पहिले भारत में रहे, दृढ़तस अर्थ प्रबंधु ।
भवन भवन सिवगति गहै,पति पति रहि प्रतिबंधु ।२२९१।
भावार्थ : -- प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था अत्यधिक सुदृढ़ थी । जहाँ प्रत्येक भवन सुख समृद्धि को प्राप्त थे वहीँ भवन पतियों में परस्पर आत्मीय सम्बन्ध होता था ॥
खन खन कर कनखनकाए ,बाँध बनज भुज बंध ।
सिखा बल बेनी बँधाए ,उपबन देइ सुगंध ।२२९२।
भावार्थ : -वनोपज से युक्त होकर खंड खंड धनधान्य से भरपूर थे अर्थात अर्थ व्यवस्था कृषि-कर्म पर आधारित थी । वेणियों के सदृश पर्वत श्रेणियों से युक्त इस भारत खंड को उपवन सुगन्धित किया करते थे ॥
पहिले खन खलिहान सन, रहैं सबहि धनबान ।
अजहुँ त खल धन धान बिनु , किसान रहँ न किसान ।२२९३ ।
भावार्थ : -- प्राचीन भारत में खेत खलखण्ड के स्वामी होकर सभी भारतीय धनवान थे किसान थे । विद्यमान परिदृश्य में तो भूमि व् धनधान्य से रहित होकर किसान, किसान न रहे शासन की दमनकारी नीतियों ने उन्हें कृषिकर्म से हीन कर दिया ॥
अजहुँ की अर्थ नीति के, किए जब अनुसंधान ।
हलबान तो हींन मिले धनिमन मिले प्रधान ।२२९४ ।
भावार्थ : -- विद्यमान शासन की आर्थिक नीतियों का जब अर्थानुसन्धान किया किसान अर्थहीन मिले धनवान अर्थप्रधान मिले ॥
अजहुँ देस बन दास भए , ऐसेउ नय अधीन ।
कलजीबी को पीन किए हलजीबी को दीन ।२२९५।
भावार्थ : -- विद्यमान समय का भारत ऐसे नियमों के अधीन हो गया । जो कलुषित कला के कलजीवी का पोषण कर हलजीवी का शोषण कर रहे हैं ।।
भवन भवन सिवगति गहै,पति पति रहि प्रतिबंधु ।२२९१।
भावार्थ : -- प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था अत्यधिक सुदृढ़ थी । जहाँ प्रत्येक भवन सुख समृद्धि को प्राप्त थे वहीँ भवन पतियों में परस्पर आत्मीय सम्बन्ध होता था ॥
खन खन कर कनखनकाए ,बाँध बनज भुज बंध ।
सिखा बल बेनी बँधाए ,उपबन देइ सुगंध ।२२९२।
भावार्थ : -वनोपज से युक्त होकर खंड खंड धनधान्य से भरपूर थे अर्थात अर्थ व्यवस्था कृषि-कर्म पर आधारित थी । वेणियों के सदृश पर्वत श्रेणियों से युक्त इस भारत खंड को उपवन सुगन्धित किया करते थे ॥
पहिले खन खलिहान सन, रहैं सबहि धनबान ।
अजहुँ त खल धन धान बिनु , किसान रहँ न किसान ।२२९३ ।
भावार्थ : -- प्राचीन भारत में खेत खलखण्ड के स्वामी होकर सभी भारतीय धनवान थे किसान थे । विद्यमान परिदृश्य में तो भूमि व् धनधान्य से रहित होकर किसान, किसान न रहे शासन की दमनकारी नीतियों ने उन्हें कृषिकर्म से हीन कर दिया ॥
अजहुँ की अर्थ नीति के, किए जब अनुसंधान ।
हलबान तो हींन मिले धनिमन मिले प्रधान ।२२९४ ।
भावार्थ : -- विद्यमान शासन की आर्थिक नीतियों का जब अर्थानुसन्धान किया किसान अर्थहीन मिले धनवान अर्थप्रधान मिले ॥
अजहुँ देस बन दास भए , ऐसेउ नय अधीन ।
कलजीबी को पीन किए हलजीबी को दीन ।२२९५।
भावार्थ : -- विद्यमान समय का भारत ऐसे नियमों के अधीन हो गया । जो कलुषित कला के कलजीवी का पोषण कर हलजीवी का शोषण कर रहे हैं ।।
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