शनिवार, 18 अप्रैल 2015

----- ॥ दोहा-दशम २५६ ॥ -----

 खाए पिए सिरु छाईं किए सुख सय्या में सोए ।
जुग लग संचित संपदा अल्प काल में खोए ।२५
६१।  

भावार्थ : -- खाए पिए शीश पर शीतल छाया कर सुख पूर्वक शयन किए । युगों से संचित इस सम्पदा को अल्प काल में समाप्त कर चल दिए ॥ यही तुम्हारी लघु कथा होगी ।।

खाया पिया पहन इया सोया चादर तान । 
रैनी सुख सोन बित गई,दिन के क्या अनुमान ।२५६२। 
भावार्थ : -- खया पिया पहन लिया संसार के सभी सुख भोग इये ।रेना तो सुखपूर्वक व्यतीत हो गई दान का क्या पता ॥ 

हो निकरे को भूर सब, अपने सुख को रोए । 
होतब के का होइये, चिंता करे न कोए ।२५६। 
भावार्थ:-- जो चले गए उनका त्याग भुला कर सब अपने अधिकाधिक सुख के लिए हाय हाय कर रहे हैं । जो होने वाले केलिए  कोई चिंता करते दिखाई नहीं देता ॥ 

न निरझरी निर्झर झरे न त तटिनी मैं तोए । 
बरसाइत बद्ररिया को बरसे बरसों होए ।२५६४ -क ।  

हरियारि करियारि करे, जगतिरु भुइ मरु होए ।
सुख सय्या जो सयन किए,होनहार तिन रोए ।२५
४-ख । 

भावार्थ :-- न पहाड़ों से झरने ही झरते हैं न ही नदियों में पानी ही है । वर्षा ऋतु में वर्षा वर्षित हुवे वर्षों हो गए ।

भावार्थ :-  हरियाली को कलियाली किए तरुस्थल मरुस्थल में परिवर्तित हो गए ।  सुख की शीतल सय्या में शयन करने वालों को कल उनका भविष्यत पिपासार्त्त होकर कोसेगा ॥  


कलधारि द्यूति कर भए  सासक द्यूति कार । 
खेती बारी हारि गए हल धारिहि हल हार ।२५
भावार्थ : --  शासक द्यूति का आयोजन कर रहे हैं उद्योगपति क्रीड़ा कर रहे हैं ।  किसान हल हार के कृषिभूमि भी भी हार चुके हैं ॥ 

टू बी कंटिन्यू.....

चाहे साँसत मैं रहे जीव जगत के साँस । 
मानस बहुं सुबास रहे, यह तो नहीं बिकास ।२५६। 
भावार्थ :--जीव जगत चाहे कितने ही कष्ट भोगे मानव को सुख पूर्वक रहना चाहिए । यह विकास नहीं है यह विनाश है, कारण कि जीव जगत से इतरत: उन्नत मानव जाति  की कल्पना नहीं की जा सकती ॥ 

जनमानस की बढ़नि पर गरब न कीजो कोए । 
गरब करे सो अंध मति,देस आपनी होए ।२५६। 
भावार्थ : --   वर्तमान में बढ़ती जनसँख्या न केवल भारत अपितु  विश्व के लिए चिंता व् चिंतन का विषय है,इस पर गौरवान्वित नहीं होना चाहिए, यदि कोई होता है तो वह अपने राष्ट में अंध मति सिद्ध होगा ।। 

चकमक की चिनगी संग जगत ज्वाला जागि । 
को लगावन मैं लगे कोउ बुझावन लागि ।२५६
भावार्थ :-- चकमक पत्थर की चिंगारी से ज्वाला का प्रादुर्भाव हुवा  इतिहास में ऐसा वर्णन मिलता है । अब  कोई तो उसे भड़काने में लगा तो कोई उसे बुझाने में लग गया ।

 अलसाए सासन जो अस सुख आसन मैं सोहि । 
गहुँ होवनिहार अवसि,पाहन जुग में होंहि ।२५६। 
भावार्थ :--विश्व भर के राष्ट्रों का शासन अनमनयस्क होकर शीतल छाया वाले सुखासन में इस प्रकार शयनित  रहा तब  निश्चय ही आगे आने वाली पीढ़िया पाषाण युग में जन्म लेंगी ॥

श्रम  करे सब करम करे, तब जा पेट पुराएँ । 
धनिमन ऐतक संपदा न जान कहाँ सों  लाएँ ।२५७०। 
भावार्थ:--एक साधरण व्यक्ति श्रम पूर्वक दुनिया भर के  कार्य करता है तब कहीं जाकर उसके पेट की पूर्ति होती है ।इन उद्योग पति इन पूंजी पतियों के पास इतनी धन- सम्पद जाने कहाँ से आई ॥ पहले एक  दो ही उद्योग पति थे औचक इतने कैसे उग गए कौन सी खाद दी थी.....? 

कांग्रेस आई तो आई कमलाई तो और बढ़ाई :-- अल्प समय में औचक इतने करोड़पति कैसे हो गए ?   अल्प समय में ही भ्रष्टाचारिता इतनी कैसे बढ़ गई ?  कहने का तात्पर्य यह है कि  भ्रष्टाचारिता व् करोड़पति साथ साथ बढे उद्योगपतियों का लाभांश भी बढ़ा.....

या वित्तकामि चित्त की गति न जाने कोए । 
जूँ जूँ बुढ़े स्याम रंग तूँ तूँ उजबल होए ।। 
भावार्थ : -- लोभी निठल्ले चित्त की गति कोई नहीं जानता  जैसे जैसे भ्रष्टाचारिता बढती है ये तैसे तैसे पनपते हैं ॥ 






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