दाएँ बाएं तो किछु नहीं, जग लग करे बखान ।
तेरी कहनि से पहले, पहुंचे तेरा दान ।२३७१ ।
भावार्थ : -- देना-वेना कुछ नहीं जग भर में रुक्का कर दिया । तुम्हारी कथनी से पूर्व तुम्हारे दिए दान को पहुंचना चाहिए ।।
कर सों बहुंत कुकरम किए, मुख सों किए बहु कर्म ।
मर्म पराया जान नहि सो का जाने धर्म ।२३७२ ।
भावार्थ : -- जो हाथों से तो कुकरम करता है और मुख से कर्म करता है । जिसे पराया मर्म ज्ञात न हो वह धर्म-सस्कार-संस्कृति क्या जाने ।।
घरियारि घरी पलक दिए गिन के साँस सँजोए ।
जेतक बिरथा ब्यय किए, तेतक जीवन खोए ।२३७३ ।
भावार्थ : -- घंटा बजाने वाले ने अनंत समय में से तुझे घड़ी पलक का ही समय दिया हैं तुझे स्वांस भी गिनकर ही दी हैं । स्वांस की जीवटता कल्याण करने में ही है इसका जितना अपव्यय होगा मृत्य उतनी निकट होगी ॥
तिन पूरन कर लीजिये काज बचे जो कोए ।
घरी पलक का देहरा, न जाने कब खोए ।२३७४ ।
भावार्थ : - शेष कार्यों को पूर्ण कर लेना चाहिए, यह शरीर घडी पलक का है जाने कब खो जाए ॥
अजहुँ आज का राज है, करी लेब सब काज ।
काल काल को जोगता, काज जोगता आज ।२३७५ ।
भावार्थ : -- अभी तो आज का राज है इसकी लाठी है भैंस भी इसी की है अत: सभी कार्य संपन्न कर लेने चाहिए । क्योंकि कल तो मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है आज कार्य की ॥
यह जग जीवन जोत सों, भयऊजोतिर् बान ।
जब लग सार गहे रहीं रहिहि प्रान में प्रान ।२३७६।
भावार्थ : - संसार जीवन रूपी ज्योति से ही ज्योतिर्मय है ।जब तक यह सार ग्रहण किए रहेगी तब तक प्राणों में प्राण अधिष्ठित रहेंगे ॥
जीउ जगत जिउनाबास,साधन प्रानाधार ।
जी उठे तो जीवन न तरु पाहन है संसार ।२३७७ ।
भावार्थ : -- जीव जगत यदि शरीर है तो जीव-साधन उसका ह्रदय है प्राणों के अधिष्ठान से ही यह संसार चैतन्य है अन्यथा पाषाण है ॥
दीपक सारे बरतिका बर्तिक सारै सार ।
बिनहि लगनाधार करे, होत नहीं उजरार ।२३७८।
भावार्थ : -- दीपक है सार है वर्तिका है किन्तु जब तक उसमें अग्नि अधिष्ठित नही होती तब तक वह प्रज्वलित नहीं होता ॥
मानस भूषन मान के भए संसार सरीर ।
तिन अभरन का कीजिये, रहे नहीं जब चीर ।२३७९।
भावार्थ : - वर्तमान में मानव को आभूषण अनुमान कर यह संसार शरीर हुवा जा रहा है । वस्त्रहीन शरीर में आभूषण व्यर्थ होते हैं ॥
पाहन पाहन पूजिता कैसे धारे प्रान ।
पूजे हरिदै कोमला, होइहि अवसि निधान ।२३८०।
भावार्थ : -- पत्थरों को यदि पत्थर ही पूजेंगे तो कहीं और प्राण कैसे प्रतिष्ठित होंगे । कोमल व् दयाशील ह्रदय जब कठोर पत्थरों को पूजेंगे तब प्राणों की प्रतिष्ठा अवश्य ही होगी॥
तेरी कहनि से पहले, पहुंचे तेरा दान ।२३७१ ।
भावार्थ : -- देना-वेना कुछ नहीं जग भर में रुक्का कर दिया । तुम्हारी कथनी से पूर्व तुम्हारे दिए दान को पहुंचना चाहिए ।।
कर सों बहुंत कुकरम किए, मुख सों किए बहु कर्म ।
मर्म पराया जान नहि सो का जाने धर्म ।२३७२ ।
भावार्थ : -- जो हाथों से तो कुकरम करता है और मुख से कर्म करता है । जिसे पराया मर्म ज्ञात न हो वह धर्म-सस्कार-संस्कृति क्या जाने ।।
घरियारि घरी पलक दिए गिन के साँस सँजोए ।
जेतक बिरथा ब्यय किए, तेतक जीवन खोए ।२३७३ ।
भावार्थ : -- घंटा बजाने वाले ने अनंत समय में से तुझे घड़ी पलक का ही समय दिया हैं तुझे स्वांस भी गिनकर ही दी हैं । स्वांस की जीवटता कल्याण करने में ही है इसका जितना अपव्यय होगा मृत्य उतनी निकट होगी ॥
तिन पूरन कर लीजिये काज बचे जो कोए ।
घरी पलक का देहरा, न जाने कब खोए ।२३७४ ।
भावार्थ : - शेष कार्यों को पूर्ण कर लेना चाहिए, यह शरीर घडी पलक का है जाने कब खो जाए ॥
अजहुँ आज का राज है, करी लेब सब काज ।
काल काल को जोगता, काज जोगता आज ।२३७५ ।
भावार्थ : -- अभी तो आज का राज है इसकी लाठी है भैंस भी इसी की है अत: सभी कार्य संपन्न कर लेने चाहिए । क्योंकि कल तो मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है आज कार्य की ॥
यह जग जीवन जोत सों, भयऊजोतिर् बान ।
जब लग सार गहे रहीं रहिहि प्रान में प्रान ।२३७६।
भावार्थ : - संसार जीवन रूपी ज्योति से ही ज्योतिर्मय है ।जब तक यह सार ग्रहण किए रहेगी तब तक प्राणों में प्राण अधिष्ठित रहेंगे ॥
जीउ जगत जिउनाबास,साधन प्रानाधार ।
जी उठे तो जीवन न तरु पाहन है संसार ।२३७७ ।
भावार्थ : -- जीव जगत यदि शरीर है तो जीव-साधन उसका ह्रदय है प्राणों के अधिष्ठान से ही यह संसार चैतन्य है अन्यथा पाषाण है ॥
दीपक सारे बरतिका बर्तिक सारै सार ।
बिनहि लगनाधार करे, होत नहीं उजरार ।२३७८।
भावार्थ : -- दीपक है सार है वर्तिका है किन्तु जब तक उसमें अग्नि अधिष्ठित नही होती तब तक वह प्रज्वलित नहीं होता ॥
मानस भूषन मान के भए संसार सरीर ।
तिन अभरन का कीजिये, रहे नहीं जब चीर ।२३७९।
भावार्थ : - वर्तमान में मानव को आभूषण अनुमान कर यह संसार शरीर हुवा जा रहा है । वस्त्रहीन शरीर में आभूषण व्यर्थ होते हैं ॥
पाहन पाहन पूजिता कैसे धारे प्रान ।
पूजे हरिदै कोमला, होइहि अवसि निधान ।२३८०।
भावार्थ : -- पत्थरों को यदि पत्थर ही पूजेंगे तो कहीं और प्राण कैसे प्रतिष्ठित होंगे । कोमल व् दयाशील ह्रदय जब कठोर पत्थरों को पूजेंगे तब प्राणों की प्रतिष्ठा अवश्य ही होगी॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें