बुधवार, 15 अप्रैल 2015

----- ॥ दोहा-दशम २५४॥ -----

अबिधि को बिधि बिलखित जब रजिहि ऐसेउ षंड । 
तब भारत देस के अरु , होइहि केतक खंड ।२५४१। 
भावार्थ :--अविधान को विधान लेख कर जब ऐसे अकर्मण्य राज करेंगे । सोचो तब इस देश के और कितने खंड होंगे ॥ ये सत्ता के लालची इस देश को खंड खंड करने पर तूले हैं ॥

किंवदंती कहै कबहु रहिहि अखंड ए देस । 
ऐसेउ बिभाजित होत होए रही अवशेष ।२५४२। 
भावार्थ :--किंवदन्तियाँ कह रही हैं कि कभी यह देश अखंड भारत हुवा करता था ।यदि यह इसी प्रकार से विभाजित होगा तो यह शेष भारत भी अवशेष होकर रह जाएगा ॥ फिर कोई कश्मीरिस्तान तो कोई कंट्री ऑफ इण्डिया बनेगा ॥ 

जाके हरिदै दया नहि तहाँ धर्म कहँ पाए | 
अधमी अधर्मी अजहुँ बैठे करे न्याय  | २५४३ | 
भावार्थ : -- जिसके ह्रदय में दया न हो वहां धर्म कहाँ मिलता है | अब तो अधमी अधर्मी न्यायधीश बनकर  न्याय कर न्याय ,कर रहें हैं ||  

टिप्पणी : -- न्यायालय को धर्म-सभा भी कहा जाता  हैं जहां न्यायाधीश सभा के अधीश होकर धर्म के सेतु का कार्य करते हैं । 

न्यायाधीशों की मानसिकता जितनी विकृत होती जाएगी न्याय भी उतना ही  दोषपूर्ण होता जाएगा || 

जब धर्म असुरक्षित होगा तब सत्य की रक्षा कैसे होगी .....? 

हिंसित हुँत तो दंड है ,हिंसक हुँत परितोस  |
दोषी यहँ छूटे फिरे , साँकर बध  निर्दोष  |२५४४ |
भावार्थ :--अब तो हिंसित को दंड मिलता है हिंसक पुरस्कृत होते हैं | अपराधी को यहाँ खुली छूट है, निरपराधी साँकलें से बंधे हैं ॥ 

 अधुनातन तो ऐसोइ  भई जगत की कान   । 
धर्म करे सो बावरा, कुकरम करे स्यान । २५४५ । 
भावार्थ :-- अब तो  संसार की ऐसी रीत हो चली है कि जो अनेकानेक कुकरम करता हो वह स्याना है ।जो धर्म करता है  वह पागल है ॥  

अबिधानी बिधानी जहँ अबिधि जहँ बिधि बिधान । 
अपभाषन भाषन जहँ मान तहाँ अपमान । २५४६ । 
भावार्थ :-- विधान के विरोधी ही जहां विधाता हों  जहाँ विधि ही विधि-विधान हो । अपशबों से युक्त अपवचन को जहाँ भाषण कहते हों वहां फिर सभी सम्मान अपमान स्वरूप जाते हैं ॥ 

निकृष्टता के सम्मान से उत्कृष्टता अपमानित होती है.....

अपध्यानी ध्यानी तहँ बिजान कहत सुजान ।
पावन अपावन कर तहँ हीन होत कुलवान । २५४७ । 
भावार्थ : --  जहां अनिष्ट का चिंतन करने वाले ही मननशील पुरुष, और विद्याहीन विद्वान कहलाते हों,वहां पवित्र को अपवित्र करते हुवे कुलहीन भी कुलीन हो जाते हैं ॥ 

अपराधि चरन गहे तहँ सरन गहे अपराध ।

------ क्रमश: -----












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