शनिवार, 18 अप्रैल 2015

----- ॥ दोहा-दशम २५ ७ ॥ -----

बनउनि की  बानि  ऊँची,बनि की ऊँची बानि । 
दान धर्म को लाभ कहँ पाप कर्म को हानि ।२५७१ । 
भावार्थ :--बने हुवे की तो सज-धज  ऊँची होती है, बनिये की वाणी ऊँची होती है । वे दान और पुण्य को लाभ कहते हैं कुकर्मों को हानि कहते हैं ।।

जोड़े लाख करोड़ किए सब किछु छोड़ बिहाए । 
ऐसी कमाइ कर चलें मरे संग मैं जाए ।२५७२। 
भावार्थ : - जोड़ जोड़ कर लाख को करोड़ किया फिर सब कुछ छोड़ कर चल दिए । ऐसी कमाई कर चलें जो मरने पर साथ में जाए ॥


तेरा दिया हुवा सदा सुपात पानि गहाए  । 
कुपात को  दाया दान संजमनी लए जाए ।२५७। 
भावार्थ  :-- दाता  को सतवर्षी होना चाहिए वह  पात्रता का  विचार कर  दान करे  ।  दाया हुवा सत्पात्र  को ही मिले । कुपात्र  को दिया दान जीवन को नरक बना देता है ॥

सदगाहि सो दान गहै जो सद् दान गहाए  । 
उदर पूरता आपना, दूजे हाथ प्रदाए ।२५७४। 
भावार्थ : --   सद्ग्राही वही है जो सत्परिग्रह करे ।  परिग्रह को केवल अपने उदर की पूर्ति करते हुवे  अन्य सुपात्र को सम्यक रूप से वितरित करे  ॥

दाता का मन लालची दिए मत दान निसंक । 
तेरा दाया किन मिला मारे घर जो डंक ।२५७५। 
भ्वर्थ : --उस मतदाता का मन लालची होता है जो निसंकोच किसी को भी मत दे देता है । यह दान उसे मिलता  है जो उसी के घर में डाका डालते हैं ॥
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मुख सों किछु आनइ  कहे  कर सो किए किछु आन । 
पहनी सम रहनी नहीं रहनी   कहँ सब संत महान ।२५७६। 
भावार्थ : --मुख से कुछ बोला हाथ से कुछ करवाया । जैसी पहनी हो रहनी भी वैसी ही होनी चाहिए जिसका वासस् कुछ और रहा वास कुछ और,  उस गाँधी को जगत में महान आत्मा कहकर पुकारा जाता है ॥

कोई सरकार सूट- बूट वाली है कोई सूटेड-बूटेड  नौकरों वाली है.....

सेबक उजबल भेस जहँ स्वामि मलिनए भेस । 
ऐसो अंधियारे भवन,बचे नहीं किछु सेस ।२५७७। 
भावार्थ: --जहाँ स्वामी मलिन वेश में और सेवक उज्जवल वेश में हो ऐसे विचार शुन्य  घर में कुछ भी शेष नहीं बचता । सेवक  घर ही डुहार के ले जाता है ॥

स्वामि हो कि सेवक हो, चाहे कोउ नरेस । 
तैसा जीवन जीवना जैसा वाका  देस ।२५७८। 
भावार्थ : -- स्वामी हो सेवक हो चाहे कोई नरेश ही क्यों न हो । उसकी जीवनचर्या वैसी ही होनी चाहिए जैसे उसके देश की है ।

कंगालु कृस देस जो ऐसो भेस बनाए । 
कौड़ी को करोड़ी किए, अमोल रतन बिसाए ।२५७९। 
भावार्थ : --पहना है ज़रीदार जम्फ़र और जेब में कुछ नहीं । अकिंचन कंगाल रोग्गी देश जिसने ऐसा वेश भरा की अपनी कौड़ी के मोल की मुद्रा को करोड़ी कर अनमोल रतन आयात करे हैं । जब ये कौड़ी की तीन हो जाएगी तब क्या करेग्गा बम खाएगा नहीं..... बम दिखाएगा -और आतंक मचाएगा ॥

छोटे छोटे काज सों होत बड़े सब काज । 
मूठि भर बुवाई करे कोठी भरे अनाज ।२५८० । 
भावार्थ : -- छोटे छोटे कार्यों से बड़े कार्य सिद्ध होते हैं। एक मूट्ठी अन्न  की यदि बुवाई कर दो तो वह भंडार भर देता है ॥











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