ईंधन अर्थ आधार किए, बरे सकल बन खेत ।
बुझावनि उपाई करत, जन मानस तू चेत ।२४७१ ।
भावार्थ :--अधुनातन अर्थ प्रबंधन ईंधन पर आधारित हो चला है । यह प्रबंधन तेरे सभी वन व् कृषि भूमि को नष्ट किए जा रहा है । हे जनमानस! तू सावधान हो और इस प्रज्वलन को शांति करने की युक्ति कर ॥
जेते जैसी जब जहाँ, जी अनिबारै होए ।
तेते तैसे तब तहाँ,जीवन साज सँजोएँ ।२४७२।
भावार्थ :-- जीवन हेतु जब जहाँ जैसे जितने आवश्यक व् अनिवार्य हो, तब ही वहां वैसे उतने ही साधन संकलित करने चाहिए । अन्यथा ये साधन जीवन -धन को हानि पहुंचाएंगे ॥
मैट्रो जैसे चुम्बक रखोगे तो पूरे देश का लोहा आकर्षित होकर एक स्थान पर एकत्र हो जाएगा । बड़े बड़े चिकित्सालय व् शिक्षा केंद्र की राजधानियों को क्या आवश्यकता । ये एक ही स्थान पर भी इनकी क्या उपयोगिता । एक स्थान पर बादल एकत्र होगें तो फटेंगे न और बाढ़ आएगी ।
सुविधाओं के समयक वितरण से समय धन साधन ईंधन सभी की बचत होती है.....
खेद है ! कि मूर्खों के लिए उपदेश नहीं होते.....
जब पावस रस बस रहे, छाए रहे बदराइ ।
बिनहि रितु की बादरिआ, होत नहीं सुखदाइ ।२४७३।
भावार्थ : - जब पावस ऋतु की आवश्यकता हो तभी बदरा छाए । बिना आवश्यकता की बरखा दुखदाई होती है ॥
ईंधन धारे प्रबंधन, भयऊ अर्थ बिकार ।
दहन धूम धराई के पाए तमस बिस्तार ।२४७४।
भावार्थ : -- राष्ट्र का प्रबंधन ईंधन पर आधारित होने से रूप रस गंध आदि इन्द्रियों के विषयों सहित धन व् उसके प्रयोजन विकृत हो जाते हैं । इस ईंधन के दहन से उत्पन्न धूम-संहति की गहनता से देश में अज्ञान रूपी अंधकार का बसेरा हो जाता है जिसका सहयोग प्राप्त कर विकृत प्रयोजन तमोगुण का विस्तार करते हैं ॥
प्रगत प्रगासित पाहना, लिखे सेष आलेख ।
अंतर्मन उजियार कर , पथ अँधियारा देख ।२४७५ ।
भावार्थ : -- दुरी मापक पाषाण खंड पर तेरी मृत्यु लिखी हुई है । हे पंथी तू अपने अंतर ज्ञान रूपी प्रकाश से प्रकाशित करते हुवे बाहिर के अंधकार रूपी अज्ञानता का दर्शन कर ॥
दूरी मापक पाषाणों के प्रकाश से मार्ग के अंधेरों का बोध नहीं होता.....
कहँ सोहि चले कहँ आए अरु कहाँ रहे पयान ।
पलक भर कतहुँ होर के, सरनी लए संज्ञान ।२४७६।
भावार्थ : -- कहाँ से चला था , कहाँ आ पहुंचा , और कहाँ जा रहां है , हे प्रगति पंथ के पथिक सुन क्षण भर के लिए कहीं ठहर ! और अपने मार्ग का संज्ञान कर कि तुम्हे जाना कहाँ है ॥
पृथ्वी में जितना प्रतिशत जल है शेष भाग में उतने प्रतिशत ही हरियाली होनी चाहिए हरियाली होनी चाहिए
अर्थात ७० % जलीय भाग को छोड़कर शेष ३०% में से २१% हरियाली पारिस्थितिक संतुलन के लिए आवश्यक है ॥
बिगत जनम एक साँच है, अगत मरन एक साँच ।
बीच किए सब करम लिखे, बाँच सकै तो बाँच ।२४७७ ।
भावार्थ : -- जाता हुवा जन्म एक सत्य है आती हुई मृत्यु भी एक सत्य है । इस जनम -मरण के मध्य कर्मों ने जो लेख लिखे हैं उसको पढ़ता चल ॥
हिंसा को लाल अहिंसा को हरा करेगा तो तेरे पाप व् पुण्य ज्ञात हो जाएंगे
सत्य को उज्जवल कर असत्य को काला कर तब जीवन के अँधेरे व् सबेरे ज्ञात हो जाएंगे सयन व् जागरण ज्ञात हो जाएगा ॥
उषप उषिप अबरेख के, लिखे अलेखी लेख ।
जग अँधेरा छाए रहा, देख सकै तो देख ।२४७८।
भावार्थ :-- अस्त हुवे सूर्य का चित्रण करते तमोचर आलेख उत्कीर्ण कर रहा है । जग में अज्ञान रूपी अन्धेरा व्याप्त हो रहा है इसका संज्ञान कर ॥
पीछे जनम बिहान है आगे है अवसान ।
प्रगत पंथ के पथिक सुन कहत बरख पाषान।२४७९।
भावार्थ : --प्रगति पंथ के पथिक सुन संवत्सर के पाषाण खंड कह रहे हैं । पीछे तेरा आरम्भ है आगे तेरा अवसान है ॥
पच्छिन हेरी दे रहे दिनकर निज मुख फेर ।
पाछे प्यारे बिछढ़ो हेर सकै तो हेर ।२४८० ।
भावार्थ : -- अस्त होता सूर्य आह्वयन कर तेरा आह्वान कर रहा है । देख तेरे संबंधी, तेरे मित्र, तेरे पूज्यनीय, पीछे कहीं बिछड़ गए हैं, यदि तू समर्थ है तो उनका अन्वेषण कर ॥
बुझावनि उपाई करत, जन मानस तू चेत ।२४७१ ।
भावार्थ :--अधुनातन अर्थ प्रबंधन ईंधन पर आधारित हो चला है । यह प्रबंधन तेरे सभी वन व् कृषि भूमि को नष्ट किए जा रहा है । हे जनमानस! तू सावधान हो और इस प्रज्वलन को शांति करने की युक्ति कर ॥
जेते जैसी जब जहाँ, जी अनिबारै होए ।
तेते तैसे तब तहाँ,जीवन साज सँजोएँ ।२४७२।
भावार्थ :-- जीवन हेतु जब जहाँ जैसे जितने आवश्यक व् अनिवार्य हो, तब ही वहां वैसे उतने ही साधन संकलित करने चाहिए । अन्यथा ये साधन जीवन -धन को हानि पहुंचाएंगे ॥
मैट्रो जैसे चुम्बक रखोगे तो पूरे देश का लोहा आकर्षित होकर एक स्थान पर एकत्र हो जाएगा । बड़े बड़े चिकित्सालय व् शिक्षा केंद्र की राजधानियों को क्या आवश्यकता । ये एक ही स्थान पर भी इनकी क्या उपयोगिता । एक स्थान पर बादल एकत्र होगें तो फटेंगे न और बाढ़ आएगी ।
सुविधाओं के समयक वितरण से समय धन साधन ईंधन सभी की बचत होती है.....
खेद है ! कि मूर्खों के लिए उपदेश नहीं होते.....
जब पावस रस बस रहे, छाए रहे बदराइ ।
बिनहि रितु की बादरिआ, होत नहीं सुखदाइ ।२४७३।
भावार्थ : - जब पावस ऋतु की आवश्यकता हो तभी बदरा छाए । बिना आवश्यकता की बरखा दुखदाई होती है ॥
ईंधन धारे प्रबंधन, भयऊ अर्थ बिकार ।
दहन धूम धराई के पाए तमस बिस्तार ।२४७४।
भावार्थ : -- राष्ट्र का प्रबंधन ईंधन पर आधारित होने से रूप रस गंध आदि इन्द्रियों के विषयों सहित धन व् उसके प्रयोजन विकृत हो जाते हैं । इस ईंधन के दहन से उत्पन्न धूम-संहति की गहनता से देश में अज्ञान रूपी अंधकार का बसेरा हो जाता है जिसका सहयोग प्राप्त कर विकृत प्रयोजन तमोगुण का विस्तार करते हैं ॥
प्रगत प्रगासित पाहना, लिखे सेष आलेख ।
अंतर्मन उजियार कर , पथ अँधियारा देख ।२४७५ ।
भावार्थ : -- दुरी मापक पाषाण खंड पर तेरी मृत्यु लिखी हुई है । हे पंथी तू अपने अंतर ज्ञान रूपी प्रकाश से प्रकाशित करते हुवे बाहिर के अंधकार रूपी अज्ञानता का दर्शन कर ॥
दूरी मापक पाषाणों के प्रकाश से मार्ग के अंधेरों का बोध नहीं होता.....
कहँ सोहि चले कहँ आए अरु कहाँ रहे पयान ।
पलक भर कतहुँ होर के, सरनी लए संज्ञान ।२४७६।
भावार्थ : -- कहाँ से चला था , कहाँ आ पहुंचा , और कहाँ जा रहां है , हे प्रगति पंथ के पथिक सुन क्षण भर के लिए कहीं ठहर ! और अपने मार्ग का संज्ञान कर कि तुम्हे जाना कहाँ है ॥
पृथ्वी में जितना प्रतिशत जल है शेष भाग में उतने प्रतिशत ही हरियाली होनी चाहिए हरियाली होनी चाहिए
अर्थात ७० % जलीय भाग को छोड़कर शेष ३०% में से २१% हरियाली पारिस्थितिक संतुलन के लिए आवश्यक है ॥
बिगत जनम एक साँच है, अगत मरन एक साँच ।
बीच किए सब करम लिखे, बाँच सकै तो बाँच ।२४७७ ।
भावार्थ : -- जाता हुवा जन्म एक सत्य है आती हुई मृत्यु भी एक सत्य है । इस जनम -मरण के मध्य कर्मों ने जो लेख लिखे हैं उसको पढ़ता चल ॥
हिंसा को लाल अहिंसा को हरा करेगा तो तेरे पाप व् पुण्य ज्ञात हो जाएंगे
सत्य को उज्जवल कर असत्य को काला कर तब जीवन के अँधेरे व् सबेरे ज्ञात हो जाएंगे सयन व् जागरण ज्ञात हो जाएगा ॥
उषप उषिप अबरेख के, लिखे अलेखी लेख ।
जग अँधेरा छाए रहा, देख सकै तो देख ।२४७८।
भावार्थ :-- अस्त हुवे सूर्य का चित्रण करते तमोचर आलेख उत्कीर्ण कर रहा है । जग में अज्ञान रूपी अन्धेरा व्याप्त हो रहा है इसका संज्ञान कर ॥
पीछे जनम बिहान है आगे है अवसान ।
प्रगत पंथ के पथिक सुन कहत बरख पाषान।२४७९।
भावार्थ : --प्रगति पंथ के पथिक सुन संवत्सर के पाषाण खंड कह रहे हैं । पीछे तेरा आरम्भ है आगे तेरा अवसान है ॥
पच्छिन हेरी दे रहे दिनकर निज मुख फेर ।
पाछे प्यारे बिछढ़ो हेर सकै तो हेर ।२४८० ।
भावार्थ : -- अस्त होता सूर्य आह्वयन कर तेरा आह्वान कर रहा है । देख तेरे संबंधी, तेरे मित्र, तेरे पूज्यनीय, पीछे कहीं बिछड़ गए हैं, यदि तू समर्थ है तो उनका अन्वेषण कर ॥
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