मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३९ ॥ -----


कर्म चारी काम चहैं, नाम धार कर नाम । 
काम नाम की चाह में दोऊ करें बिश्राम ।२३९१। 
भावार्थ : -- कर्म चारि कार्य चाहता है, अकर्मण्य विहित कर्म न कर केवल कीर्ति चाहता है । स काम और कीर्ति की चाह  में दोनों ही विश्राम कर रहे हैं ॥

स्पष्टीकरण : - नाम धारक यदि कर्मण्यता से ही  कर्मचारी को कार्यशील होगा , अन्यथा दोनों ही विश्राम करेंगे.....

हाल हूला कर हल दिए, धाँधल कर कल दाए । 
दानउ दल कर बल दिए त,  निर्बल कवन सहाए ।२३९२। 
भावार्थ : --  उपद्रवियों के हाथों हल दे दोगे ( जिसका वह हथियार के रूप में उपयोग करेगा ) धूर्तों धंधकों के हाथों में यन्त्र-तंत्र-संयंत्र  दे दोगे।दानवों के हाथों में बल दे दोगे तो निर्बल की सहायता कौन करेगा ॥


कल उपकारी कर धरे हल धारे हल धारि । 
बल बलिहारी कर धरे जल धारे जलधारि ।२३९३।   
भावार्थ : -- कल उपकारी के, हल हलधारी के, बल बलिहारी के जल जलधारी के नियंत्रण में हों ॥

नायक है ना अधिप जहँ , नाय है ना न्याए । 
जन आयसु अवमान किए, जन सासन सो नाए ।२३९४। 
भावार्थ : -- जहां न तो कोई प्रधान  है न राजा है न नीति है न न्याय ही है जहाँ अपने ही नियम हों जहां जनादेश का पालन नहीं होता हो वह शासन जनतंत्र तो कदापि नहीं है,  वह कुछ और ही है ॥

स्पष्टीकरण : -- अंग्रेज  ऐसे ही शासन करते थे, इसे अधिनायक तंत्र कहते है इसका प्रमुख,  अधिनायक कहलाता है ॥

हलजीबी हलभृति चहैं, नवन खंड नव सूति । 
कलजीबी कलि कृति करत चहैं सकल भव भूति ।२३९५। 
भावार्थ : -- हल जीवी पृथ्वी के सभी नव खण्डों को दोहदवती/दुधारू गाय  कर केवल हलभृति की अभिलाषा करता है । कलजीवी कलुषित कल की कलाकृति कर समस्त विभूतियों की लालसा करता है ॥

अजहुँ जन घन बन भयऊ, ब्याल भयो कुचालु  । 
जति रूपी नय नीति को, चाहिये एक कृपालु  ।२३९६। 
भावार्थ : -- अधुनातन जन साधारण  सघन वन का स्वरूप धारण किए है व् निज स्वार्थ हेतु बुरी बुरी चाल चलने वाले हिंसक पशु हो गए हैं । सद नीति नियम रूपी सन्यासियों को अब एक कृपा निधान भगवान  की आवश्यकता है ॥

कृपानिधि कर कृपन चहै, कृपनी चहै कृपालु । 
कलुष कला के काल कर कुचालि चहै कुचालु ।२३९७। 
भावार्थ : -- कृपा निधि कृपणता करते है । दीन दुखी कृपा के सिंधु का अभिकांक्षी है  । काल को कलुषित कल की कलाओं का काल कर कदाचरणी कदाचरण का अभिकांक्षी है ॥

बल पौरुख अतिचार किए ,निर्बल कवन सहाए । 
बिहुरे बिहग के सौंमुह, जूह सदा जय पाए ।२३९८। 
भावार्थ : --  अनुचित बल यदि अत्याचार करे तो निर्बल का सहायक कौन हो । एकाकी पक्षी के सम्मुख एकता किए हुवे  पक्षी का समूह सदैव विजित होता हैं ।अत: बल पुरुष के सम्मुख निर्बल को एक हो जाना चाहिए ॥

तहाँ न सम्पद आपनी जहाँ न राजा होइ । 
सकासी के सम्मति लए ले जावै जो कोइ ।२३९९ । 
भावार्थ : -- जहाँ राजा नहीं होता वहां अपनी संपत्ति अपनी नहीं होती । हमारे देश में भी शासक नहीं है कुशासक ही उर उसने यह नियम बनाया है कि  ७०% अड़ोसी-पड़ोसी की सम्मति लेकर निर्बल की सम्पति को जो चाहे वो ले जाए ।

और ये दस लखिया सूत वाले महाराज कहते हैं नहीं पड़ोसियों से भी पूछना ज़ुरूरी नहीं है ॥
उठा लो !!!

एक बात तो बताइये : -- लकवा मारने पर (पक्ष का आघात )  कोई खटिया पकड़ता है कि खटिया पकड़ लिए इस लिए लकवा मारता है ।

सेबक के सेबाभिरत, स्वामि नावै सीस । 
कोटि कोटि गनमान पर सासन किए दस बीस ।२४००। 
भावार्थ : --  सेवक की स्वामी ही शीश झुका कर सेवा टहल कर रहा है । जो स्वयं अनुशासित नहीं हैं वे  दस बीस लोग ही करोड़ों गणमान्य जनों पर शासन का रहे हैं ॥



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