बरतिका बढ़ अगन धरे, दीप धरे बढ़ सार ।
एकै सहारथ एक एकहि, होत दूर अँधियार ।२५११ ।
भावार्थ : -- वर्तिका अग्रसर होकर अगन ग्रहण करती है, दीपक अग्रसर होकर सार ग्रहण करता है । यूं परस्पर सहयोग से ही अज्ञान के अँधेरे दूर होते हैं ॥
जगत मैं बुराई बढ़ी,भलाई मन न भाए ।
सुसंगति जो दूर करे , कुसंगत संग लाए ।२५१२ ।
भावार्थ : -- जब संसार में बुराइयां व्याप्त हो जाती हैं तब भलाई बुरी लगने लगती है । यह बुरापन सुसंगति को दूर कर कुसंगत को संग लगाता है ॥
पापधर्म सब जोग के अपने लेखे लीख ।
बहुरि ऐसे पंथ चले जैसी गुरु की सीख ।२५१३।
भावार्थ : -- प्रत्येक मनुष्य को अपने पाप-पुण्य का विवरण अद्यतन कर जीवन की प्रपञ्जी व्यवस्थित कर लेनी चाहिए । कहीं भगवान का छापा पड़ गया तो फिर गोली पूछ के नहीं लगती कि मैं कठे लगूं । जो आय-व्यय विवरणिका भरणी न आवे तो गुरुजनों के दिखाए सन्मार्ग पर चलना चाहिए ॥
अनुकूलित बात सौमुह आप रहे जब छाए ।
धूपत बनगत चरन के पीर समझ नहि आए ।२५१४ ।
भावार्थ : -- तप्त वन में गतिवान चरणों की पीड़ा नुकूलित वातावरण के सम्मुख छाया में रहने वालों की समझ से परे होती है ॥
अगन कहे यह काँच है, कारु कहै नहि साँच ।२५१५।
भावार्थ : -- भूषण धारण किए सुन्दर स्त्री है जो नयनों को प्यारी है ह्रदय को नहीं । अग्नि ने उसकी सत्यता का परीक्षण कर कहा ई कहाँ कंच्चन है ई तो काँचनी है, पेट का प्यारू कारु कहत हैं नही री ये तो सौ टंच कंचन है ॥
टिप्पणी : -- प्रत्येक चमकती वस्तु होती.....
जलावन को जस अँगरा, संत पुरुष को लोभ ।
कंथा धर को कामिनी, साँत मनस को छोभ । २५१६ ।
भावार्थ : -- अग्नि को जैसे ईंधन से वैर होता है वैसे ही संत पुरुष को लोभ से योगी को माया और स्त्री से, शांत मष्तिस्क को क्रोध से वैर होता है । क्षोभ की तरंग शांत मन-मानस को अशांत कर देती है ॥
बिहांसे हँसि न बोलिबे, बिसुरत बिसुर न रोए ।
जीते जी सो जीउना मरे बराबर होए ।२५१७।
भावार्थ : -- पर प्रसन्नता से जो प्रसन्न न हो , पर पीड़ा से जो पीड़ित न हो वह जीवित होते हुवे भी मृतक के समान होता है ॥
मे मैं करते मुख तले, कैं कैं करती काइ ।
अपना ज्ञान बघार के फूरी गाल बजाए ।२५१८।
भावार्थ :-- मैं ही ईश्वर हूँ ! मैं ही जगत रचैता हूँ !! मैं ये हूँ मैं वो हूँ !!! मैं मैं करते मुख के नीचे काऊं काऊँ करती काया है । जो अपने तुच्छ ज्ञान का व्याख्यान कर झूठी आत्मप्रशसा करती है ॥
भावार्थ :-- मैं ही ईश्वर हूँ ! मैं ही जगत रचैता हूँ !! मैं ये हूँ मैं वो हूँ !!! मैं मैं करते मुख के नीचे काऊं काऊँ करती काया है । जो अपने तुच्छ ज्ञान का व्याख्यान कर झूठी आत्मप्रशसा करती है ॥
पांच तत्व की पूरिया, कथन के नाहि सीउँ ।
मानए भगवन आपनो, धरे चार घर नीउँ ।२५१९। भावार्थ :- पांच तत्वों की यह पुड़िया इसके अनर्गल प्रलाप की तो सीमा ही नहीं है । चार घर की नीव रखनी क्या जान गई अपने आप को भगवान समझने लगी । पहाड़ों वाला एक ग्रह की नीव रखे तो जाने ये अपने को क्या समझे ॥
यह ग्रह नखत यह नभ यह जगत रचाया कौन ।
को ज्ञानी को बिज्ञानी, पूछत भए सब मौन ।२५२०।
भावार्थ :--ये ग्रह-नक्षत्र यह नभ यह संसार किसने रचा किसी ज्ञानी ने अथवा किसी वैज्ञानिक ने ? ऐसे प्रश्न अनीश्वरवादिता के मुख पर चुप लगा देते हैं ॥
I have seen the blog . These are pearls of wisdom .
जवाब देंहटाएंI also see the aberrations of one Russ Plummer , , out of context and purposeless . all must strike off his frustrations , to ignore him ....
A layman who can not appreciate a text which he has not at all studied if relies on “google translation “ , then translate tab will not transport the real meaning of the author , this is what the google translation has made a mess of .
जवाब देंहटाएंI here below give my translation of the couplet
“ one should put straight the deeds done in debt and credit sides in the book of accounts of life . if God notices inconsistencies , there is no sparing . T herefore one should seek elders guidance for choosing the right foot forward .”