चेतस मनस चिंतन कर सब कहु सोच विचार ।
अधिक गुने थोरहि कहे, तबहि कहन में सार ।२४४१।
भावार्थ :--चैतन्य मस्तिष्क से गहन विवेचना करते हुवे विषय का अधिकाधिक ज्ञान ग्रहण कर किंचित ही कहा जाएं तभी कहने का कुछ औचित्य है ॥
" चैतन्य मस्तिष्क से गहन विवेचना करते हुवे विषय का अधिकाधिक ज्ञान ग्रहण कर कहे गए कथन सारगर्भित कथन होते हैं....."
अधिक गुने थोरहि कहे, तबहि कहन में सार ।२४४१।
भावार्थ :--चैतन्य मस्तिष्क से गहन विवेचना करते हुवे विषय का अधिकाधिक ज्ञान ग्रहण कर किंचित ही कहा जाएं तभी कहने का कुछ औचित्य है ॥
" चैतन्य मस्तिष्क से गहन विवेचना करते हुवे विषय का अधिकाधिक ज्ञान ग्रहण कर कहे गए कथन सारगर्भित कथन होते हैं....."
राम किसन के देस जहँ, पथ पथ तिनके धाम ।
जातबंत तिन जानिये,जिन हिय बाका नाम ।२४४२।
भावार्थ : --भारत की भूमि राम-कृष्ण की भूमि के लिए विख्यात है । जहां के पथ पथ में उनके द्यौहरों से सुशोभित होते हैं ।यहाँ के जातक वे ही हैं जिनके हृदय में इनका नाम निवास करता हो ॥
सुजल सुफल सस स्यामलि, रहि ड्रम दल सों पीन ।
सो भुइ दीन हीन होत,भई कल के अधीन ।२४४३।
भावार्थ :-जो भूमि कभी सुजलम् थी सुफलम् थी सस्य श्यामलम् थी द्रुम दलों से परिपूर्ण थी ।वह आज अधीन दीन हीन होकर यन्त्र-तंत्र-संयंत्र के अधीन हो चली है
अब तो संसद में वन्दे-फंदे गाने बंद कर देने चाहिए..... हाँ अधिनायक- तंत्र का जयघोष अनवरत होता रहे.....
पहिले सब फल फुरित रहे,पूर रहे भरपूर ।
अजहुँ रसन की का कहैं,भए दरसन सहुँ दूर ।२४४४।
भावार्थ : -- पहिले यह धरती सब प्रक़र से फली भूत होकर रसीले खाद्यानों से भरी पूरी थी । अधुनातन स्वाद की तो क्या कहें फल दर्शनों से भी दूर हो गए हैं । अब अन्न की बारी है..... भारत जैसे कृषिपरधन देश में तोले में मिला करेंगे ये कण.....
अर्थ पति हुँत सबहि अर्थ,होहि सुगम सब भोग ।
देस ऐसी प्रधानता,नहीं केहि के जोग ।२४४५ ।
भावार्थ : --जहाँ अर्थ पतियों के हेतु ही अर्थ का प्रबंधन हो,सभी भोग वस्तुएं उनके ही निमित्त हो । ऐसा अर्थ प्रधान देश किसी का भी कल्याण नहीं करता ॥
रखिया एहि हुँत राखिया, राख रखावै खेत ।
छिपे छिपे खाईं रहा, चेति सकै तो चेत ।२४४६।
भावार्थ : -- स्वामी ने रक्षक इस हेतु रखे थे कि वह खेतों की रखवाली करे । किन्तु जब रक्षक ही भक्षक हो जाए और छिप छिप कर उपज क्या पूरा खेत ही खाने लगे तब स्वामी को सावधान हो जाना चाहिए । उस भक्षक को डंडे से पीट पीट के भगा देना चाहिए ॥
>> जिस गुप्त रीति से संसद में जनहित के विरुद्ध नियम रचे जा रहे हैं उसी गुप्त रीति से कभी संविधान रचा गया था इस हेतु कि भारत का अस्तीत्व ही समाप्त हो जाए और यहाँ उपनिवेशी आ आकर बसें.....
चाकर करे न चाकरी, राजा करे न काम ।
रखिया को रखिया रखे, न्याय करे बिश्राम ।२४४७।
भावार्थ : -- सेवक सेवा नहीं करते, राजा कोई कार्य नहीं करता । रक्षकों ने अपनी रक्षा के लिए रक्षक रख रखे हैं, न्याय यहाँ विश्राम की मुद्रा में है, अत: सावधान हो जाओ ॥
पहिले सुसंग किए रहे, सबहि कर्म गति रीति ।
अजहुँ कुदास के संगत, चरे कुपथ सब नीति ।२४४८।
भावार्थ :-- पहले सु का संग किए सभी कर्म सुक्रम सभी गति सुगति व् सभी रीत सुरीति होती थी ।अधुनातन कु-सेवकों का संग प्राप्त कर सभी गति कर्म नीतियां-रीतियाँ दुराचरण अनुशरण कर रही हैं ॥
सुजल सुफल सस स्यामलि, रहि ड्रम दल सों पीन ।
सो भुइ दीन हीन होत,भई कल के अधीन ।२४४३।
भावार्थ :-जो भूमि कभी सुजलम् थी सुफलम् थी सस्य श्यामलम् थी द्रुम दलों से परिपूर्ण थी ।वह आज अधीन दीन हीन होकर यन्त्र-तंत्र-संयंत्र के अधीन हो चली है
अब तो संसद में वन्दे-फंदे गाने बंद कर देने चाहिए..... हाँ अधिनायक- तंत्र का जयघोष अनवरत होता रहे.....
पहिले सब फल फुरित रहे,पूर रहे भरपूर ।
अजहुँ रसन की का कहैं,भए दरसन सहुँ दूर ।२४४४।
भावार्थ : -- पहिले यह धरती सब प्रक़र से फली भूत होकर रसीले खाद्यानों से भरी पूरी थी । अधुनातन स्वाद की तो क्या कहें फल दर्शनों से भी दूर हो गए हैं । अब अन्न की बारी है..... भारत जैसे कृषिपरधन देश में तोले में मिला करेंगे ये कण.....
अर्थ पति हुँत सबहि अर्थ,होहि सुगम सब भोग ।
देस ऐसी प्रधानता,नहीं केहि के जोग ।२४४५ ।
भावार्थ : --जहाँ अर्थ पतियों के हेतु ही अर्थ का प्रबंधन हो,सभी भोग वस्तुएं उनके ही निमित्त हो । ऐसा अर्थ प्रधान देश किसी का भी कल्याण नहीं करता ॥
रखिया एहि हुँत राखिया, राख रखावै खेत ।
छिपे छिपे खाईं रहा, चेति सकै तो चेत ।२४४६।
भावार्थ : -- स्वामी ने रक्षक इस हेतु रखे थे कि वह खेतों की रखवाली करे । किन्तु जब रक्षक ही भक्षक हो जाए और छिप छिप कर उपज क्या पूरा खेत ही खाने लगे तब स्वामी को सावधान हो जाना चाहिए । उस भक्षक को डंडे से पीट पीट के भगा देना चाहिए ॥
>> जिस गुप्त रीति से संसद में जनहित के विरुद्ध नियम रचे जा रहे हैं उसी गुप्त रीति से कभी संविधान रचा गया था इस हेतु कि भारत का अस्तीत्व ही समाप्त हो जाए और यहाँ उपनिवेशी आ आकर बसें.....
चाकर करे न चाकरी, राजा करे न काम ।
रखिया को रखिया रखे, न्याय करे बिश्राम ।२४४७।
भावार्थ : -- सेवक सेवा नहीं करते, राजा कोई कार्य नहीं करता । रक्षकों ने अपनी रक्षा के लिए रक्षक रख रखे हैं, न्याय यहाँ विश्राम की मुद्रा में है, अत: सावधान हो जाओ ॥
पहिले सुसंग किए रहे, सबहि कर्म गति रीति ।
अजहुँ कुदास के संगत, चरे कुपथ सब नीति ।२४४८।
भावार्थ :-- पहले सु का संग किए सभी कर्म सुक्रम सभी गति सुगति व् सभी रीत सुरीति होती थी ।अधुनातन कु-सेवकों का संग प्राप्त कर सभी गति कर्म नीतियां-रीतियाँ दुराचरण अनुशरण कर रही हैं ॥
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