मंगलवार, 31 मार्च 2015

----- ॥ दोहा-दशम २५१ ॥ -----

बरतिका बढ़ अगन धरे, दीप धरे बढ़ सार । 
एकै सहारथ एक एकहि, होत दूर अँधियार ।२५११ । 
भावार्थ : -- वर्तिका अग्रसर होकर अगन ग्रहण करती है,  दीपक अग्रसर होकर सार ग्रहण करता है । यूं परस्पर सहयोग से ही अज्ञान के अँधेरे दूर होते हैं ॥ 

जगत मैं बुराई बढ़ी,भलाई मन न भाए । 
सुसंगति जो दूर करे , कुसंगत संग लाए ।२५१२ । 
भावार्थ : -- जब संसार में बुराइयां व्याप्त हो जाती हैं तब भलाई बुरी लगने लगती है । यह बुरापन सुसंगति को दूर कर कुसंगत को संग  लगाता है ॥ 

पापधर्म सब जोग के अपने लेखे लीख । 
बहुरि ऐसे पंथ चले जैसी गुरु की सीख ।२५१३। 
भावार्थ : -- प्रत्येक मनुष्य को अपने पाप-पुण्य का विवरण अद्यतन कर जीवन की प्रपञ्जी व्यवस्थित कर लेनी चाहिए । कहीं भगवान का छापा पड़ गया तो फिर गोली पूछ के नहीं लगती कि मैं कठे लगूं । जो आय-व्यय विवरणिका भरणी न आवे तो गुरुजनों के दिखाए सन्मार्ग पर चलना चाहिए ॥ 

 अनुकूलित बात सौमुह आप रहे जब छाए  । 
धूपत बनगत चरन के पीर समझ नहि आए ।२५१४ । 
भावार्थ : -- तप्त वन में गतिवान चरणों की पीड़ा नुकूलित वातावरण के सम्मुख छाया में रहने वालों की समझ से परे होती है ॥ 

कंचन कंचन कामिनी रही नयन को राँच । 
अगन  कहे यह काँच है, कारु कहै नहि साँच ।२५१५। 
भावार्थ : --  भूषण धारण किए सुन्दर स्त्री है जो नयनों को प्यारी है ह्रदय को नहीं ।  अग्नि ने उसकी सत्यता का परीक्षण कर कहा ई कहाँ कंच्चन है ई तो काँचनी है,  पेट का प्यारू कारु कहत हैं नही री ये तो सौ टंच कंचन है ॥ 

टिप्पणी : -- प्रत्येक चमकती वस्तु  होती..... 

जलावन को जस अँगरा, संत पुरुष को लोभ । 
कंथा धर को कामिनी, साँत मनस को छोभ । २५१६ । 
भावार्थ  : -- अग्नि को जैसे ईंधन से वैर होता है वैसे ही संत पुरुष को लोभ से योगी  को माया और स्त्री से, शांत मष्तिस्क को क्रोध से वैर होता है । क्षोभ की तरंग शांत मन-मानस को अशांत कर देती है ॥ 

बिहांसे हँसि न बोलिबे, बिसुरत बिसुर न रोए । 
जीते जी सो जीउना मरे बराबर होए ।२५१७। 
भावार्थ : -- पर प्रसन्नता से जो प्रसन्न न हो , पर पीड़ा से जो पीड़ित न हो वह जीवित होते हुवे भी मृतक के समान होता है ॥ 

मे मैं करते मुख तले, कैं कैं करती काइ । 
अपना ज्ञान बघार के फूरी गाल बजाए ।२५१८। 
भावार्थ :-- मैं ही ईश्वर हूँ ! मैं ही जगत रचैता हूँ !! मैं ये हूँ मैं वो हूँ !!! मैं मैं करते मुख  के नीचे काऊं काऊँ करती काया है । जो अपने तुच्छ ज्ञान का व्याख्यान कर झूठी आत्मप्रशसा करती है ॥ 

पांच तत्व की पूरिया, कथन के नाहि सीउँ । 
मानए  भगवन आपनो, धरे चार घर नीउँ ।२५१९। 
भावार्थ :- पांच तत्वों की यह पुड़िया इसके अनर्गल प्रलाप की तो सीमा ही नहीं है । चार घर की नीव रखनी क्या जान गई अपने आप को भगवान समझने लगी । पहाड़ों वाला एक ग्रह की नीव रखे तो जाने ये अपने को क्या समझे ॥ 

यह ग्रह नखत यह नभ यह जगत रचाया कौन । 
को ज्ञानी को बिज्ञानी, पूछत भए सब मौन ।२५२०। 
भावार्थ :--ये ग्रह-नक्षत्र यह नभ यह संसार किसने रचा किसी ज्ञानी ने अथवा किसी वैज्ञानिक ने ? ऐसे प्रश्न अनीश्वरवादिता के मुख पर चुप लगा देते हैं ॥ 

शनिवार, 28 मार्च 2015

----- ॥ दोहा-दशम २५० ॥ -----

जीवन पथ एक चाकरी,जामें बहुतक ठाउँ । 
पाप पसारे धूप है,धर्म पसारे छाउँ ।२५०१ । 
भावार्थ : -- यह जीवन-पथ एक चक्र है  जिसमें बहुंत से जन्म व् बहुंत से मरण है ।  एक जन्म के पापों का विस्तार जन्म-जन्म के दुखों का व् एक जन्म के पुण्यों का विस्तार जन्म-जन्म के सुखों का कारण होता हैं ॥

सकल जोनि भव भीत है,  मानस मुकुति द्वार । 
सत्कृत के जो संग किए ,भए दुआर के पार ।२५०२। 
भावार्थ :-- समस्त जीव जगत भीतिका हैं अंतरात्मा उस भीतिका की बंधक है यह मनुष्य शरीर उस आत्मा का मुक्ति द्वार है । जिसने परमार्थ का प्रसंग किया वह अंतरात्मा द्वार के बाहिर हो गई ॥

पाप जी गरुआर करे धर्म करे हरूआर । 
गरुबारे नीचू परे, हरुबारे उद्धार ।२५०३। 
भावार्थ : -- पाप इस अंतरतम को भार युक्त  पुण्य इसे भारहीन करता है । पापों के भार से मनुष्य पतन की और अग्रसर होकर निकृष्ट योनि को प्राप्त होता है और पुण्य से यह भारहीन होकर सद्गति को प्राप्त होता है ।।

जीवन भर कुकरनी कर भरे पाप भंडार । 
केतक नीचू जाइये, जेतक भारी भार ।२५०४। 
भावार्थ : -- जीवन भर कुकरम करते हुवे हम अपने कर्म- कोष में पापों को संकलित करते जाते हैं । यह जाने बिना कि जिसके पापों का भार जितना अधिक होता है वह उतनी ही निकृष्ट योनि को प्राप्त होता है ॥

स्पाष्टिकरण  : -- स्तनधारीजीवों के पश्चात सरीसृप (अण्डज )का क्रम आता है, व्हेल मछली स्तनधारी होती है । स्तनधारी के पैर होते हैं किसी किसी के हाथ होते हैं  इन बेचारों के न हाथ होते हैं न पैर ॥

मानस जिउती जोग मैं,मरनी को बिसराए ।
धर्म अंक घटाई के,पाप अंक  बरधाए ।२५०५।
भावार्थ :--जीवन के हेतु संकलित करने में चित्त से मृत्यु विस्मृत हो जाती है । परिणाम स्वरूप  हमारे कर्म कोष में पुण्य घटते जाते है और पाप बढ़ते जाते हैं ॥

बचपन खेल गवाएं के,यौबन जी भर सोए ।
जागत तब का लाहिये,बिरध बयस जब जोए ।२५०६।
भावार्थ :--  बचपन खेल में बीत गया,यौवन शयन में । फिर चित्त के सचेत होने से क्या लाभ जब वृद्धा अवस्था को प्राप्त हो गए।  यह वृद्धावस्था शरीर को असमर्थ कर देती है ॥

सीध धरावे लाकरी, ज्यों काट छिल छाँट । 
तासु चरन अनुहर त्यों,साधौ अपने बाट ।२५०७। 
भावार्थ : -- जिस प्रकार लकड़ी काट के छिल छाँट के सीधी होती है तभी उससे कोई सुन्दर कलाकृति प्राप्त होती है  उसी प्रकार साधु-संत की प्राप्ति के लिए अपने पंथों को भी छिलछांट के सीधे कर लेने चाहिए कारण कि टेड़े पंथ पर चलने से सीधा भी टेड़ा हो जाता है ॥

रासभ जैसे काज किए, नाना साज सँजोए । 
जीते जी सब आपना, मरे पराया होए ।२५०८। 
भावार्थ :-- गधों के जैसे कर्म कर भांति भांति की सामग्रियाँ तो संकलित कर लीं । यह जीते जी की हाय हाय है मरने  के पश्चात यह सब दूसरों का होना है ।।

जिउती केतक जोइये जेतक जीवाधार । 
बरते कस कृपनी सम  दाएं जैसे  उदार ।२५०९। 
भावार्थ :-- जीविका कितनी अर्जित करनी चाहिए जितने में प्राण अधिष्ठित रहें । उसे व्यय कैसे करें ? कृपणतापूर्वक !उसका  दान कैसे करें ? उदारतापूर्वक !!
पूत कपूत तो का धन संचय,पूत सपूत तो का धन संचय ॥

हीरे मानक मोतिया यूँ तो सबके पास । 
मांगनी तेहि द्वार परे, जहाँ मिलन की आस ।२५१० । 
भावार्थ: --हीरे, माणिक,  मोती यूं तो सभी के पास हैं । मांग उसी द्वार को प्रणाम करती है जहाँ मिलने की आस हो ।।
गौहर लाल-ओ-अलमास यूं तो सब के पास..,
बंदे का सर वहां झुके जहाँ मिलने की आस.....





----- ॥ दोहा-दशम २४८-२४९ ॥ -----

बिरते को सब जानिहैं, होनिहार को जान । 
अजहुँ त जिउता जागता, होहि पलक अवसान ।२४८१ । 
भावार्थ : --अतीत से तो सभी परिचित हैं  भावी काल किसने जाना है । अधुनातन तू जीवित है सतेज है । यह भी संभावित है कि आनेवाला क्षण तेरी इह -लीला समाप्त कर दे ॥

जग मह बहुतक पथ परे, चाहे कतहुँ पयान । 
तीन लोक लए भाँवरे,पहुंचे सब समसान ।२४८२। 
भावार्थ : -- संसार में पंथ ही पंथ हैं चाहे कोई कहीं गमन करे ।  चाहे आकाश पृथ्वी पाताल का भ्रमण क्यों न कर ले अंत में सबको श्मशान ही आना पड़ता है ।

काल के तन तीनि बदन, भावी भूत भवंत । 
चित मैं वाके सिमरनी , रह जीवन पर्जंत ।२४८३। 
भावार्थ : --समय की देह वर्तमान भूत भविष्य रूपी त्रयी आनन से युक्त है ।यह सदैव स्मरण रहना चाहिए ॥

एक सूर एकहि चन्द्रमा  एकै बिसम्भरि होइ  । 
बिलग दिसा पंथ सहुँ भए  बिलग बिलग सब कोइ ।२४८४। 
भावार्थ ?: --यद्यपि एक ही सूर्य है, एक ही चन्द्रमा है भरण पोषण करने वाली यह धरा भी एक ही है । विपरीत दिशा व् पंथ में गमन के कारण पथिकों में भिन्नता है॥

पंथ गहै को औरहीं, दिसा गहै को और । 
ऐसेउ सरन चरनन्हि, पावै न कोउ पौर।२४८५। 
भावार्थ : -- जब  दिशा कोई और है और पंथ कोई और । तब ऐसे पथिक के गतिमान चरण लक्ष्य को प्राप्त नहीं होते ॥
आगे डीठ धराए के पाछे देख निहार ।२४८६। 
बिरते के सुधारी करत आगे करम सँभार । 
भावार्थ :-- मनुष्य को चाहिए कि वह भविष्य का आलोकन व् अतीत का अवलोकन करे, वह भूत काल की त्रुटियों को सुधार कर अपने भविष्य पर ध्यान केंद्रित रखें ॥

अपने जवान चरन के मतै करौ अभिमान । 
जहँ नबल नवान अहैं,होइहि काल पुरान ।२४८७। 
भावार्थ : - अपने यवान (वेगवान) चरणों का अभिमान नहीं करना चाहिए । जैसे अधुनातन के नवयुवा कल के वृद्ध होंगे वैसे ही वर्त्तमान की युवा समृद्धि कल वृद्धावस्था को प्राप्त होगी ॥

कोऊ पंथ पुरान है कोऊ यहाँ नवांन । 
सबकी अपनी बानि है सबकी अपनी बान ।२४८९। 
भावार्थ : -- यह जीवन की यात्रा है यहाँ कोई पथ नवीन तो कोई प्राचीन है । सबकी अपनी वेश-भूषा है व् अपनी ही भाषा है ॥

पंथी पंथ नवान के गर्ता गर्त अजान । 
कहँ अँधेर कहाँ फेर हैं,चरत न होत ग्यान ।२४९०। 
भावार्थ : -- हे पथिक नवल पंथ में  कहाँ अँधेरा छाएगा कहाँ घन फेरा आएगा नवलपंथ के यवान को इसका संज्ञान नहीं होता और न ही कंदराओं व् खड्डों का पूर्वाभास होता ।।

पुरान पंथ के पंथी, जानिहि हेरिहि फेर ।  
गरत गहबर गहराई  , लए सब फेरिहि हेर ।२४९१। 
भावार्थ : -- यह सर्वविदित है कि वारंवार आवगमन से  पुराने पथों के पथिक को पथ की दूरी, विभेदों, विनिमय तिर्यकता तथा उसके  घाटों व् घुमावों का गहरा ज्ञान होता है, जीवन संचालक यदि कुशल हो तो यात्रा मंगलमय होती है ॥

चरन संचरन दीजिए, कर सों कीजिए काम ।
भगता मुख सोंहि लीजिए , रमारमन के नाम ।२४९२।
भावार्थ : -- चरणों संचरण करते रहें युगल कर सत्कार्य करते रहें । हे पथिक मुख से ईश्वर को भजते हुवे यात्रा करनी चाहिए,  इस उपाय से चित्त एकाग्र होता है ॥

जन्माए तो सबहि हँसे, जनम जाए सब रोएँ । 
आए  कहाँ सों गए कहाँ, पूछे ना पुनि कोए ।२४९३। 
भावार्थ : -- संसार में आते हुवे को सभी हँसते हैं और जते हुवे को रोते हैं । आया तो कोई कहाँ से आया गया तो कोई कहाँ गया यह कोई नहीं पूछता ॥

गगन जल अगन पवन सन जीवन धन जो खेह । 
देह ही बाहि रूप है  सबते बर मनु देह ।२४९४। 
भावार्थ : -- यदि वायु पृथ्वी अग्नि जल आकाश यदि  ईंधन है जीवात्मा चालक है शरीर वाहन है तो सबसे उत्तम वाहन मानव शरीर है ॥ जीव निरंतर इस मानव-शरीर को प्राप्त करने के प्रयास में रहता है मनुष्य को चाहिए कि वह इस जीवन चक्र पथ से मुक्ति प्राप्त करने हेतु प्रयासरत रहे ॥

मानव दिसा ग्यान के, करे पंथ अनुहार । 
सेष जीउ का जीउना, तासू करम अधार ।२४९५। 
भावार्थ : -- मानव दिशा का संज्ञान कर फिर पंथ का अनुशरण  करता है । पशु-पक्षी नहीं करते इनका जीवन उसके ही के कर्मों पर आधारित होता है ॥ मानव के चरणों में इतना ताप होता है कि यदि वह किसी निर्जन स्थान से चले तो वहां पगडंडियाँ उत्कीर्ण हो जाती हैं पशु चलें तो नहीं होती ॥

पथ पधारन  हेर फिरे ,  पद हेरएँ बन खेत ।
 जौनी केतक होउनी, चाहिए जीवन जेत ।२४९६। 
भावार्थ : -- अधुनातन पथ हैं कि चरणों को ढूंढ़ते फिर रहे हैं चरण है कि वन धन धान्य को ढूंढने लगे हैं ॥साधन कितने होने चाहिए है जितने कि जीवन हेतु आवश्यक हों ॥

धर्म के कुल चार चरन, जोइ चले तिन संग । 
मग मग मेलिहि तीर्था पग पग मेलिहि गंग ।२४९७। 
भावार्थ : -- धर्म के कुल चार आचरणहोते हैं ( सत्य, शौच, दया, दान ) जो पथिक इन आचरणो का संग किए संचलित होता है उसे पथ पथ पर तीर्थ व् चरण चरण पर गंगा मिलती है ॥

सुचित संग सुरसरित है, दान संग सब धाम । 
 दया संग जग हरित है, सत्य संग हरि नाम ।२४९५। 
भावार्थ :--  शौच से गंगा का, दान से तीर्थों का, दया से सुख-शांति का और सत्य से ईश्वर का प्रागट्य है ॥

दया प्रकृति की परम रक्षक है.....

जबलग यह घट घटक रहँ,  यह पुर यह हट बाट  । 
बहुरि घाट लगाई दिए, बाँध काठ की खाट ।२४९६। 
भावार्थ : -- दैहिक संघटक जब तक संघटित रहते हैं, यह पुर पट्टन यह पंथ तब तक ही हैं । जब यह  विघटित हो जाते हैं  तब मृतप्राय देह तट के आश्रित हो जाती है ॥

यह भव सिंधु सरूप है , जनम मरन दुहु कूल ।
पाप डुबावनि पाहना, पुन नौका के तूल ।२४९७।
भावार्थ : -- यह संसार एक सिंधु है, जन्म एवं मरण इसके दो तट हैं । पाप का भार डुबोने वाला पाषाण है वारम्वार जन्म व् मरण क कारन यह पाप ही है । चौरासी लाख काया से यह जीव जगत रचा गया है । यह आवश्यक नहीं है की वारंवार मनुष्य की काय ही प्राप्त हो । पुण्य वह जलयान जो  काया को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति प्रदान करता है ॥

मोक्ष ही वास्तविक मरण है  अन्यथा तुम जीवित हो..... कहाँ हो कैसे हो.....मरने के बाद कोई नहीं पूछता..... इसलिए कहते हैं यहाँ देओगे तो वहां पाओगे.....यहां भोगोगे वहां भुक्तोगे.....

यहाँ भोगए तहँ भुगतें,यहाँ दाए तहँ पाए ।
मरनि परे को जाए कहँ   , जहां करम लए  जाए ।२४९८।
भावार्थ : -- यहां भोगोगे तो वहां भुक्तोगे,यहां देओगे तो वहां पाओगे । मृत्यु के पश्चात कोई कहाँ जाता है ? जहाँ  कर्म ले जाते हैं ॥

 एक करम जग सीत करै दूज भरै संताप ।
एक के नाउ धरम धरे, दूजे धराए पाप ।२४९९।
भावार्थ :--एक कर्म संसार को सुख देता है  दूसरा दुख  ।जो सुख  देता है वह कर्म पुण्य जो दुःख  देता है वह कर्म पाप है ॥

पाप धर्म आधीन कभु  धर्म पाप आधीन । 
स्वामि कीन्हनि जानिए , जामें जग लवलीन ।२५०० । 
भावार्थ :--कभी पाप धर्म के तो कभी धर्म पाप के अधीन होता है । जिसमें संसार तन्मय हो वह स्वामी होता है ॥ अर्थात मनुष्य की संलग्नता जब पाप में हो जाती है  तब धर्म दास हो जाता है जब पुण्य में हो जाती ही तब पाप दास हो जाता है ।।

























हरियारी करियाए के करियारी हरियाए । 
हरिहरि सबहि रसाबरी ,रसरी संग दूराए ।२४७५ । 


गुरुवार, 19 मार्च 2015

----- ॥ दोहा-दशम २४७ ॥ ---

ईंधन अर्थ आधार किए, बरे सकल बन खेत । 
बुझावनि उपाई करत, जन मानस तू चेत ।२४७१ ।  
भावार्थ :--अधुनातन अर्थ प्रबंधन  ईंधन पर आधारित हो चला है । यह प्रबंधन तेरे सभी वन व् कृषि भूमि को नष्ट किए जा रहा है । हे जनमानस! तू सावधान हो और इस प्रज्वलन को शांति करने की युक्ति कर ॥ 

जेते जैसी जब जहाँ, जी अनिबारै होए । 
तेते तैसे तब तहाँ,जीवन साज सँजोएँ ।२४७२। 
भावार्थ :-- जीवन हेतु जब जहाँ जैसे जितने  आवश्यक व् अनिवार्य हो,  तब ही वहां वैसे उतने ही साधन संकलित करने चाहिए । अन्यथा ये साधन जीवन -धन को हानि पहुंचाएंगे ॥ 

मैट्रो जैसे चुम्बक रखोगे तो पूरे देश का लोहा आकर्षित होकर एक स्थान पर एकत्र हो जाएगा । बड़े बड़े चिकित्सालय व् शिक्षा  केंद्र की राजधानियों को क्या आवश्यकता । ये एक ही स्थान पर भी इनकी क्या उपयोगिता । एक स्थान पर बादल एकत्र होगें तो फटेंगे न और बाढ़ आएगी । 

सुविधाओं के समयक वितरण से समय धन साधन ईंधन सभी की बचत होती है.....  

 खेद है ! कि मूर्खों के लिए उपदेश नहीं होते..... 

जब पावस रस बस रहे, छाए रहे बदराइ । 
बिनहि रितु की बादरिआ, होत नहीं सुखदाइ ।२४७३।  
भावार्थ : - जब पावस ऋतु की आवश्यकता हो तभी बदरा छाए । बिना आवश्यकता  की बरखा  दुखदाई होती है ॥  

ईंधन धारे प्रबंधन, भयऊ अर्थ बिकार । 
दहन धूम धराई के  पाए तमस बिस्तार  ।२४७४। 
भावार्थ : -- राष्ट्र का प्रबंधन ईंधन पर आधारित होने से रूप रस गंध आदि इन्द्रियों के विषयों सहित धन व् उसके प्रयोजन विकृत हो जाते हैं  । इस ईंधन के दहन से उत्पन्न धूम-संहति की गहनता से देश में अज्ञान रूपी अंधकार का बसेरा हो जाता है जिसका सहयोग प्राप्त कर विकृत प्रयोजन तमोगुण का विस्तार करते हैं ॥ 

प्रगत प्रगासित पाहना, लिखे सेष आलेख । 
 अंतर्मन उजियार कर , पथ अँधियारा देख ।२४७५ ।  
भावार्थ : -- दुरी मापक पाषाण खंड पर तेरी मृत्यु लिखी हुई है । हे पंथी तू अपने अंतर ज्ञान रूपी प्रकाश से प्रकाशित करते हुवे बाहिर के अंधकार रूपी अज्ञानता का दर्शन कर ॥

 दूरी मापक पाषाणों के प्रकाश से मार्ग के अंधेरों का बोध नहीं होता.....

कहँ सोहि चले कहँ आए अरु कहाँ रहे पयान । 
पलक भर कतहुँ होर के, सरनी लए संज्ञान ।२४७६। 
भावार्थ : -- कहाँ से चला था , कहाँ आ पहुंचा , और कहाँ जा रहां है  , हे प्रगति पंथ के पथिक सुन  क्षण भर के लिए कहीं ठहर ! और अपने मार्ग का संज्ञान कर कि तुम्हे जाना कहाँ है ॥ 

पृथ्वी में जितना प्रतिशत जल  है शेष भाग में उतने प्रतिशत ही हरियाली होनी चाहिए हरियाली होनी चाहिए 
अर्थात ७० % जलीय भाग को छोड़कर शेष ३०% में से २१% हरियाली पारिस्थितिक संतुलन के लिए आवश्यक है ॥ 

बिगत जनम एक साँच है, अगत मरन एक साँच । 

बीच किए सब करम लिखे, बाँच सकै तो बाँच ।२४७७ । 
भावार्थ : -- जाता हुवा जन्म एक सत्य है आती हुई मृत्यु भी एक सत्य है । इस जनम -मरण के मध्य कर्मों ने जो लेख लिखे हैं उसको पढ़ता चल ॥

 हिंसा को लाल अहिंसा को हरा करेगा तो तेरे पाप व् पुण्य ज्ञात हो जाएंगे 
सत्य को उज्जवल  कर असत्य को काला कर तब जीवन के अँधेरे व् सबेरे ज्ञात हो जाएंगे सयन व् जागरण ज्ञात हो जाएगा ॥

उषप उषिप अबरेख के, लिखे अलेखी लेख । 
जग अँधेरा छाए रहा, देख सकै तो देख ।२४७८। 
भावार्थ :-- अस्त हुवे सूर्य का चित्रण करते  तमोचर आलेख उत्कीर्ण कर रहा है । जग में अज्ञान रूपी अन्धेरा व्याप्त हो रहा है इसका संज्ञान कर ॥

पीछे जनम बिहान है आगे है अवसान । 
प्रगत पंथ के पथिक सुन कहत बरख पाषान।२४७९। 
भावार्थ : --प्रगति पंथ के पथिक सुन संवत्सर के पाषाण खंड कह रहे हैं । पीछे तेरा आरम्भ है आगे तेरा अवसान है ॥

पच्छिन हेरी दे रहे दिनकर निज मुख फेर ।
पाछे प्यारे बिछढ़ो  हेर सकै तो हेर ।२४८० । 
भावार्थ : --  अस्त होता सूर्य आह्वयन कर तेरा आह्वान कर रहा है । देख तेरे संबंधी, तेरे मित्र, तेरे पूज्यनीय, पीछे कहीं बिछड़ गए हैं, यदि तू समर्थ है तो उनका अन्वेषण कर ॥

----- मिनिस्टर राजू १६५ -----

"राजू !  भारत का राजस्व घर से जाता हुवा तो दिखाई देता है,आता हुवा दिखाई नहीं देता.."

राजू : - मास्टर जी ! वो सरकार की जबानों में जमा होकर जमादार की दस्तावेजों बोले तो फाइलों में ही खर्च होता है इसीलिए दिखाई नहीं देता.....  

राजू ! इन नेताओं का भी अपना ही इतिहास और अपना ही शब्दकोश है..... 

मंगलवार, 17 मार्च 2015

----- मिनिस्टर राजू १६४ -----

राजू ! काल भगवान सपणों में आए थे..,

राजू : -- तो मास्टर जी!
"तो क्या, कहने लगे " एक पत्थर की तक़दीर संवर सकती है सरत ये ही कि सलीके से तरासा जाए " 
मैं मन में सोचो  पत्थर के गोले ये बणाए ठीक मैं करूँ, फिर सोचा भगवान है उलटी-सीधी नहीं बोलनी चाहिए और सोच समझ के बोल्यो  : -- पहले ये जो गोली बणा रक्खी है उसे तो तरास लूँ.....


रविवार, 15 मार्च 2015

-----॥ पृच्छा-परीक्षा ३ ॥ -----

>> हस्त सिद्धि को गिनते ये सेना आपस में ही लड़ती रही । वहां पड़ोसी निरंतर सीमा पार करते कश्मीर में बसते भारत के  वाशिंदे हो गए । अब वे हमारे अधिकार को अपना किए हैं । 

 कितने सुरक्षित है हम.....? 
>> सीमा का उल्ल्ंघन  करने वाले घुसपैठियों के लिए भी परमाणु गोले चाहिए, जो एक हुंकार से भाग जाएं । एक गृहस्थ को चौकीदारी  में कितना धन व्यय करना चाहिए..... 

>>  एक हस्ताक्षर  करने के लिए भी शासन को बैमान चाहिए । कितना राजस्व व्यय होता है इस शासन पर ? और कितना होना चाहिए..... ? 

>> भारत के निम्न व् निम्नतम वर्ग की औसत आय कितनी है.....और क्यों है.....?

>> यहां उच्च कोटि का लौहा चालीस रुपया किलो और मध्यम कोटि का चावल पचपन रुपय किलो मिल रहा है क्यों ? जनसाधारण लोहा चबाएगा क्या.....? बिजली पहनेगा क्या.....? गाड़ियों में रहेगा क्या.....? 

>> जीवन की रक्षा के लिए जीव-जगत को जितने भोजन की आवश्यक है देश की दशा कह रही उतना भोजन तो नहीं है..... यदि नहीं है तो शासन क्या कर रहा है.... ? है कहाँ वो.....?

>>  पाठशालाओं में मध्यान भोजन मिलेगा । यह योजना यह सिद्ध करती है कि अपने  नौनिहालों की क्षुधा शांत करने के लिए पालकों के पास एक समय का भोजन भी नहीं है,  भारत का बचपन भूखों मर रहा है ।

क्यों मर रहा है ?  : - विभाजन के पश्चात से क्या कर रहे थे ये सत्ताधारी.....?

'ढोंगी महात्माओं का देश है ये.....'


>> कालाधन किसे कहेंगे.....? 

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

----- ॥ दोहा-दशम २४५-६ ॥ -----

मेरा मेरा कह मरे, मरघट खटिया सोए । 
देइ अगन तन जर बरे, तेरा कछुहु न होए ।२४५१ । 
भावार्थ : -- मेरा मेरा कहकर लोग मरते गए चिता  को वरण करते चले  ।  मुखाग्नि से जब यह शरीर ही जल के भस्म हो गया फिर तेरा क्या हुवा कुछ भी नहीं ॥ 

राम राम को कहि मरा, मरा मरा कह कोइ । 
जेहिं कहि कल्यान गहे, कहन बरे सब सोइ ।२४५२। 
भावार्थ : -- कोई राम राम रट रहा हैं किन्तु मरा-मरा उच्चारित हो रहा है कोई मरा-मरा रट रहा है किन्तु राम-राम उच्चारित हो रहा है । जिसकी कथनी में जग का कल्याण हो वही कथन वरण करें ॥ 

राजा की रच्छा करे रहेउ दाहिन बाम । 
पैदे के सिरोपर रहे, रखिया के एहि काम ।२४५३। 
भावार्थ : --  रक्षक का यह कर्त्तव्य है कि वह प्यादे के सिर पर चढ़ा रहे और चारों ओर से राजा की ही रक्षा करे ॥ 
राजा जीते जीत है राजा हारे हार । 
पैदे को पैदा रखे, राजा को रखबार ।२४५४। 
भावार्थ : - राजा की जीत में ही राज्य की जीत है राजा की हार में राज्य की हार है । अत: प्यादे की रक्षा प्यादा ही करे और रक्षक राजा की रक्षा करे ॥ 

पैदे राउ के पदबी, पैदे पदबी राउ । 
कुटिल कुठारि चाल चले, लोकतंत्र धर नाउ ।२४५५ । 
भावार्थ : - प्यादे  की पदवी पर राजा और राजा की पदवी पर प्यादा है । यह अधिनायक तंत्र का राजा बना प्यादा लोकतंत्र  के  नाम से विश्वासघाती कुटिल चालें चल रहा है ॥

रंक अजहुँ राजा भया, राजा भयऊ रंक । 
रंक पदबी पंकज भए राजा पद भए पंक ।२४५६।  
भावार्थ : -- जो कभी दलि-दर थे वे राजा हो गए जो कभी राजा थे वे दरिद्र -नारायण हो गए । दलिदर पंकज  को गए, नारायण पंक की ॥ 

राजा मलिने भेष मैं पैदे राजा भेष । 
राजा जी अनुहार करें पेदे दैं आदेस ।२४५७ । 
भावार्थ : -- राजा की भूषा मलिन है और प्यादे राजा के भेष में हैं । राजा जी अनुशरण कीजिए , प्यादे जनादेश  दे रहे हैं ॥ 

राजा कमावै अल्पहि, पैदे भृत बहुताए । 
तापर साज  सजोउना कहु तो कहँ ते आए ।२४५८ । 
भावार्थ : -- राजा का उपार्जन  अल्प ही है और  प्यादे की पारिश्रमिक राजा के उपार्जन से भी अधिक है  राजा एक कमा रहा है प्यादा दो पा रहा है उसपर इतने गाड़ी-घोड़े कहो यह सब कहाँ से आएगें ॥  उपनिवेशी भी तो कुछ नहीं करते बस बैठे बैठे खाते हैं ॥ 

जीवोपार्जन अल्पहि, कौड़ी गिन कुल चार ।
जीवन जोग जुगाउने, करसों भयउ बहार ।२४५९। 
भावार्थ : -- जीवन का उपार्जन अल्प ही है जोड़े तो कुल चार कौड़ी होती हैं ।  शासन इस प्रकार से अव्यवस्थित है कि  अब तो आधार भूत धन अर्थात भोजन सामग्री भी पहुँच से बाहिर होती जा रही हैं ॥ 

कारण क्या है : -- मुद्रा की क्रय शक्ति का क्षीण होना 
यह क्षीणता क्यों है ?

 पीडीपी नई  डीबीपी नई नई पीजेपी छड्ड न जीवन धन का सकल घरेलू उत्पादन अर्थात ग्रास डोमेस्टिक पिरोड एक्सन  गिर रहा है । जीवन साधन का उत्पादन स्थिर है यहां उच्च कोटि का लौहा चालीस रुपया किलो और मध्यम कोटि का चावल पचपन रुपय किलो मिल रहा है क्यों ? जनसाधारण लोहा चबाएगा क्या ? 

आवश्यक वस्तुओं तक पहुँच कैसे हो : --  उत्पादन में वृद्धि कर आवश्यक वस्तु के मूल्य को नियंत्रित करना जिससे मुद्रा की क्रय शक्ति में वृद्धि होगी 

यदि मुद्रा की क्रय शक्ति क्षीण हो रही हो तो इसका अर्थ है उत्पादन गिर रहा है.....

तो कहानी का सारांश यह ही कि  ----- ॥ पहले भोजन फिर साधन ॥ -----

जीवन को जोवन हेतु भोजन जेतक चाहिँ । 
देस की दसा कह रही, अजहुँ त तेतक नाहि ।२४६०। 
भावार्थ : -- जीवन की रक्षा के लिए जीव-जगत को जितने भोजन की आवश्यक है देश की दशा कह रही उतना भोजन तो नहीं है..... यदि नहीं है तो शासन क्या कर रहा है.... ?

आधी पाधी धोतनी,  धरे पेट मैं आग। 
सुबारथ परता परारथ, छेड़ रहे श्री राग ।२४६१। 
भावार्थ : -- आधिक वस्त्रों से तन ढके पेटों में यहां भूख पल रही है । और स्वार्थी शासक दूसरों के लाभ हेतु सुख साधनों का राग छेड़ रहे हैं ॥

साला महुँ मिलिहि भोजन होइहि जब मध्यान ।
बचपन भूख मर रहा सासन देइ प्रमान ।२४६२। 
भावार्थ : --  पाठशालाओं में मध्यान भोजन मिलेगा । यह योजना सिद्ध कर रही है कि भारत का बचपन भूखों मर रहा है । अपने  नौनिहालों की  क्षुधा शांत करने के लिए पालकों के पास एक समय का भोजन भी नहीं है ॥

क्यों नहीं है : - विभाजन के पश्चात से क्या कर रहे थे ये सत्ताधारी.....?

'ढोंगी महात्माओं का देश है ये.....'

जन घनहारिन बरग पहि   अहहि न जीवन जोग । 
जुगौअन बिनहि जिऊना, छांड़ी देउ सँजोग ।२४६३। 
भावार्थ : --   अगाध जन संख्या से युक्त ( भारत का ) निम्नतम के पास जीवन को संयोजित करने वाले योग भी उपलब्ध नहीं है । इस वर्ग में पंचानबे प्रतिशत से ऊपर भारतीय हैं उपनिवेशी नहीं ।  साधनों की तो छोड़ दो उनका जीवन उचित आहार के बिना मृत्यु की प्रतीक्षारत है ।  और महाराज को नई नई इक्छाएँ हो रही हैं.....

कलुषित कल के अनल सों, भयउ सकल बन खार । 
बिअ रहे न बनजा रहे  रहे न बिननी हार ।२४६४। 
भावार्थ :-- कलुषित कल कीअग्नि से भारत के वनप्रदेश जल कर राख हो गए । अब न तो वन बीज रहे न वन- विटप रहे न वनजा ही रहे न ही वन बीज व् वनकाष्ठ को चुनने वाले ही रहे ॥

खेत रहे न खेह रहे, रहे नही खलिहान । 
चहुँपुर कल मल मल रहे  , सासक के अस कान ।२४६५। 
भावार्थ : -- अशासकों के ऐसे नियम हैं कि वन के साथ अब खेत भी न रहे खेतों की वह मीट्टी ही रहे  वह न धनधान्य रहे,  केवल कलुषित कल की कला करने वाले ये संयंत्र  अपने मल को मलते रहे।

अपने अपने साख में, सभी कीन्हे कान । 
बनिहार बिनहार हुए,पति सोन दास किसान ।२४६६। 
भावार्थ : -- यहाँ सब अपने अपने अहंकार में है सबके अपने अपने नियम हैं । इनके इन नियमों ने बनिहार को बिना आहार के हो गए  भूमिहार को उद्योगपतियों का दास बना दिया ॥ 

भूपति बंधुआ दास  भएँ, भूख मरे बनिहार । 
बेपार अस बिनसिहि जस, बिनसि बनज बैपार ।२४६७। 
भावार्थ : -- ऐसे नियमों से कृषि भूमि के स्वामी किसान बंधुआ दास बन जाएंगे और बन गए हैं  कृषिकर्म करने वाले भूमिहीन किसान भूखे मरेंगे और मर रहे हैं ॥ जैसे वन उपज से संबंधित उद्योग-धंधे चौपट हो गए वैसे ही कृषि उपज से संबंधित उद्योग-धंधे भी चौपट हो जाएंगे ॥

दलहन तिलहन दूराए दूरे दलिन अहार । 
कुल दीपक पूछ बुझाए , कहँ से अवाए सार ।२४६८। 
भावार्थ :-- तिलहन चल बसा, दलहन नहीं रहा, पत्तेदार आहार थालियों से उठ गया । कुलों के दीपक भी पूछते पूछते बुझ गए कि सार कहाँ से आए ॥

कर्षक के खन घेर के धनपति भयउ कुबेरु । 
तिनकी रयन सबेर किए  जग सब बेर अँधेर ।२४६९। 
भावार्थ : - भूमिहार किसानों की भूमियों को घेर कर ही ये पूंजीवादी कुबेर बने हैं । संसार के दिवस अपराह्न संध्या आदि सभी कालों में अंधेरा छाया हुवा है और इनकी अपनी रयन भी प्रभासित है ॥ 


अभिमत नेई देइ के पाहन लेइ चुनाए । 
तिन्हते बर परबत हैं बोलि बोल बहुराए ।२४७०। 
भावार्थ : -- अपनी अभिमत की नीव देकर तुमने पत्थरों को चुन लिया है । इनसे अच्छे पर्वत है जहाँ बोलने से बोल वापस तो आते हैं यहां से तो कोई उत्तर नहीं मिलता ॥


गुरुवार, 12 मार्च 2015

----- ॥ दोहा-दशम २४४ ॥ -----

चेतस मनस चिंतन कर सब कहु सोच विचार  ।
अधिक गुने थोरहि कहे, तबहि कहन में सार ।२४४१। 
भावार्थ :--चैतन्य मस्तिष्क से गहन विवेचना करते हुवे विषय का अधिकाधिक ज्ञान ग्रहण कर किंचित ही कहा जाएं तभी कहने का कुछ औचित्य है ॥


" चैतन्य मस्तिष्क से गहन विवेचना करते हुवे विषय का अधिकाधिक ज्ञान ग्रहण कर कहे गए कथन सारगर्भित कथन होते हैं....."

राम किसन के देस जहँ, पथ पथ तिनके धाम । 
जातबंत तिन जानिये,जिन हिय बाका नाम ।२४४२। 
भावार्थ : --भारत की भूमि राम-कृष्ण की भूमि के लिए विख्यात है  । जहां के पथ पथ में उनके द्यौहरों से सुशोभित होते हैं ।यहाँ के जातक वे ही हैं जिनके हृदय में इनका नाम निवास करता हो ॥


सुजल सुफल सस स्यामलि, रहि ड्रम दल सों पीन । 
सो भुइ दीन हीन होत,भई कल के अधीन ।२४४३। 
भावार्थ :-जो भूमि कभी सुजलम् थी सुफलम् थी सस्य श्यामलम् थी द्रुम दलों  से परिपूर्ण थी ।वह आज  अधीन दीन हीन होकर यन्त्र-तंत्र-संयंत्र के अधीन हो चली है

 अब तो संसद में वन्दे-फंदे गाने बंद कर देने चाहिए..... हाँ अधिनायक- तंत्र का जयघोष अनवरत होता रहे.....

पहिले सब फल फुरित रहे,पूर रहे भरपूर । 
अजहुँ रसन की का कहैं,भए  दरसन सहुँ दूर ।२४४४।
भावार्थ : -- पहिले यह धरती सब प्रक़र से फली भूत होकर रसीले खाद्यानों से भरी पूरी थी । अधुनातन स्वाद की तो क्या कहें फल  दर्शनों से भी दूर हो गए हैं । अब अन्न की बारी है..... भारत जैसे कृषिपरधन देश में तोले में मिला करेंगे ये कण.....

अर्थ पति हुँत सबहि अर्थ,होहि सुगम सब भोग । 
देस ऐसी प्रधानता,नहीं केहि के जोग ।२४४५ । 
भावार्थ : --जहाँ अर्थ पतियों के हेतु ही अर्थ का प्रबंधन हो,सभी भोग वस्तुएं उनके ही निमित्त हो । ऐसा अर्थ प्रधान देश किसी का भी कल्याण नहीं करता ॥

रखिया एहि हुँत राखिया, राख रखावै खेत । 
छिपे छिपे खाईं रहा, चेति सकै तो चेत ।२४४६। 
भावार्थ : -- स्वामी ने रक्षक इस हेतु रखे थे कि वह खेतों की रखवाली करे । किन्तु जब रक्षक ही भक्षक हो जाए और छिप छिप कर उपज क्या पूरा खेत ही खाने लगे तब स्वामी को सावधान हो जाना चाहिए । उस भक्षक को डंडे से पीट पीट के भगा देना चाहिए ॥

>> जिस गुप्त रीति से संसद में जनहित के विरुद्ध नियम रचे जा रहे हैं उसी गुप्त रीति से कभी संविधान रचा गया था इस हेतु कि भारत का अस्तीत्व ही समाप्त हो जाए और यहाँ उपनिवेशी आ आकर बसें.....

चाकर करे न चाकरी, राजा करे न काम । 
रखिया को रखिया रखे, न्याय करे बिश्राम ।२४४७। 
भावार्थ : -- सेवक सेवा नहीं करते, राजा कोई कार्य नहीं करता । रक्षकों ने अपनी रक्षा के लिए रक्षक रख रखे हैं,  न्याय यहाँ विश्राम की मुद्रा में है, अत: सावधान हो जाओ ॥

पहिले सुसंग किए रहे, सबहि कर्म गति रीति  । 
अजहुँ कुदास के संगत, चरे कुपथ सब नीति ।२४४८। 
भावार्थ :-- पहले सु का संग किए सभी कर्म सुक्रम सभी गति सुगति व् सभी रीत सुरीति होती थी ।अधुनातन  कु-सेवकों का संग  प्राप्त कर सभी गति कर्म नीतियां-रीतियाँ दुराचरण अनुशरण कर रही हैं ॥







रविवार, 8 मार्च 2015

----- ॥ दोहा-दशम २४३ ॥ -----

ऊँगरी भर का देहरा, सौक हाथ के ढाँक ।
नयन दुआरी हाँक सब पाप रहे हैं झाँक ।२४३१ । 
भावार्थ : -- ऊँगली भर की देह है और सौ हाथ का छादन है । नयन की दुआरी ऐसी है जहाँ से सारे पाप झांकते हुवे कहते हैं तथापि तू निर्वस्त्र है ।।

नीचै रत्नाकर कहैं, ऊँटत मनि घन माल ।
कृपा करें कृपाल कहैं, न तरु कहेब ब्याल  ।२४३२। 
भावार्थ : --  नीचे रहे तो रत्नाकर कहलाए ऊपर उठे तो घन की मणि धारी  मालाएं कहलाए गए  ।  कृपा करे तो कृपालू कहलाए दुष्टता करे तो रावण के जैसे ब्याल कहलाए ।।

अपने अपने मान सब चढ़ै फिरैं बैमान । 
केतक बर निबास रहें, मरे एकै समसान ।२४३३। 
भावार्थ : -- अपने अपने घमंड में सब अपने मन के विमानों में चढ़े फिरते हैं । जीते जी के ही ये धौलहरे हैं मरने के लिए तो सबको श्मसान में ही आना पड़ता है ॥ फिर क्या होता है ? यही तो सस्पेंस है ॥

नयन लगे अँधियार है नयन जगे उजियार  । 
एकै पलक की देर मैं, बदले देह अकार ।२४३४। 
भावार्थ : -- निद्रा के भवन में अँधकार का निवास होता है जागृति की कुटिया प्रकाश की वसति होती है । क्षण मात्र में ही इस शरीर की आकृति दूसरी हो जाती है । प्राण गए शरीर फूंका गया पता चला वे प्राण सर्प के शरीर को प्राप्त हो गए क्यों हो गए क्योंकि पूर्व में उस प्राणी का स्वभाव ऐसा ही था ।

जाकी रही भावना जैसी,  प्रभु मूरत देखि तिन तैसी ।।

थोड़े का सुख छोड़ के रहे बहुंत को जोड़ । 
छोड़ छोड़ को जोड़िये जोड़ जोड़ को छोड़ ।२४३५। 
भावार्थ : - किंचित के सुख का त्याग कर अधिकाधिक के संचय में संलग्न मनुष्य को चाहिए कि वह संचयन की प्रवृति का त्याग कर त्याग की प्रवृत्ति का संचयन करे ॥

बलहीन को जहँ बल नहि , दीनन को नहि ठौर । 
अस कलि  कल का कीजिये, जो कलि के सिरमौर ।२४३६। 
भावार्थ : -- बलहीन को जहाँ बल नहीं मिले दुर्दशा ग्रस्त को शरण न मिले ।  ऐसे अजीर्ण यन्त्र-तंत्र-संयत्र का क्या करेंगे जो कलुषता का सिरमौर हो ॥

प्रारब्ध सबहि हुँत रचे, सबके भाग बँधाए । 
कलुष कलि के कलाकार, लूट लूट कर खाए ।२४३७। 
भावार्थ : -- कल्पकार ने सभी प्रकार की भोग वस्तुओं की रचना कर कर्म अनुसार भाग्य में लिखा । कलुषित यन्त्र-तंत्र -संयंत्र के कलाविद उसे लूट लूट कर खा रहे है,  इनके कुकर्मों से कलि काल और अधिक कलुषित हो रहा है ॥

विलास जोअनि जोग सों जीवन होत सुपास। 
प्रगति के परिभाष में ए   बिकास है कि बिनास ।२४३८। 
भावार्थ :--विलसित सामग्रियों के संचयन से जीवन सुखमय होता है । प्रगति की परिभाषा के अंतर्गत यह विकास की परिभाषा है कि विनाश की ॥

विकास  : -- "वृद्धि हेतु चराचर जगत की रूप-आकृति आदि में निरंतर कल्याणकारी परिवर्तन ही विकास है....."
                   जो हो रहा है वह विकास नहीं विलास है विलास, विनाश का कारण होता है.....

अग जग लग के लब्धि लिए, सो तो दुःख की खान । 
थोरहि मैं सुख सिद्ध किए, होत सोइ सुखबान ।२४३९। 
भावार्थ : - जो संसार भर के ऐश्वर्य से युक्त है अथवा उसकी कामना करता है वह दुखों का भंडार होता है । किंचित में जो अधिकाधिक सुख सिद्ध करता हो उसी का संसार सुखी होता है ॥

सुखासुख नहीं होउना,दुःख पर दुःख बहु होइ ।
दुःख मैं सुख का बास है हेर सकै जो कोइ ।२४४०।
भावार्थ :-- सुख पर सुख होना नहीं है दुःख पर दुःख बहुंत होंगे । यदि कोई अनुभव करने में समर्थ हो तो उसे दुःख में भी सुख की अनुभूति होगी ॥

 मेरे पास एक ही संयंत्र है उस अरब पति के पास तो दो दो हैं, पर उस लखपति को तो देखो फटीचर कहीं का.....एक है तो क्या हुवा जब प्रधान मंत्री बनूँगा तो दस बीस हो जाएंगे.....सुख पर सुख.....

शुक्रवार, 6 मार्च 2015

----- मिनिस्टर राजू १६३ ----

राजू : - मास्टर जी! आप होली नहीं खेले..?

'नहीं'
राजू : -- क्यों मासटर जी !

'मेरे पास पुराने कपडे नहीं थे.....'

गुरुवार, 5 मार्च 2015

----- ॥ दोहा-दशम २४२॥ -----

पाउँ पसारे परबती पाहन की एहि जात । 
सिखर जुगत को जुग लगे,होवै पलक निपात । २४२१ । 

भावार्थ :- पद प्रस्तारे पर्वतीय पाषाण -खंड की यही नियति है । नगमूर्धन् कहलाने में उसे युग लग जाते हैं , नगण्य कहलाने में क्षण भर का समय लगता है ॥  

अधमतस सों नगसिख लग, लख चौरासी जोनि । 
उठे त नगसिख जोइये,गिरे अधमतस होनि ।२४२२। 

भावार्थ : -- सूक्ष्म से स्थूल तक जीवों की कुल चौरासी लाख प्रजातियों हैं । यदि कोई जीव उठता है तो अंतत: मनुष्य के शरीर को प्राप्त होता है और यदि किसी मनुष्य का पतन होता है तब वह पुनश्च  अधमतस प्रजाति को प्राप्त हो जाता है ॥ 

न पछौहित ही किछु होहि, न अगौहित किछु होहि । 
अस समझे जो बावरा, अधुनें जन्महु खोहि ।२४२३। 

भावार्थ : -- न तो पीछे ही कुछ था न आगे कुछ होगा । जो यह समझता है, वह भ्रमित होकर अपने इस जनम को भी नष्ट कर रहा है  ॥ 

गन सो गरब न कीजिये, गुन सों कीजिए हेत ।
केतक गौरब मारि गए, एकै गुनी कर सेत ।२४२४। 
भावार्थ : -- गुण पर गर्व करना चाहिए गण पर नहीं । गण पर गर्व करने वाले जाने कितने गौरव एक गुणी के हाथों मारे गए ॥

यह तन छिनु भंगुर भवन, भीत बसे भव भीति । 
कारन नेकानेक किए, मरन केर एक रीति ।२४२५। 
भावार्थ : -- क्षण भंगुर देह रूपी भवन के भीतर जीवन-मरण का भय बसा है ।  कारण तो अनेकनेक हैं किन्तु मृत्य की रीति एक ही है अर्थात स्वांस समाप्त होने से ही मृत्यु होनी है ॥

मरन रीत सब जानिहै, कारण जान न कोइ । 
कारन को जो जान गए, तिन मरन भए न होइ ।२४२६ । 
भावार्थ : - मरण की रीत को तो सभी जानते हैं किन्तु कारण का ज्ञान किसी को नहीं है । जिसे कारण का ज्ञान हो गया उसे फिर मृत्यु का भय नहीं होता ॥

यह भव सिंधु समान है, जीवन सम जलजान ।
मोचन ही सद मरन है, परमधाम समसान ।२४२७। 
भावार्थ : - यह संसार सागर के सदृश्य है जीवन यहाँ जलयान है । जीवन-मरण से मुक्ति ही यहाँ मृत्यु है परम धाम ही पितृ उद्यान है ॥

मानस तन तेतक बढ़े जेतक बाक़ी बाड़ । 
बढ़ती अमरै बेलरी, देइ मूल को छाँड़ ।२४२८।
मनुष्य को उतना बढ़ना चाहिए जितना उसका घेर है । बढ़ती अमर बेल जिस प्रकार अपने मूल को छोड़ देती है उसी प्रकार अन्य के घेरे में बढ़ते मनुष्य से उसका मूल छूटता जाता है ॥

बढ़नी गुन सों हारि गए चढ़नी गन सों हारि।
गन को  नेम नियंत सों, होत सकल गुनकारि ।२४२९
भावार्थ : -- मात्रा से गुणवत्ता तिरष्कृत होती है गुणवत्ता से मात्रा तिरष्कृत होती है । यदि मात्रा को नियमों से नियंत्रित किया जाए तो गुणवत्ता परिष्कृत होती है ॥

अलप जोइ बहुतारथी बहु अल्पारथ जोइ । 
अर्नब अरन अधमहि रहँ, अर्ना पूरन होइ ।२४३०। 
भावार्थ : -- अधिक वस्तु किंचित, किंचित वस्तु अधिक अर्थ देनेवाली होती है । जिस प्रकार सरिता-पति  का जल किंचित ही उपयोगी होता है किन्तु सरिता का जल पूर्णतस उपयोगी होता है ॥









----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...