शुक्रवार, 13 मार्च 2015

----- ॥ दोहा-दशम २४५-६ ॥ -----

मेरा मेरा कह मरे, मरघट खटिया सोए । 
देइ अगन तन जर बरे, तेरा कछुहु न होए ।२४५१ । 
भावार्थ : -- मेरा मेरा कहकर लोग मरते गए चिता  को वरण करते चले  ।  मुखाग्नि से जब यह शरीर ही जल के भस्म हो गया फिर तेरा क्या हुवा कुछ भी नहीं ॥ 

राम राम को कहि मरा, मरा मरा कह कोइ । 
जेहिं कहि कल्यान गहे, कहन बरे सब सोइ ।२४५२। 
भावार्थ : -- कोई राम राम रट रहा हैं किन्तु मरा-मरा उच्चारित हो रहा है कोई मरा-मरा रट रहा है किन्तु राम-राम उच्चारित हो रहा है । जिसकी कथनी में जग का कल्याण हो वही कथन वरण करें ॥ 

राजा की रच्छा करे रहेउ दाहिन बाम । 
पैदे के सिरोपर रहे, रखिया के एहि काम ।२४५३। 
भावार्थ : --  रक्षक का यह कर्त्तव्य है कि वह प्यादे के सिर पर चढ़ा रहे और चारों ओर से राजा की ही रक्षा करे ॥ 
राजा जीते जीत है राजा हारे हार । 
पैदे को पैदा रखे, राजा को रखबार ।२४५४। 
भावार्थ : - राजा की जीत में ही राज्य की जीत है राजा की हार में राज्य की हार है । अत: प्यादे की रक्षा प्यादा ही करे और रक्षक राजा की रक्षा करे ॥ 

पैदे राउ के पदबी, पैदे पदबी राउ । 
कुटिल कुठारि चाल चले, लोकतंत्र धर नाउ ।२४५५ । 
भावार्थ : - प्यादे  की पदवी पर राजा और राजा की पदवी पर प्यादा है । यह अधिनायक तंत्र का राजा बना प्यादा लोकतंत्र  के  नाम से विश्वासघाती कुटिल चालें चल रहा है ॥

रंक अजहुँ राजा भया, राजा भयऊ रंक । 
रंक पदबी पंकज भए राजा पद भए पंक ।२४५६।  
भावार्थ : -- जो कभी दलि-दर थे वे राजा हो गए जो कभी राजा थे वे दरिद्र -नारायण हो गए । दलिदर पंकज  को गए, नारायण पंक की ॥ 

राजा मलिने भेष मैं पैदे राजा भेष । 
राजा जी अनुहार करें पेदे दैं आदेस ।२४५७ । 
भावार्थ : -- राजा की भूषा मलिन है और प्यादे राजा के भेष में हैं । राजा जी अनुशरण कीजिए , प्यादे जनादेश  दे रहे हैं ॥ 

राजा कमावै अल्पहि, पैदे भृत बहुताए । 
तापर साज  सजोउना कहु तो कहँ ते आए ।२४५८ । 
भावार्थ : -- राजा का उपार्जन  अल्प ही है और  प्यादे की पारिश्रमिक राजा के उपार्जन से भी अधिक है  राजा एक कमा रहा है प्यादा दो पा रहा है उसपर इतने गाड़ी-घोड़े कहो यह सब कहाँ से आएगें ॥  उपनिवेशी भी तो कुछ नहीं करते बस बैठे बैठे खाते हैं ॥ 

जीवोपार्जन अल्पहि, कौड़ी गिन कुल चार ।
जीवन जोग जुगाउने, करसों भयउ बहार ।२४५९। 
भावार्थ : -- जीवन का उपार्जन अल्प ही है जोड़े तो कुल चार कौड़ी होती हैं ।  शासन इस प्रकार से अव्यवस्थित है कि  अब तो आधार भूत धन अर्थात भोजन सामग्री भी पहुँच से बाहिर होती जा रही हैं ॥ 

कारण क्या है : -- मुद्रा की क्रय शक्ति का क्षीण होना 
यह क्षीणता क्यों है ?

 पीडीपी नई  डीबीपी नई नई पीजेपी छड्ड न जीवन धन का सकल घरेलू उत्पादन अर्थात ग्रास डोमेस्टिक पिरोड एक्सन  गिर रहा है । जीवन साधन का उत्पादन स्थिर है यहां उच्च कोटि का लौहा चालीस रुपया किलो और मध्यम कोटि का चावल पचपन रुपय किलो मिल रहा है क्यों ? जनसाधारण लोहा चबाएगा क्या ? 

आवश्यक वस्तुओं तक पहुँच कैसे हो : --  उत्पादन में वृद्धि कर आवश्यक वस्तु के मूल्य को नियंत्रित करना जिससे मुद्रा की क्रय शक्ति में वृद्धि होगी 

यदि मुद्रा की क्रय शक्ति क्षीण हो रही हो तो इसका अर्थ है उत्पादन गिर रहा है.....

तो कहानी का सारांश यह ही कि  ----- ॥ पहले भोजन फिर साधन ॥ -----

जीवन को जोवन हेतु भोजन जेतक चाहिँ । 
देस की दसा कह रही, अजहुँ त तेतक नाहि ।२४६०। 
भावार्थ : -- जीवन की रक्षा के लिए जीव-जगत को जितने भोजन की आवश्यक है देश की दशा कह रही उतना भोजन तो नहीं है..... यदि नहीं है तो शासन क्या कर रहा है.... ?

आधी पाधी धोतनी,  धरे पेट मैं आग। 
सुबारथ परता परारथ, छेड़ रहे श्री राग ।२४६१। 
भावार्थ : -- आधिक वस्त्रों से तन ढके पेटों में यहां भूख पल रही है । और स्वार्थी शासक दूसरों के लाभ हेतु सुख साधनों का राग छेड़ रहे हैं ॥

साला महुँ मिलिहि भोजन होइहि जब मध्यान ।
बचपन भूख मर रहा सासन देइ प्रमान ।२४६२। 
भावार्थ : --  पाठशालाओं में मध्यान भोजन मिलेगा । यह योजना सिद्ध कर रही है कि भारत का बचपन भूखों मर रहा है । अपने  नौनिहालों की  क्षुधा शांत करने के लिए पालकों के पास एक समय का भोजन भी नहीं है ॥

क्यों नहीं है : - विभाजन के पश्चात से क्या कर रहे थे ये सत्ताधारी.....?

'ढोंगी महात्माओं का देश है ये.....'

जन घनहारिन बरग पहि   अहहि न जीवन जोग । 
जुगौअन बिनहि जिऊना, छांड़ी देउ सँजोग ।२४६३। 
भावार्थ : --   अगाध जन संख्या से युक्त ( भारत का ) निम्नतम के पास जीवन को संयोजित करने वाले योग भी उपलब्ध नहीं है । इस वर्ग में पंचानबे प्रतिशत से ऊपर भारतीय हैं उपनिवेशी नहीं ।  साधनों की तो छोड़ दो उनका जीवन उचित आहार के बिना मृत्यु की प्रतीक्षारत है ।  और महाराज को नई नई इक्छाएँ हो रही हैं.....

कलुषित कल के अनल सों, भयउ सकल बन खार । 
बिअ रहे न बनजा रहे  रहे न बिननी हार ।२४६४। 
भावार्थ :-- कलुषित कल कीअग्नि से भारत के वनप्रदेश जल कर राख हो गए । अब न तो वन बीज रहे न वन- विटप रहे न वनजा ही रहे न ही वन बीज व् वनकाष्ठ को चुनने वाले ही रहे ॥

खेत रहे न खेह रहे, रहे नही खलिहान । 
चहुँपुर कल मल मल रहे  , सासक के अस कान ।२४६५। 
भावार्थ : -- अशासकों के ऐसे नियम हैं कि वन के साथ अब खेत भी न रहे खेतों की वह मीट्टी ही रहे  वह न धनधान्य रहे,  केवल कलुषित कल की कला करने वाले ये संयंत्र  अपने मल को मलते रहे।

अपने अपने साख में, सभी कीन्हे कान । 
बनिहार बिनहार हुए,पति सोन दास किसान ।२४६६। 
भावार्थ : -- यहाँ सब अपने अपने अहंकार में है सबके अपने अपने नियम हैं । इनके इन नियमों ने बनिहार को बिना आहार के हो गए  भूमिहार को उद्योगपतियों का दास बना दिया ॥ 

भूपति बंधुआ दास  भएँ, भूख मरे बनिहार । 
बेपार अस बिनसिहि जस, बिनसि बनज बैपार ।२४६७। 
भावार्थ : -- ऐसे नियमों से कृषि भूमि के स्वामी किसान बंधुआ दास बन जाएंगे और बन गए हैं  कृषिकर्म करने वाले भूमिहीन किसान भूखे मरेंगे और मर रहे हैं ॥ जैसे वन उपज से संबंधित उद्योग-धंधे चौपट हो गए वैसे ही कृषि उपज से संबंधित उद्योग-धंधे भी चौपट हो जाएंगे ॥

दलहन तिलहन दूराए दूरे दलिन अहार । 
कुल दीपक पूछ बुझाए , कहँ से अवाए सार ।२४६८। 
भावार्थ :-- तिलहन चल बसा, दलहन नहीं रहा, पत्तेदार आहार थालियों से उठ गया । कुलों के दीपक भी पूछते पूछते बुझ गए कि सार कहाँ से आए ॥

कर्षक के खन घेर के धनपति भयउ कुबेरु । 
तिनकी रयन सबेर किए  जग सब बेर अँधेर ।२४६९। 
भावार्थ : - भूमिहार किसानों की भूमियों को घेर कर ही ये पूंजीवादी कुबेर बने हैं । संसार के दिवस अपराह्न संध्या आदि सभी कालों में अंधेरा छाया हुवा है और इनकी अपनी रयन भी प्रभासित है ॥ 


अभिमत नेई देइ के पाहन लेइ चुनाए । 
तिन्हते बर परबत हैं बोलि बोल बहुराए ।२४७०। 
भावार्थ : -- अपनी अभिमत की नीव देकर तुमने पत्थरों को चुन लिया है । इनसे अच्छे पर्वत है जहाँ बोलने से बोल वापस तो आते हैं यहां से तो कोई उत्तर नहीं मिलता ॥


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