कर्म नीठ श्रम वान को कठिनै जी के जोग ।
धंधारी धनवान को सुलभ सकल भव भोग । २५८१।
भावार्थ :--एक कर्मनिष्ठ श्रमवान को तो जीवन के हेतु भी कठिन हो गए हैं । और एक कुकर्मी धनवान हेतु पृथ्वी के सभी भोग सुलभ हैं ॥ इसे व्यवस्था कहेंगे या अव्यवस्था कहेंगें ?
सकल पाल अस ढंग रहँ रहँ ब्याल जिस ढंग ।
अंतर कुकरम रँग रँगे बाहिर करे ब्यंग ।२५८२।
भावार्थ :--विश्व केसभी जनपाल इस रीति से रहते हैं मानो देश में कोई व्याल रह रहा है । ये देश में कलुषित- कर्मों की कालिमा से रंगे हुवे होते हैं और विदेशों में साधु बनकर प्रवचन देते हुवे इन कुकर्मों पर विरोध प्रकट करते हैं ॥
कुकरम पर देस बिदेस सब नृप दैं उपदेस ।
कमाई को लल जिभि जस चहँ निज देस निबेस । २५८३।
भावार्थ : -- कालकुकर्म पर तो सभी प्रमुख देश विदेशों में उपदेश देते फिरते हैं । काली कमाई लालची दृष्टि रखते हुवे कली कमाई का निवेश अपने देश में चाहते हैं ॥क्या निवेशित धन के स्त्रोत का परिक्षण होता है.....?
कोई बम फोड़े आतंक मचाए कुछ भी करे प्राप्त धन को हमारे देश में लगाए.....विश्व की आर्थिक नीति यही हो चली है.....
नग नद बन खेत खन सन जुवपन के बढ़ताए ।
बिलासि जीवन हेतु सन, बूढत बे जुवताए ।२५८४।
भावार्थ : -- पर्वतों नदियों वनों खेतों खण्ड से राष्ट्र वयस्कर होते हैं । विलासी जीवन हेतु से वयस की हानि कर वह युवावस्था में ही वृद्धवस्था को प्राप्त हो जाते हैं, अंतत: वह राष्ट्र मृत हो जाता है उनकी भूमि मरु भूमि हो जाती है । जैसे : - अफगानिस्तान एक मृत राष्ट है ॥
अधुनातन जगत मैं भए जीव जोग भरपूर ।
कलियारे धन ने करे , उजियारे सों दूर ।२५८५।
भावार्थ :-- इस समय विश्व में जीवन के साधन भर पूर हैं दुःख की बात यह है कि काले धन ने इसे कमाए उजले धन से दूर क्या हुवा है ॥
पुर पुर पयस्वान जहाँ रहे खेत खलिहान ।
तहाँ भंडार भवन मैं , भरे रहे धनधान ।२५८६।
भावार्थ : -- जहाँ पर पर पयस् से युक्त हों खेतों में उपज लहलहाती हो । वहां के भंडार भवन धनधान्य से भरपूर होते हैं ॥
धन धान भर पूर रहे सब दिन पुआ पवाएँ ।
अपुर रहे काचहि नहि पूर कहाँ ते आए ।२५८७ ।
भावार्थ : -- रे भिखमंगे पडोसी : -- सस्य शाली देश निसदिन पूए पवाते हैं, बचे तो जिनावर भी खाते हैं । धनधान्य अपूर्ण हो तो गुजरात के जैसे कुपोषण को प्ऱप्त होते हैं कारण कि फिर कच्ची रसोई ही नहीं पवाती, पकी कहाँ से पवाए ॥
मानस तेरी जिहा को तब रस लहनी होए ।
जहँ लग गोचर दीठ हो, भूखा रहे न कोए ।२५८८ ।
भावार्थ:--हे मनुष्य इस जिह्वा को रसास्वादन का अधिकार तभी है जब तेरे दृष्टि गोचर पथ को कोई भूखा दर्शित न हो ॥
किरषक मलिनई मुख लिए सासक कौरव भेष ।
भगवन को पुकार रही धरनी बिथुरे केस ।२५८९।
पिधानी मैं परी रहे सो तो लोहु लुहारि ।
सीस हने तलवार है एकै वार सो धार। २५९० ।
पिधानी मैं परी रहे सो तो लोहु लुहारि ।
सीस हने तलवार है एकै वार सो धार। २५९० ।
भावार्थ :-- खड्ग कोष में पड़ा खड्ग लोहार के घर में पड़ा हुवा लोहा होता है । जो शीश हने उसे तलवार कहते हैं मारे एक ही वार में उसे धार कहते है ॥