पाउँ पसारे परबती पाहन की एहि जात ।
सिखर जुगत को जुग लगे,होवै पलक निपात । २४२१ ।
भावार्थ :- पद प्रस्तारे पर्वतीय पाषाण -खंड की यही नियति है । नगमूर्धन् कहलाने में उसे युग लग जाते हैं , नगण्य कहलाने में क्षण भर का समय लगता है ॥
अधमतस सों नगसिख लग, लख चौरासी जोनि ।
उठे त नगसिख जोइये,गिरे अधमतस होनि ।२४२२।
भावार्थ : -- सूक्ष्म से स्थूल तक जीवों की कुल चौरासी लाख प्रजातियों हैं । यदि कोई जीव उठता है तो अंतत: मनुष्य के शरीर को प्राप्त होता है और यदि किसी मनुष्य का पतन होता है तब वह पुनश्च अधमतस प्रजाति को प्राप्त हो जाता है ॥
न पछौहित ही किछु होहि, न अगौहित किछु होहि ।
अस समझे जो बावरा, अधुनें जन्महु खोहि ।२४२३।
भावार्थ : -- न तो पीछे ही कुछ था न आगे कुछ होगा । जो यह समझता है, वह भ्रमित होकर अपने इस जनम को भी नष्ट कर रहा है ॥
गन सो गरब न कीजिये, गुन सों कीजिए हेत ।
केतक गौरब मारि गए, एकै गुनी कर सेत ।२४२४।
भावार्थ : -- गुण पर गर्व करना चाहिए गण पर नहीं । गण पर गर्व करने वाले जाने कितने गौरव एक गुणी के हाथों मारे गए ॥
यह तन छिनु भंगुर भवन, भीत बसे भव भीति ।
कारन नेकानेक किए, मरन केर एक रीति ।२४२५।
भावार्थ : -- क्षण भंगुर देह रूपी भवन के भीतर जीवन-मरण का भय बसा है । कारण तो अनेकनेक हैं किन्तु मृत्य की रीति एक ही है अर्थात स्वांस समाप्त होने से ही मृत्यु होनी है ॥
मरन रीत सब जानिहै, कारण जान न कोइ ।
कारन को जो जान गए, तिन मरन भए न होइ ।२४२६ ।
भावार्थ : - मरण की रीत को तो सभी जानते हैं किन्तु कारण का ज्ञान किसी को नहीं है । जिसे कारण का ज्ञान हो गया उसे फिर मृत्यु का भय नहीं होता ॥
यह भव सिंधु समान है, जीवन सम जलजान ।
मोचन ही सद मरन है, परमधाम समसान ।२४२७।
भावार्थ : - यह संसार सागर के सदृश्य है जीवन यहाँ जलयान है । जीवन-मरण से मुक्ति ही यहाँ मृत्यु है परम धाम ही पितृ उद्यान है ॥
मानस तन तेतक बढ़े जेतक बाक़ी बाड़ ।
बढ़ती अमरै बेलरी, देइ मूल को छाँड़ ।२४२८।
मनुष्य को उतना बढ़ना चाहिए जितना उसका घेर है । बढ़ती अमर बेल जिस प्रकार अपने मूल को छोड़ देती है उसी प्रकार अन्य के घेरे में बढ़ते मनुष्य से उसका मूल छूटता जाता है ॥
बढ़नी गुन सों हारि गए चढ़नी गन सों हारि।
गन को नेम नियंत सों, होत सकल गुनकारि ।२४२९।
भावार्थ : -- मात्रा से गुणवत्ता तिरष्कृत होती है गुणवत्ता से मात्रा तिरष्कृत होती है । यदि मात्रा को नियमों से नियंत्रित किया जाए तो गुणवत्ता परिष्कृत होती है ॥
अलप जोइ बहुतारथी बहु अल्पारथ जोइ ।
अर्नब अरन अधमहि रहँ, अर्ना पूरन होइ ।२४३०।
भावार्थ : -- अधिक वस्तु किंचित, किंचित वस्तु अधिक अर्थ देनेवाली होती है । जिस प्रकार सरिता-पति का जल किंचित ही उपयोगी होता है किन्तु सरिता का जल पूर्णतस उपयोगी होता है ॥
सिखर जुगत को जुग लगे,होवै पलक निपात । २४२१ ।
भावार्थ :- पद प्रस्तारे पर्वतीय पाषाण -खंड की यही नियति है । नगमूर्धन् कहलाने में उसे युग लग जाते हैं , नगण्य कहलाने में क्षण भर का समय लगता है ॥
अधमतस सों नगसिख लग, लख चौरासी जोनि ।
उठे त नगसिख जोइये,गिरे अधमतस होनि ।२४२२।
भावार्थ : -- सूक्ष्म से स्थूल तक जीवों की कुल चौरासी लाख प्रजातियों हैं । यदि कोई जीव उठता है तो अंतत: मनुष्य के शरीर को प्राप्त होता है और यदि किसी मनुष्य का पतन होता है तब वह पुनश्च अधमतस प्रजाति को प्राप्त हो जाता है ॥
न पछौहित ही किछु होहि, न अगौहित किछु होहि ।
अस समझे जो बावरा, अधुनें जन्महु खोहि ।२४२३।
भावार्थ : -- न तो पीछे ही कुछ था न आगे कुछ होगा । जो यह समझता है, वह भ्रमित होकर अपने इस जनम को भी नष्ट कर रहा है ॥
गन सो गरब न कीजिये, गुन सों कीजिए हेत ।
केतक गौरब मारि गए, एकै गुनी कर सेत ।२४२४।
भावार्थ : -- गुण पर गर्व करना चाहिए गण पर नहीं । गण पर गर्व करने वाले जाने कितने गौरव एक गुणी के हाथों मारे गए ॥
यह तन छिनु भंगुर भवन, भीत बसे भव भीति ।
कारन नेकानेक किए, मरन केर एक रीति ।२४२५।
भावार्थ : -- क्षण भंगुर देह रूपी भवन के भीतर जीवन-मरण का भय बसा है । कारण तो अनेकनेक हैं किन्तु मृत्य की रीति एक ही है अर्थात स्वांस समाप्त होने से ही मृत्यु होनी है ॥
मरन रीत सब जानिहै, कारण जान न कोइ ।
कारन को जो जान गए, तिन मरन भए न होइ ।२४२६ ।
भावार्थ : - मरण की रीत को तो सभी जानते हैं किन्तु कारण का ज्ञान किसी को नहीं है । जिसे कारण का ज्ञान हो गया उसे फिर मृत्यु का भय नहीं होता ॥
यह भव सिंधु समान है, जीवन सम जलजान ।
मोचन ही सद मरन है, परमधाम समसान ।२४२७।
भावार्थ : - यह संसार सागर के सदृश्य है जीवन यहाँ जलयान है । जीवन-मरण से मुक्ति ही यहाँ मृत्यु है परम धाम ही पितृ उद्यान है ॥
मानस तन तेतक बढ़े जेतक बाक़ी बाड़ ।
बढ़ती अमरै बेलरी, देइ मूल को छाँड़ ।२४२८।
मनुष्य को उतना बढ़ना चाहिए जितना उसका घेर है । बढ़ती अमर बेल जिस प्रकार अपने मूल को छोड़ देती है उसी प्रकार अन्य के घेरे में बढ़ते मनुष्य से उसका मूल छूटता जाता है ॥
बढ़नी गुन सों हारि गए चढ़नी गन सों हारि।
गन को नेम नियंत सों, होत सकल गुनकारि ।२४२९।
भावार्थ : -- मात्रा से गुणवत्ता तिरष्कृत होती है गुणवत्ता से मात्रा तिरष्कृत होती है । यदि मात्रा को नियमों से नियंत्रित किया जाए तो गुणवत्ता परिष्कृत होती है ॥
अलप जोइ बहुतारथी बहु अल्पारथ जोइ ।
अर्नब अरन अधमहि रहँ, अर्ना पूरन होइ ।२४३०।
भावार्थ : -- अधिक वस्तु किंचित, किंचित वस्तु अधिक अर्थ देनेवाली होती है । जिस प्रकार सरिता-पति का जल किंचित ही उपयोगी होता है किन्तु सरिता का जल पूर्णतस उपयोगी होता है ॥
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