शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३८ ॥ -----

दया धर्म का मूल है दान पात फल फूल । 
सारे सो सत सार है, तारे सो तप तूल ।२३८१ -क । 
भावार्थ : --धर्म रूपी वृक्ष का मूल दया (प्राणी मात्र पर ) है जहाँ दया न हो वह धर्म नहीं है ।उसके पत्र फल एवं फूल दान हैं,वृक्ष के द्वारा ग्रहण किया गया सार सत्य रूपी सार है । अपने उपासकों का नाव बनकर उद्धार करने वाली लकड़ी तप है ॥ 

 बढे तो बड़ तूल बढ़े, अपने मूल नुकूल । 
सबहि भाँति सब हुँत सुखद, पलए फलए बिनु फूल ।२३८१ -ख । 
भावार्थ : --उस अधर्म रूपी वृक्ष को वट वृक्ष के जैसे अपने मूल के अनुकूल ही बढ़ना चाहिए वह अपने मूल को न भूले । जो सभी प्रकार से सभी के लिए सुखप्रद हो, जो बिना अभिमान के फले फूले ॥

हे रे मानो मरि गयो,रोई दुनिआ सारि । 
पसु बसन सन जनम लियो, मारे बारहि बारि ।२३८२। 
भावार्थ : --हाय रे ! आतंकवदियों ने मानुष मार दिए, सारी दुनिया रोने बैठ गई ॥ वही मानुष पशु के वस्त्र धारण कर वारंवार जन्म लेता है रोने वाले ही उसे वारंवार मारते हैं ॥

 आतंकवदियों ने तो उसे एक ही बार मारा, वारम्वार उसे किसने मारा.....?

भई अजहुँ सब ते अधम, जे मानस की जात । 
कुकरनी संग आपनी,सब खून करे असाँति ।२३८३। 
भावार्थ : -- अधुनातन यह मानुष जाति सबसे नीच जात हो गई है । जो अपनी कुकरनी के संग चारों ओर आतंक मचाए हैं ॥

एक कूल जनम एक मरनि, परे बीच में जीउ । 
जोड़ जुगत लगाई में, भूरे अपनी सीउ ।२३८४। 
भावार्थ : -- एक तट पर जन्म तो दूसरे तट पर मृत्यु है मध्य में यह जीव जगत है ॥ जो अपने योग की युक्ति को युक्त करने में ( अर्थात जीविका के संघर्ष में ) तट को विस्मृत किए मझधार में ही विचरण कर रहा है ॥


उपकारै उपकार है, अपकारै अपकार । 
जग सोंह सोइ पाइये,किए जोइ ब्यौहार ।२३८५। 
भावार्थ : -- हम जैसा व्यवहार  करेंगे संसार भी हमसे वैसा ही व्यवहार करेगा ।  हम  मंगल करेंगे तो यह हमारा मंगल करेगा हम अमंगल करेंगे तो यह भी अमंगल ही करेगा ॥

तू जग सोहि कठोर है, जग तुझ सोहि कठोर । 
जो तू पौरै पौर है, तो जे अपने ठोर ।२३८६। 
भावार्थ : -यदि तुम निष्ठुर हो  कट्टर हो तो यह संसार तुमसे अधिक निष्ठुर और कट्टर है । तुम जन्म-मरण के चक्र में बंधकर दस ठिकाने बदलते है  यह सदैव अपने ठोर पर रहता है,  आज तुमने जिसकी जो दशा की कल  यह तुम्हारी वही करेगा ॥

झूठी बोली छोलका, साँची सार सरूप । 
झूठा पोला ढोलका, साँचा घन घन रूप ।२३८७। 
भावार्थ : -- असत्य वचन यदि वाह्य वल्कल हैं तो सत्य सार भाग के स्वरूप हैं । मिथ्यावादी के भेद होते हैं अत: उसका भेदन किया जा सकता है सत्यवादी के भेद नहीं होते अत:वह अभेद्य होते हैं ॥

छल की झूठी छाय सों, भली साँच की धूप । 
जे कंचन मन काल किए, जे कुंदन के रूप ।२३८८। 
भावार्थ : --  छल की मिथ्या छाया से सत्य की धूप भली होती है । छल छाया कंचन तन को कुंदन कर मन को कलुषित करती है सत्य की धूप कंचन तन को कलुषित कर मन को कुंदन करती है ॥

भारत में भ्रष्टाचरन भयउ गंग की धार । 
सकल तीरथ बार बार ये तीरथ एक बार ।२३८९। 
भावार्थ : -- भारत में भ्रष्टाचरण बहती गंगा हो चली है शिष्टाचारण परनाले ॥ सरे तीरथ बार बार करो पर इस गंगा का करो सारी  दरिद्रता नहीं धूल जाए तो कहना ॥

राजा बहुंत सँहगे भए, मिलै टका मैं तीन । 
तापर धुंधक धनिमान, रहे दीन के दीन ।२३९०। 
भावार्थ : -- सस्ते के दिन आ गए हैं अब तो राजा एक टके में तीन मिल रहे हैं । इतनी सँहगाई होने पर भी इन उद्योगपतियों की दरिद्रता नहीं जाती ॥





















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