एक रोधी एक बिरोधी बिमत कहत सब कोइ ।
जब सिंहासन पर चढ़े दोउ एकै मत होइ ।२४०१ ।
भावार्थ : -- एक को पक्ष को अवरोधी तो दूसरे को उसका विरोधी कहते हुवे गणमान्य जन साधारण पक्ष व् विपक्ष दोनों को परस्पर विपरीत विमर्शी जान कर उनका चयन करते हैं । किन्तु ये जब सिंहासन पर बैठते हैं तब एक ही विचार के हो जाते हैं ॥
फिर इनको चुनने से लाभ क्या ? नहीं चुनने से ही सही चुनाव होता है.....
स्वाधीन सुपनाए पुनि पराधीन ही पाए ।
कूलिनी कल कलिमल किए, जहँ जल रहा बिकाए ।२४०२।
भावार्थ : -- स्वाधीनता का स्वप्न देखा यथार्तस स्वयं को पराधीन ही पाया ॥इस पराधीनता में तो संयंत्रों ने अपने गंदे परनालों से नदियों को दूषित कर रखा है यहाँ तो जल भी मोल मिल रहा है, छी इस पराधीनता से तो वो वाली अच्छी थी ॥
राजा जी का लेहना राजा जी का खेह ।
राजा जी का मेहना आज गेह कल देह ।२४०३।
भावार्थ : -- भैया अब तो लेहना ( उपज, खेत में कटे डंठलों का पूल, नट, नाई, धोबी आदि को दी जाने वाली उपज का भाग क्या खेत क्या खेतन की मिटटी क्या सब कुछ राजा जी का ही है । राजा जी के ही मेघ हैं मेहन हैं आज घर लूटेंगे तो कल घरवाली, परसों बहन- बेटी को लूटेंगे ॥
आज खलिहान खेह लिए कल लिहि गेह दुआरि ।
आज तुहरी बारी है, काल हमारी बारि ।२४०४।
भावार्थ : - आज जो तेरी उपज क्रय कर रहे हैं कल वह तेरा खेत हड़प लेंगे परसों घर फिर घरबारी ॥ आज जो तुम्हारी बारी है तो कल हमारी बारी होगी ॥
लोक तंत्र जो भवन निभ धरे चारि अस्तूप ।
पके ईंट चुनाई के,रहें भीत जान भूप जन भूप ।२४०५।
भावार्थ : -- लोकतंत्र यदि भवन के सदृश्य है और वह चार स्तूपों पर आधारित है तो उसकी भित्ति परिपक्व ईंट से निर्मित होनी चाहिए । एवं 'मैं' 'आप' अथवा 'हम' न होकर इस भवन का स्वामी जनसाधारण को होना चाहिए ।
बिना पकी हुई ईंट से तो कच्चे भवन भी नहीं बनते, फिर इनका तो बिना ईंट का भवन है और बाई-फाई बाला भी है ॥
सरब कामी धेनु सोंह, रहे देस जो खेत ।
कुसासक तिन्ह रुजित कह गयऊ निज कर देह ।२४०६।
भावार्थ : -- भारत में सार्वकाम्य् धेनु के सदृश जो भी क्षेत्र थे उन्हें कुशासक रोगी कहते गए व् उनका निजीकरण कर उन्हें उद्योगपतियों के हाथों लूटाते चले ।
जैसे : -
>> बैंक जहँ ग्राहक ही ग्राहक थे उसका निजीकरण किया
>> संचार व्यवस्था या मुबाईल-टेलीफोन = यहाँभी ग्राहक ही ग्राहक थे इसका भी निजीकरण किया
>> बीमा नियामक = यहाँ भी ग्राहक ही ग्राहक हैं शासन कर में छूट देकर यहां एक बड़ी पूंजी खडी कर सकता था अब यहाँ तो शासन को कर भी नहीं मिलता और निजी हाथों में पूँजी जा रही है ॥ निज्जी बीमे वाले कुछ नहीं देते बस प्रीमियम लेते हैं फिर जै राम जी की ये या हम मर मुरा गए तो पैसे की कोई गारंटी नहीं
>> प्रकृतिक सम्पदा क निजीकरण कर इन सब कुटिलताओं के कारण ही भारत में पहले इक्का दुक्का ही पुनीपति थे अब तो कुकुरमुत्ता जैसे हो गए यही है गांधी-नेहरू के सपनों का इण्डिया.....
जहाँ गाहक ता हूँ नहिं,जहाँ मैं गाहक नाए ।
मोहि घाट लगाई के , गाहक दूज धराए ।२४०७ ।
भावार्थ : -अपनी कुटिलता से इन शासनों ने जहां ग्राहक हैं वहां से जन साधारण को हटा दिया जहाँ ग्राहक नहीं है वहां बैठा दिया । उसके लेखे में घाटा लिख दिया और ग्राहक निजी हाथों को दे दिया ॥
कोउ लेन मैं लींन भया,कोउ देंन मैं लीन ।
कोउ अतिसय पीन भया त को अतिसय दीन ।२४०८।
भावार्थ : - कोई केवल लेने में ही लगा रहा कोई देने में । इसका परिणाम यह हुवा की कोई तो निर्धन रेखा के नीचे आ गया कोई धनिमन रेखा के ऊपर चला गया
यदि आर्थिक समानता को अपनाना है तो किसी भी व्यक्ति की आय पांच लाख मुद्रा (वार्षिक) से अधिक न हो हो । इससे मुद्रा की क्रय शक्ति बढ़ती जाएगी व् महँगाई घटती जाएगी, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण होगा अतिरिक्त आय को निर्धनों की बौद्धिक शक्ति व् उनकी योग्यता में वर्द्धन कर उसे प्राप्त करने हेतु प्रेरित किया जाए ॥
पांच लाख मुद्रा प्रति व्यक्ति ( व्यक्ति का अर्थ वयस्क से है ) हेतु पर्याप्त से अधिक हैं ।
खनि सम्पद अधार किए हो जो कोउ सँजंत्र ।
निजि कर सों अधिगहत तिन जनता करे नियंत्र ।२४०९।
भावार्थ : -- चूँकि समस्त प्राकृतिक सम्पदा जनता जनार्दन की सम्पदा है अत: प्राकृतिक संपदाओं पर आधारित उपक्रमों का अधिग्रहण हो वह निजि नियंत्रण से मुक्त होकर सार्वजनिक नियंत्रण में हो ।
टिप्पणी : -- यह न होने पाए इस हेतु सत्ताधारी भ्रष्टाचारिता को निरंतर प्रोत्साहित कर रहे हैं ॥
जीव साधन तो केवल मानस के हुँत जोइ ।
जीवन धन के सों सकल, जीव जगत हित होइ ।२४१०।
भावार्थ : -- मानव संसाधन मानव जाति का हेतु निहित है । जबकि जीवन धन में समस्त जीव जगत हित निहित है ॥ अत: यदि अर्थव्यवस्था ईंधन आधारित है तो इसका अर्थ यह है कि वह मानव संसाधन पर आधारित अर्थ व्यवस्था है कोई अर्थ व्यवस्था यदि कृषि पर आधारित है तो वह जीवन आधारित अर्थ व्यवस्था है और संसाधन से जीवन अधिक महत्वपूर्ण होता है ॥
" कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था मुद्रा पर निर्भर नहीं होती, जबकि संसाधनों पर आधारित अर्थव्यवस्था पूर्णत: मुद्रा पर निर्भर होती है ।"
" भोजन जीवन की प्रथम आवश्यकता है, साधन द्वितीयक ।"
भोग भोजन संग जुगे, साधन संग बिलासु ।
भोग बिलास जब बिहुरे, जीवन होत सुपासु ।२४१०।
भावार्थ : -- भोग भोजन से संयोजित है, विलास साधन से । भोजन व् साधन से जब भोग-विलास पृथक होते हैं जीवन तभी सुखमय होता है ॥
अत: क्षुधा शांत करने हेतु भोजन करना चाहिए, भोग हेतु नहीं । सरलतम जीवन हेतु साधन संजोने चाहिए विलास हेतु नहीं
धर्म सोही अर्थ जुगे, अर्थ के सोंह काम ।
काम सोही मुकुत जुगे, मुकुत सोंह हरि धाम ।२४११ ।
भावार्थ : -- धर्म से अर्थ संयोजित है धर्म के चार पद होते हैं (सत्य शौच दया दान )। सत्य मार्ग से प्राणी मात्र पर दया करते हुवे त्याग व दान के हेतु अर्थ का अर्जन होना चाहिए ।
अर्थ से काम संयोजित है अर्थ से ही कामनाएं निहित है कामनाओं से मोक्ष संयोजित है मोक्ष प्राप्ति की ही कामना होनी चाहिए कारण की मनुष्य योनि को इस भवचक्र का मुक्ति-द्वार कहा गया है
मोक्ष से परम पद संयोजित है परम पद प्राप्त कर एक आत्मा परमात्मा का स्वरूप ग्रहण करती है ॥
मानस थोरे अंक रहेँ, भावै भोग बिलास ।
घन जन के कलि काल मै लहहि बिषय उपहास ।२४१२ ।
भावार्थ : - जब जनसँख्या विरल हो भोग विलास तभी सुखप्रद होता है । किन्तु सघन जन संख्या वाले कलिकाल में भोग विलास उपहास का विषय होकर मनुष्य मूर्खता को दर्शाता है ॥
कल को सुरत अजहुँ संग, कल के करौ बिचार ।
अजहुँ जनित कल सों जनिक कल सों होवनिहार ।२४१३।
भावार्थ : - इतिहास का स्मरण करते हुवे वर्त्तमान के संग भविष्य का चिंतन करें । कारण कि इतिहास हमारे जन्मदाता का है वर्तमान हमारा है भविष्य आने वाली पीढ़ियों का है ॥
पुरनिआ संचई करे, सम्पद रहे सँजोए ।
होनहार हुँत आपने, सब सुख लिप्सा खोए ।२४१४।
भावार्थ : -- आने वाली पीढ़ियों के सुख हेतु पूर्वजों ने अपनी सुख लिपसाओं का किया । और प्राकृत सम्पदा के व्यवहार में मितव्ययिता का व्यवहार कर उसे संजोय रखा ॥
पूर्वजों की सम्पति पर अग्रजों अधिकार होता है, तुम्हारा अथवा हमारा नहीं.....
प्रगति पंथ के पथिक सुन बिते काल को देख ।
भौति सुख के सम्पदा, होनहार हुँत लेख ।२४१५।
भावार्थ :- हे प्रगति पंथ के पथिक सुनों : - किंचित अपने पूर्वजों को देखो । यह भौतिक सुख की सम्पदा विलसिता में समाप्त मत करो, इसे अपनी आनेवाली पीढ़ियों के भाग्य में लिखो ॥
"मनुष्य अपना भाग्य स्वयं लिखता है" कैसे ऐसे.....
हल हरिआरी सोष के, भरे भूमि कल कोष ।
तहँ भूरि का कीजिये, जहाँ नहीं संतोष ।२४१६ ।
भावार्थ :--हल शोषित किया हलियारी शोषित की भूमि को कलुषित काल की कला करने वाले कल से व्याप्त कर दिया वहां कल क्या करेगा जहाँ पर सुखों से संतोष ही न हो ।।
ये जितनी भी कालीमाएँ हैं न तुम्हारे ही होनिहारों की होंगी हमारे थोड़े ही होंगी.....कुछ को तो अपने होनिहार का ही पता नहीं.....
जीवनहु के जुगाउना, निर्धन कर सो दूर ।
धनिमान को सबहि भूति, सबहि भोग भरपूर ।२४१७ ।
भावार्थ : -- निर्धन को जीवित रहने के साधन भी अप्राप्य हैं । पूंजीपतियों क सभी भोग- विभूतियां भरपूर हैं । दुःख की बात यह है कि यह भोग- विभूतियां लूट लूट कर संकलित की गई हैं ॥
अगन लगाए नीच भवन, होत बुरा परिनाम ।
पलक पतंग पाए के, बरे धनिक के धाम ।२४१८।
भावार्थ : -- निर्धन की झोपड़ी में आग लगाने का परिणाम बुरा होता है । इसके एक पतंगे से धनवानों के धाम भी क्षण में भस्म हो जाते हैं ॥
धनपत पयस पवाए के आप मलाई पाए ।
राजा जी अग्या दैइ जनता करकट खाए ।२४१९।
भावार्थ : -- पूंजीपतियों को दुख उपलब्ध करवा कर राजा जी स्वयं मलाई उडा रहे हैं जनता को आज्ञा दे रहे हैं की वो कूड़ा खाए ।
पहोमि पारे पायसा,राजा के मन भाए ।
भूरि भूरि बधाई किए, जन हित हेतु बताए ।२४२० ।
भावार्थ : -- पड़ोसी देश पाक ने भारत की भूमि पर अपना अधिकार स्थापित किया और सत्ताधारियों ने इस कृत्य की भूरि भूरि प्रशंसा की । अब ये इस अधिकरण्य को विधि के रूप में अंगीकृत कर इसे देश के हित में बताते फिर रहे हैं ॥
स्पष्टीकरण : -- यदि चयनित प्रतिनिधि बलपूर्वक अथवा जनमत संग्रह से किसी क्षेत्र की भूमि अधिग्रहित कर उस अधिकरण को भूमि स्वामी के हित में कहें तो उक्त क्षेत्र में प्रवेश करने पर ऐसे प्रतिनिधि के प्रति उसी प्रकार व्यवहार करना चाहिए जिस प्रकार किसी देश के सीमांत देश द्वारा उसकी सीमाओं का अतिक्रमण करने पर किया जाता है.….