बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३१॥ -----,

सासन धर बिभाजन कर ऐसी रीत चलाए । 
भीतरी बहरियाए के, बाहरी भीतराए ।२३११। 
भावार्थ : -- सत्ता धारकों ने दश का विभाजन कर ऐसी रीत चलाई कि घर वाले बाहर हो गए बाहर वाले घरवाले हो गए ॥ ये कौन सा चारा है ?

जनक कहै जिन जानकी, जाके राम पियाए । 
संविधान सन्मान दिए, जो को  लेइ भगाए ।२३१२। 
भावार्थ : -- जनक जिसे जानकी कहते हैं जिसका पिया राम ही हो । ऐसी कन्याओं को यदि कोई भीतरी-बाहरी भगा कर ले जाए तो भारत का संविधान उसे पुरष्कृत करता है ॥

संकीर्ण विचार धारा के कुछ लोग सामाजिक व्यवस्था को विकृत करने पर तूले हैं  ये संविधान को माध्यम बना भले घर की बहु बेटियों को चारे के रूप में उपयोग कर सत्ता साधने में लगे हैं.....

 दस लाख को लीख करे रहे सूत के सूत  । 
तासु पहिरे सासन धर  लगे भूत के भूत ।२३१३। 
भावार्थ : --  दस  लाख स्वाहा करके भी कोई वस्त्रखण्ड सूत्रों से ही बने उसे पहन के सत्ता धारी यदि भूत का भूत दिखे,  उससे तो फटा पहनना अच्छा है ॥

जो मुख धनु सरूप भया, भरे सबद के बान । 
तिनके सों रन छेड़िये, जिन जग बैरी जान ।२३१४ । 
भवार्थ : -- यदि  मुख धनुष स्वरूप हो जाए व् उसमें शब्दों के बाण से भरे हों ॥ तब ऐसे धनुर्धर को उसके विरुद्ध युद्ध करना चाहिए जो विश्व कल्याण को विस्मृत कर अपने ही स्वार्थ की पूर्ति में संलग्न हैं ॥

तहँ न्याय के सब्द कहँ, जहँ देखे अन्याय । 
जहँ अन्यान्य अर्थ गहँ, उहँ मुख लिए उरगाएँ ।२३१५। 
भावार्थ : --जहाँ अन्याय संदर्शित हो रहा हो वहां  न्याय पूरित शब्द कहने चाहिए । जहां शब्द अन्यान्य अर्थ ग्रहण किए हों वहां मौन धारण कर लेना चाहिए ॥

करत कबित कलाल करे कबिबर दोई अर्थ । 
परमारथ मदरस लखे  मदिर लखे सुवारथ ।२३१६। 
भावार्थ : -- कविवर ने कविता करते हुवे उभयार्थी  शब्द कीलाल का प्रयोग किया । परमार्थ को वह सुधा दर्शित हुवा स्वार्थ को मदिरा ॥

एक सब्द धाराधर है, उचरे बिनहि बिचार । 
एक अर्थ सों घाट लगे, एक दिए घाट उतार ।२३१७। 
भावार्थ : -- एक शब्द  है धारा धारण करने वाला धाराधर । यदि यह बिना विचार किए उच्चारित हो जाए तो इसके अर्थ का अनर्थ हो जाता है एक अर्थ में नैया घाट से लग जाती है दूसरा अर्थ श्मसान घाट में पहुंचा देता है ॥
अहमिका संग करे जब आपा आगिन होए । 
मातु पिता गुरु तिअ संग, छूटे पिछु सब कोए ।२३१८। 
भावार्थ : -- बढ़ा-बढ़ी की स्पर्द्धा के संग जब 'मैं' आगे आ जाता  है तब मात-पिता गुरु पत्नी बच्चे सहित सब कुछ पीछे छूट जाता है ॥

जब लग राउ राज रजे , तब लग जय जय होइ । 
राउ रहे न राज रहे , पूछे ना फिर कोइ ।२३१९ । 
भावार्थ : -- राजा जब तक राज  करता है तब तक उसकी जय जय कार होती है । जब राजा राजा नहीं रहता राज भी नहीं रहता तब बस खटिया रह जाती है फिर उसको कौन पूछता है ॥

अजहुँ पूज न पेखियअ अपने  देस प्रधान । 
जग लग पूजत पेखिये, अजहुँ लगे बिद्बान ।२३२०। 
भावार्थ : -- विद्यमान समय मे परिस्थियाँ ऐसी हो गई हैं कि राजा अपने देश में ही दुत्कारा जाने लगा है वह पूजित होते दिखाई नहीं देता । किन्तु विद्वान अब भी सर्वत्र पूज्यनीय हैं ॥














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