गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

----- ॥ दोहा-दशम २५८ ॥ -----

कर्म नीठ श्रम वान  को कठिनै जी के जोग । 
धंधारी धनवान को सुलभ सकल भव भोग । २५८१। 
भावार्थ :--एक कर्मनिष्ठ श्रमवान को तो जीवन के हेतु भी कठिन हो गए हैं । और एक कुकर्मी धनवान हेतु  पृथ्वी के सभी भोग सुलभ हैं ॥  इसे व्यवस्था कहेंगे या अव्यवस्था कहेंगें  ?

सकल पाल अस ढंग रहँ रहँ ब्याल जिस ढंग । 
अंतर कुकरम रँग रँगे बाहिर करे ब्यंग ।२५८२। 
भावार्थ :--विश्व केसभी जनपाल इस रीति से रहते हैं मानो  देश में कोई व्याल रह रहा है । ये देश में कलुषित- कर्मों की कालिमा से रंगे हुवे होते हैं और विदेशों में साधु बनकर प्रवचन देते हुवे इन कुकर्मों पर  विरोध प्रकट करते हैं ॥

कुकरम पर देस बिदेस सब नृप दैं उपदेस । 
कमाई को लल जिभि जस चहँ निज देस निबेस । २५८३। 
भावार्थ : -- कालकुकर्म पर तो सभी प्रमुख देश विदेशों में उपदेश देते फिरते हैं । काली कमाई लालची दृष्टि रखते हुवे कली कमाई का निवेश अपने  देश में चाहते हैं ॥क्या  निवेशित धन के स्त्रोत का परिक्षण होता है.....?  
कोई बम फोड़े आतंक मचाए कुछ भी करे प्राप्त धन को हमारे देश में लगाए.....विश्व की  आर्थिक नीति यही हो चली है.....

नग नद बन खेत खन सन जुवपन के बढ़ताए । 
बिलासि जीवन हेतु सन, बूढत बे जुवताए ।२५८४। 
भावार्थ : -- पर्वतों नदियों वनों खेतों खण्ड से राष्ट्र वयस्कर होते हैं । विलासी जीवन हेतु  से वयस की हानि कर वह युवावस्था में ही वृद्धवस्था को प्राप्त हो जाते हैं,  अंतत: वह राष्ट्र मृत हो जाता है उनकी भूमि मरु भूमि हो जाती है । जैसे : - अफगानिस्तान एक मृत राष्ट है ॥

अधुनातन जगत मैं भए जीव जोग भरपूर । 
कलियारे धन ने करे , उजियारे सों दूर ।२५८५। 
भावार्थ :--  इस समय विश्व में जीवन के साधन भर पूर हैं दुःख की बात यह है कि काले धन ने इसे  कमाए उजले धन से दूर क्या हुवा है ॥

पुर पुर पयस्वान जहाँ रहे खेत खलिहान । 
तहाँ भंडार भवन मैं  , भरे रहे धनधान ।२५८६। 
भावार्थ : -- जहाँ पर पर पयस् से युक्त हों खेतों में उपज लहलहाती हो । वहां के भंडार भवन धनधान्य से  भरपूर होते हैं ॥


धन धान भर पूर रहे सब दिन पुआ पवाएँ । 
अपुर रहे काचहि नहि पूर कहाँ  ते आए ।२५८७ । 
भावार्थ : -- रे भिखमंगे पडोसी : -- सस्य शाली देश  निसदिन पूए पवाते हैं,  बचे तो जिनावर भी खाते हैं ।  धनधान्य अपूर्ण हो तो गुजरात के जैसे कुपोषण को प्ऱप्त होते हैं कारण कि फिर कच्ची रसोई ही नहीं पवाती, पकी कहाँ से पवाए ॥
 
मानस तेरी जिहा को तब रस लहनी होए । 
जहँ लग गोचर दीठ हो, भूखा रहे न कोए ।२५८८ । 
भावार्थ:--हे मनुष्य इस जिह्वा को रसास्वादन का अधिकार तभी है जब तेरे  दृष्टि गोचर पथ को कोई भूखा दर्शित न हो ॥ 


किरषक मलिनई मुख लिए सासक कौरव भेष । 
भगवन को पुकार रही धरनी बिथुरे केस ।२५८९। 

पिधानी मैं  परी रहे सो तो लोहु लुहारि ।
सीस हने तलवार है एकै वार सो धार। २५९० ।
 भावार्थ :-- खड्ग कोष में पड़ा खड्ग लोहार के घर में पड़ा हुवा लोहा होता है । जो शीश हने उसे तलवार कहते हैं  मारे एक ही वार में उसे धार कहते है ॥  



मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

----- मिनिस्टर राजू १६७ -----

राजू :--मास्टर जी! यो प्रधाण मंतरी बी कैंया आड्डो - टेड्डो चाल्ल ह,बिका दिल्ली तैं गुजरात जाणो हो तो यो जर्मनी हो के जावै.....

"आड्डी-टेड्डी गाड्डी में आड़डॉ-टेड्डो ही चालोगो सिद्धो थोड़े चालोगो....."

शनिवार, 18 अप्रैल 2015

----- ॥ दोहा-दशम २५ ७ ॥ -----

बनउनि की  बानि  ऊँची,बनि की ऊँची बानि । 
दान धर्म को लाभ कहँ पाप कर्म को हानि ।२५७१ । 
भावार्थ :--बने हुवे की तो सज-धज  ऊँची होती है, बनिये की वाणी ऊँची होती है । वे दान और पुण्य को लाभ कहते हैं कुकर्मों को हानि कहते हैं ।।

जोड़े लाख करोड़ किए सब किछु छोड़ बिहाए । 
ऐसी कमाइ कर चलें मरे संग मैं जाए ।२५७२। 
भावार्थ : - जोड़ जोड़ कर लाख को करोड़ किया फिर सब कुछ छोड़ कर चल दिए । ऐसी कमाई कर चलें जो मरने पर साथ में जाए ॥


तेरा दिया हुवा सदा सुपात पानि गहाए  । 
कुपात को  दाया दान संजमनी लए जाए ।२५७। 
भावार्थ  :-- दाता  को सतवर्षी होना चाहिए वह  पात्रता का  विचार कर  दान करे  ।  दाया हुवा सत्पात्र  को ही मिले । कुपात्र  को दिया दान जीवन को नरक बना देता है ॥

सदगाहि सो दान गहै जो सद् दान गहाए  । 
उदर पूरता आपना, दूजे हाथ प्रदाए ।२५७४। 
भावार्थ : --   सद्ग्राही वही है जो सत्परिग्रह करे ।  परिग्रह को केवल अपने उदर की पूर्ति करते हुवे  अन्य सुपात्र को सम्यक रूप से वितरित करे  ॥

दाता का मन लालची दिए मत दान निसंक । 
तेरा दाया किन मिला मारे घर जो डंक ।२५७५। 
भ्वर्थ : --उस मतदाता का मन लालची होता है जो निसंकोच किसी को भी मत दे देता है । यह दान उसे मिलता  है जो उसी के घर में डाका डालते हैं ॥
।   
मुख सों किछु आनइ  कहे  कर सो किए किछु आन । 
पहनी सम रहनी नहीं रहनी   कहँ सब संत महान ।२५७६। 
भावार्थ : --मुख से कुछ बोला हाथ से कुछ करवाया । जैसी पहनी हो रहनी भी वैसी ही होनी चाहिए जिसका वासस् कुछ और रहा वास कुछ और,  उस गाँधी को जगत में महान आत्मा कहकर पुकारा जाता है ॥

कोई सरकार सूट- बूट वाली है कोई सूटेड-बूटेड  नौकरों वाली है.....

सेबक उजबल भेस जहँ स्वामि मलिनए भेस । 
ऐसो अंधियारे भवन,बचे नहीं किछु सेस ।२५७७। 
भावार्थ: --जहाँ स्वामी मलिन वेश में और सेवक उज्जवल वेश में हो ऐसे विचार शुन्य  घर में कुछ भी शेष नहीं बचता । सेवक  घर ही डुहार के ले जाता है ॥

स्वामि हो कि सेवक हो, चाहे कोउ नरेस । 
तैसा जीवन जीवना जैसा वाका  देस ।२५७८। 
भावार्थ : -- स्वामी हो सेवक हो चाहे कोई नरेश ही क्यों न हो । उसकी जीवनचर्या वैसी ही होनी चाहिए जैसे उसके देश की है ।

कंगालु कृस देस जो ऐसो भेस बनाए । 
कौड़ी को करोड़ी किए, अमोल रतन बिसाए ।२५७९। 
भावार्थ : --पहना है ज़रीदार जम्फ़र और जेब में कुछ नहीं । अकिंचन कंगाल रोग्गी देश जिसने ऐसा वेश भरा की अपनी कौड़ी के मोल की मुद्रा को करोड़ी कर अनमोल रतन आयात करे हैं । जब ये कौड़ी की तीन हो जाएगी तब क्या करेग्गा बम खाएगा नहीं..... बम दिखाएगा -और आतंक मचाएगा ॥

छोटे छोटे काज सों होत बड़े सब काज । 
मूठि भर बुवाई करे कोठी भरे अनाज ।२५८० । 
भावार्थ : -- छोटे छोटे कार्यों से बड़े कार्य सिद्ध होते हैं। एक मूट्ठी अन्न  की यदि बुवाई कर दो तो वह भंडार भर देता है ॥











----- ॥ दोहा-दशम २५६ ॥ -----

 खाए पिए सिरु छाईं किए सुख सय्या में सोए ।
जुग लग संचित संपदा अल्प काल में खोए ।२५
६१।  

भावार्थ : -- खाए पिए शीश पर शीतल छाया कर सुख पूर्वक शयन किए । युगों से संचित इस सम्पदा को अल्प काल में समाप्त कर चल दिए ॥ यही तुम्हारी लघु कथा होगी ।।

खाया पिया पहन इया सोया चादर तान । 
रैनी सुख सोन बित गई,दिन के क्या अनुमान ।२५६२। 
भावार्थ : -- खया पिया पहन लिया संसार के सभी सुख भोग इये ।रेना तो सुखपूर्वक व्यतीत हो गई दान का क्या पता ॥ 

हो निकरे को भूर सब, अपने सुख को रोए । 
होतब के का होइये, चिंता करे न कोए ।२५६। 
भावार्थ:-- जो चले गए उनका त्याग भुला कर सब अपने अधिकाधिक सुख के लिए हाय हाय कर रहे हैं । जो होने वाले केलिए  कोई चिंता करते दिखाई नहीं देता ॥ 

न निरझरी निर्झर झरे न त तटिनी मैं तोए । 
बरसाइत बद्ररिया को बरसे बरसों होए ।२५६४ -क ।  

हरियारि करियारि करे, जगतिरु भुइ मरु होए ।
सुख सय्या जो सयन किए,होनहार तिन रोए ।२५
४-ख । 

भावार्थ :-- न पहाड़ों से झरने ही झरते हैं न ही नदियों में पानी ही है । वर्षा ऋतु में वर्षा वर्षित हुवे वर्षों हो गए ।

भावार्थ :-  हरियाली को कलियाली किए तरुस्थल मरुस्थल में परिवर्तित हो गए ।  सुख की शीतल सय्या में शयन करने वालों को कल उनका भविष्यत पिपासार्त्त होकर कोसेगा ॥  


कलधारि द्यूति कर भए  सासक द्यूति कार । 
खेती बारी हारि गए हल धारिहि हल हार ।२५
भावार्थ : --  शासक द्यूति का आयोजन कर रहे हैं उद्योगपति क्रीड़ा कर रहे हैं ।  किसान हल हार के कृषिभूमि भी भी हार चुके हैं ॥ 

टू बी कंटिन्यू.....

चाहे साँसत मैं रहे जीव जगत के साँस । 
मानस बहुं सुबास रहे, यह तो नहीं बिकास ।२५६। 
भावार्थ :--जीव जगत चाहे कितने ही कष्ट भोगे मानव को सुख पूर्वक रहना चाहिए । यह विकास नहीं है यह विनाश है, कारण कि जीव जगत से इतरत: उन्नत मानव जाति  की कल्पना नहीं की जा सकती ॥ 

जनमानस की बढ़नि पर गरब न कीजो कोए । 
गरब करे सो अंध मति,देस आपनी होए ।२५६। 
भावार्थ : --   वर्तमान में बढ़ती जनसँख्या न केवल भारत अपितु  विश्व के लिए चिंता व् चिंतन का विषय है,इस पर गौरवान्वित नहीं होना चाहिए, यदि कोई होता है तो वह अपने राष्ट में अंध मति सिद्ध होगा ।। 

चकमक की चिनगी संग जगत ज्वाला जागि । 
को लगावन मैं लगे कोउ बुझावन लागि ।२५६
भावार्थ :-- चकमक पत्थर की चिंगारी से ज्वाला का प्रादुर्भाव हुवा  इतिहास में ऐसा वर्णन मिलता है । अब  कोई तो उसे भड़काने में लगा तो कोई उसे बुझाने में लग गया ।

 अलसाए सासन जो अस सुख आसन मैं सोहि । 
गहुँ होवनिहार अवसि,पाहन जुग में होंहि ।२५६। 
भावार्थ :--विश्व भर के राष्ट्रों का शासन अनमनयस्क होकर शीतल छाया वाले सुखासन में इस प्रकार शयनित  रहा तब  निश्चय ही आगे आने वाली पीढ़िया पाषाण युग में जन्म लेंगी ॥

श्रम  करे सब करम करे, तब जा पेट पुराएँ । 
धनिमन ऐतक संपदा न जान कहाँ सों  लाएँ ।२५७०। 
भावार्थ:--एक साधरण व्यक्ति श्रम पूर्वक दुनिया भर के  कार्य करता है तब कहीं जाकर उसके पेट की पूर्ति होती है ।इन उद्योग पति इन पूंजी पतियों के पास इतनी धन- सम्पद जाने कहाँ से आई ॥ पहले एक  दो ही उद्योग पति थे औचक इतने कैसे उग गए कौन सी खाद दी थी.....? 

कांग्रेस आई तो आई कमलाई तो और बढ़ाई :-- अल्प समय में औचक इतने करोड़पति कैसे हो गए ?   अल्प समय में ही भ्रष्टाचारिता इतनी कैसे बढ़ गई ?  कहने का तात्पर्य यह है कि  भ्रष्टाचारिता व् करोड़पति साथ साथ बढे उद्योगपतियों का लाभांश भी बढ़ा.....

या वित्तकामि चित्त की गति न जाने कोए । 
जूँ जूँ बुढ़े स्याम रंग तूँ तूँ उजबल होए ।। 
भावार्थ : -- लोभी निठल्ले चित्त की गति कोई नहीं जानता  जैसे जैसे भ्रष्टाचारिता बढती है ये तैसे तैसे पनपते हैं ॥ 






----- ॥ दोहा-दशम २५५ ॥ -----

समऊ के गति जान के अपनी गति अनुमान । 
अजहुँ चरन अगवान  हैं अगहुँ होहि पिछवान ।२५५१ ।  

भावार्थ : -- समय के गति ज्ञात कर अपनी गति का अनुमान कर लें  ।  जो चरण आगे चल रहें हैं कल वह समय से पीछे होंगे ॥ कारन कि जीवन एक चक्र है ॥

कतहुँ साख ही साख हैं कतहुँ पाँख ही पाँख । 
सत्पथ चरते जाइये,धरे लक्ष्य पर आँख ।२५५२। 
भावार्थ :--कहीं शाखा ही शाखा हैं कहीं पंथी ही पंथी हैं । मनुष्य को चाहिए कि वह जीवन की यात्रा में मृत्यु रूपी लक्ष्य पर दृष्टि टिकाए सन्मार्ग पर चलता जाए ॥

चारि खानि जग जीव में जोनि चुरासी लाख । 
सत्कृत करते जाइये,धरे लच्छ पर आँख ।२५५३। 
भावार्थ: -- संसार में चार प्रकार के अनंत जीव हैं (अण्डज,स्वेदज,उद्भिज और जरायुज )जिनमें कुल लाख जातियां पाई जाती हैं । मनुष्य को चाहिए की वह अपने मृत्यु रूपी लक्ष्य पर दृष्टि टिकाए सत्कृत करता जाए ॥ सत्कृत्यों की उपेक्षा से वह किसी भी भांति की जाती को प्राप्त हो सकता है ॥

जब सबहि सँजोग रहँ तब कहे करे किछु नाहि । 
जब कहनहु जोग रहै न,करन बहुंत कुछ चाहि ।२५५४। 
भावार्थ : -- जब सब कुछ अनुकूल रहता है तब कहते हैं पर करते नहीं न हैं । जब कहने के योग्य भी नहीं रहते  तब बहुंत कुछ करना चाहते हैं ।।

जीवन चरजा नीच रहँ ऊँचे रहएँ विचार । 
विचारों की ऊंचाई, जग के करे सँभार ।२५५५। 
भावार्थ : --जीवन चर्या सरल होने से विचार ऊंचाइयों को प्राप्त होते हैं,  विचारों की ऊंचाई संसार को व्यवस्थित करती है ॥

भोग बिषय की चाह में अजहुँ भयौ जग अंध । 
नेम नीति निर्बंध बिनु,बिगरे सकल प्रबंध ।२५५६। 
भावार्थ : -- भोग विषय की कामनाओं मेंअधुनातन विश्व विचारहीन हो चला है । नियम व् निर्बंधों  के अभाव में इस समय विश्व का शासन प्रबंध अव्यवस्थित है ।।   


सब अपने मन की कर रहे हैं जो चाहे चन्द्रमा में टक्कर मार रहा है फूट जाता तो ? शर्मा जी वहां बम रख के आए थे ।  कोई मंगल में  ताका झांकी कर रहा है वहां डबल बम रखा है  छ इन  धरती वाले फुसफुसे बम को कौन पूछता है इधर एक बटन दबाया फिर तू कहाँ और मैं कहाँ..... शब्द भेदी गोले हैं  एक शब्द बोला फिर गोले  बोलने लगते हैं.....



होए हैं सो होइ चले, आगे होवनि हारि  । 
जैसी चलनि चल निकले, तैसेऊ अनुहारि ।२५५७। 
भावार्थ :--जो जन्म ले चुके वह मृत्यु की और अग्रसर हैं, भविष्य नई पीढ़ियों का है । पुरानी पीढ़ी जैसा आचरण  करेगी आने वाली पीढ़ियां भी उसी का अनुशरण करेंगी ॥ यही विचारहीनता रही तो  पहले जल जाएगा फिर हल जाएगा फिर जंगल जाएंगे फिर ?  फिर क्या फिर तो सारी पृथ्वी जल-जल करती जाएगी ॥ 

सब हेतु सब हितू रहें बैरी रहे न कोए । 
बेर करे जब आपही, तब जग बेरी होए ।२५५८। 
भावार्थ : -- सबके लिए सभी हिताकांक्षी रहे तो संसार में वैर-भाव न रहे और कोई किसी का वैरी न रहे । जब हम स्वयं ही वैर प्रतियात करते हैं तब सभी हमारे वैरी हो जाते हैं । परिणामतस् हमें सुरक्षा के सौ उपाय करने पड़ते हैं ॥ 

अपनी अपनी सीख लिए, लिखे आपनी लीख । 
अजहुँ सब बिसराए चले,महापुरुष की दीख ।२५५९ । 
भावार्थ :-- अपने ज्ञान को ही सर्वोपरि मानकर सबने अपने ही पंथ बना लिए । समय ने ऐसा कुसंयोग स्थापित कर दिया दृष्टिवंत महापुरुषों के चरणचिन्ह चित्तपटल से विस्मृत हो रहे हैं ॥ 

पनहारिन की गागरी जूँ जल रखे सँभार । 
सिंधु सरिस संसार में, सँभरे रहँ तौं सार ।२४६० । 
भावार्थ : -- पन्हारी की गगरी जिसप्रकार जल को व्यवस्थित रखती है सागर रूपी लावण्यमयी संसार में मधुरिम सार को भी उसी भांति व्यवस्थित रखें ॥ अन्यथा आने  पीढ़ियां प्यासी जन्मेंगी प्यासी ही मरेंगी ॥ 

बुधवार, 15 अप्रैल 2015

----- ॥ दोहा-दशम २५४॥ -----

अबिधि को बिधि बिलखित जब रजिहि ऐसेउ षंड । 
तब भारत देस के अरु , होइहि केतक खंड ।२५४१। 
भावार्थ :--अविधान को विधान लेख कर जब ऐसे अकर्मण्य राज करेंगे । सोचो तब इस देश के और कितने खंड होंगे ॥ ये सत्ता के लालची इस देश को खंड खंड करने पर तूले हैं ॥

किंवदंती कहै कबहु रहिहि अखंड ए देस । 
ऐसेउ बिभाजित होत होए रही अवशेष ।२५४२। 
भावार्थ :--किंवदन्तियाँ कह रही हैं कि कभी यह देश अखंड भारत हुवा करता था ।यदि यह इसी प्रकार से विभाजित होगा तो यह शेष भारत भी अवशेष होकर रह जाएगा ॥ फिर कोई कश्मीरिस्तान तो कोई कंट्री ऑफ इण्डिया बनेगा ॥ 

जाके हरिदै दया नहि तहाँ धर्म कहँ पाए | 
अधमी अधर्मी अजहुँ बैठे करे न्याय  | २५४३ | 
भावार्थ : -- जिसके ह्रदय में दया न हो वहां धर्म कहाँ मिलता है | अब तो अधमी अधर्मी न्यायधीश बनकर  न्याय कर न्याय ,कर रहें हैं ||  

टिप्पणी : -- न्यायालय को धर्म-सभा भी कहा जाता  हैं जहां न्यायाधीश सभा के अधीश होकर धर्म के सेतु का कार्य करते हैं । 

न्यायाधीशों की मानसिकता जितनी विकृत होती जाएगी न्याय भी उतना ही  दोषपूर्ण होता जाएगा || 

जब धर्म असुरक्षित होगा तब सत्य की रक्षा कैसे होगी .....? 

हिंसित हुँत तो दंड है ,हिंसक हुँत परितोस  |
दोषी यहँ छूटे फिरे , साँकर बध  निर्दोष  |२५४४ |
भावार्थ :--अब तो हिंसित को दंड मिलता है हिंसक पुरस्कृत होते हैं | अपराधी को यहाँ खुली छूट है, निरपराधी साँकलें से बंधे हैं ॥ 

 अधुनातन तो ऐसोइ  भई जगत की कान   । 
धर्म करे सो बावरा, कुकरम करे स्यान । २५४५ । 
भावार्थ :-- अब तो  संसार की ऐसी रीत हो चली है कि जो अनेकानेक कुकरम करता हो वह स्याना है ।जो धर्म करता है  वह पागल है ॥  

अबिधानी बिधानी जहँ अबिधि जहँ बिधि बिधान । 
अपभाषन भाषन जहँ मान तहाँ अपमान । २५४६ । 
भावार्थ :-- विधान के विरोधी ही जहां विधाता हों  जहाँ विधि ही विधि-विधान हो । अपशबों से युक्त अपवचन को जहाँ भाषण कहते हों वहां फिर सभी सम्मान अपमान स्वरूप जाते हैं ॥ 

निकृष्टता के सम्मान से उत्कृष्टता अपमानित होती है.....

अपध्यानी ध्यानी तहँ बिजान कहत सुजान ।
पावन अपावन कर तहँ हीन होत कुलवान । २५४७ । 
भावार्थ : --  जहां अनिष्ट का चिंतन करने वाले ही मननशील पुरुष, और विद्याहीन विद्वान कहलाते हों,वहां पवित्र को अपवित्र करते हुवे कुलहीन भी कुलीन हो जाते हैं ॥ 

अपराधि चरन गहे तहँ सरन गहे अपराध ।

------ क्रमश: -----












बुधवार, 8 अप्रैल 2015

----- मिनिस्टर राजू १६ ६ -----

राजू ! मेरे पास एक पैठोर है..,

राजू :-- पैठोर !!!

बोले तो  दूकान है

राजू :-- तो ऐसा बोलो न मास्टर जी ! हाँ है तो..,

" सोच रहा हूँ उसमें एक मंदीर खोल लूँ.....


सोमवार, 6 अप्रैल 2015

----- ॥ दोहा-दशम २५३ ॥ -----


हरियारी हरियरे जब लाँगल धरे किसान | 
भंडार भरे रहे जब, कनक धरे खलिहान |2531|
भावार्थ :--भूमि तभी हरीभरी रहती है जब किसान के हाथ में हल होता है  |भंडार तभी भरे रहते हैं जब उपज कणों से युक्त होती है || अन्यथा अन्न संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिसे मानव जनित अकाल कहते हैं || 


पहिले जल दूषित करें ,बहुरि करें बैपार | 
सब कहुँ रोग फ़ैलावें फिर बेचें उपचार |2532 |
भावार्थ :--इन सत्ताधारियों की यही आर्थिक नीति है कि  पहले तो जल को गंदा करो फिर उसका धंधा करो |पहले रोगों को फैलाओ फिर उपचार बेचकर लाभ कमाओ || 

\ये नेता (से बने हुवे उद्योगपति,उद्योगपति से बने नेता  )नदियों में मैला बहाएँ -जनसाधारण जल टैक्स पटाएं || 

मल उतसर्जित कल धरे,धनपति को समझाएँ |
सुचिता हुँत घर आपने सौच कूप बनवाएँ |2533 |
भावार्थ :--मल त्यागते हुवे इन उद्यमों के पाणि ग्रहीता पतियों को कोई जाकर समझाए | की स्वच्छता हेतु पहले वे अपने घर में संडास बनवाएं || जो बनाने में असमर्थ हो तो हम धर्म कर देंगे || 

हरियारि बिनसाई के करियारि किए बिकास । 
 हलधर अजहुँ कलधर के भयउ बँधेऊ दास ।२५३४ । 
भावार्थ : -  हरियाली विध्वंसित व् कलियाली निरंतर विकसित हो रही ,परिणामस्वरूप हलधारी कलधारियों के बंधुवा श्रमिक हो गए ॥ 

यहु कलयंत्रि परनाले अरु गलियन के गारि । 
यहु पयस्या पयस्वती, भै कास कलुषित कारि ।२५३५। 
भावार्थ :--यह यंत्रों -संयंत्रों के परनाले और गलियों के गार । जो क्षीरकाकोली कभी पयस्वती हुवा करती थी देखो उसे अब वह कैसी कलुषित व् कलमली हो चली है ॥ 

क्षीरकाकोली = एक ऐसी नदी जो काले रंग का आभास देती है किन्तु उसका जल क्षीर के सदृश्य होता है ॥ 

पयस पयसनी पास है तापर कंठ प्यास । 
चौंपुर मलिनावास है  जे कैसेउ बिकास  ।२५३६ । 
भावार्थ :-- पस्वती के पास पायस है तथापि कंठ में प्यास ही प्यास है । उसके चारों ओर मलिनता का आवास है,यह कैसा विकास है ॥ 

कल जंत्रि के मल जैसेउ निर्मल जल मलिनाहि । 
अगहुँ त सुचिता बातहू  चौड़े हाट बिकाहि ।२५३७ । 
भावार्थ : -- कलयंत्री अवशिष्ट जिस प्रकार से जल सहित वातावरण को प्रदूषित कर रहे हैं और जीवन का आधार स्वरूप जल बिकाऊ हो चला है उससे ऐसा प्रतीत होता है की भविष्य शुद्ध वायु भी विपणन की वस्तु हो जाएगी ॥ 

विद्यमान की आर्थिक नीति यह है कि " वायु में विकार भरो उसका भी व्यापार करो " 



हे भगवन ! अब आप प्रगट हो जाओ और हमरा बेड़ा कल्टी करो 


चौपट चरनी सरिस हैं कलधारी के पाँउ । 
कमाए खेत नसाए के खाए गाँव के गाँव ।२५३८ ।  
भवार्थ : -- उद्योगपतियों के चरण भी सत्यनाशी जैसे होते हैं । ये जहाँ जाते हैं वहां की उपजाऊ भूमि को नष्ट करते हुवे गाँव के गांव खा जाते हैं ॥ 

गाँव ही नही रहेंगे तो भारत भी नहीं रहेगा.....

काखँन मैं छुरिका धरे मुख में धर रघुराइ । 
कहनी सम करनी नहीं,बाका नाउ ठगाइ ।२५३९ । 
भावार्थ : --काँख में पाकिस्तान हो, मुख में भगवान हो ।जब कथनी और हो करनी कुछ और तो उसे 'ढगाई ' कहते हैं ॥ 

मंचासित प्रधान कहे बेच रहा था चा ए  । 
सत्ता सूत गहाए के, अपने रूप दिखाए ।२५४०। 
भावार्थ : - देश प्रधान मंत्री  मंचासित होकर कहा करता था कि मैं तो ढहरा साधू चाय बेच  अपना निर्वाह किया करता था । हे राम ! सत्ता हथियाते ही चाय वाला मुखौटा उतर गया फिर उसका वास्तविक रूप समाने आ गया 

जिसने सत्ता  के लिए 'माँ 'जैसे शब्द का दुरुपयोग किया हो वह  चाय वाले तो क्या किसी का भी दुरुपयोग कर सकता है ॥ 





गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

----- ॥ दोहा-दशम २५२ ॥ -----

अविधान संविधान किए रजे पराया राज । 
जन हित अर्थ बिसार किए,अपने हित के काज ।२५२१ । 
भावार्थ : --  संविधान को विधान के विरुद्ध कर अब तक पराए ही राज कर रहे हैं । ये  पराए राजा जन साधारण का हित को विस्मृत किए अपने स्वार्थ की पूर्ति में ही लगे हैं ॥ जो नए आते हैं वे इस अवैधानिक संविधान  काअनुशरण करते हुवे परायों के अनुचर ही कहलाते हैं ॥ 

माली आपहि फुर फरे, मरे मरे बनबारि । 
कलधारी भरे पूरे,हलधारी घर खारि ।२५२२ । 
भावार्थ : --  वनमाली बहुंत प्रसन्न चित्त हैं वन का मुख मंद प्रभा से युक्त हो गया है । कलुषित कल की कलाओं के कलाकार सम्पन्न हैं और हलधारी का घर अभाव से ग्रस्त है ॥ 

खेट खेत बन नास का करिहिहि देस बिकास । 
करिहि त यह बिकसित मुख ,रहिहि चारि के पास ।२५२३ । 
भावार्थ :--खेतों का गावों का वनों का विनाश करके देश क्या विकास करेगा । करेगा भी तो यह विकास मुट्ठी भर लोगों के ही पास होगा, बाक़ी जैसे हैं वैसे भी नहीं रहेंगे ॥ 



लघु उद्यम बिनसाइ के किए जब बृहद बिकास । 
दारिद दास स्वामि भए स्वामि दारिद दास ।२५२४ । 
भावार्थ :-- लघु उद्यमों को विनाश  जब वृहद उद्यम विकसित होते हैं । तब दलिदर दास स्वामी  और स्वामी दलिदर होकर उनके दास बन जाते हैं ॥ 



देस बासि प्रतिबासि भए प्रतिवासि भए निवासि । 
भूमि भवन सों आपने, रच बिधि देइ निकासि ।२५२५। 


भावार्थ : - जो भारत के मूल निवासी थे वे मूलहीन हो गए । जो परे देश के वासी हैं वे अब मूल निवासी हो गए । अवैधानिक विधान ने मूल निवसियों को अपनी ही भूमि से, अपने ही भवनों से  तड़ीपार कर दिया ।। 


बिदेसि रीति सुरीति तो देसी भई  कुरीत । 
सिखी सिखाई नीति सों,देस भयौ भय भीत ।२५२६। 


भावार्थ :--जो रीतियाँ इस देश की थी वह कुरीति और जो विदेश की हैं वह सुरीति हो चलीं है । इन सिखी  हुई विदेशी नीतियों से जन सामान्य भय भीत होकर सोचने के लिए विवश है कि कब मिलेगी स्वाधीनता ॥ 



हिंसक भए धर्मात्मा हिंसारत भए धर्म । 
कुकर्मी सत्कर्मी भए सुकरम गनत  कुकर्म ।२५२७। 

भावार्थ:-- जब कुकर्मी सत्कर्मों कहलाने लगते हैं सत्कर्मों की गणना कुकर्मों में होने लगाती है तब हिंसा वादी धर्मात्मा कहलाते हैं हिंसावाद परम धर्म हो जाता है 

निर्बल के खन खेत बन  छीन लेउ बरियारि । 
तिन्हनि भोगन देउ जो जोग गहे  कुल चारि ।२५२८ । 
भावार्थ : -- निर्बल के खंड उसके खेत उसके वन उसकी संचित सम्पदा को बलपूर्वक छीनो ।और उन्हें भोगने के लिए दे दो जो उँगलियों में गिने जा सकते हैं ॥ इसे विधान कहेंगे या अविधान..... ? क्या यह लोकतंत्र है.....? कि अधिसंख्यक की सम्पदा को अल्पसंख्यक भोगें.....

कलुषित कल की भांभरी सब बन उपबन जारि । 
काऱी कारी मरू थरी मृग मरीचि जल बारि ।२५२९ । 
भावार्थ : -- कलुषित संयंत्रों की जलती हुई राख ने वनों को उपवनों को भस्म कर दिया । जहाँ यह संयत्र स्थापित हैं वहां की धरती मानो काली काली मरु स्थली हो गई है वहां जल तो जैसे मृग मरीचिका ही बन कर रह गया है ॥ यह सब राजधानियों से दिखाई नहीं देगा  ॥ 

ए पाँवर परदेसी अरु ए, पच्छिम के पाखण्ड । 
किंवदंती माहि रहे भारत देस अखंड ।२५३० । 
भावार्थ :-- ये मूर्ख परदेसी  और यह पश्चिम देशों का पाखण्ड ।इनके लिए भारत के चार खंड हुवे फिर भी ये उसकी छाँती पर मूँग दल रहे हैं, 
और भारत की अखंडता एक किंवदंती बन कर रह गई है ॥ 

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...