सोमवार, 6 अप्रैल 2015

----- ॥ दोहा-दशम २५३ ॥ -----


हरियारी हरियरे जब लाँगल धरे किसान | 
भंडार भरे रहे जब, कनक धरे खलिहान |2531|
भावार्थ :--भूमि तभी हरीभरी रहती है जब किसान के हाथ में हल होता है  |भंडार तभी भरे रहते हैं जब उपज कणों से युक्त होती है || अन्यथा अन्न संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिसे मानव जनित अकाल कहते हैं || 


पहिले जल दूषित करें ,बहुरि करें बैपार | 
सब कहुँ रोग फ़ैलावें फिर बेचें उपचार |2532 |
भावार्थ :--इन सत्ताधारियों की यही आर्थिक नीति है कि  पहले तो जल को गंदा करो फिर उसका धंधा करो |पहले रोगों को फैलाओ फिर उपचार बेचकर लाभ कमाओ || 

\ये नेता (से बने हुवे उद्योगपति,उद्योगपति से बने नेता  )नदियों में मैला बहाएँ -जनसाधारण जल टैक्स पटाएं || 

मल उतसर्जित कल धरे,धनपति को समझाएँ |
सुचिता हुँत घर आपने सौच कूप बनवाएँ |2533 |
भावार्थ :--मल त्यागते हुवे इन उद्यमों के पाणि ग्रहीता पतियों को कोई जाकर समझाए | की स्वच्छता हेतु पहले वे अपने घर में संडास बनवाएं || जो बनाने में असमर्थ हो तो हम धर्म कर देंगे || 

हरियारि बिनसाई के करियारि किए बिकास । 
 हलधर अजहुँ कलधर के भयउ बँधेऊ दास ।२५३४ । 
भावार्थ : -  हरियाली विध्वंसित व् कलियाली निरंतर विकसित हो रही ,परिणामस्वरूप हलधारी कलधारियों के बंधुवा श्रमिक हो गए ॥ 

यहु कलयंत्रि परनाले अरु गलियन के गारि । 
यहु पयस्या पयस्वती, भै कास कलुषित कारि ।२५३५। 
भावार्थ :--यह यंत्रों -संयंत्रों के परनाले और गलियों के गार । जो क्षीरकाकोली कभी पयस्वती हुवा करती थी देखो उसे अब वह कैसी कलुषित व् कलमली हो चली है ॥ 

क्षीरकाकोली = एक ऐसी नदी जो काले रंग का आभास देती है किन्तु उसका जल क्षीर के सदृश्य होता है ॥ 

पयस पयसनी पास है तापर कंठ प्यास । 
चौंपुर मलिनावास है  जे कैसेउ बिकास  ।२५३६ । 
भावार्थ :-- पस्वती के पास पायस है तथापि कंठ में प्यास ही प्यास है । उसके चारों ओर मलिनता का आवास है,यह कैसा विकास है ॥ 

कल जंत्रि के मल जैसेउ निर्मल जल मलिनाहि । 
अगहुँ त सुचिता बातहू  चौड़े हाट बिकाहि ।२५३७ । 
भावार्थ : -- कलयंत्री अवशिष्ट जिस प्रकार से जल सहित वातावरण को प्रदूषित कर रहे हैं और जीवन का आधार स्वरूप जल बिकाऊ हो चला है उससे ऐसा प्रतीत होता है की भविष्य शुद्ध वायु भी विपणन की वस्तु हो जाएगी ॥ 

विद्यमान की आर्थिक नीति यह है कि " वायु में विकार भरो उसका भी व्यापार करो " 



हे भगवन ! अब आप प्रगट हो जाओ और हमरा बेड़ा कल्टी करो 


चौपट चरनी सरिस हैं कलधारी के पाँउ । 
कमाए खेत नसाए के खाए गाँव के गाँव ।२५३८ ।  
भवार्थ : -- उद्योगपतियों के चरण भी सत्यनाशी जैसे होते हैं । ये जहाँ जाते हैं वहां की उपजाऊ भूमि को नष्ट करते हुवे गाँव के गांव खा जाते हैं ॥ 

गाँव ही नही रहेंगे तो भारत भी नहीं रहेगा.....

काखँन मैं छुरिका धरे मुख में धर रघुराइ । 
कहनी सम करनी नहीं,बाका नाउ ठगाइ ।२५३९ । 
भावार्थ : --काँख में पाकिस्तान हो, मुख में भगवान हो ।जब कथनी और हो करनी कुछ और तो उसे 'ढगाई ' कहते हैं ॥ 

मंचासित प्रधान कहे बेच रहा था चा ए  । 
सत्ता सूत गहाए के, अपने रूप दिखाए ।२५४०। 
भावार्थ : - देश प्रधान मंत्री  मंचासित होकर कहा करता था कि मैं तो ढहरा साधू चाय बेच  अपना निर्वाह किया करता था । हे राम ! सत्ता हथियाते ही चाय वाला मुखौटा उतर गया फिर उसका वास्तविक रूप समाने आ गया 

जिसने सत्ता  के लिए 'माँ 'जैसे शब्द का दुरुपयोग किया हो वह  चाय वाले तो क्या किसी का भी दुरुपयोग कर सकता है ॥ 





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