ऊँगरी भर का देहरा, सौक हाथ के ढाँक ।
नयन दुआरी हाँक सब पाप रहे हैं झाँक ।२४३१ । भावार्थ : -- ऊँगली भर की देह है और सौ हाथ का छादन है । नयन की दुआरी ऐसी है जहाँ से सारे पाप झांकते हुवे कहते हैं तथापि तू निर्वस्त्र है ।।
नीचै रत्नाकर कहैं, ऊँटत मनि घन माल ।
कृपा करें कृपाल कहैं, न तरु कहेब ब्याल ।२४३२।
भावार्थ : -- नीचे रहे तो रत्नाकर कहलाए ऊपर उठे तो घन की मणि धारी मालाएं कहलाए गए । कृपा करे तो कृपालू कहलाए दुष्टता करे तो रावण के जैसे ब्याल कहलाए ।।
अपने अपने मान सब चढ़ै फिरैं बैमान ।
केतक बर निबास रहें, मरे एकै समसान ।२४३३।
भावार्थ : -- अपने अपने घमंड में सब अपने मन के विमानों में चढ़े फिरते हैं । जीते जी के ही ये धौलहरे हैं मरने के लिए तो सबको श्मसान में ही आना पड़ता है ॥ फिर क्या होता है ? यही तो सस्पेंस है ॥
नयन लगे अँधियार है नयन जगे उजियार ।
एकै पलक की देर मैं, बदले देह अकार ।२४३४।
भावार्थ : -- निद्रा के भवन में अँधकार का निवास होता है जागृति की कुटिया प्रकाश की वसति होती है । क्षण मात्र में ही इस शरीर की आकृति दूसरी हो जाती है । प्राण गए शरीर फूंका गया पता चला वे प्राण सर्प के शरीर को प्राप्त हो गए क्यों हो गए क्योंकि पूर्व में उस प्राणी का स्वभाव ऐसा ही था ।
जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखि तिन तैसी ।।
थोड़े का सुख छोड़ के रहे बहुंत को जोड़ ।
छोड़ छोड़ को जोड़िये जोड़ जोड़ को छोड़ ।२४३५।
भावार्थ : - किंचित के सुख का त्याग कर अधिकाधिक के संचय में संलग्न मनुष्य को चाहिए कि वह संचयन की प्रवृति का त्याग कर त्याग की प्रवृत्ति का संचयन करे ॥
बलहीन को जहँ बल नहि , दीनन को नहि ठौर ।
अस कलि कल का कीजिये, जो कलि के सिरमौर ।२४३६।
भावार्थ : -- बलहीन को जहाँ बल नहीं मिले दुर्दशा ग्रस्त को शरण न मिले । ऐसे अजीर्ण यन्त्र-तंत्र-संयत्र का क्या करेंगे जो कलुषता का सिरमौर हो ॥
प्रारब्ध सबहि हुँत रचे, सबके भाग बँधाए ।
कलुष कलि के कलाकार, लूट लूट कर खाए ।२४३७।
भावार्थ : -- कल्पकार ने सभी प्रकार की भोग वस्तुओं की रचना कर कर्म अनुसार भाग्य में लिखा । कलुषित यन्त्र-तंत्र -संयंत्र के कलाविद उसे लूट लूट कर खा रहे है, इनके कुकर्मों से कलि काल और अधिक कलुषित हो रहा है ॥
विलास जोअनि जोग सों जीवन होत सुपास।
प्रगति के परिभाष में ए बिकास है कि बिनास ।२४३८।
भावार्थ :--विलसित सामग्रियों के संचयन से जीवन सुखमय होता है । प्रगति की परिभाषा के अंतर्गत यह विकास की परिभाषा है कि विनाश की ॥
विकास : -- "वृद्धि हेतु चराचर जगत की रूप-आकृति आदि में निरंतर कल्याणकारी परिवर्तन ही विकास है....."
जो हो रहा है वह विकास नहीं विलास है विलास, विनाश का कारण होता है.....
अग जग लग के लब्धि लिए, सो तो दुःख की खान ।
थोरहि मैं सुख सिद्ध किए, होत सोइ सुखबान ।२४३९।
भावार्थ : - जो संसार भर के ऐश्वर्य से युक्त है अथवा उसकी कामना करता है वह दुखों का भंडार होता है । किंचित में जो अधिकाधिक सुख सिद्ध करता हो उसी का संसार सुखी होता है ॥
सुखासुख नहीं होउना,दुःख पर दुःख बहु होइ ।
दुःख मैं सुख का बास है हेर सकै जो कोइ ।२४४०।
भावार्थ :-- सुख पर सुख होना नहीं है दुःख पर दुःख बहुंत होंगे । यदि कोई अनुभव करने में समर्थ हो तो उसे दुःख में भी सुख की अनुभूति होगी ॥
मेरे पास एक ही संयंत्र है उस अरब पति के पास तो दो दो हैं, पर उस लखपति को तो देखो फटीचर कहीं का.....एक है तो क्या हुवा जब प्रधान मंत्री बनूँगा तो दस बीस हो जाएंगे.....सुख पर सुख.....
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