बिरते को सब जानिहैं, होनिहार को जान ।
अजहुँ त जिउता जागता, होहि पलक अवसान ।२४८१ ।
भावार्थ : --अतीत से तो सभी परिचित हैं भावी काल किसने जाना है । अधुनातन तू जीवित है सतेज है । यह भी संभावित है कि आनेवाला क्षण तेरी इह -लीला समाप्त कर दे ॥
जग मह बहुतक पथ परे, चाहे कतहुँ पयान ।
तीन लोक लए भाँवरे,पहुंचे सब समसान ।२४८२।
भावार्थ : -- संसार में पंथ ही पंथ हैं चाहे कोई कहीं गमन करे । चाहे आकाश पृथ्वी पाताल का भ्रमण क्यों न कर ले अंत में सबको श्मशान ही आना पड़ता है ।
काल के तन तीनि बदन, भावी भूत भवंत ।
चित मैं वाके सिमरनी , रह जीवन पर्जंत ।२४८३।
भावार्थ : --समय की देह वर्तमान भूत भविष्य रूपी त्रयी आनन से युक्त है ।यह सदैव स्मरण रहना चाहिए ॥
एक सूर एकहि चन्द्रमा एकै बिसम्भरि होइ ।
बिलग दिसा पंथ सहुँ भए बिलग बिलग सब कोइ ।२४८४।
भावार्थ ?: --यद्यपि एक ही सूर्य है, एक ही चन्द्रमा है भरण पोषण करने वाली यह धरा भी एक ही है । विपरीत दिशा व् पंथ में गमन के कारण पथिकों में भिन्नता है॥
पंथ गहै को औरहीं, दिसा गहै को और ।
ऐसेउ सरन चरनन्हि, पावै न कोउ पौर।२४८५।
भावार्थ : -- जब दिशा कोई और है और पंथ कोई और । तब ऐसे पथिक के गतिमान चरण लक्ष्य को प्राप्त नहीं होते ॥
आगे डीठ धराए के पाछे देख निहार ।२४८६।
बिरते के सुधारी करत आगे करम सँभार ।
भावार्थ :-- मनुष्य को चाहिए कि वह भविष्य का आलोकन व् अतीत का अवलोकन करे, वह भूत काल की त्रुटियों को सुधार कर अपने भविष्य पर ध्यान केंद्रित रखें ॥
अपने जवान चरन के मतै करौ अभिमान ।
जहँ नबल नवान अहैं,होइहि काल पुरान ।२४८७।
भावार्थ : - अपने यवान (वेगवान) चरणों का अभिमान नहीं करना चाहिए । जैसे अधुनातन के नवयुवा कल के वृद्ध होंगे वैसे ही वर्त्तमान की युवा समृद्धि कल वृद्धावस्था को प्राप्त होगी ॥
कोऊ पंथ पुरान है कोऊ यहाँ नवांन ।
सबकी अपनी बानि है सबकी अपनी बान ।२४८९।
भावार्थ : -- यह जीवन की यात्रा है यहाँ कोई पथ नवीन तो कोई प्राचीन है । सबकी अपनी वेश-भूषा है व् अपनी ही भाषा है ॥
पंथी पंथ नवान के गर्ता गर्त अजान ।
कहँ अँधेर कहाँ फेर हैं,चरत न होत ग्यान ।२४९०।
भावार्थ : -- हे पथिक नवल पंथ में कहाँ अँधेरा छाएगा कहाँ घन फेरा आएगा नवलपंथ के यवान को इसका संज्ञान नहीं होता और न ही कंदराओं व् खड्डों का पूर्वाभास होता ।।
पुरान पंथ के पंथी, जानिहि हेरिहि फेर ।
गरत गहबर गहराई , लए सब फेरिहि हेर ।२४९१।
भावार्थ : -- यह सर्वविदित है कि वारंवार आवगमन से पुराने पथों के पथिक को पथ की दूरी, विभेदों, विनिमय तिर्यकता तथा उसके घाटों व् घुमावों का गहरा ज्ञान होता है, जीवन संचालक यदि कुशल हो तो यात्रा मंगलमय होती है ॥
चरन संचरन दीजिए, कर सों कीजिए काम ।
भगता मुख सोंहि लीजिए , रमारमन के नाम ।२४९२।
भावार्थ : -- चरणों संचरण करते रहें युगल कर सत्कार्य करते रहें । हे पथिक मुख से ईश्वर को भजते हुवे यात्रा करनी चाहिए, इस उपाय से चित्त एकाग्र होता है ॥
जन्माए तो सबहि हँसे, जनम जाए सब रोएँ ।
आए कहाँ सों गए कहाँ, पूछे ना पुनि कोए ।२४९३।
भावार्थ : -- संसार में आते हुवे को सभी हँसते हैं और जते हुवे को रोते हैं । आया तो कोई कहाँ से आया गया तो कोई कहाँ गया यह कोई नहीं पूछता ॥
गगन जल अगन पवन सन जीवन धन जो खेह ।
देह ही बाहि रूप है सबते बर मनु देह ।२४९४।
भावार्थ : -- यदि वायु पृथ्वी अग्नि जल आकाश यदि ईंधन है जीवात्मा चालक है शरीर वाहन है तो सबसे उत्तम वाहन मानव शरीर है ॥ जीव निरंतर इस मानव-शरीर को प्राप्त करने के प्रयास में रहता है मनुष्य को चाहिए कि वह इस जीवन चक्र पथ से मुक्ति प्राप्त करने हेतु प्रयासरत रहे ॥
मानव दिसा ग्यान के, करे पंथ अनुहार ।
सेष जीउ का जीउना, तासू करम अधार ।२४९५।
भावार्थ : -- मानव दिशा का संज्ञान कर फिर पंथ का अनुशरण करता है । पशु-पक्षी नहीं करते इनका जीवन उसके ही के कर्मों पर आधारित होता है ॥ मानव के चरणों में इतना ताप होता है कि यदि वह किसी निर्जन स्थान से चले तो वहां पगडंडियाँ उत्कीर्ण हो जाती हैं पशु चलें तो नहीं होती ॥
पथ पधारन हेर फिरे , पद हेरएँ बन खेत ।
जौनी केतक होउनी, चाहिए जीवन जेत ।२४९६।
भावार्थ : -- अधुनातन पथ हैं कि चरणों को ढूंढ़ते फिर रहे हैं चरण है कि वन धन धान्य को ढूंढने लगे हैं ॥साधन कितने होने चाहिए है जितने कि जीवन हेतु आवश्यक हों ॥
धर्म के कुल चार चरन, जोइ चले तिन संग ।
मग मग मेलिहि तीर्था पग पग मेलिहि गंग ।२४९७।
भावार्थ : -- धर्म के कुल चार आचरणहोते हैं ( सत्य, शौच, दया, दान ) जो पथिक इन आचरणो का संग किए संचलित होता है उसे पथ पथ पर तीर्थ व् चरण चरण पर गंगा मिलती है ॥
सुचित संग सुरसरित है, दान संग सब धाम ।
दया संग जग हरित है, सत्य संग हरि नाम ।२४९५।
भावार्थ :-- शौच से गंगा का, दान से तीर्थों का, दया से सुख-शांति का और सत्य से ईश्वर का प्रागट्य है ॥
दया प्रकृति की परम रक्षक है.....
जबलग यह घट घटक रहँ, यह पुर यह हट बाट ।
बहुरि घाट लगाई दिए, बाँध काठ की खाट ।२४९६।
भावार्थ : -- दैहिक संघटक जब तक संघटित रहते हैं, यह पुर पट्टन यह पंथ तब तक ही हैं । जब यह विघटित हो जाते हैं तब मृतप्राय देह तट के आश्रित हो जाती है ॥
यह भव सिंधु सरूप है , जनम मरन दुहु कूल ।
पाप डुबावनि पाहना, पुन नौका के तूल ।२४९७।
भावार्थ : -- यह संसार एक सिंधु है, जन्म एवं मरण इसके दो तट हैं । पाप का भार डुबोने वाला पाषाण है वारम्वार जन्म व् मरण क कारन यह पाप ही है । चौरासी लाख काया से यह जीव जगत रचा गया है । यह आवश्यक नहीं है की वारंवार मनुष्य की काय ही प्राप्त हो । पुण्य वह जलयान जो काया को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति प्रदान करता है ॥
मोक्ष ही वास्तविक मरण है अन्यथा तुम जीवित हो..... कहाँ हो कैसे हो.....मरने के बाद कोई नहीं पूछता..... इसलिए कहते हैं यहाँ देओगे तो वहां पाओगे.....यहां भोगोगे वहां भुक्तोगे.....
यहाँ भोगए तहँ भुगतें,यहाँ दाए तहँ पाए ।
मरनि परे को जाए कहँ , जहां करम लए जाए ।२४९८।
भावार्थ : -- यहां भोगोगे तो वहां भुक्तोगे,यहां देओगे तो वहां पाओगे । मृत्यु के पश्चात कोई कहाँ जाता है ? जहाँ कर्म ले जाते हैं ॥
एक करम जग सीत करै दूज भरै संताप ।
एक के नाउ धरम धरे, दूजे धराए पाप ।२४९९।
भावार्थ :--एक कर्म संसार को सुख देता है दूसरा दुख ।जो सुख देता है वह कर्म पुण्य जो दुःख देता है वह कर्म पाप है ॥
पाप धर्म आधीन कभु धर्म पाप आधीन ।
स्वामि कीन्हनि जानिए , जामें जग लवलीन ।२५०० ।
भावार्थ :--कभी पाप धर्म के तो कभी धर्म पाप के अधीन होता है । जिसमें संसार तन्मय हो वह स्वामी होता है ॥ अर्थात मनुष्य की संलग्नता जब पाप में हो जाती है तब धर्म दास हो जाता है जब पुण्य में हो जाती ही तब पाप दास हो जाता है ।।
हरियारी करियाए के करियारी हरियाए ।
हरिहरि सबहि रसाबरी ,रसरी संग दूराए ।२४७५ ।