दया धर्म का मूल है दान पात फल फूल ।
सारे सो सत सार है, तारे सो तप तूल ।२३८१ -क ।
भावार्थ : --धर्म रूपी वृक्ष का मूल दया (प्राणी मात्र पर ) है जहाँ दया न हो वह धर्म नहीं है ।उसके पत्र फल एवं फूल दान हैं,वृक्ष के द्वारा ग्रहण किया गया सार सत्य रूपी सार है । अपने उपासकों का नाव बनकर उद्धार करने वाली लकड़ी तप है ॥
बढे तो बड़ तूल बढ़े, अपने मूल नुकूल ।
सबहि भाँति सब हुँत सुखद, पलए फलए बिनु फूल ।२३८१ -ख ।
भावार्थ : --उस अधर्म रूपी वृक्ष को वट वृक्ष के जैसे अपने मूल के अनुकूल ही बढ़ना चाहिए वह अपने मूल को न भूले । जो सभी प्रकार से सभी के लिए सुखप्रद हो, जो बिना अभिमान के फले फूले ॥
हे रे मानो मरि गयो,रोई दुनिआ सारि ।
पसु बसन सन जनम लियो, मारे बारहि बारि ।२३८२।
भावार्थ : --हाय रे ! आतंकवदियों ने मानुष मार दिए, सारी दुनिया रोने बैठ गई ॥ वही मानुष पशु के वस्त्र धारण कर वारंवार जन्म लेता है रोने वाले ही उसे वारंवार मारते हैं ॥
आतंकवदियों ने तो उसे एक ही बार मारा, वारम्वार उसे किसने मारा.....?
भई अजहुँ सब ते अधम, जे मानस की जात ।
कुकरनी संग आपनी,सब खून करे असाँति ।२३८३।
भावार्थ : -- अधुनातन यह मानुष जाति सबसे नीच जात हो गई है । जो अपनी कुकरनी के संग चारों ओर आतंक मचाए हैं ॥
एक कूल जनम एक मरनि, परे बीच में जीउ ।
जोड़ जुगत लगाई में, भूरे अपनी सीउ ।२३८४।
भावार्थ : -- एक तट पर जन्म तो दूसरे तट पर मृत्यु है मध्य में यह जीव जगत है ॥ जो अपने योग की युक्ति को युक्त करने में ( अर्थात जीविका के संघर्ष में ) तट को विस्मृत किए मझधार में ही विचरण कर रहा है ॥
उपकारै उपकार है, अपकारै अपकार ।
जग सोंह सोइ पाइये,किए जोइ ब्यौहार ।२३८५।
भावार्थ : -- हम जैसा व्यवहार करेंगे संसार भी हमसे वैसा ही व्यवहार करेगा । हम मंगल करेंगे तो यह हमारा मंगल करेगा हम अमंगल करेंगे तो यह भी अमंगल ही करेगा ॥
तू जग सोहि कठोर है, जग तुझ सोहि कठोर ।
जो तू पौरै पौर है, तो जे अपने ठोर ।२३८६।
भावार्थ : -यदि तुम निष्ठुर हो कट्टर हो तो यह संसार तुमसे अधिक निष्ठुर और कट्टर है । तुम जन्म-मरण के चक्र में बंधकर दस ठिकाने बदलते है यह सदैव अपने ठोर पर रहता है, आज तुमने जिसकी जो दशा की कल यह तुम्हारी वही करेगा ॥
झूठी बोली छोलका, साँची सार सरूप ।
झूठा पोला ढोलका, साँचा घन घन रूप ।२३८७।
भावार्थ : -- असत्य वचन यदि वाह्य वल्कल हैं तो सत्य सार भाग के स्वरूप हैं । मिथ्यावादी के भेद होते हैं अत: उसका भेदन किया जा सकता है सत्यवादी के भेद नहीं होते अत:वह अभेद्य होते हैं ॥
छल की झूठी छाय सों, भली साँच की धूप ।
जे कंचन मन काल किए, जे कुंदन के रूप ।२३८८।
भावार्थ : -- छल की मिथ्या छाया से सत्य की धूप भली होती है । छल छाया कंचन तन को कुंदन कर मन को कलुषित करती है सत्य की धूप कंचन तन को कलुषित कर मन को कुंदन करती है ॥
भारत में भ्रष्टाचरन भयउ गंग की धार ।
सकल तीरथ बार बार ये तीरथ एक बार ।२३८९।
भावार्थ : -- भारत में भ्रष्टाचरण बहती गंगा हो चली है शिष्टाचारण परनाले ॥ सरे तीरथ बार बार करो पर इस गंगा का करो सारी दरिद्रता नहीं धूल जाए तो कहना ॥
राजा बहुंत सँहगे भए, मिलै टका मैं तीन ।
तापर धुंधक धनिमान, रहे दीन के दीन ।२३९०।
भावार्थ : -- सस्ते के दिन आ गए हैं अब तो राजा एक टके में तीन मिल रहे हैं । इतनी सँहगाई होने पर भी इन उद्योगपतियों की दरिद्रता नहीं जाती ॥
सारे सो सत सार है, तारे सो तप तूल ।२३८१ -क ।
भावार्थ : --धर्म रूपी वृक्ष का मूल दया (प्राणी मात्र पर ) है जहाँ दया न हो वह धर्म नहीं है ।उसके पत्र फल एवं फूल दान हैं,वृक्ष के द्वारा ग्रहण किया गया सार सत्य रूपी सार है । अपने उपासकों का नाव बनकर उद्धार करने वाली लकड़ी तप है ॥
बढे तो बड़ तूल बढ़े, अपने मूल नुकूल ।
सबहि भाँति सब हुँत सुखद, पलए फलए बिनु फूल ।२३८१ -ख ।
भावार्थ : --उस अधर्म रूपी वृक्ष को वट वृक्ष के जैसे अपने मूल के अनुकूल ही बढ़ना चाहिए वह अपने मूल को न भूले । जो सभी प्रकार से सभी के लिए सुखप्रद हो, जो बिना अभिमान के फले फूले ॥
हे रे मानो मरि गयो,रोई दुनिआ सारि ।
पसु बसन सन जनम लियो, मारे बारहि बारि ।२३८२।
भावार्थ : --हाय रे ! आतंकवदियों ने मानुष मार दिए, सारी दुनिया रोने बैठ गई ॥ वही मानुष पशु के वस्त्र धारण कर वारंवार जन्म लेता है रोने वाले ही उसे वारंवार मारते हैं ॥
आतंकवदियों ने तो उसे एक ही बार मारा, वारम्वार उसे किसने मारा.....?
भई अजहुँ सब ते अधम, जे मानस की जात ।
कुकरनी संग आपनी,सब खून करे असाँति ।२३८३।
भावार्थ : -- अधुनातन यह मानुष जाति सबसे नीच जात हो गई है । जो अपनी कुकरनी के संग चारों ओर आतंक मचाए हैं ॥
एक कूल जनम एक मरनि, परे बीच में जीउ ।
जोड़ जुगत लगाई में, भूरे अपनी सीउ ।२३८४।
भावार्थ : -- एक तट पर जन्म तो दूसरे तट पर मृत्यु है मध्य में यह जीव जगत है ॥ जो अपने योग की युक्ति को युक्त करने में ( अर्थात जीविका के संघर्ष में ) तट को विस्मृत किए मझधार में ही विचरण कर रहा है ॥
उपकारै उपकार है, अपकारै अपकार ।
जग सोंह सोइ पाइये,किए जोइ ब्यौहार ।२३८५।
भावार्थ : -- हम जैसा व्यवहार करेंगे संसार भी हमसे वैसा ही व्यवहार करेगा । हम मंगल करेंगे तो यह हमारा मंगल करेगा हम अमंगल करेंगे तो यह भी अमंगल ही करेगा ॥
तू जग सोहि कठोर है, जग तुझ सोहि कठोर ।
जो तू पौरै पौर है, तो जे अपने ठोर ।२३८६।
भावार्थ : -यदि तुम निष्ठुर हो कट्टर हो तो यह संसार तुमसे अधिक निष्ठुर और कट्टर है । तुम जन्म-मरण के चक्र में बंधकर दस ठिकाने बदलते है यह सदैव अपने ठोर पर रहता है, आज तुमने जिसकी जो दशा की कल यह तुम्हारी वही करेगा ॥
झूठी बोली छोलका, साँची सार सरूप ।
झूठा पोला ढोलका, साँचा घन घन रूप ।२३८७।
भावार्थ : -- असत्य वचन यदि वाह्य वल्कल हैं तो सत्य सार भाग के स्वरूप हैं । मिथ्यावादी के भेद होते हैं अत: उसका भेदन किया जा सकता है सत्यवादी के भेद नहीं होते अत:वह अभेद्य होते हैं ॥
छल की झूठी छाय सों, भली साँच की धूप ।
जे कंचन मन काल किए, जे कुंदन के रूप ।२३८८।
भावार्थ : -- छल की मिथ्या छाया से सत्य की धूप भली होती है । छल छाया कंचन तन को कुंदन कर मन को कलुषित करती है सत्य की धूप कंचन तन को कलुषित कर मन को कुंदन करती है ॥
भारत में भ्रष्टाचरन भयउ गंग की धार ।
सकल तीरथ बार बार ये तीरथ एक बार ।२३८९।
भावार्थ : -- भारत में भ्रष्टाचरण बहती गंगा हो चली है शिष्टाचारण परनाले ॥ सरे तीरथ बार बार करो पर इस गंगा का करो सारी दरिद्रता नहीं धूल जाए तो कहना ॥
राजा बहुंत सँहगे भए, मिलै टका मैं तीन ।
तापर धुंधक धनिमान, रहे दीन के दीन ।२३९०।
भावार्थ : -- सस्ते के दिन आ गए हैं अब तो राजा एक टके में तीन मिल रहे हैं । इतनी सँहगाई होने पर भी इन उद्योगपतियों की दरिद्रता नहीं जाती ॥
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