गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

----- मिनिस्टर राजू १६२ -----

राजू : -- मास्टर जी ! यू मत्था पकड़ के क्यूँ बैठे हो ?
" तेरी मास्टरनी को घर का बजट बनाने को दिया था"
राजू : -- मास्टर जी ! फिर इसमे मत्था पकड़ने आली कूण सी बात ही आप तो घना ही कमाते हो..,

" उसने बजट बनाया वो अन्दन वाली दस लखटकिया तो साड़ी पैनूँगी , घर की सफाई सोने की बुहारी ते होगी, पिछले साल तुमने केवल दाल खाई थी अबके तुम नून चावल खाना , मैने पूछा  फिर घर कैसे चलेगा तो वो बोली वो सेंध मारने वाले चोर लुटेरे हैं  न  उनका विज्ञापन बोरड लगवाएंगे जिसपे लिखा होगा अपना घर लुटवा लो, और जो कुछ वो दान दक्षिणा करेंगे उससे घर चल जाएगा । नहीं चला तो घर का आँगन उनको दे देंगे और हाँ जी मैं तो गंगा जल पीउंगी तुम्हारी तुम जानो.....

राजू : -- मास्टर जी ! झाड़ू सै सीक तो टूटेगी ही..,

" वो उसके भाई-बंधू के होंगे" 

----- ॥ दोहा-दशम २४०/४१॥ -----

एक रोधी एक बिरोधी बिमत कहत सब कोइ ।
जब सिंहासन पर चढ़े दोउ एकै मत होइ ।२४०१ । 
भावार्थ : -- एक  को पक्ष को अवरोधी तो  दूसरे को उसका विरोधी कहते हुवे गणमान्य जन साधारण पक्ष व् विपक्ष दोनों को परस्पर विपरीत विमर्शी जान कर उनका चयन करते हैं  । किन्तु ये जब सिंहासन पर बैठते हैं तब एक ही विचार के हो जाते हैं ॥

 फिर इनको चुनने से लाभ क्या ? नहीं चुनने से ही सही चुनाव होता है.....

स्वाधीन सुपनाए पुनि पराधीन ही पाए । 
कूलिनी कल कलिमल किए, जहँ जल रहा बिकाए ।२४०२। 
भावार्थ : -- स्वाधीनता का स्वप्न देखा यथार्तस स्वयं को पराधीन ही पाया ॥इस पराधीनता में तो संयंत्रों ने अपने गंदे परनालों से नदियों को दूषित कर रखा है यहाँ तो जल भी मोल मिल रहा है, छी इस पराधीनता से तो वो वाली अच्छी थी ॥

राजा जी का लेहना राजा जी का खेह । 
राजा जी का मेहना आज गेह कल देह ।२४०३। 
भावार्थ : -- भैया अब तो लेहना ( उपज, खेत में कटे डंठलों का पूल, नट, नाई, धोबी आदि को दी जाने वाली उपज का भाग  क्या खेत क्या खेतन की मिटटी क्या सब कुछ राजा जी का ही है । राजा जी के ही मेघ हैं मेहन हैं आज घर लूटेंगे तो कल घरवाली, परसों बहन- बेटी को लूटेंगे ॥

आज खलिहान खेह लिए कल लिहि गेह दुआरि । 
आज तुहरी बारी है, काल हमारी बारि ।२४०४। 
भावार्थ : - आज जो तेरी उपज क्रय कर रहे हैं कल वह तेरा खेत हड़प लेंगे परसों घर फिर  घरबारी ॥ आज जो तुम्हारी बारी है तो कल हमारी बारी होगी ॥

लोक तंत्र जो भवन निभ धरे चारि अस्तूप । 
पके ईंट चुनाई के,रहें भीत जान भूप जन भूप ।२४०५। 
भावार्थ : -- लोकतंत्र यदि भवन के सदृश्य है और वह चार स्तूपों पर आधारित  है तो उसकी भित्ति परिपक्व ईंट से निर्मित होनी चाहिए । एवं  'मैं' 'आप' अथवा 'हम' न होकर इस भवन का स्वामी  जनसाधारण को होना चाहिए ।

बिना पकी हुई ईंट से तो कच्चे भवन भी नहीं बनते, फिर इनका तो बिना ईंट का भवन है और बाई-फाई बाला भी है ॥

सरब कामी धेनु सोंह, रहे देस जो खेत । 
कुसासक तिन्ह रुजित कह गयऊ निज कर देह ।२४०६। 


भावार्थ : -- भारत में सार्वकाम्य् धेनु के सदृश जो भी क्षेत्र थे उन्हें कुशासक रोगी कहते गए व् उनका निजीकरण कर उन्हें उद्योगपतियों के हाथों लूटाते चले । 


जैसे : - 
>> बैंक जहँ ग्राहक ही ग्राहक थे उसका निजीकरण किया 

>> संचार व्यवस्था या मुबाईल-टेलीफोन = यहाँभी ग्राहक ही ग्राहक थे इसका भी निजीकरण किया 

>> बीमा नियामक = यहाँ  भी ग्राहक ही ग्राहक हैं  शासन कर में छूट देकर यहां एक बड़ी पूंजी खडी कर सकता था अब यहाँ तो शासन को कर भी नहीं मिलता और निजी हाथों में पूँजी जा रही है ॥ निज्जी बीमे वाले कुछ नहीं देते बस प्रीमियम लेते हैं फिर जै राम जी की ये या हम मर मुरा गए तो पैसे की कोई गारंटी नहीं 



>> प्रकृतिक सम्पदा क निजीकरण कर इन सब कुटिलताओं के कारण ही भारत में पहले इक्का दुक्का ही पुनीपति थे अब तो  कुकुरमुत्ता जैसे हो गए यही है  गांधी-नेहरू के सपनों का इण्डिया.....


जहाँ गाहक ता  हूँ नहिं,जहाँ मैं गाहक नाए । 
मोहि घाट  लगाई के , गाहक दूज धराए ।२४०७ । 
भावार्थ : -अपनी कुटिलता से इन शासनों ने जहां ग्राहक हैं वहां से जन साधारण को हटा दिया जहाँ ग्राहक नहीं है वहां बैठा दिया । उसके लेखे में घाटा लिख दिया और ग्राहक निजी हाथों को दे दिया ॥ 

कोउ लेन मैं लींन भया,कोउ देंन मैं लीन ।
कोउ अतिसय पीन भया त को अतिसय दीन ।२४०८। 
भावार्थ : - कोई केवल लेने में ही लगा रहा कोई देने में । इसका परिणाम यह हुवा की कोई तो निर्धन रेखा के नीचे आ गया कोई धनिमन रेखा के ऊपर चला गया

यदि आर्थिक समानता को अपनाना है तो किसी भी व्यक्ति की आय पांच  लाख मुद्रा (वार्षिक)  से अधिक  न हो   हो  ।  इससे मुद्रा की क्रय शक्ति बढ़ती जाएगी व् महँगाई घटती जाएगी, भ्रष्टाचार  पर नियंत्रण होगा अतिरिक्त आय को निर्धनों की बौद्धिक शक्ति व् उनकी योग्यता में वर्द्धन कर उसे प्राप्त करने हेतु प्रेरित किया जाए ॥

 पांच लाख मुद्रा प्रति व्यक्ति ( व्यक्ति का अर्थ वयस्क से है ) हेतु पर्याप्त से अधिक हैं ।

खनि सम्पद अधार किए हो जो कोउ सँजंत्र । 
निजि कर सों अधिगहत तिन जनता करे नियंत्र ।२४०९। 
भावार्थ : -- चूँकि समस्त प्राकृतिक सम्पदा जनता जनार्दन की सम्पदा है अत: प्राकृतिक संपदाओं पर आधारित उपक्रमों का अधिग्रहण हो वह निजि नियंत्रण से मुक्त होकर सार्वजनिक नियंत्रण में हो ।

टिप्पणी : -- यह न होने पाए इस हेतु सत्ताधारी भ्रष्टाचारिता को निरंतर प्रोत्साहित कर रहे हैं ॥

जीव साधन तो केवल मानस के हुँत जोइ  । 
जीवन धन के सों सकल, जीव जगत हित होइ ।२४१०। 
भावार्थ : --  मानव संसाधन  मानव जाति  का हेतु निहित है । जबकि जीवन धन में समस्त जीव जगत  हित निहित है ॥ अत: यदि अर्थव्यवस्था ईंधन  आधारित  है तो इसका अर्थ यह है कि वह मानव संसाधन पर  आधारित अर्थ व्यवस्था है कोई अर्थ व्यवस्था यदि कृषि पर आधारित है तो वह जीवन आधारित अर्थ व्यवस्था है और संसाधन से जीवन अधिक महत्वपूर्ण होता है ॥

" कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था मुद्रा पर निर्भर नहीं होती, जबकि संसाधनों पर आधारित अर्थव्यवस्था पूर्णत: मुद्रा पर निर्भर होती है ।"

 " भोजन जीवन की प्रथम आवश्यकता है, साधन द्वितीयक ।"

भोग भोजन संग जुगे, साधन संग बिलासु । 
भोग बिलास जब बिहुरे, जीवन होत सुपासु ।२४१०।  
भावार्थ : --  भोग  भोजन  से संयोजित है, विलास साधन से । भोजन व् साधन से जब भोग-विलास पृथक होते हैं जीवन तभी सुखमय होता है ॥ 

अत: क्षुधा शांत करने हेतु भोजन करना चाहिए,  भोग हेतु नहीं ।   सरलतम जीवन हेतु साधन संजोने चाहिए विलास हेतु नहीं

धर्म सोही अर्थ जुगे, अर्थ के सोंह काम । 
काम सोही मुकुत जुगे, मुकुत सोंह हरि धाम ।२४११ । 
भावार्थ : -- धर्म से अर्थ संयोजित है धर्म के चार पद होते हैं (सत्य शौच दया दान )। सत्य मार्ग से प्राणी मात्र पर दया करते हुवे त्याग व दान के हेतु  अर्थ का अर्जन होना चाहिए ।  

अर्थ से काम संयोजित है अर्थ से ही कामनाएं निहित है कामनाओं से मोक्ष संयोजित है मोक्ष प्राप्ति की ही कामना होनी चाहिए कारण की मनुष्य योनि को इस भवचक्र का मुक्ति-द्वार कहा गया है 

मोक्ष से परम पद संयोजित है परम पद प्राप्त कर एक आत्मा परमात्मा का स्वरूप ग्रहण करती है ॥ 

मानस थोरे अंक रहेँ, भावै  भोग बिलास । 
घन जन के कलि काल मै लहहि बिषय उपहास ।२४१२ । 
भावार्थ : -   जब जनसँख्या विरल हो भोग विलास तभी सुखप्रद होता है । किन्तु  सघन जन संख्या  वाले कलिकाल में भोग विलास  उपहास का विषय होकर मनुष्य  मूर्खता को दर्शाता है ॥ 

कल को सुरत अजहुँ संग, कल के करौ बिचार । 
अजहुँ जनित कल सों जनिक कल सों होवनिहार ।२४१३।  
भावार्थ : - इतिहास का स्मरण करते हुवे वर्त्तमान के संग भविष्य का चिंतन करें । कारण कि इतिहास हमारे जन्मदाता का है वर्तमान हमारा है भविष्य आने वाली पीढ़ियों का है ॥ 

पुरनिआ संचई करे, सम्पद रहे सँजोए । 
होनहार हुँत आपने, सब सुख लिप्सा खोए ।२४१४। 
भावार्थ : -- आने वाली पीढ़ियों के सुख हेतु पूर्वजों ने अपनी सुख लिपसाओं का किया । और प्राकृत सम्पदा के व्यवहार में मितव्ययिता का व्यवहार कर उसे संजोय रखा ॥ 

 पूर्वजों की सम्पति पर अग्रजों अधिकार होता है, तुम्हारा अथवा हमारा नहीं.....

 प्रगति पंथ के पथिक सुन बिते काल को देख । 
भौति सुख के सम्पदा, होनहार हुँत लेख ।२४१५। 
भावार्थ :- हे प्रगति पंथ के पथिक सुनों : - किंचित अपने पूर्वजों को देखो । यह भौतिक सुख की सम्पदा विलसिता में समाप्त मत करो, इसे अपनी आनेवाली पीढ़ियों के भाग्य में लिखो ॥  

"मनुष्य अपना भाग्य स्वयं लिखता है" कैसे ऐसे.....

हल हरिआरी सोष के, भरे भूमि कल कोष । 
तहँ भूरि का कीजिये, जहाँ नहीं संतोष ।२४१६ । 
भावार्थ :--हल शोषित किया हलियारी शोषित की भूमि को कलुषित काल  की कला करने वाले कल से व्याप्त कर दिया वहां कल क्या करेगा जहाँ पर सुखों से संतोष ही न हो ।। 

ये जितनी भी कालीमाएँ हैं न तुम्हारे ही होनिहारों की होंगी हमारे थोड़े ही होंगी.....कुछ को तो अपने होनिहार  का ही पता नहीं.....  


जीवनहु के जुगाउना, निर्धन कर सो दूर । 
धनिमान को सबहि भूति, सबहि भोग भरपूर ।२४१७ । 
भावार्थ : -- निर्धन को जीवित रहने के साधन भी अप्राप्य हैं । पूंजीपतियों क  सभी भोग- विभूतियां भरपूर हैं । दुःख  की बात यह है कि यह भोग- विभूतियां लूट लूट कर संकलित की गई हैं ॥

अगन लगाए नीच भवन, होत बुरा परिनाम ।
पलक पतंग पाए के, बरे धनिक के धाम ।२४१८। 
भावार्थ : --  निर्धन की झोपड़ी में आग लगाने का परिणाम बुरा होता है । इसके एक पतंगे से धनवानों के धाम भी क्षण में भस्म हो जाते हैं ॥

धनपत पयस पवाए के आप मलाई पाए । 
राजा जी अग्या दैइ जनता करकट खाए ।२४१९।
भावार्थ : -- पूंजीपतियों को दुख उपलब्ध करवा कर राजा जी स्वयं मलाई उडा रहे हैं जनता को आज्ञा दे रहे हैं की वो कूड़ा खाए ।

पहोमि पारे पायसा,राजा के मन भाए ।
भूरि भूरि बधाई किए, जन हित हेतु बताए ।२४२० । 
भावार्थ : -- पड़ोसी देश पाक ने भारत की भूमि पर अपना अधिकार स्थापित किया और सत्ताधारियों ने इस कृत्य की  भूरि भूरि  प्रशंसा की ।  अब ये इस अधिकरण्य को विधि के रूप में अंगीकृत कर इसे देश के हित में बताते फिर रहे हैं ॥

स्पष्टीकरण : -- यदि चयनित प्रतिनिधि बलपूर्वक अथवा जनमत संग्रह से किसी क्षेत्र की भूमि अधिग्रहित कर उस अधिकरण को भूमि स्वामी के हित में कहें तो  उक्त क्षेत्र में प्रवेश करने पर ऐसे प्रतिनिधि के प्रति  उसी प्रकार व्यवहार करना चाहिए जिस प्रकार किसी देश के सीमांत देश द्वारा उसकी सीमाओं का अतिक्रमण करने पर किया जाता है.….


  



















मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३९ ॥ -----


कर्म चारी काम चहैं, नाम धार कर नाम । 
काम नाम की चाह में दोऊ करें बिश्राम ।२३९१। 
भावार्थ : -- कर्म चारि कार्य चाहता है, अकर्मण्य विहित कर्म न कर केवल कीर्ति चाहता है । स काम और कीर्ति की चाह  में दोनों ही विश्राम कर रहे हैं ॥

स्पष्टीकरण : - नाम धारक यदि कर्मण्यता से ही  कर्मचारी को कार्यशील होगा , अन्यथा दोनों ही विश्राम करेंगे.....

हाल हूला कर हल दिए, धाँधल कर कल दाए । 
दानउ दल कर बल दिए त,  निर्बल कवन सहाए ।२३९२। 
भावार्थ : --  उपद्रवियों के हाथों हल दे दोगे ( जिसका वह हथियार के रूप में उपयोग करेगा ) धूर्तों धंधकों के हाथों में यन्त्र-तंत्र-संयंत्र  दे दोगे।दानवों के हाथों में बल दे दोगे तो निर्बल की सहायता कौन करेगा ॥


कल उपकारी कर धरे हल धारे हल धारि । 
बल बलिहारी कर धरे जल धारे जलधारि ।२३९३।   
भावार्थ : -- कल उपकारी के, हल हलधारी के, बल बलिहारी के जल जलधारी के नियंत्रण में हों ॥

नायक है ना अधिप जहँ , नाय है ना न्याए । 
जन आयसु अवमान किए, जन सासन सो नाए ।२३९४। 
भावार्थ : -- जहां न तो कोई प्रधान  है न राजा है न नीति है न न्याय ही है जहाँ अपने ही नियम हों जहां जनादेश का पालन नहीं होता हो वह शासन जनतंत्र तो कदापि नहीं है,  वह कुछ और ही है ॥

स्पष्टीकरण : -- अंग्रेज  ऐसे ही शासन करते थे, इसे अधिनायक तंत्र कहते है इसका प्रमुख,  अधिनायक कहलाता है ॥

हलजीबी हलभृति चहैं, नवन खंड नव सूति । 
कलजीबी कलि कृति करत चहैं सकल भव भूति ।२३९५। 
भावार्थ : -- हल जीवी पृथ्वी के सभी नव खण्डों को दोहदवती/दुधारू गाय  कर केवल हलभृति की अभिलाषा करता है । कलजीवी कलुषित कल की कलाकृति कर समस्त विभूतियों की लालसा करता है ॥

अजहुँ जन घन बन भयऊ, ब्याल भयो कुचालु  । 
जति रूपी नय नीति को, चाहिये एक कृपालु  ।२३९६। 
भावार्थ : -- अधुनातन जन साधारण  सघन वन का स्वरूप धारण किए है व् निज स्वार्थ हेतु बुरी बुरी चाल चलने वाले हिंसक पशु हो गए हैं । सद नीति नियम रूपी सन्यासियों को अब एक कृपा निधान भगवान  की आवश्यकता है ॥

कृपानिधि कर कृपन चहै, कृपनी चहै कृपालु । 
कलुष कला के काल कर कुचालि चहै कुचालु ।२३९७। 
भावार्थ : -- कृपा निधि कृपणता करते है । दीन दुखी कृपा के सिंधु का अभिकांक्षी है  । काल को कलुषित कल की कलाओं का काल कर कदाचरणी कदाचरण का अभिकांक्षी है ॥

बल पौरुख अतिचार किए ,निर्बल कवन सहाए । 
बिहुरे बिहग के सौंमुह, जूह सदा जय पाए ।२३९८। 
भावार्थ : --  अनुचित बल यदि अत्याचार करे तो निर्बल का सहायक कौन हो । एकाकी पक्षी के सम्मुख एकता किए हुवे  पक्षी का समूह सदैव विजित होता हैं ।अत: बल पुरुष के सम्मुख निर्बल को एक हो जाना चाहिए ॥

तहाँ न सम्पद आपनी जहाँ न राजा होइ । 
सकासी के सम्मति लए ले जावै जो कोइ ।२३९९ । 
भावार्थ : -- जहाँ राजा नहीं होता वहां अपनी संपत्ति अपनी नहीं होती । हमारे देश में भी शासक नहीं है कुशासक ही उर उसने यह नियम बनाया है कि  ७०% अड़ोसी-पड़ोसी की सम्मति लेकर निर्बल की सम्पति को जो चाहे वो ले जाए ।

और ये दस लखिया सूत वाले महाराज कहते हैं नहीं पड़ोसियों से भी पूछना ज़ुरूरी नहीं है ॥
उठा लो !!!

एक बात तो बताइये : -- लकवा मारने पर (पक्ष का आघात )  कोई खटिया पकड़ता है कि खटिया पकड़ लिए इस लिए लकवा मारता है ।

सेबक के सेबाभिरत, स्वामि नावै सीस । 
कोटि कोटि गनमान पर सासन किए दस बीस ।२४००। 
भावार्थ : --  सेवक की स्वामी ही शीश झुका कर सेवा टहल कर रहा है । जो स्वयं अनुशासित नहीं हैं वे  दस बीस लोग ही करोड़ों गणमान्य जनों पर शासन का रहे हैं ॥



शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३८ ॥ -----

दया धर्म का मूल है दान पात फल फूल । 
सारे सो सत सार है, तारे सो तप तूल ।२३८१ -क । 
भावार्थ : --धर्म रूपी वृक्ष का मूल दया (प्राणी मात्र पर ) है जहाँ दया न हो वह धर्म नहीं है ।उसके पत्र फल एवं फूल दान हैं,वृक्ष के द्वारा ग्रहण किया गया सार सत्य रूपी सार है । अपने उपासकों का नाव बनकर उद्धार करने वाली लकड़ी तप है ॥ 

 बढे तो बड़ तूल बढ़े, अपने मूल नुकूल । 
सबहि भाँति सब हुँत सुखद, पलए फलए बिनु फूल ।२३८१ -ख । 
भावार्थ : --उस अधर्म रूपी वृक्ष को वट वृक्ष के जैसे अपने मूल के अनुकूल ही बढ़ना चाहिए वह अपने मूल को न भूले । जो सभी प्रकार से सभी के लिए सुखप्रद हो, जो बिना अभिमान के फले फूले ॥

हे रे मानो मरि गयो,रोई दुनिआ सारि । 
पसु बसन सन जनम लियो, मारे बारहि बारि ।२३८२। 
भावार्थ : --हाय रे ! आतंकवदियों ने मानुष मार दिए, सारी दुनिया रोने बैठ गई ॥ वही मानुष पशु के वस्त्र धारण कर वारंवार जन्म लेता है रोने वाले ही उसे वारंवार मारते हैं ॥

 आतंकवदियों ने तो उसे एक ही बार मारा, वारम्वार उसे किसने मारा.....?

भई अजहुँ सब ते अधम, जे मानस की जात । 
कुकरनी संग आपनी,सब खून करे असाँति ।२३८३। 
भावार्थ : -- अधुनातन यह मानुष जाति सबसे नीच जात हो गई है । जो अपनी कुकरनी के संग चारों ओर आतंक मचाए हैं ॥

एक कूल जनम एक मरनि, परे बीच में जीउ । 
जोड़ जुगत लगाई में, भूरे अपनी सीउ ।२३८४। 
भावार्थ : -- एक तट पर जन्म तो दूसरे तट पर मृत्यु है मध्य में यह जीव जगत है ॥ जो अपने योग की युक्ति को युक्त करने में ( अर्थात जीविका के संघर्ष में ) तट को विस्मृत किए मझधार में ही विचरण कर रहा है ॥


उपकारै उपकार है, अपकारै अपकार । 
जग सोंह सोइ पाइये,किए जोइ ब्यौहार ।२३८५। 
भावार्थ : -- हम जैसा व्यवहार  करेंगे संसार भी हमसे वैसा ही व्यवहार करेगा ।  हम  मंगल करेंगे तो यह हमारा मंगल करेगा हम अमंगल करेंगे तो यह भी अमंगल ही करेगा ॥

तू जग सोहि कठोर है, जग तुझ सोहि कठोर । 
जो तू पौरै पौर है, तो जे अपने ठोर ।२३८६। 
भावार्थ : -यदि तुम निष्ठुर हो  कट्टर हो तो यह संसार तुमसे अधिक निष्ठुर और कट्टर है । तुम जन्म-मरण के चक्र में बंधकर दस ठिकाने बदलते है  यह सदैव अपने ठोर पर रहता है,  आज तुमने जिसकी जो दशा की कल  यह तुम्हारी वही करेगा ॥

झूठी बोली छोलका, साँची सार सरूप । 
झूठा पोला ढोलका, साँचा घन घन रूप ।२३८७। 
भावार्थ : -- असत्य वचन यदि वाह्य वल्कल हैं तो सत्य सार भाग के स्वरूप हैं । मिथ्यावादी के भेद होते हैं अत: उसका भेदन किया जा सकता है सत्यवादी के भेद नहीं होते अत:वह अभेद्य होते हैं ॥

छल की झूठी छाय सों, भली साँच की धूप । 
जे कंचन मन काल किए, जे कुंदन के रूप ।२३८८। 
भावार्थ : --  छल की मिथ्या छाया से सत्य की धूप भली होती है । छल छाया कंचन तन को कुंदन कर मन को कलुषित करती है सत्य की धूप कंचन तन को कलुषित कर मन को कुंदन करती है ॥

भारत में भ्रष्टाचरन भयउ गंग की धार । 
सकल तीरथ बार बार ये तीरथ एक बार ।२३८९। 
भावार्थ : -- भारत में भ्रष्टाचरण बहती गंगा हो चली है शिष्टाचारण परनाले ॥ सरे तीरथ बार बार करो पर इस गंगा का करो सारी  दरिद्रता नहीं धूल जाए तो कहना ॥

राजा बहुंत सँहगे भए, मिलै टका मैं तीन । 
तापर धुंधक धनिमान, रहे दीन के दीन ।२३९०। 
भावार्थ : -- सस्ते के दिन आ गए हैं अब तो राजा एक टके में तीन मिल रहे हैं । इतनी सँहगाई होने पर भी इन उद्योगपतियों की दरिद्रता नहीं जाती ॥





















बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३७॥ -----

दाएँ बाएं तो किछु नहीं, जग लग करे बखान । 
तेरी कहनि से पहले, पहुंचे तेरा दान ।२३७१ । 
भावार्थ : -- देना-वेना कुछ नहीं जग भर में रुक्का कर दिया । तुम्हारी कथनी से पूर्व तुम्हारे दिए दान को पहुंचना चाहिए ।।  

कर सों बहुंत कुकरम किए, मुख सों किए बहु कर्म । 
मर्म पराया जान नहि सो का जाने धर्म ।२३७२ । 
भावार्थ : -- जो हाथों से तो कुकरम करता है और मुख से कर्म करता है । जिसे पराया मर्म ज्ञात  न हो वह धर्म-सस्कार-संस्कृति क्या जाने  ।। 

घरियारि घरी पलक दिए गिन के साँस सँजोए । 
जेतक बिरथा ब्यय किए, तेतक जीवन खोए ।२३७३ । 
भावार्थ : -- घंटा बजाने वाले ने  अनंत समय में से तुझे घड़ी पलक का ही समय दिया हैं  तुझे स्वांस भी गिनकर ही  दी हैं । स्वांस की जीवटता कल्याण करने में ही है इसका जितना अपव्यय होगा मृत्य उतनी निकट होगी ॥ 

तिन पूरन कर लीजिये काज बचे जो कोए । 
घरी पलक का देहरा, न जाने कब खोए ।२३७४ । 
भावार्थ : - शेष कार्यों को पूर्ण कर लेना चाहिए, यह शरीर घडी पलक का है जाने कब खो जाए ॥ 

अजहुँ आज का राज है, करी लेब सब काज । 
काल काल को जोगता, काज जोगता आज ।२३७५ । 
भावार्थ : -- अभी तो आज का राज है इसकी लाठी है  भैंस भी इसी की है  अत: सभी कार्य संपन्न कर लेने चाहिए । क्योंकि कल तो मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है आज कार्य की ॥ 

यह जग जीवन जोत सों, भयऊजोतिर् बान । 
जब लग सार गहे रहीं रहिहि प्रान में प्रान ।२३७६। 
भावार्थ : -  संसार जीवन रूपी ज्योति से ही ज्योतिर्मय है ।जब तक यह सार ग्रहण किए रहेगी तब तक प्राणों में प्राण अधिष्ठित रहेंगे ॥ 

जीउ जगत जिउनाबास,साधन प्रानाधार । 
जी उठे तो जीवन न तरु पाहन है संसार ।२३७७ । 
भावार्थ : -- जीव जगत यदि शरीर है तो जीव-साधन उसका ह्रदय है प्राणों के अधिष्ठान से ही यह संसार चैतन्य है  अन्यथा पाषाण है ॥ 


दीपक सारे बरतिका बर्तिक सारै सार । 
बिनहि लगनाधार करे, होत  नहीं उजरार ।२३७८। 
भावार्थ : -- दीपक है सार है वर्तिका है किन्तु जब तक उसमें अग्नि अधिष्ठित नही होती तब तक वह प्रज्वलित नहीं होता ॥ 

मानस भूषन मान के भए संसार सरीर । 
तिन अभरन का कीजिये, रहे नहीं जब चीर ।२३७९। 
भावार्थ : - वर्तमान में मानव को आभूषण अनुमान कर यह संसार शरीर हुवा जा रहा है । वस्त्रहीन शरीर में आभूषण व्यर्थ होते हैं ॥ 

पाहन पाहन पूजिता कैसे धारे प्रान । 
पूजे हरिदै कोमला, होइहि अवसि निधान ।२३८०। 
भावार्थ : -- पत्थरों को यदि पत्थर ही पूजेंगे तो कहीं और प्राण  कैसे प्रतिष्ठित होंगे । कोमल व् दयाशील  ह्रदय जब कठोर पत्थरों को पूजेंगे  तब प्राणों की प्रतिष्ठा अवश्य ही होगी॥










सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३६ ॥ -----

यह सकल संसार लगे,  भगवन का परिबार । 
जान इहां घरी न लगे , आन लगे घरियार । २३६१ ।  
भावार्थ : - यह सारा संसार भगवन का कुटुंब प्रतीत होता है । यहन आने के लिए सैकड़ों घड़िया लगती हैं किन्तु जाने के लिए घड़ी भर का भी समय नहीं लगता ॥ 

बैद मुआ रोगी मुआ,मुआ न जी का रोग । 
एक ए  मेरा मैं न मुआ,मरि मरि गए सब लोग ।२३६२ । 
भावार्थ : --वैद्य मर गए रोगी मर गए किंतु जी का रोग नहीं मरा । लोग मरते चले गए एक ये मेरा मैं नहीं मरा ॥
मैं :-- उत्तम पुरुष के कर्त्ता का रूप,अहम्

एक खल भलमनसी भया,भया नगर धन्नाह ।
हाथ सों किछु छूटे नहि, दानी पद की चाह ।२३६३।
भावार्थ : -- एक दुष्ट आत्मा  सेठ बन गया तो भला मनुष्य कहलाने लगा । चूँकि वह सवभाव से दुष्ट था अत?: उसके हाथ से छूटता तो कुछ भी नहीं और महा दानी पद की लालसा करता था ॥ 

धन  सों भविल भवन भया, पड़ी टूमरी टूट । 
तापर घर भर रहा लए दोउ हाथ ते लूट ।२३६४ । 
भावार्थ : -- ऐहिक साधन के ष भव्य भवन भी गढ़ लिया जिसमें टूमड़ी टूट टूट के पड़ती थी । इसपर भी वह दोनों हाथों से लू लूट लूट के अपना घर भरे हैं ॥ 

कोइ छूट की चाह लिए कोइ लूट की चाह । 
फैरे करज सम्पुटिका ,चाहिए न केहि नाह ।२३६५। 
भावार्थ : -- किसी को छूट  की चाह है किसी को लूट की । कर संपुटिकका फैली है यहाँ बैठे बैठे किसको नहीं चाहिए ॥  

कतहुँ  छूट की लूट है, कतहु लूट की छूट । 
नगरि अँधेरा राज किए छाए कपट छल कूट ।२३६६।   
भावार्थ : -- कहीं छूट की लूट मची है कहीं लूट की छूट है । नगरी में अनीति का राज है छल कपट एवं मिथ्या छाई हुई है ॥ 

अंतर एक पाषान है बाहिर एक पाषान । 
भागता भगवन बंदिये, होहिं प्रतिठीत प्रान ।२३६७ । 
भावार्थ : -- यदि तेरा अंतर जगत एक पाषाण है तो यह बाह्य जगत उससे भी कठोर पाषाण है । हे भक्त !तू ईश्वर की वंदना कर इसमें अवश्य ही प्राण प्रतिष्ठित होंगे ।। 

दिआ मैं दिआ कही के, दाता चढ़े बिमान ।
दिआ सो तो मिले नहीं बेगि मिले पहचान ।२३६८। 
भावार्थ : --  मैने इतना दान दिया ऐसा कहकर दाता विमान में चढ़े फिर रहा हैं । उसका दिया अब तक नहीं मिला किन्तु दानवीर रूप में उसकी कीर्ति बड़ी द्रुत गति से मिली ॥ 

उसका दिया किसी को मिल जाए तो बता देना अपने भी अँधेरे दूर हो जाएं.....

दाता देवन की कहे पाए बिनहि दिए मान । 
आप तो  गाहि पद गहे दान बीर भए आन ।२३ ६९ । 
भावार्थ : -- जो कोई केवल देने की कहकर बिना दिए ही दाता का सम्मान प्राप्त करता है वह सम्मान दाता को दानवीर घोषित कर स्वयं ग्राही पद को प्राप्त होता है ॥ 

दायन पहुँच कहँ लगे, जहँ लग किए पहचान । 
करे पहचान कहँ लगे, जहाँ लग पहुंचे दान ।२३७०। 
भावार्थ : - दान की गई वस्तु की पहुंच कहाँ तक होनी चाहिए । जहाँ तक तुम्हारी कीर्ति हो । कीर्ति कहाँ तक होनी चाहिए जहाँ तक दान की गई वस्तु की पहुंच हो ॥ 











शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३५॥ -----

काम के बोल बोल बिनु  जो किए बिरथ अलाप  । 
तिनते महति सो मुख है, जोइ रहे चुपचाप ।२३५१। 
भावार्थ : -- अर्थान्वित वचन न कहकर जो निरर्थक अलाप करता है उससे वह मुख श्रेष्ठ है जो मौन मुद्रा का वरण किए हो ॥

नाम करे  बिनु काम किए सो सुत  नाम कमाए । 
काम करे बिनु नाम किए, सो सब नाम कराए ।२३५२। 
भावार्थ : -- जो पुत्र नाम करे बिना ही काम करता जाता है वही यश को प्राप्त होता है । जो काम करे बिना ही यश को प्राप्त  होता है वह सब कुछ अपने नाम कर लेता है ॥

पाँच भूत का भूतना,रहए बूँद के भीत । 
मैं मैं मैं मैं कर कहए,लिआ जगत को जीत ।२३५३। 
भावार्थ : -- पांच भूत का भूतना कभी एक बूँद के भीतर था । अब देखो कैसे मैं मैं करके कह रिया रे मै णे  तो संसार जीत लिया ॥

उद्योग सुदृढ़ अर्थव्यवस्था का आधार नहीं होते, होते तो यह अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होती
काल व् परिस्थितियां देशों पर निर्भर होती हैं,
"क्षण भर की समृद्धि, समृद्धि नहीं कहलाती..... "

तलबारि की मार सोंह बढ़ी सब्द की मार । 
एक ते एकहि बार मरे,एक ते बारहि बार ।२३५४। 
भावार्थ : -- तलवार की चोट से शब्दों की चोट गहरी होती है,  एक से तो एक ही वार,  एक से वारंवार मृत्यु होती है ॥

जो भाउ के जोग लगे, मुख सों बोलिए सोए । 
जो सब्दाँ सँजोग लगे, सोइ भाव उर जोए ।२३५ ५। 
भावार्थ : --  मुख को भाव से संयोजित शब्दों की व् ह्रदय को शब्दों से संयोजित भाव की व्यंजना करनी चाहिए ।।

एक सब्द में ए देस हैं, एक देई उपदेस । 
एक सब्द घनस्याम है, एक सागर सय सेस ।२३५६। 
भावार्थ : -- एक शब्द में यह भारत देश है एक शब्द में उपदेश है । एक शब्द में घनश्याम हैं एक शब्द में भगवान श्रीहरि हैं ॥

भगिनी पतिनी पूतिका, नारी मात सरूप ।
नारी सब रूप बंदिए, नारी रूप अनूप ।२३५७। 
 भावार्थ : -- नारी का प्रत्येक रूप सुन्दर होता है,  नारी भगिनी है  पत्नी है पुत्रिका है नारी माता का स्वरूप है अत: इसके प्रत्येक रूप की पूजा करनी चाहिए ॥

एक कोत दुआरी लगे, दूज क़ुतुब की लाट । 
घेर घार हँकार लगे,हाँकारी की हाट ।२३५८। 
एक और यहाँ दुवारी है दुआरी जोसका पट ही नहीं है दूसरी ओर पुस्तकों वाली अटारी है जहां ही पुस्तक नहीं है ॥  अहंकार को घेरे एक  घेरी जहाँ पक्ष में  बोलने वालों का ही हटवारि लगती है ।।

उत्तर : - इंडिया का गेट, क़ुतुब मीनार, पालिका बाजार

गोल गोल अकार लगे, गोली जाकी बात । 
दिन सबहि हुरिहार लगे, देवारी सब रात । २३५९ ।      
भावार्थ : -- इसका आकार गोल गोल लगता है किन्तु यह गोलाकार भी नही है इसकी बातें गोली जैसी लगती है किन्तु कोई मरता भी  नहीं है । यहाँ सभी दिन राग-रंग वाले लगते है,  यहाँ सभी रातें  दिवाली  वाली  लगती है ॥

उत्तर : --संसद-भवन

यह सकल संसार लगे, पातुक का परिबार । 
आन जहँ घरियार  लगे, जान घरी  कुल चार । २३६०।  
भावार्थ : - यह सारा संसार पतन करने वालों का परिवार लगता है । यहाँ आने में तो घंटा भर लगता  है किन्तु जाने में चार घडी लगती है ॥

उत्तर : --देहली
















बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३४ ॥ -----

धरम सूचक सकल चिन्ह,होत प्रतीक सरूप । 
तिन्ह बरै तो दरसनै , धरम परायन रूप ।२३४१ । 
भावार्थ : - धरम सूचक चिन्ह सम्बंधित धर्म के प्रतीक स्वरूप होते हैं ।इन चिन्हों का वरण धर्म के प्रति निष्ठां को दर्शाता है ॥ 

धरम चरन लौ लीन नहि, अहहीं कहन कुलीन । 
धन साधन सन पीनाए रहें दीन के दीन ।२३४२ । 
भावार्थ : -- जिनकी अपने धर्म में निष्ठां नहीं है वही कुलीन कहला रहै हैं ।रहने  को तो उनके पास सब कुछ पर मांग मांग के खा रहे हैं ॥  

काल  कलुषित करम करे धरम करे ना कोए । 
छेद  बिचार नीच लखे, ऊँच पदार्थि होए ।२३४३ । 
भावार्थ : --  (जिनकी अपने धर्म में निष्ठा नहीं होती ) ये काले कलुषित करम करते हैं पुण्य कुछ भी  नहीं करते । अपने विचारों को तुच्छ व् ऊँचे पदों की लालसा किए ये सदा नीचा ही देखते हैं ॥ 

एक सुरा को सुरा कहए,दूजे सुधा पुकारि । 
सूरा पीत जेहि बिधि हो,होत सदा मतबारि ।२३४४ । 
भावार्थ : -- ये सत्ताधारी जो है न वह एक विधि की सूरा को सुरा कहते है दूसरी विधि की सूरा को अमृत कहते है । सुरापान चाहे किसी विधि में हो वह मतवाली ही होती है ।

राजा बासे झोपड़ी, सेबक नीक निबास । 
राजा पद पयादा भए, सेबक उरै अगास ।२३४५। 
भावार्थ : --   सेवक सुघर सुघर भवन में बसने लगे राजा झुपड़िया में बसे हैं । राजा का पद प्यादा  का पद हो गया,और सेवक  धरती में पग नहीं रखते उड़ते फिरते हैं।।

राजा पद प्यादा भए,सबक राजै राज । 
राजा पद बिनु पनहिआ, सबक के सौ साज ।२३४६। 
भावार्थ : -- राजा का पद प्यादे का पद हो गया जबसे सेवक राज करने लगे । राजा का पद पन्हैया से रहित हो गया जबसे सेवक के सौ सौ साज हो गए ॥
पन्हैया = खड़ाऊ

राजा लभन बहु सुलभा, सेवक दुर्लभ होए । 
सुलभ पद केहि न चाहिए, दुर्लभ चहँ सब कोए ।२३४७। 
भावार्थ : -- राजा के दर्शन अत्यंत सुलभ व् सेवक के दुर्लभ हो गए ।  दुर्लभ दर्शी पद के तो सभी आंकाक्षी है, सुलभ दर्शी पद किसी को नहीं चाहिए ।।

स्पष्टीकरण : - जो किसी को नहीं चाहिए त्यागी संत उसी का वरण करते हैं.....

मान साधन संग होए  धन सन होए उठान । 
अजहुँ तिन्ह जोहत कीनि, सबहि गोहारि आन ।२३४८। 
भावार्थ : -- पहले साधूता से सम्मान होता था लोग सद विचारों से ऊपर उठते थे । अब तो सम्मान सुख के साधनों के संग हो गया है और उठान धन के संग,  जो धन-साधन का संग्रह करता है लोग  उसी की  चरण जुहारी करने लगे हैं ॥

जो पद लाहन दुर्लभा,चहैं सोए सब कोए । 
जो पद केहि न चाहिये सतजन तिनके होए ।२३४९। 
भावार्थ : -- जो पद प्राप्त करने में कठिन हो सब कोई उसी पद की लालसा करते हैं । जो 'पद' किसी को नहीं चाहिए साधु सज्जन उसी पद के हो जाते हैं ॥

भाजन बिभुत भूषन सन, भूसा बरे बहूँति । 
पके पाक पबिता तेहि, पाक भवन के भूति ।२३५०। 
भावार्थ : --    पके पाक  की शुद्धता से ही पाकागार सुशोभित होता है  उत्तम भाजन व्  उत्तम साज श्रृंगार से नहीं ।












सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३३ ॥ -----

काले काले मोतिया धौली धौली सीप । 
एक मुख बासित औषधी, दूजे देस अधीप ।२३३१। 

उत्तर : - तीक्ष्ण- गंधा, नेताजी धौला बाहर में काला अंतर

जनम झुलाए पालना, बहुरि पलन  पौड़ाए । 
बिरधा बए दए लाकुटी, मरे त चिता चिनाए ।२३३२। 
उत्तर = लकड़ी

ग्यान  थाना आपने सीख आपने थान । 
सीखे सो बनिहार भए, ग्यानि बने किसान ।२३३३ । 
भावार्थ : -- शिक्षा एवं ज्ञान का अपना अपना महत्व है, शिक्षा से ज्ञान अधिक महत्वपूर्ण होता है । शिक्षित  परिश्रम कर श्रमिक बनता है ज्ञानी खलिहान का स्वामी होकर किसान बनता है ॥

बनिहारी किए खन धरे, जोई बनै किसान ।
खलिहान मोल जान के, खन दए आदर मान।२३३४।
 भावार्थ : -- परिश्रम करते हुवे जो कोई श्रमिक खलिहान का स्वामी बनता है, वही अन्न का माहत्म्य संज्ञान कर खेतों का आदर करता है ।।

सेबक  सों स्वामि बने मरत बने अरु कोए । 
कारे कारे करम किए, मुए हुँत पाप सँजोए ।२३३४। 

भावार्थ : - सेवक से स्वामी बने हुवे व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसके स्वामित्व  हस्तांतरित जब किसी अन्य को होता है वह उसके श्रमफल व् कर्म भूमि का आदर न  कर काले कुकर्म करता है उस मरे हुवे स्वामी के लेखा में पाप ही लिखता है । एतेव श्रमिक से कोई स्वामी बने तो वह सेवक ही बना रहे

स्पष्टीकरण : -- शिक्षा हस्तांतरणीय नहीं होती ज्ञान हस्तांतरणीय होता है ।जैसे : --  चिंकित्सक की संतान चिकित्सक नहीं कहलाती उपचार करना उसे आ ही जाता है ॥ उसी प्रकार सेवा धर्म हस्तांतरणीय नहीं होता किन्तु स्वामित्व हस्तांतरणीय होता है ।।

बाँधन ते जो भल होए,बिनु बाँधे खल होइ । 
ताते बाँधन ही भलो, बाँध सकै जो कोइ ।२३३५। 
भावार्थ  : -- यदि कोई बाँधने से नायक बन जाता है वह बिना बाँधे खलनायक बन जाता  है । जो कोई बांधने में समर्थ हो तो ऐसे को बाँधना ही अच्छा । अब  तो इस खलनायक से कोई नायक ही निपटेगा ओर नायक बनने के लिए बंधना तो पड़ेगा ॥ 

बुरे काल का बिहुरना,बुरे काल का साथ । 
सीस ऊपर होत भलो सदा बड़े का हाथ ।२३३६ । 
भावार्थ :-- बुरे दिनों का व्यतीत होना, बुरे दिनों  के साथी सदैव अच्छे होते हैं , सिर पर बड़ों की छाया सदैव सुखदाई होते है ॥ 

भले काल का बिहुरना भले काल का साथ । 
सीस ऊपर होत सदा बुरा बुरे का हाथ ।२३३७ । 
भावार्थ : -- अच्छे दिनों का  लौटना, अच्छे दिनों के साथी सदैव बुरे होते हैं , सिर पर बुरों का हाथ सदैव बुरा होता है ॥

जुलाहे का तीर हो कि चाहे जुलाहि दाड़ि । 
लाह  लखे तो  राख लिए, लाह लखे दिए छाँड़ि ।२३३८। 
भावार्थ : --झूठे वचन के तीर हों चाहे बिना मूँछ वाली दाड़ी अवसर देखकर ही रखे व् छोड़े जाते हैं ॥ जहाँ रखने में लाभ दिखा वहां रख लिए जहाँ छोड़ने में लाभ दिखा वहां छोड़ दिए ॥

जो को कोउ दोष करै बाँध परै पछिताए । 
काल अंतर छूट चले,सो तो दोषी नाए । २३३९। 
भावार्थ  = यदि कोई अपराधी किए गए अपराध का नियमपूर्वक दंड भुगत कर उसका पश्चाताप करता है ॥ कालांतर में जब मुक्त हो जाए व् किए गए अपराध  की पुनरावृत्ति न करे तब वह अपराधी नहीं कहलाता ॥ 

धुनुरु कर मैं गहे रहे, छूट लगे उर बान । 
न्यायतस दोष धरन मैं, दोनउ एकै समान ।२३४० । 
भावार्थ : -- धनुष कर में ही ग्रहीत रहता है यद्यपि वाण ही ह्रदय का भेदन करता है ॥ न्याय की दृष्टि में धनुष व् वाण  दोनों ही दोषी होते हैं ।।  







शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३२ ॥ -----

चढ़ सिंहासन सासन धर, बने चहैं सब कोइ । 
जोई सेबक पद गहै सोइ सराहनि  होइ  ।२३२१। 
भावार्थ : -- सिंहासन चढ़ के सभी शासक बनना चाहते हैं । जो कोई सेवक पद ग्रहण करे वह  प्रशंसा के योग्य होता है॥

>>  स्वयं को अनुशासित करने के लिए शासक का चयन करना चाहिए राज करने के लिए नहीं
>> जिसे स्वयं को अनुशासन की आवश्यकता है वह क्या शासन करेगा.....

दुर्नय नीति दुरभृति सों भारत भए अस देस । 
सासन सीस निजोग के, गुरु को दें आदेस ।२३२२। 
भावार्थ : -  भारत ऐसा देश हो चला है जहां अनुचित  उद्दंड, नीति विरुद्ध आचरण को वरन कर शासन यथोचित रीति से आदेश का पालन न करने वाले व्  शिक्षा देने योग्य शिष्य को उच्च पदों पर नियुक्त करते हैं जो अपने गुरुओं को आदेश  देते हैं ॥

जैसे प्रेमी प्रियतमा, तैसी प्रीति प्रतीति । 
जैसे नेमी नियंता, तैसी नियमन नीति ।२३२३ । 
भावार्थ : - पिया व प्रिया जैसे होंगे प्रीति व् प्रतीति भी वैसी ही होगी । जैसे नियम के पालन कर्ता व् नियंता होंगे उनकी  नियम नीतियां भी वैसे ही होंगी ॥

भैंस आगे बीन बजे भैंस खड़ी पगुराय । 
बिहुरि बूझता आपनी,मूरख जो समुझाए ।२३२४ । 
भावार्थ : --भैंस के आगे बीन बज रही है और भैंस को खाने मने की जुगाली करने से विश्राम नहीं । मूर्खों को समझाने से अपनी भी समझ चली जाती है ॥

राउ धानी ढके रहे, पहन पंच परिधान । 
पुर पुरा के पिंजरा, भयौ बिनहि ओहान ।२३२५ । 
भावार्थ : -- राज धानी बहुमूल्य परिधान आभरित किए है । छोटे छोटे गाँव खेड़े  को तन ढँकने के लिए भी वस्त्र नहीं हैं ॥

पाल पलक पँच तोरिया, पहिरै देइ उतार । 
पौरिक बिनही पौरिया, भयऊ बिनहि उहार ।२३२६। 
भावार्थ : - प्रजापाल बहुमूल्य परिधान आभरित कर उसे क्षणभर में ही त्याग देते हैं । प्रजा को न तो सिर ढकने के लिए छप्पर है न ही तन ढंकने के लिए वस्त्र हैं ॥

सद मुखिआ पँच तोरिया, कुल हित हेतु उहारि । 
कुलहित हेतु धराए रहि, कुलहित हेतु उतारि ।२३२७ । 
भावार्थ : - सद मुखिया कुल के कल्याण हेतु ही उत्तम परिधान धारण करता है,कुल के कल्याण हेतु ही धृत करता है  कुल के कल्याण हेतु ही उसे धारित किए रहता है कुल के कल्याण हेतु ही उसका त्याग करता है ॥

पालक जनधन जोइ के, खाए पाक पकवान । 
प्रजा खेह खन खोइ के, बिलखे बाट बुआन ।२३२८ । 
भावार्थ : -शासक जनता के धन से पकवान उड़ाए है । जनता अपने खेत खंड गँवा के बोवनी की प्रतीक्षा में है कब अन्न हो कब वह पके कब उदर की पूर्ति हो ॥

पदासीत् उंचे पदक, बारहहि घरी जोए । 
चारि खेले चारि खाए, चारि सयन मैं खोए ।२३२९। 
भावार्थ : - बारह घड़ी संग्रह  किए ऊँचे पद के अधीश बने अर्थात उत्तम योनि को प्राप्त हुवे । चार घडी खेलने में चार खाने में चार शयन में नष्ट कर दी ॥

होत  अमोघ बान सरिस, बर राजन की बानि । 
मध्यम भेद जानै  नहि, अधम मरमु नहिं  जानि ।२३३०। 
भावार्थ : -- उत्तम राजा की वाणी अमोघ वाण के सदृश्य होती है इसे मर्म/रहस्य का भी ज्ञान होता है व् भेदन/उद्घाटन  का भी ।मध्यम की बाणि साधारण बाण के जैसी होती है उसे मर्म का तो ज्ञान  होता उसे भेदने का ज्ञान नहीं होता,  अधम की वाणी अधम वाण के जैसी होती है उसे न मर्म का भान होता ही न ही भेदन का ।










बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३१॥ -----,

सासन धर बिभाजन कर ऐसी रीत चलाए । 
भीतरी बहरियाए के, बाहरी भीतराए ।२३११। 
भावार्थ : -- सत्ता धारकों ने दश का विभाजन कर ऐसी रीत चलाई कि घर वाले बाहर हो गए बाहर वाले घरवाले हो गए ॥ ये कौन सा चारा है ?

जनक कहै जिन जानकी, जाके राम पियाए । 
संविधान सन्मान दिए, जो को  लेइ भगाए ।२३१२। 
भावार्थ : -- जनक जिसे जानकी कहते हैं जिसका पिया राम ही हो । ऐसी कन्याओं को यदि कोई भीतरी-बाहरी भगा कर ले जाए तो भारत का संविधान उसे पुरष्कृत करता है ॥

संकीर्ण विचार धारा के कुछ लोग सामाजिक व्यवस्था को विकृत करने पर तूले हैं  ये संविधान को माध्यम बना भले घर की बहु बेटियों को चारे के रूप में उपयोग कर सत्ता साधने में लगे हैं.....

 दस लाख को लीख करे रहे सूत के सूत  । 
तासु पहिरे सासन धर  लगे भूत के भूत ।२३१३। 
भावार्थ : --  दस  लाख स्वाहा करके भी कोई वस्त्रखण्ड सूत्रों से ही बने उसे पहन के सत्ता धारी यदि भूत का भूत दिखे,  उससे तो फटा पहनना अच्छा है ॥

जो मुख धनु सरूप भया, भरे सबद के बान । 
तिनके सों रन छेड़िये, जिन जग बैरी जान ।२३१४ । 
भवार्थ : -- यदि  मुख धनुष स्वरूप हो जाए व् उसमें शब्दों के बाण से भरे हों ॥ तब ऐसे धनुर्धर को उसके विरुद्ध युद्ध करना चाहिए जो विश्व कल्याण को विस्मृत कर अपने ही स्वार्थ की पूर्ति में संलग्न हैं ॥

तहँ न्याय के सब्द कहँ, जहँ देखे अन्याय । 
जहँ अन्यान्य अर्थ गहँ, उहँ मुख लिए उरगाएँ ।२३१५। 
भावार्थ : --जहाँ अन्याय संदर्शित हो रहा हो वहां  न्याय पूरित शब्द कहने चाहिए । जहां शब्द अन्यान्य अर्थ ग्रहण किए हों वहां मौन धारण कर लेना चाहिए ॥

करत कबित कलाल करे कबिबर दोई अर्थ । 
परमारथ मदरस लखे  मदिर लखे सुवारथ ।२३१६। 
भावार्थ : -- कविवर ने कविता करते हुवे उभयार्थी  शब्द कीलाल का प्रयोग किया । परमार्थ को वह सुधा दर्शित हुवा स्वार्थ को मदिरा ॥

एक सब्द धाराधर है, उचरे बिनहि बिचार । 
एक अर्थ सों घाट लगे, एक दिए घाट उतार ।२३१७। 
भावार्थ : -- एक शब्द  है धारा धारण करने वाला धाराधर । यदि यह बिना विचार किए उच्चारित हो जाए तो इसके अर्थ का अनर्थ हो जाता है एक अर्थ में नैया घाट से लग जाती है दूसरा अर्थ श्मसान घाट में पहुंचा देता है ॥
अहमिका संग करे जब आपा आगिन होए । 
मातु पिता गुरु तिअ संग, छूटे पिछु सब कोए ।२३१८। 
भावार्थ : -- बढ़ा-बढ़ी की स्पर्द्धा के संग जब 'मैं' आगे आ जाता  है तब मात-पिता गुरु पत्नी बच्चे सहित सब कुछ पीछे छूट जाता है ॥

जब लग राउ राज रजे , तब लग जय जय होइ । 
राउ रहे न राज रहे , पूछे ना फिर कोइ ।२३१९ । 
भावार्थ : -- राजा जब तक राज  करता है तब तक उसकी जय जय कार होती है । जब राजा राजा नहीं रहता राज भी नहीं रहता तब बस खटिया रह जाती है फिर उसको कौन पूछता है ॥

अजहुँ पूज न पेखियअ अपने  देस प्रधान । 
जग लग पूजत पेखिये, अजहुँ लगे बिद्बान ।२३२०। 
भावार्थ : -- विद्यमान समय मे परिस्थियाँ ऐसी हो गई हैं कि राजा अपने देश में ही दुत्कारा जाने लगा है वह पूजित होते दिखाई नहीं देता । किन्तु विद्वान अब भी सर्वत्र पूज्यनीय हैं ॥














मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

----- मिनिस्टर राजू १६१ -----

" इस बम की फैमिली का कलर तो  देखो, अमेरिकी इसीलिए दिन में भी बिजली जलाते हैं

और इस फेमिली का साइज तो देखो इतनी चमड़ी में तो दो अमेरिका समा जाए.....

राजू : -- ऐ आँटी! अब यदि इस फेमिली पर तीसरी टिप्पणी की न तो चौथा विश्व यह हो जाएगा


----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...