बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३७॥ -----

दाएँ बाएं तो किछु नहीं, जग लग करे बखान । 
तेरी कहनि से पहले, पहुंचे तेरा दान ।२३७१ । 
भावार्थ : -- देना-वेना कुछ नहीं जग भर में रुक्का कर दिया । तुम्हारी कथनी से पूर्व तुम्हारे दिए दान को पहुंचना चाहिए ।।  

कर सों बहुंत कुकरम किए, मुख सों किए बहु कर्म । 
मर्म पराया जान नहि सो का जाने धर्म ।२३७२ । 
भावार्थ : -- जो हाथों से तो कुकरम करता है और मुख से कर्म करता है । जिसे पराया मर्म ज्ञात  न हो वह धर्म-सस्कार-संस्कृति क्या जाने  ।। 

घरियारि घरी पलक दिए गिन के साँस सँजोए । 
जेतक बिरथा ब्यय किए, तेतक जीवन खोए ।२३७३ । 
भावार्थ : -- घंटा बजाने वाले ने  अनंत समय में से तुझे घड़ी पलक का ही समय दिया हैं  तुझे स्वांस भी गिनकर ही  दी हैं । स्वांस की जीवटता कल्याण करने में ही है इसका जितना अपव्यय होगा मृत्य उतनी निकट होगी ॥ 

तिन पूरन कर लीजिये काज बचे जो कोए । 
घरी पलक का देहरा, न जाने कब खोए ।२३७४ । 
भावार्थ : - शेष कार्यों को पूर्ण कर लेना चाहिए, यह शरीर घडी पलक का है जाने कब खो जाए ॥ 

अजहुँ आज का राज है, करी लेब सब काज । 
काल काल को जोगता, काज जोगता आज ।२३७५ । 
भावार्थ : -- अभी तो आज का राज है इसकी लाठी है  भैंस भी इसी की है  अत: सभी कार्य संपन्न कर लेने चाहिए । क्योंकि कल तो मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है आज कार्य की ॥ 

यह जग जीवन जोत सों, भयऊजोतिर् बान । 
जब लग सार गहे रहीं रहिहि प्रान में प्रान ।२३७६। 
भावार्थ : -  संसार जीवन रूपी ज्योति से ही ज्योतिर्मय है ।जब तक यह सार ग्रहण किए रहेगी तब तक प्राणों में प्राण अधिष्ठित रहेंगे ॥ 

जीउ जगत जिउनाबास,साधन प्रानाधार । 
जी उठे तो जीवन न तरु पाहन है संसार ।२३७७ । 
भावार्थ : -- जीव जगत यदि शरीर है तो जीव-साधन उसका ह्रदय है प्राणों के अधिष्ठान से ही यह संसार चैतन्य है  अन्यथा पाषाण है ॥ 


दीपक सारे बरतिका बर्तिक सारै सार । 
बिनहि लगनाधार करे, होत  नहीं उजरार ।२३७८। 
भावार्थ : -- दीपक है सार है वर्तिका है किन्तु जब तक उसमें अग्नि अधिष्ठित नही होती तब तक वह प्रज्वलित नहीं होता ॥ 

मानस भूषन मान के भए संसार सरीर । 
तिन अभरन का कीजिये, रहे नहीं जब चीर ।२३७९। 
भावार्थ : - वर्तमान में मानव को आभूषण अनुमान कर यह संसार शरीर हुवा जा रहा है । वस्त्रहीन शरीर में आभूषण व्यर्थ होते हैं ॥ 

पाहन पाहन पूजिता कैसे धारे प्रान । 
पूजे हरिदै कोमला, होइहि अवसि निधान ।२३८०। 
भावार्थ : -- पत्थरों को यदि पत्थर ही पूजेंगे तो कहीं और प्राण  कैसे प्रतिष्ठित होंगे । कोमल व् दयाशील  ह्रदय जब कठोर पत्थरों को पूजेंगे  तब प्राणों की प्रतिष्ठा अवश्य ही होगी॥










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