गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

----- मिनिस्टर राजू १६२ -----

राजू : -- मास्टर जी ! यू मत्था पकड़ के क्यूँ बैठे हो ?
" तेरी मास्टरनी को घर का बजट बनाने को दिया था"
राजू : -- मास्टर जी ! फिर इसमे मत्था पकड़ने आली कूण सी बात ही आप तो घना ही कमाते हो..,

" उसने बजट बनाया वो अन्दन वाली दस लखटकिया तो साड़ी पैनूँगी , घर की सफाई सोने की बुहारी ते होगी, पिछले साल तुमने केवल दाल खाई थी अबके तुम नून चावल खाना , मैने पूछा  फिर घर कैसे चलेगा तो वो बोली वो सेंध मारने वाले चोर लुटेरे हैं  न  उनका विज्ञापन बोरड लगवाएंगे जिसपे लिखा होगा अपना घर लुटवा लो, और जो कुछ वो दान दक्षिणा करेंगे उससे घर चल जाएगा । नहीं चला तो घर का आँगन उनको दे देंगे और हाँ जी मैं तो गंगा जल पीउंगी तुम्हारी तुम जानो.....

राजू : -- मास्टर जी ! झाड़ू सै सीक तो टूटेगी ही..,

" वो उसके भाई-बंधू के होंगे" 

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