समाप्त होने लगा । अब यहाँ कोई भी विदेशी चाहे वह ब्रिटेन की महारानी ही क्यों न हो राज कर सकता था पण यह है कि उसे किसी खूसट से विवाह करना होगा ।।

जहँ लग देखिहौ तहँ लग  अपराधहि अपराध । 
ऐतक जन संबाध में, अपराधी एक आध ।२६१७। 
भावार्थ : -- अब न तो कोई शासन व्यवस्था ही रही  न न्याय व्यवस्था, जहाँ तक  दृष्टि जाती वहां तक अपराध  ही अपराध दिखाई देता  इतने लोगों की भीड़ में अपराधी एक आध ही दिखाई देता ॥ 


करे परायो आपना पड़े पराई पोर । 
बगुले की सी भगति किए ये ततार के चोर ।२६१८। 
भावार्थ: --  ये तातारी के डाकू-लूटेरे थे जो पराया-धन को भी अपना मानते हैं ॥ जहाँ  रहते हैं वहां बगुले सी भक्ति करते हैं ।। यही वह लोग हैं जिन्होंने  भारत  के अस्तित्व को अस्त करते हुवे उसे चार भागों में विभाजित कर दिया ॥


स्पष्टीकरण १ : - पंचानबे प्रतिशत से भी अधिक हाइब्रिड भारतीय इन्ही से हैं  जाति- संकर इन्ही की झोली में जाकर गिरते हैं । हाइब्रिड में न रसहीन, गुणहीन व् स्वादहीन होते हैं बस ये दिखने भर के अच्छे होते हैं । ये राष्ट्र  के लिए स्वास्थवर्धक नहीं होते, ये राष्ट्र-वाद के विरोधी होते हैं  वेद पुराणों में तो इनकी कड़े शब्दों में भर्त्सना की गई है ॥  
  
स्पष्टीकरण २ : --  ये अपने ही पेट के परायण होते हैं  राष्ट्र पर संकट आन पड़े तो उसे छोड़ कर भागने वालों में ये सबसे आगे होते हैं ॥ 

देस बिरोधि नेम करे जब कोउ संबिधान । 
बिधि हतत होत  सो तो आपा ग्रन्थ समान ।२६१९। 
भावार्थ : --   किसी राष्ट्र का संविधान यदि राष्ट्र विरोधी नियम उपबंधित करता हो तो  वह  विधिध्न होते हुवे आपा-ग्रन्थ के समतुल्य होता है । 

 यह भू यह धन सम्पदा यह भारत के जोग ।  
भारतहि को बंचित किए भोगें पराए लोग ।२६०। 
भावार्थ : -- यह भूमि नदी वन खेत खलिहान यह खदान भारत ही की धन सम्पदा थी  हुवे इससे भारत को ही वंचित कर नियम उपबंधित करते इसे परायों के उपभोग हेतु प्रस्तुत किया गया ॥ 





मंगलवार, 5 मई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २६० ॥ -----

सत्तावादि सासन पुनि पूंजी वादि प्रबंध । 
दोउ देस सम्पद् करे,शासक के कर बंध ।२६०१। 
भावार्थ : --  सत्तावादी शासन फिर पूंजी वादी व्यवस्था इन दोनों ने देश की धन सम्पदा को शासकों की   बंधक घोषित कर दिया ॥

सत्तावाद =  जहां सत्ताधारी का मत ही सर्वमान्य हो 
पूंजी वादी व्यवस्था = ऐसी प्रणाली जिसमें धनिक वर्ग उत्पादक संसाधनों पर बलपूर्वक अधिकार कर श्रमिकों का शोषण करते  है

सासन हर भए सास्ता,सासन अंकुस हीन । 
तासों धनपत पिएं भए , दीन दिनोदिन दीन ।२६०२। 
भावार्थ : -- ऐसी द्वैध व्यवस्था में फिर तो शासक अधिनायक ( स्वेच्छाचारी) हो गए । शासन  निरंकुश होता  चला गया अब यह जो चाहता वही होता । निरंकुश शासन का प्रोत्साहन प्राप्त कर धनिक वर्ग परिपुष्ट होता गया और दीनों  निरंतर दीन होती चली गई

अर्थाधार किए पुनि एक रेखा खींचत आए   । 
धनपत उपरोपर करे, दरिद नीच धकियाए ।२६०३ । 
 भावार्थ : -- आर्थिक आधार पर फिर एक रेखा खींचते हुवे परिपुष्ट धनियों को  बहुंत बहुंत बहुंत ऊपर  और जो कभी धनवान किसान था  उसे दरिद्र दास बना कर नीचे धकेल दिया गया ।  इस प्रकार इस देश की शासन व्यवस्था जो कभी कर्म पर आधारित थी वह अब अर्थ पर आधारित हो गई ।।

अंतर के पट और हैं बाहिर के पट और । 
परन कुटी का जोगना बसे सुबरनी ठौर ।२६०४। 
भवार्थ : -- जिसके अंतर के पट कहीं और खुलते बाहिर के पट कहीं और ऐसा वो वन कुटिया का  महात्मा था जो  सोने की लंका में रहता था । और गाँधी- वाद भी कुछ  ऐसा ही है ॥

सब किछु अपना जान के सब किछु आपन मान । 
आपापंथी ने रचे, अपने मन के कान ।२६०५। 
भावार्थ: - इस गांधीवादिता का अनुशरण करते हुवे  सम्पदा को अपना जान कर अपने को सब कुछ मानते  हुवे ये आपापंथी अपने ही  मन के विधान रचते गए ।।

सेवक  बने अधिनायक, चले कुचालि चाल । 
धर्मादा के कोष में,लगे आपदा काल ।२६०७ । 
भावार्थ  : -- इस देश ने वह समय भी देखा जब  सेवक से इच्छाचारी शासक बने इन नताओं  ऐसी दुष्ट चाल चली कि धमार्थ निकाले हुवे धन पर आपात काल लगाया गया जो किसी महा -भूचाल के जैसा ही था ॥


एक धन कोषज बाहिरे भीतर एक धन कोष ।
 कोष कोष को सोष के करे खेत  कलि पोष ।२६०८
भावार्थ : --  आपात काल के पूर्व यहां निवासित लोगों के  विदेशी बैंकों में लेखे थे ऐसा सुनने में नहीं आया था  , इस काल में लूटे गए धन को विदेशों में पहुंचाया गया , और मनचाहे को रेवड़ी के जैसे बँटा । अब यहाँ बृहद उद्यम की स्थापित करने की होड़ होने लगी । तदनन्तर  कृषि कार्य योग्य भूमि का शोषण कर  वहां कल की कलुषित कलाओं का पोषण किया । अब इनका देश के बाहिर एक धन कोष है देश के भीतर एक धन कोष है,  न्याय की व्यवस्था इनके शब्द-कोष में नहीं है ॥

आपा पंथीहि फिर तो भए राजाधिकारि । 
धंधारी बेपार भए धुंधारी बैपारि ।२६०९ । 
भावार्थ : -- फिर क्या था  भारत की गद्दी  इच्छाचारिता का ही अधिकार हो गया । उलटे सीधे धंधे व्यापार व्   उलटे सीधे लोग साहूकार हो गए ॥ आपात काल के उपरांत  पांच साल में ही बड़ी बड़ी कंपनिया खड़ी हो गईं जो बड़ी थी वो और बड़ी हो गईं ।।

 उदाहरण :--  नवासी नब्बे में   हमारे पारा में एक धनि आया क्यों आया सटील  पलांट  लगाने आया । लोगों ने उसकी कुंडली खोली पता चला पंद्रह वर्ष पूर्व वह घुर-बिनिया ( सडकों में पड़ी टूटी फूटी वस्तुएं व् लोहे लक्कड़ इकट्ठे  करने वाला ) था ॥

पूँजी करे उधार  कूट कपट के  छाए । 
तापर  भू उपहार की जहँ तहँ कल बिकसाए ।२६१०। 
भावार्थ : - छल कपट की  छत्र छाया में उधार की पुंजी से दारिद दास पूँजी पति हो गए  उसपर बंदर  बाँटा में  कृषि भूमि उपहार स्वरूप  मिल गई और यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ मत पूछो कहाँ कहाँ उद्योग विकसित हो गए ॥ 







शुक्रवार, 1 मई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २५९ ॥ -----

जहँ असाँच भयहीन तहँ साँच रहए भय भीत । 
सभेय समाजु के माझ, होत सभिक के जीत ।२५९१। 
भावार्थ : -- जहाँ असत्य भयहीन होता है वहां सत्य सदैव भयभीत रहता है  । वहां विद्वानों के समाज के मध्य असभ्य द्युतिकार विजय प्राप्त करते हैं ॥ 

दुर्मतिन्हि की सभा में, मह दुरमति पति होए । 
सकल सदस  को बस करे, दुर्मत सम्मत जोए ।२५९२ । 
भावार्थ : --दुर्बुद्धियों की सभा में महा दरबुद्धि ही पति के पद को प्राप्त होता है । ऐसी सभा में सभी सदस्यों को प्रभावित कर दुर्मत ही सम्मति संकलित करता है ॥ 

 राउ करत कुचालि परत ,पउ बारह के दाँव । 
खेतिहारु बचाई ले खेत सेत घर गाँव 
।२५९३। 
भावार्थ : -- अधिनायक  कुचालि कर रहा है और पौ बारह का दांव पड़ा है  ।  हे खेतिहर तू खेत के संग अपना घर अपने गांव को बचा ॥ 

को वस्तु नहि आपनी,जहँ न होत  को राए । 
मीन सरिस सब  लोग  तहँ लेइ  परस्पर खाएँ ।। 
-----॥ महर्षि  वाल्मीकि ॥ -----
भावार्थ : -- जहाँ कोई राजा नहीं होता वहां कोई भी वस्तु अपनी नहीं होती, जहां  कोई वस्तु अपनी न हो वहां शासन व्यवस्था नहीं होती  । मछली की भांति वहां सब लोग एक दूसरे को खाने में लगे रहते हैं ॥

टू बी कंटिन्यू .....

कतहुँ कलकल करत सरित कतहुँ त गिरी बिसाल । 
सागर घिरी बिसम्भरा फरी फुरी सब काल ।२५९४ । 
भावार्थ : --कहीं कलकल करती हुई सरिता कहीं विशाल गिरीराज । सागर से घिरी विश्व का भरण पोषण करने में समर्थ यह पावन भूमि सभी ऋतुओं  में फलीभूत रही ॥

कल जंत्री मल मुख मले, सीकस  भए  बन खेत । 
काल  कलुषित बरन बरे भयउ खेह मरु  रेत ।२५९५-। 

कुमारग पर चरन धरे, शासक बारे कुनीति । 
बन हरे खेतखन हरे हरे हरित सब रीति ।२५९५-

भावार्थ : -- खेद है कि संयंत्रों के अवशिष्ट रूपी मल को मुख पर मले वन सहित कृषि  क्षेत्र  बंजर कर दिए गए । समय ने ऐसा  कलुषित वर्ण वरण  किया कि स्वर्णमयी मिटटी काले मरुस्थल की रेत  के सदृश्य हो गई ॥

भावार्थ : - कारण यह रहा कि कुमार्ग पर चरण धरते  हुवे स्वार्थी शासकों ने कुरीतियों का वरण किया । उन्होंने वन का हरण किया  खेत खण्डों का हरण किया येन केन प्रकारेण वाली रीति से  इस विश्वंभरा  की हरियाली को ही हर लिया ॥

करम कारि कृपनी करे ,  कलधर धन्वन होइ  । 
खेत करन  बहु कठिन भए हे न हलधर कोइ ।२५९६ । 
भावार्थ : -- ये  कुनीतियाँ श्रमशील धनी किसानों को तो दिनोदिन दीन और संयंत्र धारी निर्धनों को धवन करती चली \से । परिणाम यह हुवा कि धन के अभाव में जुताई बुवाई बहुंत ही कठिन हो गई और हलधर हल को त्यागते चले गए । कृषि उत्पादन  अपने न्यूनतम  स्तर पर पहुँच गया और इस विश्वम्भरा का  बचपन कुपोषित हो गया ॥

कबहु कर बिनु काम गहै कबहु बिनहि देहारि । 
खेतिहारी हरिअरी अस बिनहि करम भए कारि ।२५९७ । 
भावार्थ : -- फिर तो कभी इनके हाथ को  काम न मिला तो कभी दिहाड़ी नहीं मिली । इस प्रकार ये किसान जो विश्व के पालन हारी थे  धीरे धीरे बंधुवा श्रमिक बन गए, और निर्धन रेखा  के नीचे धकेल दिए गए ॥

कलधर के मुख हंस हँसि श्रमहर के मुख पीर । 
हाड़तोड़ श्रम बारि कर जावैं  मोती हीर ।२५९८। 
भावार्थ : -- ये लूट उद्योग पतियों के मुख पर तो  हंस सी हंसी खिलाती  रही । श्रमिकों के मुख पीड़ा गहराती  रही  । ये हाड़  तोड़ परिश्रम करते  श्रम वारि से  सींच  कर हीरे और मोती उगाते रहे ॥


श्रमहर कर बिनु दिहारी, भए  ऐसे असहाए । 
एक समउ के भोजन में अपना सब किछु दाए ।२५९। 
भावार्थ :--इन बंधुआ श्रमिको का हाथ बिना दिहाड़ी के फिर इतना विवश व् असहाय हो गया कि ये एक समय के भोजन में  अपना सब कुछ लुटाते गया  ॥  एक ढोंगी महात्मा कह गया की भूखे पेट बुद्धि नहीं आती यदि सत्ता हथियानी है तो अधिसंख्यक को भूखा रखो । ये नेता उसका अनुशरण करते गए इनका सब कुछ लूट  कर सत्ता धारी बने और बने रहे ॥

कहाँ किसान के किसानी कहँ सचिवनि की जात । 
जे जगत के पेट भरें,अरु जे मारें लात । २६०० । 
भावार्थ :--कहाँ तो किसान की किसानी और कहाँ नेताओं की गंदी जात । ये तो संसार के पेट की पूर्ति करते  और ये उसी पेट पर लात मारते  ।।


----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...