समऊ के गति जान के अपनी गति अनुमान ।
अजहुँ चरन अगवान हैं अगहुँ होहि पिछवान ।२५५१ ।
भावार्थ : -- समय के गति ज्ञात कर अपनी गति का अनुमान कर लें । जो चरण आगे चल रहें हैं कल वह समय से पीछे होंगे ॥ कारन कि जीवन एक चक्र है ॥
कतहुँ साख ही साख हैं कतहुँ पाँख ही पाँख ।
सत्पथ चरते जाइये,धरे लक्ष्य पर आँख ।२५५२।
भावार्थ :--कहीं शाखा ही शाखा हैं कहीं पंथी ही पंथी हैं । मनुष्य को चाहिए कि वह जीवन की यात्रा में मृत्यु रूपी लक्ष्य पर दृष्टि टिकाए सन्मार्ग पर चलता जाए ॥
चारि खानि जग जीव में जोनि चुरासी लाख ।
सत्कृत करते जाइये,धरे लच्छ पर आँख ।२५५३।
भावार्थ: -- संसार में चार प्रकार के अनंत जीव हैं (अण्डज,स्वेदज,उद्भिज और जरायुज )जिनमें कुल लाख जातियां पाई जाती हैं । मनुष्य को चाहिए की वह अपने मृत्यु रूपी लक्ष्य पर दृष्टि टिकाए सत्कृत करता जाए ॥ सत्कृत्यों की उपेक्षा से वह किसी भी भांति की जाती को प्राप्त हो सकता है ॥
जब सबहि सँजोग रहँ तब कहे करे किछु नाहि ।
जब कहनहु जोग रहै न,करन बहुंत कुछ चाहि ।२५५४।
भावार्थ : -- जब सब कुछ अनुकूल रहता है तब कहते हैं पर करते नहीं न हैं । जब कहने के योग्य भी नहीं रहते तब बहुंत कुछ करना चाहते हैं ।।
जीवन चरजा नीच रहँ ऊँचे रहएँ विचार ।
विचारों की ऊंचाई, जग के करे सँभार ।२५५५।
भावार्थ : --जीवन चर्या सरल होने से विचार ऊंचाइयों को प्राप्त होते हैं, विचारों की ऊंचाई संसार को व्यवस्थित करती है ॥
भोग बिषय की चाह में अजहुँ भयौ जग अंध ।
नेम नीति निर्बंध बिनु,बिगरे सकल प्रबंध ।२५५६।
भावार्थ : -- भोग विषय की कामनाओं मेंअधुनातन विश्व विचारहीन हो चला है । नियम व् निर्बंधों के अभाव में इस समय विश्व का शासन प्रबंध अव्यवस्थित है ।।
सब अपने मन की कर रहे हैं जो चाहे चन्द्रमा में टक्कर मार रहा है फूट जाता तो ? शर्मा जी वहां बम रख के आए थे । कोई मंगल में ताका झांकी कर रहा है वहां डबल बम रखा है छ इन धरती वाले फुसफुसे बम को कौन पूछता है इधर एक बटन दबाया फिर तू कहाँ और मैं कहाँ..... शब्द भेदी गोले हैं एक शब्द बोला फिर गोले बोलने लगते हैं.....
होए हैं सो होइ चले, आगे होवनि हारि ।
जैसी चलनि चल निकले, तैसेऊ अनुहारि ।२५५७।
भावार्थ :--जो जन्म ले चुके वह मृत्यु की और अग्रसर हैं, भविष्य नई पीढ़ियों का है । पुरानी पीढ़ी जैसा आचरण करेगी आने वाली पीढ़ियां भी उसी का अनुशरण करेंगी ॥ यही विचारहीनता रही तो पहले जल जाएगा फिर हल जाएगा फिर जंगल जाएंगे फिर ? फिर क्या फिर तो सारी पृथ्वी जल-जल करती जाएगी ॥
सब हेतु सब हितू रहें बैरी रहे न कोए ।
बेर करे जब आपही, तब जग बेरी होए ।२५५८।
भावार्थ : -- सबके लिए सभी हिताकांक्षी रहे तो संसार में वैर-भाव न रहे और कोई किसी का वैरी न रहे । जब हम स्वयं ही वैर प्रतियात करते हैं तब सभी हमारे वैरी हो जाते हैं । परिणामतस् हमें सुरक्षा के सौ उपाय करने पड़ते हैं ॥
अपनी अपनी सीख लिए, लिखे आपनी लीख ।
अजहुँ सब बिसराए चले,महापुरुष की दीख ।२५५९ ।
भावार्थ :-- अपने ज्ञान को ही सर्वोपरि मानकर सबने अपने ही पंथ बना लिए । समय ने ऐसा कुसंयोग स्थापित कर दिया दृष्टिवंत महापुरुषों के चरणचिन्ह चित्तपटल से विस्मृत हो रहे हैं ॥
पनहारिन की गागरी जूँ जल रखे सँभार ।
सिंधु सरिस संसार में, सँभरे रहँ तौं सार ।२४६० ।
भावार्थ : -- पन्हारी की गगरी जिसप्रकार जल को व्यवस्थित रखती है सागर रूपी लावण्यमयी संसार में मधुरिम सार को भी उसी भांति व्यवस्थित रखें ॥ अन्यथा आने पीढ़ियां प्यासी जन्मेंगी प्यासी ही मरेंगी ॥
अजहुँ चरन अगवान हैं अगहुँ होहि पिछवान ।२५५१ ।
भावार्थ : -- समय के गति ज्ञात कर अपनी गति का अनुमान कर लें । जो चरण आगे चल रहें हैं कल वह समय से पीछे होंगे ॥ कारन कि जीवन एक चक्र है ॥
कतहुँ साख ही साख हैं कतहुँ पाँख ही पाँख ।
सत्पथ चरते जाइये,धरे लक्ष्य पर आँख ।२५५२।
भावार्थ :--कहीं शाखा ही शाखा हैं कहीं पंथी ही पंथी हैं । मनुष्य को चाहिए कि वह जीवन की यात्रा में मृत्यु रूपी लक्ष्य पर दृष्टि टिकाए सन्मार्ग पर चलता जाए ॥
चारि खानि जग जीव में जोनि चुरासी लाख ।
सत्कृत करते जाइये,धरे लच्छ पर आँख ।२५५३।
भावार्थ: -- संसार में चार प्रकार के अनंत जीव हैं (अण्डज,स्वेदज,उद्भिज और जरायुज )जिनमें कुल लाख जातियां पाई जाती हैं । मनुष्य को चाहिए की वह अपने मृत्यु रूपी लक्ष्य पर दृष्टि टिकाए सत्कृत करता जाए ॥ सत्कृत्यों की उपेक्षा से वह किसी भी भांति की जाती को प्राप्त हो सकता है ॥
जब सबहि सँजोग रहँ तब कहे करे किछु नाहि ।
जब कहनहु जोग रहै न,करन बहुंत कुछ चाहि ।२५५४।
भावार्थ : -- जब सब कुछ अनुकूल रहता है तब कहते हैं पर करते नहीं न हैं । जब कहने के योग्य भी नहीं रहते तब बहुंत कुछ करना चाहते हैं ।।
जीवन चरजा नीच रहँ ऊँचे रहएँ विचार ।
विचारों की ऊंचाई, जग के करे सँभार ।२५५५।
भावार्थ : --जीवन चर्या सरल होने से विचार ऊंचाइयों को प्राप्त होते हैं, विचारों की ऊंचाई संसार को व्यवस्थित करती है ॥
भोग बिषय की चाह में अजहुँ भयौ जग अंध ।
नेम नीति निर्बंध बिनु,बिगरे सकल प्रबंध ।२५५६।
भावार्थ : -- भोग विषय की कामनाओं मेंअधुनातन विश्व विचारहीन हो चला है । नियम व् निर्बंधों के अभाव में इस समय विश्व का शासन प्रबंध अव्यवस्थित है ।।
सब अपने मन की कर रहे हैं जो चाहे चन्द्रमा में टक्कर मार रहा है फूट जाता तो ? शर्मा जी वहां बम रख के आए थे । कोई मंगल में ताका झांकी कर रहा है वहां डबल बम रखा है छ इन धरती वाले फुसफुसे बम को कौन पूछता है इधर एक बटन दबाया फिर तू कहाँ और मैं कहाँ..... शब्द भेदी गोले हैं एक शब्द बोला फिर गोले बोलने लगते हैं.....
होए हैं सो होइ चले, आगे होवनि हारि ।
जैसी चलनि चल निकले, तैसेऊ अनुहारि ।२५५७।
भावार्थ :--जो जन्म ले चुके वह मृत्यु की और अग्रसर हैं, भविष्य नई पीढ़ियों का है । पुरानी पीढ़ी जैसा आचरण करेगी आने वाली पीढ़ियां भी उसी का अनुशरण करेंगी ॥ यही विचारहीनता रही तो पहले जल जाएगा फिर हल जाएगा फिर जंगल जाएंगे फिर ? फिर क्या फिर तो सारी पृथ्वी जल-जल करती जाएगी ॥
सब हेतु सब हितू रहें बैरी रहे न कोए ।
बेर करे जब आपही, तब जग बेरी होए ।२५५८।
भावार्थ : -- सबके लिए सभी हिताकांक्षी रहे तो संसार में वैर-भाव न रहे और कोई किसी का वैरी न रहे । जब हम स्वयं ही वैर प्रतियात करते हैं तब सभी हमारे वैरी हो जाते हैं । परिणामतस् हमें सुरक्षा के सौ उपाय करने पड़ते हैं ॥
अपनी अपनी सीख लिए, लिखे आपनी लीख ।
अजहुँ सब बिसराए चले,महापुरुष की दीख ।२५५९ ।
भावार्थ :-- अपने ज्ञान को ही सर्वोपरि मानकर सबने अपने ही पंथ बना लिए । समय ने ऐसा कुसंयोग स्थापित कर दिया दृष्टिवंत महापुरुषों के चरणचिन्ह चित्तपटल से विस्मृत हो रहे हैं ॥
पनहारिन की गागरी जूँ जल रखे सँभार ।
सिंधु सरिस संसार में, सँभरे रहँ तौं सार ।२४६० ।
भावार्थ : -- पन्हारी की गगरी जिसप्रकार जल को व्यवस्थित रखती है सागर रूपी लावण्यमयी संसार में मधुरिम सार को भी उसी भांति व्यवस्थित रखें ॥ अन्यथा आने पीढ़ियां प्यासी जन्मेंगी प्यासी ही मरेंगी ॥
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