शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

--- ॥ दोहा-दशम २२९ ॥ -----

पहिले भारत में रहे, दृढ़तस अर्थ प्रबंधु । 
भवन भवन सिवगति गहै,पति पति रहि प्रतिबंधु ।२२९१। 
भावार्थ : -- प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था अत्यधिक सुदृढ़ थी । जहाँ प्रत्येक भवन सुख समृद्धि को प्राप्त थे वहीँ भवन पतियों में परस्पर आत्मीय सम्बन्ध होता था ॥ 

खन खन कर कनखनकाए  ,बाँध बनज भुज बंध । 

सिखा बल बेनी बँधाए ,उपबन देइ सुगंध ।२२९२। 
भावार्थ : -वनोपज से युक्त होकर खंड खंड धनधान्य से भरपूर थे अर्थात अर्थ व्यवस्था कृषि-कर्म पर आधारित थी । वेणियों के सदृश पर्वत श्रेणियों से युक्त  इस भारत खंड को उपवन सुगन्धित किया करते थे ॥ 

पहिले खन खलिहान सन, रहैं सबहि धनबान । 
अजहुँ त खल धन धान बिनु , किसान रहँ न किसान ।२२९३ । 
भावार्थ : -- प्राचीन भारत में  खेत खलखण्ड के स्वामी होकर सभी भारतीय धनवान थे किसान थे । विद्यमान परिदृश्य में तो भूमि व् धनधान्य से रहित होकर किसान, किसान न रहे शासन की दमनकारी नीतियों ने उन्हें कृषिकर्म से हीन कर दिया ॥ 

अजहुँ की अर्थ नीति के, किए जब अनुसंधान । 
हलबान तो हींन मिले धनिमन मिले प्रधान ।२२९४ । 
भावार्थ : -- विद्यमान शासन की आर्थिक  नीतियों का जब अर्थानुसन्धान किया किसान अर्थहीन मिले धनवान अर्थप्रधान मिले ॥ 

अजहुँ देस बन दास भए  , ऐसेउ नय  अधीन । 
कलजीबी को पीन किए हलजीबी को दीन ।२२९५। 
भावार्थ : -- विद्यमान समय का भारत  ऐसे नियमों के अधीन हो गया । जो कलुषित कला के कलजीवी का पोषण  कर हलजीवी का शोषण कर रहे हैं  ।।  

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