शनिवार, 31 जनवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३०॥ -----,

छन भंगुर संसार तू आपा करे अपार । 
मरनि परन मटिया माहि, मिले सबहि एक सार ।२३०१। 
भावार्थ : -- यह सांसारिक प्रपंच क्षण भंगुर है और तेरा अहंकार अपरम्पार है । मरने  के पश्चात मिटटी में सभी एक जैसे ही मिलते हैं ॥ 

सार संग संसार में , चहुँ दिसि होत उजास   । 
सार रहे ना किछु रहे, देख देख के चास  ।२३०२ । 
भावार्थ : -- सार से ही यह संसार है  सार नहीं तो संसार नहीं  है सार के संग ही चारों दिशाएं उज्ज्वलित होती हैं । सारहीन संसार में अन्धकार ही व्याप्त रहता है ॥ अत:  आवश्यकता अनुसार  ही इसका उपयोग करना चाहिए ॥ 

चार ईंट का जोगना, चार ईंट दिए ढार । 
चार जुगौनी जोग के, आपा करे अपार ।२३०३ । 
भावार्थ : -- चार भित्ति के भवन में चार वस्तुएं संग्रह कर मनुष्य असंख्य अहंकार करता है ॥ 

कहाँ अजहुँ के कुसासन,कहाँ राम के राज ।
कहाँ यहु कलुखित कुकरम , कहाँ राम के काज ।२३०४।
भावार्थ : --  कहाँ तो यह लोकतांत्रिक कुशासन कहाँ राजतांत्रिक राम का राज । कहाँ तो इन कुशासकों के काले काले कुकरम, कहाँ राम के सद्कार्य ।

 रयनि चर रयन बितावै, भोर उगावै सूर । 
जाग उठए सो बावरा,बोले जब तमचूर ।२३०५। 
भवार्थग : -- चन्द्रमा के संचरण से ही रयनी व्यतीत होती है । सूर्य से ही प्रभात का उदय होता है ॥ जो मूर्गों के बोलों से जागरण करता है वह हतबुद्धि हैं ॥

भोर बतावै आँधरा, गूंगा गावै राग । 
बहरा बंधन बोधता, केसेउ होए जाग ।२३०६।
भावार्थ : -- अंधा भोर होने की सूचना देता हो , गूंगा राग भोर गाता हो  ॥ बहरा सुरों को बांधता हो बताओ फिर जागरण होए तो कैसे होए ॥

कंदील पथ उजरावै , दिसा दिखावै सूर । 
कहत चरे सो बावरा, बढे पंथ पद तूर ।२३०६। 
भावार्थ : -- प्रकाश स्तम्भ पंथ को प्रकाशमय कर रहा है  सूर्य दिशा दर्शा रहा है । वह हतबुद्धि है जो कहता चलता हो कि आगे बढ़ो जब साँझ हो जाए तब घर लौटना चाहिए ॥

अधिक पहिरै अधिक खाए अधिकाधिक जो सोए । 
तासु मरनी काल सोंह पहिले मरनी होए ।२३०७ । 
भावार्थ : -- शयन मरण के सदृश्य है जो अधिक खाता व् पहनता है अधिकाधिक शयन करता है, उसकी मृत्यु समय से पूर्व हो जाती है ॥

हरिन्मनि सोंह सोहिते कंचन सन जूँ काँच । 
साँचा संगत पाइके सोहिते तूँ असाँच ।२३०८। 
भवार्थ : --  कंचन का संग प्राप्त कर जिस प्रकार काँच  भी हिरन्मणि के जैसे शोभा देता है ।  साँच  की संगती प्राप्त कर असाँच भी उसी प्रकार से सुशोभित होता है ॥

संस्कार अरु संस्कृति, धर्म चरन जन्माइ । 
प्रथा गत लोक गति रीति, चरत चरत चलि आए ।२३०९। 
भावार्थ : -- संस्कार एवं संस्कृति की व्युत्पत्ति धर्मचर्या से ही होती है । लोक मान्यताएं अर्थात देश विशेष के आचार-विचार, धर्म का अनुशरण करते हुवे ही प्रचलित होते  हैं ॥


जीवन जस चर्जा चरे, तैसे होत बिचार ।
धर्म चरजा होइब तस, होतब लोकाचार || 
 जीवनचर्या जैसी होगी आचार-विचार भी वैसे ही होंगे, उसी प्रकार धर्मचर्या जैसी होगी लोकाचार भी वैसे ही होंगे

इतिहास में जिसका कहीं उल्लेख नहीं मिलता , जो पूर्व में कभी सुनी नहीं गई,
वह गंगा- जमुनी अर्थात दोरंगी संस्कृति क्या है.....?





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