तनिक काल पहिले रहै भारत देस अखंड ।
उपनिबेसित देस संग, भयऊ खंडहि खंड ।२२२१।
भावार्थ : -- किंचित समय पूर्व तक यह राष्ट्र अखंड-भारत कहलाता था । पराए देश से आए लोगों की बस्तियां बसाते बसाते यह खंड-खंड हो गया ॥
को लूटक लूमरे को साधु भेष भर आए ।
लूट के सिँहासन चढ़े, लूट पाट के खाए ।२२२२।
भावार्थ : - पराए कौन ? सज्जनता के वेश वे जो डाकू थे लूटेरे थे जिन्होंने यहां के मंदिरों को नहीं छोड़ा । वे लूट के सिंहासन पर चढ़े व् यहां के शांतिप्रिय लोगों को यंत्रणाएं दे दे कर उनका धन छीन-छीन कर खाते रहे ॥
उपनिबेसी देसी भए , भारत भयऊ सेष ।
लज्जाहीन परदेसी, बसे रहे एहि देस ।२२२३।
भावार्थ : -- उपनिवेश प्रणाली का यही उद्देश्य था कि प्रवासियों की पृथक वसति हो । किन्तु शासकों ने छल किया मत के उपनिवेशी को देशज का अधिकार दे दिया । उपनिवेश तो बसे किन्तु निर्लज उपनिवेशी यहाँ से गए नहीं यहीं बसे रहे ॥ परिणाम यह हुवा कि उपनिवेश प्रणाली असफल सिद्ध हुई अत: यदि अन्य किसी राष्ट्र के समक्ष यह समस्या है तो उसे प्रवासियों को उनके ही देश में लौटाना चाहिए ॥
सुजलय सुफलय मलय भुइँ ससि स्यामल सँजोए ।
देस बनाया कोए अरु, बास बसाया कोए ।२२२४।
भावार्थ : - तप करके, त्याग करके, सत्य के मार्ग पर चलते हुवे, प्राणी मात्र पर दया करते यहाँ के देशजों ने इस सुजलम सुफलम् व् मलय पर्वत सी इस पावन भूमि को ( नदी-बहुल फलवती व् अनपूर्णा भूमि जहां गौधन का संकलन हो ) एक राष्ट्र का स्वरूप दिया । उसपर बस्ती किसी और ने बसा ली ॥
देस दिए धन धान्य दिए, तापर किए उत्पात ।
निस दिन सीवाँ काँड़ कै, दिखाए अपनी ज़ात ।२२२५।
भावार्थ : -- इन उपनिवेशी को भारत ने देश दिया धन दिया धान्य दिया और ये नित्य उत्पात करते हैं । ऐसा कोई दिन नहीं है जब इन्होने इस देश की सीमाओं का अतिक्रमण कर अपनी जात दिखाते रहते हैं ॥
पकी पकाई मेलिबै, ताते श्रम ना होए ।
अपने बिसने बिसराए,दूजे बसने जोए ।२२२६।
भावार्थ : -- पकी पकाई जिसको मिल फिर उससे परिश्रम नहीं होता । अपना पतन अपना दुर्व्यसन अपना दुर्भाग्य पाने दोष पने अपराधों को विस्मृत कर दूसरों के वेश को अपना वेश कहते हैं दूसरों की संस्कृति को अपनी संस्कृति कहते हैं, हम तो पता नहीं कौन थे क्या हो गए और क्या होंगें अभी, ये कुलीन हो गए ॥
पेट पराया पूरता पुआ पकाया कोए ।
कोउ मचाया हगनेटि, कोउ मैल मल धोए ।२२२७ ।
भावार्थ : -- पराए पेटों को भरने के लिए पुआ पकाया किसी ने खा खा के हगन हटी ( अत्यधिक मात्रा में व्युत्पन्न होना ) मचाई किसी ने मैल धोया किसी ने । उपनिवेशियों को किसान पुकारा गया हो उन्होंने मैल धोया है ऐसा किसी ने कहीं सूना अथवा कहीं पढ़ा.....?
हो जो कोइ आपना कि कोइ पराया होए ।
ऐसो कारज कीजिये, जिन चाहै सब कोए ।२२२८।
भावार्थ : -- अपना देश हो कि पराया देश हो ऐसे कार्य करने चाहिए जिसे सभी चाहें । क्योकि इस देश में धर्मात्मा का सम्मान नहीं होता अपितु उनकी पूजा होती है.....
अमौलिक को मूल करे पोष दिए खाद्यान ।
अमरत अम्ल मिलाई के, अम्लिन करे मलान ।२२२९।
भावार्थ : -- इस राष्ट्र ने अमौलिक उपनिवेशियों को मौलिक कहा उसे खंड-खाद्यान देकर उसका पोषण किया । और इसने अमृत को मलिन करते हुवे उसी राष्ट्र की पवित्रता को अपवित्र किया ॥
बसा बसति बसबासिआ,तिनका तिनका जोए ।
बसा बसेरा बिनसिआ, तिनका तिनका होए ।२२३० ।
भावार्थ : - बसेरी ने तिनका तिनका एकत्र कर बसेरा बसाया । इनकी करनी बसा बसेरा उजड़ कर पुनश्च तिनका तिनका हो गया अथवा तीन भाग में विभाजित होकर तिसरैत का हो गया ॥
झुधित उदर के दोउ कर करे न केहि पाप ।२२३१।
----- ॥ नीति वाक्य ॥ -----
भावार्थ : -- दुखी ह्रदय कौन सा जाप नहीं करता अर्थात सभी करता है । क्षुधित उदर ये दो कर कौन सा पाप नहीं करता अर्थात्त कुछ भी कर ले ॥
एक भूखे पेट की चोरी और एक सेठ की चोरी की क्या तुलना.....भूखे पेट की चोरी अपराध तो है किन्तु क्षमा योग्य है.....
मानस मन की दसा दुइ, का जागै का सोइ ।
सोए मन बुराई जोए, जगे बड़ाई होइ ।२२३२।
भावार्थ : -- मनोमस्तिष्क की दो अवस्थाएं होती है एक सुसुप्त एक जागृत । सुसुप्त अवस्था जिसे दोष दर्शाती है जागृत मन उसे गुण दर्शाता है॥
जैसे : -
हे रे हेर मिले न मम जनम दात सम कोए ।
एक संतोस पर हाँसे दुजे कोस के रोए ।२२३३।
भावार्थ : -- हे रे हमरे जन्मदाता के जैसे जन्मदाता ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे । कितने संतोषी थे एक मनोदशा यह विचार कर प्रसन्न है दूसरी कोस कोस के रोए, छी कैसे थे ऐसा भी कोई होता है ॥
कबहुंसधान रहे कबहुँ साधन सकल सँजोग ।
छे रहे गह दीनता भोगे न कोउ भोग ।२२३४।
भावार्थ : -- कभी ऐहिक सुख के सभी साधन सादर उपस्थित रहे कभी साधन के सभी संयोग उपस्थित रहे । तब भी घर में दीनता छाई रही कोई भोग नहीं भोगे ॥
टिप्पणी : -- मात -पिता के त्यागे हुवे साधन-संयोग व् दन की हुई वस्तु को संतति द्वारा उपयोग नहीं करनी चाहिए, अन्यथा उनका त्याग व्यर्थ हो जाता है.....
धनवान हुँत त्याग है दीन दरिद हुँत दान ।
सन्निधान हुँत ग्यान है, सन्निधात हुँत कान ।२२३५ ।
भावार्थ : -- धनवान के लिए त्याग उत्तम है दीन दरिद्र के लिए दान उत्तम है । संचय करने वालों के लिए ज्ञान उत्तम है चोरी चकारी लूट मारी के संचय कर्त्ता के लिए न्याय-व्यवस्था ॥
त्याग की प्राथमिकताए : --
प्रथम तजन बुराई है, दूजी कूट कुटाए ।
अधमतम कर्म संग है बहोरि कौसलताए ।२२३६।
भावार्थ : - प्रथमतस समस्त कुकर्मों का त्याग है दूसरे धंधे में छल कपट मार- पीट का त्याग । तदनन्तर दुर्वृत्तियों के त्याग के पश्चात साधन-संयोग के त्याग का स्थान है ( इसके लिए संतोष का होना आवश्यक है ) ॥
कुकर्म ही नही त्यागे तो दान का क्या अर्थ !
पाप कमाए पाप खाए पापहि को कर दाए ।
ताते पापी पाप किए, पाप बहुरि कर आए ।२२३७ ।
भावार्थ : - पाप कमाने से मनुष्य पाप ही खाता है व् पाप का ही दान करता है । पाप का दान पापी ही ग्रहण करता है वह उस दान से पुनश्च पाप करता है इस प्रकार दाता को दान के फल में पाप ही प्राप्त होता है पुण्य नहीं ॥
जाके घर सब संपदा, सब दिन करे उपास ।
तहँ सुख संतोख संग, श्रीहरि करे निबास ।२२३८।
भावार्थ : -जिसके घर में सभी प्रकार की सम्पदाएँ हों, गृहस्थ उसका उपभोग न करता हो । वहां सुख व् संतोष के संग श्रीहरि निवास करते हैं ॥
बहरि सुहा तब लग रहै, जब लग रहैं सरीर ।
साधौ सुहा अंतर की, रहैं सदा जग थीर ।२२३९ ।
भावार्थ : -- बाह्य जगत का सौंदर्य देह के संग ही लक्षित होता है, अंतर्जगत का सौंदर्य सदैव परिलक्षित रहता है ॥
न बिग्यान का मान होए, न ग्यान की मान ।
कहै साकट सोए मने, जो मोरे अनुमान ।२२३१ ।
भावार्थ : -- न विज्ञान की मान हो न ज्ञान की । स्वार्थी अभक्त-अज्ञानी कहता है संसार में वही मने जो मेरा अनुमान हो ॥
में जानूँ धनि मरि गया, दिया चिता मैं फूँक ।
मरा उठा पीछू लगा, रहा गली मैं भूँक ।२२३२।
भावार्थ : -- संसार के लिए तो सेठ मर गया चिता मैं फूँक दिया गया । किन्तु ये क्या वह तो मरा नहीं उठ के गली मैं भूँक रहा है कह रिहा है, मैं सेठ हूँ गली बोली तेरी थोड़े ही मनेगी जो सेठानी बोलेगी वही मनेगी ॥
प्राग रूप बृत्त मानबन जब अनुमति दे नाहि ।
अस अमान के अर्थ एहि ते जन मति नहि आहि ।२२३५।
भावार्थ : -- प्राग् रुपित वृत्तांत को यदि कोई अमान्य करता हो तो ऐसी अमान्यता का अर्थ यह है कि उसमें बुद्धि ही नहीं है ॥
जैसे बासा बासिये, तैसे बास बसाए ।
जैसा बासा पहरिये, तैसे नाच नचाए ।२२३६।
भावार्थ : -जैसे वास में निवास होगा वैसे ही वासन का वास होगा । जैसा वासन के वश होगे वह वैसा ही नाच नचाएगा ॥
बास बसाई कनइका, बासस बसे बसंत ।
बासक सज्जा साज के बासर मुख भए कंत ।२२३७।
भावार्थ : -- कन्या ( दिन की कन्या =रात्रि ) ने घर बसाया नहीं कि गृहाक्ष के आवरण में जैसे वसंत वासित हो गया ॥ श्रृंगार कर कन्या प्रतीक्षा करती है कन्या का स्वामी अब पिता बनने वाला है ॥ पता नहीं कन्या होगी की कन्नू होगा /प्रभात उसके कंत हुवे ॥
कला कलित का कबित किए, कबिबर अर्थ न पाए ।
भरम भाव के गति कहए दूजे भाग बँधाए ।२२३८।
भावार्थ : -- कला का विभूषण कर कविवर ने कल- कविता रची किन्तु कविता का उसे अर्थ प्राप्त न हुवा । भ्रमित भाव की गति ने कहा इसमें दूसरे का भाग बँधा है ॥
करतन कारन फल संग जग अपकीरिति होइ ।
भय प्रसंग स्वनिर्यनै ,प्रान हनै निज कोइ ।२२३९ ।
भावार्थ : -- मानस मनस जब किसी कार्य कारण व् परिणाम से जग दुष्कीर्ति के भय प्रसंग आत्म निर्णायक होकर स्वयं को मृत्यु का दंड देता है उसे आत्महत्या कहते हैं । यह एक अपराधिक कृत्य है किन्तु दंडनीय नहीं है कार्य कारन व् निवारण ही इसका समाधान है
स्पष्टीकरण १ : -- आत्महत्या का नाटक एक दंडनीय कृत्य है
स्पष्टीकरण २ : -- कार्य कारण यदि विधि द्वारा विहित उपबंधों में कोई अपराध है तब अभियुक्त उतने दंड का ही भागी होगा.....
लाग रहैं न लाग रहें, रहँ सुर मैं सब कोए ।
रागिनी कर राग गहै, ऐसो सरगम होए ।२२४० ।
भावार्थ : -ऐसी सरगम होनी चाहिए जो सारेबाजों में बजे ॥
हिंसारत आँगन फिरए किए घर घर समसान ।
सासक दल के बल संग,भयउ सकल बलबान ।२२४१ ।
भावार्थ : - हिंसा वादी आँगन में फिर रहे हैं और घर घर को श्मशान किए हैं प्रधान सेवक को बन में दिखाई दे रहे हैं । सत्ता धारी दलों का बल प्राप्त कर ही देश में हिंसा बलवती हुई हैं ॥
हिंसा वादी हैं ये दल.....
पुरंजई पुर पुर जाएँ, काज कहेँ सब कोइ ।
पुरंजनी पूछ बुझाएं जे कारज कस होइ । २२४२- क।
भावार्थ : -- पुरों को जीतने वाले जब कहीं जाते उनको सब काम बताते हैं ( जैसे : - हमारा कार्य कर दो )प्रज्ञावान जब कहीं जाते हैं तब उनसे यही पूछा जाता है कि यह कार्य कैसे होगा ॥
नटता को कहत नचाए करेँ न कारज कोइ ।
नत नागर पूछ बुझाएं जे कारज कस होइ ।२२४२ -ख ।
भावार्थ : -- नटता को ( अथवा नाटक नौटंकी वाले से अनुरोध करते हैं ये संवाद सुनाओ न वो नाच दिखाओ न ) यह कह कह के नचाते हैं कुछ नहीं करता और किसी चतुर व्यक्ति से पूछते ये काज कैसे होगा ले दे के होता हो तो तू बोल के करवा दे ॥
पावन पुनीत सत्कर्म भयऊ गरभ निपात ।
ए राजा की राजकता, एहि राजा की जात ।२२४३।
भावार्थ : -- गर्भपात कराना पुनीत पवित्र व् पुण्य का काम हो गया । महाराज की राजकता यही है । यही उनकी जात है.....?
मत सम्मत के दान अरु गार गवाँरू गोठ ।
दातारू को छोट किए, गहई को किए पोठ ।२२४४ ।
भावार्थ : -- अपात्र को दिया गया मतदान व् गाली दाता को छोटा करते हैं ग्राही को बड़ा। पात्र को देने से दोनों एक समान हो जाते हैं ॥
सबहीं पदबी पदक पद ऊँचे पद पौराए ।
जब पद देखे आपने, तहँ लग पहुंच न पाए ।२२४५।
भावार्थ : -- सभी पदवी पदक व् पद ऊँचे स्थान पर रखे हुवे थे । जब अपने चरण देखे तो वे वहां तक पहुंचे ही नहीं ॥
सत्याकृति सदैव फरै उभरै सत्यइ कार ।
सत्येत्तर सोंह इतर, दुबरै दोइ असार ।२२४६।
भावार्थ : -- जो सत्यानृत न करे सत्य को सदा आकृत करे वह फलता है सत्यंकार की सदैव उन्नति होती है ।। सत्याकृति की अस्वीकृति से अधोगति की प्राप्ति होती है ॥
सत्याकृति = पण ठहराना,
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