बनउनि की बानि ऊँची,बनि की ऊँची बानि ।
दान धर्म को लाभ कहँ पाप कर्म को हानि ।२५७१ ।
भावार्थ :--बने हुवे की तो सज-धज ऊँची होती है, बनिये की वाणी ऊँची होती है । वे दान और पुण्य को लाभ कहते हैं कुकर्मों को हानि कहते हैं ।।
जोड़े लाख करोड़ किए सब किछु छोड़ बिहाए ।
ऐसी कमाइ कर चलें मरे संग मैं जाए ।२५७२।
भावार्थ : - जोड़ जोड़ कर लाख को करोड़ किया फिर सब कुछ छोड़ कर चल दिए । ऐसी कमाई कर चलें जो मरने पर साथ में जाए ॥
तेरा दिया हुवा सदा सुपात पानि गहाए ।
कुपात को दाया दान संजमनी लए जाए ।२५७३।
भावार्थ :-- दाता को सतवर्षी होना चाहिए वह पात्रता का विचार कर दान करे । दाया हुवा सत्पात्र को ही मिले । कुपात्र को दिया दान जीवन को नरक बना देता है ॥
सदगाहि सो दान गहै जो सद् दान गहाए ।
उदर पूरता आपना, दूजे हाथ प्रदाए ।२५७४।
भावार्थ : -- सद्ग्राही वही है जो सत्परिग्रह करे । परिग्रह को केवल अपने उदर की पूर्ति करते हुवे अन्य सुपात्र को सम्यक रूप से वितरित करे ॥
दाता का मन लालची दिए मत दान निसंक ।
तेरा दाया किन मिला मारे घर जो डंक ।२५७५।
भ्वर्थ : --उस मतदाता का मन लालची होता है जो निसंकोच किसी को भी मत दे देता है । यह दान उसे मिलता है जो उसी के घर में डाका डालते हैं ॥।
मुख सों किछु आनइ कहे कर सो किए किछु आन ।
पहनी सम रहनी नहीं रहनी कहँ सब संत महान ।२५७६।
भावार्थ : --मुख से कुछ बोला हाथ से कुछ करवाया । जैसी पहनी हो रहनी भी वैसी ही होनी चाहिए जिसका वासस् कुछ और रहा वास कुछ और, उस गाँधी को जगत में महान आत्मा कहकर पुकारा जाता है ॥कोई सरकार सूट- बूट वाली है कोई सूटेड-बूटेड नौकरों वाली है.....
सेबक उजबल भेस जहँ स्वामि मलिनए भेस ।
ऐसो अंधियारे भवन,बचे नहीं किछु सेस ।२५७७।
भावार्थ: --जहाँ स्वामी मलिन वेश में और सेवक उज्जवल वेश में हो ऐसे विचार शुन्य घर में कुछ भी शेष नहीं बचता । सेवक घर ही डुहार के ले जाता है ॥
स्वामि हो कि सेवक हो, चाहे कोउ नरेस ।
तैसा जीवन जीवना जैसा वाका देस ।२५७८।
भावार्थ : -- स्वामी हो सेवक हो चाहे कोई नरेश ही क्यों न हो । उसकी जीवनचर्या वैसी ही होनी चाहिए जैसे उसके देश की है ।
कंगालु कृस देस जो ऐसो भेस बनाए ।
कौड़ी को करोड़ी किए, अमोल रतन बिसाए ।२५७९।
भावार्थ : --पहना है ज़रीदार जम्फ़र और जेब में कुछ नहीं । अकिंचन कंगाल रोग्गी देश जिसने ऐसा वेश भरा की अपनी कौड़ी के मोल की मुद्रा को करोड़ी कर अनमोल रतन आयात करे हैं । जब ये कौड़ी की तीन हो जाएगी तब क्या करेग्गा बम खाएगा नहीं..... बम दिखाएगा -और आतंक मचाएगा ॥छोटे छोटे काज सों होत बड़े सब काज ।
मूठि भर बुवाई करे कोठी भरे अनाज ।२५८० ।
भावार्थ : -- छोटे छोटे कार्यों से बड़े कार्य सिद्ध होते हैं। एक मूट्ठी अन्न की यदि बुवाई कर दो तो वह भंडार भर देता है ॥
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