शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३५॥ -----

काम के बोल बोल बिनु  जो किए बिरथ अलाप  । 
तिनते महति सो मुख है, जोइ रहे चुपचाप ।२३५१। 
भावार्थ : -- अर्थान्वित वचन न कहकर जो निरर्थक अलाप करता है उससे वह मुख श्रेष्ठ है जो मौन मुद्रा का वरण किए हो ॥

नाम करे  बिनु काम किए सो सुत  नाम कमाए । 
काम करे बिनु नाम किए, सो सब नाम कराए ।२३५२। 
भावार्थ : -- जो पुत्र नाम करे बिना ही काम करता जाता है वही यश को प्राप्त होता है । जो काम करे बिना ही यश को प्राप्त  होता है वह सब कुछ अपने नाम कर लेता है ॥

पाँच भूत का भूतना,रहए बूँद के भीत । 
मैं मैं मैं मैं कर कहए,लिआ जगत को जीत ।२३५३। 
भावार्थ : -- पांच भूत का भूतना कभी एक बूँद के भीतर था । अब देखो कैसे मैं मैं करके कह रिया रे मै णे  तो संसार जीत लिया ॥

उद्योग सुदृढ़ अर्थव्यवस्था का आधार नहीं होते, होते तो यह अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होती
काल व् परिस्थितियां देशों पर निर्भर होती हैं,
"क्षण भर की समृद्धि, समृद्धि नहीं कहलाती..... "

तलबारि की मार सोंह बढ़ी सब्द की मार । 
एक ते एकहि बार मरे,एक ते बारहि बार ।२३५४। 
भावार्थ : -- तलवार की चोट से शब्दों की चोट गहरी होती है,  एक से तो एक ही वार,  एक से वारंवार मृत्यु होती है ॥

जो भाउ के जोग लगे, मुख सों बोलिए सोए । 
जो सब्दाँ सँजोग लगे, सोइ भाव उर जोए ।२३५ ५। 
भावार्थ : --  मुख को भाव से संयोजित शब्दों की व् ह्रदय को शब्दों से संयोजित भाव की व्यंजना करनी चाहिए ।।

एक सब्द में ए देस हैं, एक देई उपदेस । 
एक सब्द घनस्याम है, एक सागर सय सेस ।२३५६। 
भावार्थ : -- एक शब्द में यह भारत देश है एक शब्द में उपदेश है । एक शब्द में घनश्याम हैं एक शब्द में भगवान श्रीहरि हैं ॥

भगिनी पतिनी पूतिका, नारी मात सरूप ।
नारी सब रूप बंदिए, नारी रूप अनूप ।२३५७। 
 भावार्थ : -- नारी का प्रत्येक रूप सुन्दर होता है,  नारी भगिनी है  पत्नी है पुत्रिका है नारी माता का स्वरूप है अत: इसके प्रत्येक रूप की पूजा करनी चाहिए ॥

एक कोत दुआरी लगे, दूज क़ुतुब की लाट । 
घेर घार हँकार लगे,हाँकारी की हाट ।२३५८। 
एक और यहाँ दुवारी है दुआरी जोसका पट ही नहीं है दूसरी ओर पुस्तकों वाली अटारी है जहां ही पुस्तक नहीं है ॥  अहंकार को घेरे एक  घेरी जहाँ पक्ष में  बोलने वालों का ही हटवारि लगती है ।।

उत्तर : - इंडिया का गेट, क़ुतुब मीनार, पालिका बाजार

गोल गोल अकार लगे, गोली जाकी बात । 
दिन सबहि हुरिहार लगे, देवारी सब रात । २३५९ ।      
भावार्थ : -- इसका आकार गोल गोल लगता है किन्तु यह गोलाकार भी नही है इसकी बातें गोली जैसी लगती है किन्तु कोई मरता भी  नहीं है । यहाँ सभी दिन राग-रंग वाले लगते है,  यहाँ सभी रातें  दिवाली  वाली  लगती है ॥

उत्तर : --संसद-भवन

यह सकल संसार लगे, पातुक का परिबार । 
आन जहँ घरियार  लगे, जान घरी  कुल चार । २३६०।  
भावार्थ : - यह सारा संसार पतन करने वालों का परिवार लगता है । यहाँ आने में तो घंटा भर लगता  है किन्तु जाने में चार घडी लगती है ॥

उत्तर : --देहली
















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