बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३४ ॥ -----

धरम सूचक सकल चिन्ह,होत प्रतीक सरूप । 
तिन्ह बरै तो दरसनै , धरम परायन रूप ।२३४१ । 
भावार्थ : - धरम सूचक चिन्ह सम्बंधित धर्म के प्रतीक स्वरूप होते हैं ।इन चिन्हों का वरण धर्म के प्रति निष्ठां को दर्शाता है ॥ 

धरम चरन लौ लीन नहि, अहहीं कहन कुलीन । 
धन साधन सन पीनाए रहें दीन के दीन ।२३४२ । 
भावार्थ : -- जिनकी अपने धर्म में निष्ठां नहीं है वही कुलीन कहला रहै हैं ।रहने  को तो उनके पास सब कुछ पर मांग मांग के खा रहे हैं ॥  

काल  कलुषित करम करे धरम करे ना कोए । 
छेद  बिचार नीच लखे, ऊँच पदार्थि होए ।२३४३ । 
भावार्थ : --  (जिनकी अपने धर्म में निष्ठा नहीं होती ) ये काले कलुषित करम करते हैं पुण्य कुछ भी  नहीं करते । अपने विचारों को तुच्छ व् ऊँचे पदों की लालसा किए ये सदा नीचा ही देखते हैं ॥ 

एक सुरा को सुरा कहए,दूजे सुधा पुकारि । 
सूरा पीत जेहि बिधि हो,होत सदा मतबारि ।२३४४ । 
भावार्थ : -- ये सत्ताधारी जो है न वह एक विधि की सूरा को सुरा कहते है दूसरी विधि की सूरा को अमृत कहते है । सुरापान चाहे किसी विधि में हो वह मतवाली ही होती है ।

राजा बासे झोपड़ी, सेबक नीक निबास । 
राजा पद पयादा भए, सेबक उरै अगास ।२३४५। 
भावार्थ : --   सेवक सुघर सुघर भवन में बसने लगे राजा झुपड़िया में बसे हैं । राजा का पद प्यादा  का पद हो गया,और सेवक  धरती में पग नहीं रखते उड़ते फिरते हैं।।

राजा पद प्यादा भए,सबक राजै राज । 
राजा पद बिनु पनहिआ, सबक के सौ साज ।२३४६। 
भावार्थ : -- राजा का पद प्यादे का पद हो गया जबसे सेवक राज करने लगे । राजा का पद पन्हैया से रहित हो गया जबसे सेवक के सौ सौ साज हो गए ॥
पन्हैया = खड़ाऊ

राजा लभन बहु सुलभा, सेवक दुर्लभ होए । 
सुलभ पद केहि न चाहिए, दुर्लभ चहँ सब कोए ।२३४७। 
भावार्थ : -- राजा के दर्शन अत्यंत सुलभ व् सेवक के दुर्लभ हो गए ।  दुर्लभ दर्शी पद के तो सभी आंकाक्षी है, सुलभ दर्शी पद किसी को नहीं चाहिए ।।

स्पष्टीकरण : - जो किसी को नहीं चाहिए त्यागी संत उसी का वरण करते हैं.....

मान साधन संग होए  धन सन होए उठान । 
अजहुँ तिन्ह जोहत कीनि, सबहि गोहारि आन ।२३४८। 
भावार्थ : -- पहले साधूता से सम्मान होता था लोग सद विचारों से ऊपर उठते थे । अब तो सम्मान सुख के साधनों के संग हो गया है और उठान धन के संग,  जो धन-साधन का संग्रह करता है लोग  उसी की  चरण जुहारी करने लगे हैं ॥

जो पद लाहन दुर्लभा,चहैं सोए सब कोए । 
जो पद केहि न चाहिये सतजन तिनके होए ।२३४९। 
भावार्थ : -- जो पद प्राप्त करने में कठिन हो सब कोई उसी पद की लालसा करते हैं । जो 'पद' किसी को नहीं चाहिए साधु सज्जन उसी पद के हो जाते हैं ॥

भाजन बिभुत भूषन सन, भूसा बरे बहूँति । 
पके पाक पबिता तेहि, पाक भवन के भूति ।२३५०। 
भावार्थ : --    पके पाक  की शुद्धता से ही पाकागार सुशोभित होता है  उत्तम भाजन व्  उत्तम साज श्रृंगार से नहीं ।












1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही बेहतरीन ब्‍लाग। आपकी रचना रूपी दोहे पढ़कर अच्‍छा लगा।

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