शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३२ ॥ -----

चढ़ सिंहासन सासन धर, बने चहैं सब कोइ । 
जोई सेबक पद गहै सोइ सराहनि  होइ  ।२३२१। 
भावार्थ : -- सिंहासन चढ़ के सभी शासक बनना चाहते हैं । जो कोई सेवक पद ग्रहण करे वह  प्रशंसा के योग्य होता है॥

>>  स्वयं को अनुशासित करने के लिए शासक का चयन करना चाहिए राज करने के लिए नहीं
>> जिसे स्वयं को अनुशासन की आवश्यकता है वह क्या शासन करेगा.....

दुर्नय नीति दुरभृति सों भारत भए अस देस । 
सासन सीस निजोग के, गुरु को दें आदेस ।२३२२। 
भावार्थ : -  भारत ऐसा देश हो चला है जहां अनुचित  उद्दंड, नीति विरुद्ध आचरण को वरन कर शासन यथोचित रीति से आदेश का पालन न करने वाले व्  शिक्षा देने योग्य शिष्य को उच्च पदों पर नियुक्त करते हैं जो अपने गुरुओं को आदेश  देते हैं ॥

जैसे प्रेमी प्रियतमा, तैसी प्रीति प्रतीति । 
जैसे नेमी नियंता, तैसी नियमन नीति ।२३२३ । 
भावार्थ : - पिया व प्रिया जैसे होंगे प्रीति व् प्रतीति भी वैसी ही होगी । जैसे नियम के पालन कर्ता व् नियंता होंगे उनकी  नियम नीतियां भी वैसे ही होंगी ॥

भैंस आगे बीन बजे भैंस खड़ी पगुराय । 
बिहुरि बूझता आपनी,मूरख जो समुझाए ।२३२४ । 
भावार्थ : --भैंस के आगे बीन बज रही है और भैंस को खाने मने की जुगाली करने से विश्राम नहीं । मूर्खों को समझाने से अपनी भी समझ चली जाती है ॥

राउ धानी ढके रहे, पहन पंच परिधान । 
पुर पुरा के पिंजरा, भयौ बिनहि ओहान ।२३२५ । 
भावार्थ : -- राज धानी बहुमूल्य परिधान आभरित किए है । छोटे छोटे गाँव खेड़े  को तन ढँकने के लिए भी वस्त्र नहीं हैं ॥

पाल पलक पँच तोरिया, पहिरै देइ उतार । 
पौरिक बिनही पौरिया, भयऊ बिनहि उहार ।२३२६। 
भावार्थ : - प्रजापाल बहुमूल्य परिधान आभरित कर उसे क्षणभर में ही त्याग देते हैं । प्रजा को न तो सिर ढकने के लिए छप्पर है न ही तन ढंकने के लिए वस्त्र हैं ॥

सद मुखिआ पँच तोरिया, कुल हित हेतु उहारि । 
कुलहित हेतु धराए रहि, कुलहित हेतु उतारि ।२३२७ । 
भावार्थ : - सद मुखिया कुल के कल्याण हेतु ही उत्तम परिधान धारण करता है,कुल के कल्याण हेतु ही धृत करता है  कुल के कल्याण हेतु ही उसे धारित किए रहता है कुल के कल्याण हेतु ही उसका त्याग करता है ॥

पालक जनधन जोइ के, खाए पाक पकवान । 
प्रजा खेह खन खोइ के, बिलखे बाट बुआन ।२३२८ । 
भावार्थ : -शासक जनता के धन से पकवान उड़ाए है । जनता अपने खेत खंड गँवा के बोवनी की प्रतीक्षा में है कब अन्न हो कब वह पके कब उदर की पूर्ति हो ॥

पदासीत् उंचे पदक, बारहहि घरी जोए । 
चारि खेले चारि खाए, चारि सयन मैं खोए ।२३२९। 
भावार्थ : - बारह घड़ी संग्रह  किए ऊँचे पद के अधीश बने अर्थात उत्तम योनि को प्राप्त हुवे । चार घडी खेलने में चार खाने में चार शयन में नष्ट कर दी ॥

होत  अमोघ बान सरिस, बर राजन की बानि । 
मध्यम भेद जानै  नहि, अधम मरमु नहिं  जानि ।२३३०। 
भावार्थ : -- उत्तम राजा की वाणी अमोघ वाण के सदृश्य होती है इसे मर्म/रहस्य का भी ज्ञान होता है व् भेदन/उद्घाटन  का भी ।मध्यम की बाणि साधारण बाण के जैसी होती है उसे मर्म का तो ज्ञान  होता उसे भेदने का ज्ञान नहीं होता,  अधम की वाणी अधम वाण के जैसी होती है उसे न मर्म का भान होता ही न ही भेदन का ।










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