यह सकल संसार लगे, भगवन का परिबार ।
जान इहां घरी न लगे , आन लगे घरियार । २३६१ ।
भावार्थ : - यह सारा संसार भगवन का कुटुंब प्रतीत होता है । यहन आने के लिए सैकड़ों घड़िया लगती हैं किन्तु जाने के लिए घड़ी भर का भी समय नहीं लगता ॥
बैद मुआ रोगी मुआ,मुआ न जी का रोग ।
एक ए मेरा मैं न मुआ,मरि मरि गए सब लोग ।२३६२ ।
भावार्थ : --वैद्य मर गए रोगी मर गए किंतु जी का रोग नहीं मरा । लोग मरते चले गए एक ये मेरा मैं नहीं मरा ॥
मैं :-- उत्तम पुरुष के कर्त्ता का रूप,अहम्
एक खल भलमनसी भया,भया नगर धन्नाह ।
हाथ सों किछु छूटे नहि, दानी पद की चाह ।२३६३।
भावार्थ : -- एक दुष्ट आत्मा सेठ बन गया तो भला मनुष्य कहलाने लगा । चूँकि वह सवभाव से दुष्ट था अत?: उसके हाथ से छूटता तो कुछ भी नहीं और महा दानी पद की लालसा करता था ॥
धन सों भविल भवन भया, पड़ी टूमरी टूट ।
तापर घर भर रहा लए दोउ हाथ ते लूट ।२३६४ ।
भावार्थ : -- ऐहिक साधन के ष भव्य भवन भी गढ़ लिया जिसमें टूमड़ी टूट टूट के पड़ती थी । इसपर भी वह दोनों हाथों से लू लूट लूट के अपना घर भरे हैं ॥
कोइ छूट की चाह लिए कोइ लूट की चाह ।
फैरे करज सम्पुटिका ,चाहिए न केहि नाह ।२३६५।
भावार्थ : -- किसी को छूट की चाह है किसी को लूट की । कर संपुटिकका फैली है यहाँ बैठे बैठे किसको नहीं चाहिए ॥
कतहुँ छूट की लूट है, कतहु लूट की छूट ।
नगरि अँधेरा राज किए छाए कपट छल कूट ।२३६६।
भावार्थ : -- कहीं छूट की लूट मची है कहीं लूट की छूट है । नगरी में अनीति का राज है छल कपट एवं मिथ्या छाई हुई है ॥
अंतर एक पाषान है बाहिर एक पाषान ।
भागता भगवन बंदिये, होहिं प्रतिठीत प्रान ।२३६७ ।
भावार्थ : -- यदि तेरा अंतर जगत एक पाषाण है तो यह बाह्य जगत उससे भी कठोर पाषाण है । हे भक्त !तू ईश्वर की वंदना कर इसमें अवश्य ही प्राण प्रतिष्ठित होंगे ।।
दिआ मैं दिआ कही के, दाता चढ़े बिमान ।
दिआ सो तो मिले नहीं बेगि मिले पहचान ।२३६८।
भावार्थ : -- मैने इतना दान दिया ऐसा कहकर दाता विमान में चढ़े फिर रहा हैं । उसका दिया अब तक नहीं मिला किन्तु दानवीर रूप में उसकी कीर्ति बड़ी द्रुत गति से मिली ॥
उसका दिया किसी को मिल जाए तो बता देना अपने भी अँधेरे दूर हो जाएं.....
दाता देवन की कहे पाए बिनहि दिए मान ।
आप तो गाहि पद गहे दान बीर भए आन ।२३ ६९ ।
भावार्थ : -- जो कोई केवल देने की कहकर बिना दिए ही दाता का सम्मान प्राप्त करता है वह सम्मान दाता को दानवीर घोषित कर स्वयं ग्राही पद को प्राप्त होता है ॥
दायन पहुँच कहँ लगे, जहँ लग किए पहचान ।
करे पहचान कहँ लगे, जहाँ लग पहुंचे दान ।२३७०।
भावार्थ : - दान की गई वस्तु की पहुंच कहाँ तक होनी चाहिए । जहाँ तक तुम्हारी कीर्ति हो । कीर्ति कहाँ तक होनी चाहिए जहाँ तक दान की गई वस्तु की पहुंच हो ॥
जान इहां घरी न लगे , आन लगे घरियार । २३६१ ।
भावार्थ : - यह सारा संसार भगवन का कुटुंब प्रतीत होता है । यहन आने के लिए सैकड़ों घड़िया लगती हैं किन्तु जाने के लिए घड़ी भर का भी समय नहीं लगता ॥
बैद मुआ रोगी मुआ,मुआ न जी का रोग ।
एक ए मेरा मैं न मुआ,मरि मरि गए सब लोग ।२३६२ ।
भावार्थ : --वैद्य मर गए रोगी मर गए किंतु जी का रोग नहीं मरा । लोग मरते चले गए एक ये मेरा मैं नहीं मरा ॥
मैं :-- उत्तम पुरुष के कर्त्ता का रूप,अहम्
एक खल भलमनसी भया,भया नगर धन्नाह ।
हाथ सों किछु छूटे नहि, दानी पद की चाह ।२३६३।
भावार्थ : -- एक दुष्ट आत्मा सेठ बन गया तो भला मनुष्य कहलाने लगा । चूँकि वह सवभाव से दुष्ट था अत?: उसके हाथ से छूटता तो कुछ भी नहीं और महा दानी पद की लालसा करता था ॥
धन सों भविल भवन भया, पड़ी टूमरी टूट ।
तापर घर भर रहा लए दोउ हाथ ते लूट ।२३६४ ।
भावार्थ : -- ऐहिक साधन के ष भव्य भवन भी गढ़ लिया जिसमें टूमड़ी टूट टूट के पड़ती थी । इसपर भी वह दोनों हाथों से लू लूट लूट के अपना घर भरे हैं ॥
कोइ छूट की चाह लिए कोइ लूट की चाह ।
फैरे करज सम्पुटिका ,चाहिए न केहि नाह ।२३६५।
भावार्थ : -- किसी को छूट की चाह है किसी को लूट की । कर संपुटिकका फैली है यहाँ बैठे बैठे किसको नहीं चाहिए ॥
कतहुँ छूट की लूट है, कतहु लूट की छूट ।
नगरि अँधेरा राज किए छाए कपट छल कूट ।२३६६।
भावार्थ : -- कहीं छूट की लूट मची है कहीं लूट की छूट है । नगरी में अनीति का राज है छल कपट एवं मिथ्या छाई हुई है ॥
अंतर एक पाषान है बाहिर एक पाषान ।
भागता भगवन बंदिये, होहिं प्रतिठीत प्रान ।२३६७ ।
भावार्थ : -- यदि तेरा अंतर जगत एक पाषाण है तो यह बाह्य जगत उससे भी कठोर पाषाण है । हे भक्त !तू ईश्वर की वंदना कर इसमें अवश्य ही प्राण प्रतिष्ठित होंगे ।।
दिआ मैं दिआ कही के, दाता चढ़े बिमान ।
दिआ सो तो मिले नहीं बेगि मिले पहचान ।२३६८।
भावार्थ : -- मैने इतना दान दिया ऐसा कहकर दाता विमान में चढ़े फिर रहा हैं । उसका दिया अब तक नहीं मिला किन्तु दानवीर रूप में उसकी कीर्ति बड़ी द्रुत गति से मिली ॥
उसका दिया किसी को मिल जाए तो बता देना अपने भी अँधेरे दूर हो जाएं.....
दाता देवन की कहे पाए बिनहि दिए मान ।
आप तो गाहि पद गहे दान बीर भए आन ।२३ ६९ ।
भावार्थ : -- जो कोई केवल देने की कहकर बिना दिए ही दाता का सम्मान प्राप्त करता है वह सम्मान दाता को दानवीर घोषित कर स्वयं ग्राही पद को प्राप्त होता है ॥
दायन पहुँच कहँ लगे, जहँ लग किए पहचान ।
करे पहचान कहँ लगे, जहाँ लग पहुंचे दान ।२३७०।
भावार्थ : - दान की गई वस्तु की पहुंच कहाँ तक होनी चाहिए । जहाँ तक तुम्हारी कीर्ति हो । कीर्ति कहाँ तक होनी चाहिए जहाँ तक दान की गई वस्तु की पहुंच हो ॥
उत्तम दोहे
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