अबिधि को बिधि बिलखित जब रजिहि ऐसेउ षंड ।
तब भारत देस के अरु , होइहि केतक खंड ।२५४१।
भावार्थ :--अविधान को विधान लेख कर जब ऐसे अकर्मण्य राज करेंगे । सोचो तब इस देश के और कितने खंड होंगे ॥ ये सत्ता के लालची इस देश को खंड खंड करने पर तूले हैं ॥
किंवदंती कहै कबहु रहिहि अखंड ए देस ।
ऐसेउ बिभाजित होत होए रही अवशेष ।२५४२।
भावार्थ :--किंवदन्तियाँ कह रही हैं कि कभी यह देश अखंड भारत हुवा करता था ।यदि यह इसी प्रकार से विभाजित होगा तो यह शेष भारत भी अवशेष होकर रह जाएगा ॥ फिर कोई कश्मीरिस्तान तो कोई कंट्री ऑफ इण्डिया बनेगा ॥
जाके हरिदै दया नहि तहाँ धर्म कहँ पाए |
अधमी अधर्मी अजहुँ बैठे करे न्याय | २५४३ |
भावार्थ : -- जिसके ह्रदय में दया न हो वहां धर्म कहाँ मिलता है | अब तो अधमी अधर्मी न्यायधीश बनकर न्याय कर न्याय ,कर रहें हैं ||
टिप्पणी : -- न्यायालय को धर्म-सभा भी कहा जाता हैं जहां न्यायाधीश सभा के अधीश होकर धर्म के सेतु का कार्य करते हैं ।
न्यायाधीशों की मानसिकता जितनी विकृत होती जाएगी न्याय भी उतना ही दोषपूर्ण होता जाएगा ||
जब धर्म असुरक्षित होगा तब सत्य की रक्षा कैसे होगी .....?
हिंसित हुँत तो दंड है ,हिंसक हुँत परितोस |
दोषी यहँ छूटे फिरे , साँकर बध निर्दोष |२५४४ |
भावार्थ :--अब तो हिंसित को दंड मिलता है हिंसक पुरस्कृत होते हैं | अपराधी को यहाँ खुली छूट है, निरपराधी साँकलें से बंधे हैं ॥
अधुनातन तो ऐसोइ भई जगत की कान ।
धर्म करे सो बावरा, कुकरम करे स्यान । २५४५ ।
भावार्थ :-- अब तो संसार की ऐसी रीत हो चली है कि जो अनेकानेक कुकरम करता हो वह स्याना है ।जो धर्म करता है वह पागल है ॥
अबिधानी बिधानी जहँ अबिधि जहँ बिधि बिधान ।
अपभाषन भाषन जहँ मान तहाँ अपमान । २५४६ ।
भावार्थ :-- विधान के विरोधी ही जहां विधाता हों जहाँ विधि ही विधि-विधान हो । अपशबों से युक्त अपवचन को जहाँ भाषण कहते हों वहां फिर सभी सम्मान अपमान स्वरूप जाते हैं ॥
निकृष्टता के सम्मान से उत्कृष्टता अपमानित होती है.....
अपध्यानी ध्यानी तहँ बिजान कहत सुजान ।
पावन अपावन कर तहँ हीन होत कुलवान । २५४७ ।
भावार्थ : -- जहां अनिष्ट का चिंतन करने वाले ही मननशील पुरुष, और विद्याहीन विद्वान कहलाते हों,वहां पवित्र को अपवित्र करते हुवे कुलहीन भी कुलीन हो जाते हैं ॥
अपराधि चरन गहे तहँ सरन गहे अपराध ।
------ क्रमश: -----
तब भारत देस के अरु , होइहि केतक खंड ।२५४१।
भावार्थ :--अविधान को विधान लेख कर जब ऐसे अकर्मण्य राज करेंगे । सोचो तब इस देश के और कितने खंड होंगे ॥ ये सत्ता के लालची इस देश को खंड खंड करने पर तूले हैं ॥
किंवदंती कहै कबहु रहिहि अखंड ए देस ।
ऐसेउ बिभाजित होत होए रही अवशेष ।२५४२।
भावार्थ :--किंवदन्तियाँ कह रही हैं कि कभी यह देश अखंड भारत हुवा करता था ।यदि यह इसी प्रकार से विभाजित होगा तो यह शेष भारत भी अवशेष होकर रह जाएगा ॥ फिर कोई कश्मीरिस्तान तो कोई कंट्री ऑफ इण्डिया बनेगा ॥
जाके हरिदै दया नहि तहाँ धर्म कहँ पाए |
अधमी अधर्मी अजहुँ बैठे करे न्याय | २५४३ |
भावार्थ : -- जिसके ह्रदय में दया न हो वहां धर्म कहाँ मिलता है | अब तो अधमी अधर्मी न्यायधीश बनकर न्याय कर न्याय ,कर रहें हैं ||
टिप्पणी : -- न्यायालय को धर्म-सभा भी कहा जाता हैं जहां न्यायाधीश सभा के अधीश होकर धर्म के सेतु का कार्य करते हैं ।
न्यायाधीशों की मानसिकता जितनी विकृत होती जाएगी न्याय भी उतना ही दोषपूर्ण होता जाएगा ||
जब धर्म असुरक्षित होगा तब सत्य की रक्षा कैसे होगी .....?
हिंसित हुँत तो दंड है ,हिंसक हुँत परितोस |
दोषी यहँ छूटे फिरे , साँकर बध निर्दोष |२५४४ |
भावार्थ :--अब तो हिंसित को दंड मिलता है हिंसक पुरस्कृत होते हैं | अपराधी को यहाँ खुली छूट है, निरपराधी साँकलें से बंधे हैं ॥
अधुनातन तो ऐसोइ भई जगत की कान ।
धर्म करे सो बावरा, कुकरम करे स्यान । २५४५ ।
भावार्थ :-- अब तो संसार की ऐसी रीत हो चली है कि जो अनेकानेक कुकरम करता हो वह स्याना है ।जो धर्म करता है वह पागल है ॥
अबिधानी बिधानी जहँ अबिधि जहँ बिधि बिधान ।
अपभाषन भाषन जहँ मान तहाँ अपमान । २५४६ ।
भावार्थ :-- विधान के विरोधी ही जहां विधाता हों जहाँ विधि ही विधि-विधान हो । अपशबों से युक्त अपवचन को जहाँ भाषण कहते हों वहां फिर सभी सम्मान अपमान स्वरूप जाते हैं ॥
निकृष्टता के सम्मान से उत्कृष्टता अपमानित होती है.....
अपध्यानी ध्यानी तहँ बिजान कहत सुजान ।
पावन अपावन कर तहँ हीन होत कुलवान । २५४७ ।
भावार्थ : -- जहां अनिष्ट का चिंतन करने वाले ही मननशील पुरुष, और विद्याहीन विद्वान कहलाते हों,वहां पवित्र को अपवित्र करते हुवे कुलहीन भी कुलीन हो जाते हैं ॥
अपराधि चरन गहे तहँ सरन गहे अपराध ।
------ क्रमश: -----
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