गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

----- ॥ दोहा-दशम २५२ ॥ -----

अविधान संविधान किए रजे पराया राज । 
जन हित अर्थ बिसार किए,अपने हित के काज ।२५२१ । 
भावार्थ : --  संविधान को विधान के विरुद्ध कर अब तक पराए ही राज कर रहे हैं । ये  पराए राजा जन साधारण का हित को विस्मृत किए अपने स्वार्थ की पूर्ति में ही लगे हैं ॥ जो नए आते हैं वे इस अवैधानिक संविधान  काअनुशरण करते हुवे परायों के अनुचर ही कहलाते हैं ॥ 

माली आपहि फुर फरे, मरे मरे बनबारि । 
कलधारी भरे पूरे,हलधारी घर खारि ।२५२२ । 
भावार्थ : --  वनमाली बहुंत प्रसन्न चित्त हैं वन का मुख मंद प्रभा से युक्त हो गया है । कलुषित कल की कलाओं के कलाकार सम्पन्न हैं और हलधारी का घर अभाव से ग्रस्त है ॥ 

खेट खेत बन नास का करिहिहि देस बिकास । 
करिहि त यह बिकसित मुख ,रहिहि चारि के पास ।२५२३ । 
भावार्थ :--खेतों का गावों का वनों का विनाश करके देश क्या विकास करेगा । करेगा भी तो यह विकास मुट्ठी भर लोगों के ही पास होगा, बाक़ी जैसे हैं वैसे भी नहीं रहेंगे ॥ 



लघु उद्यम बिनसाइ के किए जब बृहद बिकास । 
दारिद दास स्वामि भए स्वामि दारिद दास ।२५२४ । 
भावार्थ :-- लघु उद्यमों को विनाश  जब वृहद उद्यम विकसित होते हैं । तब दलिदर दास स्वामी  और स्वामी दलिदर होकर उनके दास बन जाते हैं ॥ 



देस बासि प्रतिबासि भए प्रतिवासि भए निवासि । 
भूमि भवन सों आपने, रच बिधि देइ निकासि ।२५२५। 


भावार्थ : - जो भारत के मूल निवासी थे वे मूलहीन हो गए । जो परे देश के वासी हैं वे अब मूल निवासी हो गए । अवैधानिक विधान ने मूल निवसियों को अपनी ही भूमि से, अपने ही भवनों से  तड़ीपार कर दिया ।। 


बिदेसि रीति सुरीति तो देसी भई  कुरीत । 
सिखी सिखाई नीति सों,देस भयौ भय भीत ।२५२६। 


भावार्थ :--जो रीतियाँ इस देश की थी वह कुरीति और जो विदेश की हैं वह सुरीति हो चलीं है । इन सिखी  हुई विदेशी नीतियों से जन सामान्य भय भीत होकर सोचने के लिए विवश है कि कब मिलेगी स्वाधीनता ॥ 



हिंसक भए धर्मात्मा हिंसारत भए धर्म । 
कुकर्मी सत्कर्मी भए सुकरम गनत  कुकर्म ।२५२७। 

भावार्थ:-- जब कुकर्मी सत्कर्मों कहलाने लगते हैं सत्कर्मों की गणना कुकर्मों में होने लगाती है तब हिंसा वादी धर्मात्मा कहलाते हैं हिंसावाद परम धर्म हो जाता है 

निर्बल के खन खेत बन  छीन लेउ बरियारि । 
तिन्हनि भोगन देउ जो जोग गहे  कुल चारि ।२५२८ । 
भावार्थ : -- निर्बल के खंड उसके खेत उसके वन उसकी संचित सम्पदा को बलपूर्वक छीनो ।और उन्हें भोगने के लिए दे दो जो उँगलियों में गिने जा सकते हैं ॥ इसे विधान कहेंगे या अविधान..... ? क्या यह लोकतंत्र है.....? कि अधिसंख्यक की सम्पदा को अल्पसंख्यक भोगें.....

कलुषित कल की भांभरी सब बन उपबन जारि । 
काऱी कारी मरू थरी मृग मरीचि जल बारि ।२५२९ । 
भावार्थ : -- कलुषित संयंत्रों की जलती हुई राख ने वनों को उपवनों को भस्म कर दिया । जहाँ यह संयत्र स्थापित हैं वहां की धरती मानो काली काली मरु स्थली हो गई है वहां जल तो जैसे मृग मरीचिका ही बन कर रह गया है ॥ यह सब राजधानियों से दिखाई नहीं देगा  ॥ 

ए पाँवर परदेसी अरु ए, पच्छिम के पाखण्ड । 
किंवदंती माहि रहे भारत देस अखंड ।२५३० । 
भावार्थ :-- ये मूर्ख परदेसी  और यह पश्चिम देशों का पाखण्ड ।इनके लिए भारत के चार खंड हुवे फिर भी ये उसकी छाँती पर मूँग दल रहे हैं, 
और भारत की अखंडता एक किंवदंती बन कर रह गई है ॥ 

1 टिप्पणी:

  1. “ It is wick which endures the flame and illumines, and the lamp magnifies the self.
    Thus by mutual help , the darkness of ignorance is shed away .”
    ( 2511)

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----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

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