सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३३ ॥ -----

काले काले मोतिया धौली धौली सीप । 
एक मुख बासित औषधी, दूजे देस अधीप ।२३३१। 

उत्तर : - तीक्ष्ण- गंधा, नेताजी धौला बाहर में काला अंतर

जनम झुलाए पालना, बहुरि पलन  पौड़ाए । 
बिरधा बए दए लाकुटी, मरे त चिता चिनाए ।२३३२। 
उत्तर = लकड़ी

ग्यान  थाना आपने सीख आपने थान । 
सीखे सो बनिहार भए, ग्यानि बने किसान ।२३३३ । 
भावार्थ : -- शिक्षा एवं ज्ञान का अपना अपना महत्व है, शिक्षा से ज्ञान अधिक महत्वपूर्ण होता है । शिक्षित  परिश्रम कर श्रमिक बनता है ज्ञानी खलिहान का स्वामी होकर किसान बनता है ॥

बनिहारी किए खन धरे, जोई बनै किसान ।
खलिहान मोल जान के, खन दए आदर मान।२३३४।
 भावार्थ : -- परिश्रम करते हुवे जो कोई श्रमिक खलिहान का स्वामी बनता है, वही अन्न का माहत्म्य संज्ञान कर खेतों का आदर करता है ।।

सेबक  सों स्वामि बने मरत बने अरु कोए । 
कारे कारे करम किए, मुए हुँत पाप सँजोए ।२३३४। 

भावार्थ : - सेवक से स्वामी बने हुवे व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसके स्वामित्व  हस्तांतरित जब किसी अन्य को होता है वह उसके श्रमफल व् कर्म भूमि का आदर न  कर काले कुकर्म करता है उस मरे हुवे स्वामी के लेखा में पाप ही लिखता है । एतेव श्रमिक से कोई स्वामी बने तो वह सेवक ही बना रहे

स्पष्टीकरण : -- शिक्षा हस्तांतरणीय नहीं होती ज्ञान हस्तांतरणीय होता है ।जैसे : --  चिंकित्सक की संतान चिकित्सक नहीं कहलाती उपचार करना उसे आ ही जाता है ॥ उसी प्रकार सेवा धर्म हस्तांतरणीय नहीं होता किन्तु स्वामित्व हस्तांतरणीय होता है ।।

बाँधन ते जो भल होए,बिनु बाँधे खल होइ । 
ताते बाँधन ही भलो, बाँध सकै जो कोइ ।२३३५। 
भावार्थ  : -- यदि कोई बाँधने से नायक बन जाता है वह बिना बाँधे खलनायक बन जाता  है । जो कोई बांधने में समर्थ हो तो ऐसे को बाँधना ही अच्छा । अब  तो इस खलनायक से कोई नायक ही निपटेगा ओर नायक बनने के लिए बंधना तो पड़ेगा ॥ 

बुरे काल का बिहुरना,बुरे काल का साथ । 
सीस ऊपर होत भलो सदा बड़े का हाथ ।२३३६ । 
भावार्थ :-- बुरे दिनों का व्यतीत होना, बुरे दिनों  के साथी सदैव अच्छे होते हैं , सिर पर बड़ों की छाया सदैव सुखदाई होते है ॥ 

भले काल का बिहुरना भले काल का साथ । 
सीस ऊपर होत सदा बुरा बुरे का हाथ ।२३३७ । 
भावार्थ : -- अच्छे दिनों का  लौटना, अच्छे दिनों के साथी सदैव बुरे होते हैं , सिर पर बुरों का हाथ सदैव बुरा होता है ॥

जुलाहे का तीर हो कि चाहे जुलाहि दाड़ि । 
लाह  लखे तो  राख लिए, लाह लखे दिए छाँड़ि ।२३३८। 
भावार्थ : --झूठे वचन के तीर हों चाहे बिना मूँछ वाली दाड़ी अवसर देखकर ही रखे व् छोड़े जाते हैं ॥ जहाँ रखने में लाभ दिखा वहां रख लिए जहाँ छोड़ने में लाभ दिखा वहां छोड़ दिए ॥

जो को कोउ दोष करै बाँध परै पछिताए । 
काल अंतर छूट चले,सो तो दोषी नाए । २३३९। 
भावार्थ  = यदि कोई अपराधी किए गए अपराध का नियमपूर्वक दंड भुगत कर उसका पश्चाताप करता है ॥ कालांतर में जब मुक्त हो जाए व् किए गए अपराध  की पुनरावृत्ति न करे तब वह अपराधी नहीं कहलाता ॥ 

धुनुरु कर मैं गहे रहे, छूट लगे उर बान । 
न्यायतस दोष धरन मैं, दोनउ एकै समान ।२३४० । 
भावार्थ : -- धनुष कर में ही ग्रहीत रहता है यद्यपि वाण ही ह्रदय का भेदन करता है ॥ न्याय की दृष्टि में धनुष व् वाण  दोनों ही दोषी होते हैं ।।  







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