जीवन पथ एक चाकरी,जामें बहुतक ठाउँ ।
पाप पसारे धूप है,धर्म पसारे छाउँ ।२५०१ ।
भावार्थ : -- यह जीवन-पथ एक चक्र है जिसमें बहुंत से जन्म व् बहुंत से मरण है । एक जन्म के पापों का विस्तार जन्म-जन्म के दुखों का व् एक जन्म के पुण्यों का विस्तार जन्म-जन्म के सुखों का कारण होता हैं ॥
सकल जोनि भव भीत है, मानस मुकुति द्वार ।
सत्कृत के जो संग किए ,भए दुआर के पार ।२५०२।
भावार्थ :-- समस्त जीव जगत भीतिका हैं अंतरात्मा उस भीतिका की बंधक है यह मनुष्य शरीर उस आत्मा का मुक्ति द्वार है । जिसने परमार्थ का प्रसंग किया वह अंतरात्मा द्वार के बाहिर हो गई ॥
पाप जी गरुआर करे धर्म करे हरूआर ।
गरुबारे नीचू परे, हरुबारे उद्धार ।२५०३।
भावार्थ : -- पाप इस अंतरतम को भार युक्त पुण्य इसे भारहीन करता है । पापों के भार से मनुष्य पतन की और अग्रसर होकर निकृष्ट योनि को प्राप्त होता है और पुण्य से यह भारहीन होकर सद्गति को प्राप्त होता है ।।
जीवन भर कुकरनी कर भरे पाप भंडार ।
केतक नीचू जाइये, जेतक भारी भार ।२५०४।
भावार्थ : -- जीवन भर कुकरम करते हुवे हम अपने कर्म- कोष में पापों को संकलित करते जाते हैं । यह जाने बिना कि जिसके पापों का भार जितना अधिक होता है वह उतनी ही निकृष्ट योनि को प्राप्त होता है ॥
स्पाष्टिकरण : -- स्तनधारीजीवों के पश्चात सरीसृप (अण्डज )का क्रम आता है, व्हेल मछली स्तनधारी होती है । स्तनधारी के पैर होते हैं किसी किसी के हाथ होते हैं इन बेचारों के न हाथ होते हैं न पैर ॥
मानस जिउती जोग मैं,मरनी को बिसराए ।
धर्म अंक घटाई के,पाप अंक बरधाए ।२५०५।
भावार्थ :--जीवन के हेतु संकलित करने में चित्त से मृत्यु विस्मृत हो जाती है । परिणाम स्वरूप हमारे कर्म कोष में पुण्य घटते जाते है और पाप बढ़ते जाते हैं ॥
बचपन खेल गवाएं के,यौबन जी भर सोए ।
जागत तब का लाहिये,बिरध बयस जब जोए ।२५०६।
भावार्थ :-- बचपन खेल में बीत गया,यौवन शयन में । फिर चित्त के सचेत होने से क्या लाभ जब वृद्धा अवस्था को प्राप्त हो गए। यह वृद्धावस्था शरीर को असमर्थ कर देती है ॥
सीध धरावे लाकरी, ज्यों काट छिल छाँट ।
तासु चरन अनुहर त्यों,साधौ अपने बाट ।२५०७।
भावार्थ : -- जिस प्रकार लकड़ी काट के छिल छाँट के सीधी होती है तभी उससे कोई सुन्दर कलाकृति प्राप्त होती है उसी प्रकार साधु-संत की प्राप्ति के लिए अपने पंथों को भी छिलछांट के सीधे कर लेने चाहिए कारण कि टेड़े पंथ पर चलने से सीधा भी टेड़ा हो जाता है ॥
रासभ जैसे काज किए, नाना साज सँजोए ।
जीते जी सब आपना, मरे पराया होए ।२५०८।
भावार्थ :-- गधों के जैसे कर्म कर भांति भांति की सामग्रियाँ तो संकलित कर लीं । यह जीते जी की हाय हाय है मरने के पश्चात यह सब दूसरों का होना है ।।
जिउती केतक जोइये जेतक जीवाधार ।
बरते कस कृपनी सम दाएं जैसे उदार ।२५०९।
भावार्थ :-- जीविका कितनी अर्जित करनी चाहिए जितने में प्राण अधिष्ठित रहें । उसे व्यय कैसे करें ? कृपणतापूर्वक !उसका दान कैसे करें ? उदारतापूर्वक !!
पूत कपूत तो का धन संचय,पूत सपूत तो का धन संचय ॥
हीरे मानक मोतिया यूँ तो सबके पास ।
मांगनी तेहि द्वार परे, जहाँ मिलन की आस ।२५१० ।
भावार्थ: --हीरे, माणिक, मोती यूं तो सभी के पास हैं । मांग उसी द्वार को प्रणाम करती है जहाँ मिलने की आस हो ।।
पाप पसारे धूप है,धर्म पसारे छाउँ ।२५०१ ।
भावार्थ : -- यह जीवन-पथ एक चक्र है जिसमें बहुंत से जन्म व् बहुंत से मरण है । एक जन्म के पापों का विस्तार जन्म-जन्म के दुखों का व् एक जन्म के पुण्यों का विस्तार जन्म-जन्म के सुखों का कारण होता हैं ॥
सकल जोनि भव भीत है, मानस मुकुति द्वार ।
सत्कृत के जो संग किए ,भए दुआर के पार ।२५०२।
भावार्थ :-- समस्त जीव जगत भीतिका हैं अंतरात्मा उस भीतिका की बंधक है यह मनुष्य शरीर उस आत्मा का मुक्ति द्वार है । जिसने परमार्थ का प्रसंग किया वह अंतरात्मा द्वार के बाहिर हो गई ॥
पाप जी गरुआर करे धर्म करे हरूआर ।
गरुबारे नीचू परे, हरुबारे उद्धार ।२५०३।
भावार्थ : -- पाप इस अंतरतम को भार युक्त पुण्य इसे भारहीन करता है । पापों के भार से मनुष्य पतन की और अग्रसर होकर निकृष्ट योनि को प्राप्त होता है और पुण्य से यह भारहीन होकर सद्गति को प्राप्त होता है ।।
जीवन भर कुकरनी कर भरे पाप भंडार ।
केतक नीचू जाइये, जेतक भारी भार ।२५०४।
भावार्थ : -- जीवन भर कुकरम करते हुवे हम अपने कर्म- कोष में पापों को संकलित करते जाते हैं । यह जाने बिना कि जिसके पापों का भार जितना अधिक होता है वह उतनी ही निकृष्ट योनि को प्राप्त होता है ॥
स्पाष्टिकरण : -- स्तनधारीजीवों के पश्चात सरीसृप (अण्डज )का क्रम आता है, व्हेल मछली स्तनधारी होती है । स्तनधारी के पैर होते हैं किसी किसी के हाथ होते हैं इन बेचारों के न हाथ होते हैं न पैर ॥
मानस जिउती जोग मैं,मरनी को बिसराए ।
धर्म अंक घटाई के,पाप अंक बरधाए ।२५०५।
भावार्थ :--जीवन के हेतु संकलित करने में चित्त से मृत्यु विस्मृत हो जाती है । परिणाम स्वरूप हमारे कर्म कोष में पुण्य घटते जाते है और पाप बढ़ते जाते हैं ॥
बचपन खेल गवाएं के,यौबन जी भर सोए ।
जागत तब का लाहिये,बिरध बयस जब जोए ।२५०६।
भावार्थ :-- बचपन खेल में बीत गया,यौवन शयन में । फिर चित्त के सचेत होने से क्या लाभ जब वृद्धा अवस्था को प्राप्त हो गए। यह वृद्धावस्था शरीर को असमर्थ कर देती है ॥
सीध धरावे लाकरी, ज्यों काट छिल छाँट ।
तासु चरन अनुहर त्यों,साधौ अपने बाट ।२५०७।
भावार्थ : -- जिस प्रकार लकड़ी काट के छिल छाँट के सीधी होती है तभी उससे कोई सुन्दर कलाकृति प्राप्त होती है उसी प्रकार साधु-संत की प्राप्ति के लिए अपने पंथों को भी छिलछांट के सीधे कर लेने चाहिए कारण कि टेड़े पंथ पर चलने से सीधा भी टेड़ा हो जाता है ॥
रासभ जैसे काज किए, नाना साज सँजोए ।
जीते जी सब आपना, मरे पराया होए ।२५०८।
भावार्थ :-- गधों के जैसे कर्म कर भांति भांति की सामग्रियाँ तो संकलित कर लीं । यह जीते जी की हाय हाय है मरने के पश्चात यह सब दूसरों का होना है ।।
जिउती केतक जोइये जेतक जीवाधार ।
बरते कस कृपनी सम दाएं जैसे उदार ।२५०९।
भावार्थ :-- जीविका कितनी अर्जित करनी चाहिए जितने में प्राण अधिष्ठित रहें । उसे व्यय कैसे करें ? कृपणतापूर्वक !उसका दान कैसे करें ? उदारतापूर्वक !!
पूत कपूत तो का धन संचय,पूत सपूत तो का धन संचय ॥
हीरे मानक मोतिया यूँ तो सबके पास ।
मांगनी तेहि द्वार परे, जहाँ मिलन की आस ।२५१० ।
भावार्थ: --हीरे, माणिक, मोती यूं तो सभी के पास हैं । मांग उसी द्वार को प्रणाम करती है जहाँ मिलने की आस हो ।।
गौहर लाल-ओ-अलमास यूं तो सब के पास..,
बंदे का सर वहां झुके जहाँ मिलने की आस.....
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