मंगलवार, 20 जनवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २२६- २२७ ॥ -----

भवन भवन बन राजि भए ब्याल भयउ भुजंग । 
बिमान बियत बिहंग भए बियद पताका गंग ।२२६१ । 
भावार्थ : -- भवन-समूह ही वन के वृक्ष-समूह, हिंसा वादी उसपर लिपटे विषैल सर्प, विमान ही खग हो गए विद्युत की विद्योतक सज्जा खगंग ( आकाश-गंगा ) हो गई । जिसके आगे कुछ दृष्टिगत नहीं होता ॥

पन पति भए बन पारसा, पर्वत भयउ अटारि । 
जो परबत कर परस लिए, भयउ कोइरा कारि ।२२६२ । 
भावार्थ : -- पणपति ही वनों में पहुंचे हुवे गुरु मुनि मनीष बने हैं उनकी ऊंची ऊंची अट्टालिकाएं ही पर्वत है जी । ये जिसे भी स्पर्श कर दें वह पर्वत तथा उसके तलहटी के खेत कोयला कोयला हो जाते है ।

ब्याजु तपोधनह्वयन, बन गत बने त्यागि । 
साधु सज्जन रावन भए जन जन चरननुरागि ।२२६३ । 
भावार्थ : - धींगी तपस्वी छद्म नाम धारण किए इस वन में आकर बने हुवे त्यागि बनकर भगवान बन गए । साधु सज्जन रावण हो गए जनता इनके चरणों की अनुरागी हो गई ॥

यदि विदेशी राम हो  देसी रावण हो तो इस देश को लंका होना ही है  । भेद तो लंकापति के ही होते  है अवधेश के के भेद नहीं होते

बन राऊ का राज है बन बिनु भए बन खंड । 
भाखन हुँत बन गाँउ भए जन साधारन षंड ।२२६४ । 

भावार्थ : -- वर्त्तमान में जंगल-राज है किन्तु जंगल नहीं हैं ।  हिरन नहीं हैं भक्षण हेतु जन साधारण ही हिरण बने हैं ।

कारण : --
खेह खेट बिगारी के, दिए बिधिकार बिसार । 
बने बनाउनहार भए, बनत बने बपमार । २२६५ । 
भावार्थ : - खेतों गांवों विधिवेदज्ञ की उपेक्षा की गई । बने हुवे विधज्ञ विधि के रचयिता बने जब वह संविधान बना तो बापुमार बना ।

बुअनहार बनिहार भए, बिअ बिअ बुअन निहारी । 
बसबासा बिस्तार दए,बिआर लए बरिआरि ।२२६६। 
भावार्थ : -- कृषक दैनिक भृतक हो गए बीज अपनी बुआई की प्रतीक्षा करने लगे । विलासित वास वसति  के विस्तार हेतु इनकी कृषि योग्य भूमि  पर बल पूर्वक अधिकार किया ॥

खेह खेट लूटत करें सासन दमनादेस । 
अजहुँ होइहि बिधि सम्मत,अबैधिक उपनिबेस ।२२६७।  
भावार्थ : --अब नव निर्मित शासन ने दमनचक्र चलाते हुवे यह आदेश किया है की ये लूटी खसूटे खेत गाँव पर रचे भवन विधि सम्मत होंगे ॥ 

आल बाल  बर मनि माल भूरि भवन भुइँ बाहि । 

रहन मैं त सब किछु अहैं, कहनइ मैं किछु नाहि ।२२६८ । 
भावार्थ : -- मणि मल्लिकाओं से भरे थाल हैं, भोग विलास के साधन भी अतिसय हैं । रहने को बहुंत कुछ है कहने को कुछ भी नहीं ॥ 

कहीं ज़ेवरो-जवाहर जरगर जमीं जायद कहीं..,
रहने को बहुंत कुछ है कहने को कुछ भी नहीं..... 

एक दलपत पिता एकु पति एक जमात एकु भ्रात । 
चुनाई बिधिहि रच छल किए, एक दल के दस पात ।२२६९ । 
भावार्थ : -- एक दल के पति पति होंगे दूसरे का पिता होगा तीसरे का जमात होगा चौथे का भ्राता होगा । गिनती के  दल द्वारा ही भारत का जनतंत्र  संचालित होगा  ऐसी विधि का विधान एक ही दल के दस सदस्यों ने किया । क्या यह उचित था.....? जब संविधान लागू किया गया तब कितने दल थे ? पता नहीं 

>> क्या संविधान के निर्माता को किसी चुनावी दल से संबंधित होना चाहिए था.....? 

प्रपञ्जी लेँ बिनु पूँजी, पहने देसी चैल । 
धरा दुहन कोल्हू है, देवन जन धन बैल ।२२७०। 
भावार्थ : - अड़ोसी पड़ोसी छितिज के  अंत तक जो कोई भी हो सब इंडिया आ  जाओ बिन पैसे की बही खुलवाओ-भारत के मूल नागरिक बन जाओ । यहां जीवन के आधार भूत साधन निशुल्क मिलते  है । कहाँ से मिलते  है यह हमारी धरती हैं न इसे कोल्हू लगा कर दूहेंगे और जो वास्तव में भारत के मूल नागरिक है उनको निचोड़  कर टेक् -स पर तुम्हारा अधिकार होगा, बदले में तुम हमें मतदान देना ॥ 

और सभी दलों की इसमें मौन सहमति है क्या ये दल शासन करने के योग्य हैं.....? 

अजहुँ रावन राज भया अजहुँ बिरध भए दूर । 
कारज कारे और के, पौर काज को भूर ।२२७१ ।
भावार्थ : -- इस राष्ट्र में अब तक  रावण का ही राज रहा है जहाँ मूल नागरिक तो  दूर हो गए निर्मूल निकट हो गए । यह शासन-व्यवस्था अपने राष्ट्र को विस्मृत कर औरों के कार्य कार्यान्वित करती है ॥ 

पलक नैन जब लाग रहँ, दिवस रैन सुपनाए  । 
सुरग सम सुख जीबी को, दरस किछु नहीं आए ।२२७२। 
भावार्थ : -- स्वर्ग के समान सुखमय जीवन की परिचर्या में ज्ञान चक्षु मुकुलित होते  हैं, मुकुलित ज्ञान चक्षु स्वपन का ही प्रपंच करते हैं इस प्रपंच में जीवन का यथार्थ दर्शित नहीं होता ।


पलक नैन जब लाग रहँ, दिवस रैन सुपनाए  । 
सुरग के सुख वादी को, दरस किछु नहीं आए ।२२७३। 
भावार्थ : -- सुखमय जीवन का अनुयायी के ज्ञान चक्षु मुकुलित होते हैं मुकुलित ज्ञान चक्षु स्वपन का ही प्रपंच करते हैं इस प्रपंच में जीवन का यथार्थ दर्शित नहीं होता ।।

दासा तिन का चिंतिये, जो दासन के दास । 
चिंता वाकी कीजिये पतिपद जाके पास ।२२७४। 
भावार्थ : -- दासता हेतु उसकी क्या चिंता करना जो दासों का भी दास है । चिंता उसकी करनी चाहिए जिसके पास स्वामी का पद हो ॥

चिंतक तिन का चिंतिये, जो दासन के दास । 
चिंता वाकी कीजिये, पतिपद जाके पास ।२२७५। 
भावार्थ : -- हे चिंतक ! उसकी चिंता क्या करना जो दासानुदास हैं,  स्वामी का पद जिसके पास है चिंता उसकी करनी चाहिए ॥

संविधान जबलग अहैं , रहिहीं एही बिधान । 
एक दल नाउ पुरान है, भए सब नवा नवान ।२२७६ । 

                   ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- जब तक यह संविधान रहेगा  तब तक यही विधान रहेगा । एक पुराना दल शेष सब नए दल  तो भैया मत किसी को दो जाना पुराने के पास है ॥ 

भए भिनुसारु बिरति रयन अरु संतन  की बानि । 
पलक नयन लगि चित भवन जागत जागत जानि ।२२७७। 
भावार्थ : - अवचेतन मानस मन को रयन का विप्रलयन भोर का अभ्युदयन एवं संत-वचन संज्ञात करने  है । पहले एक जगता है । सब एक साथ नहीं जागते एक एक को जगाना पड़ता है ॥ 

कैसे : -- 

केतुपति नगपथ उतरे, बोल उठे तमचूर । 
जाग जति जग रथ उतरे, बाजए संख सुदूर । २२७८-क। 

आनइ अंकुर सिरु उपरे, बिकसे बन बन फूर । 
जाग गमन गोचर चरे हरहर की कर हूर ।ख ।  

हिमसैल सुठि सीस सिखर, देइ तिलक कर कूर । 
उद बाहन बिंदु उछरे, झूर रहे रमझूर  । ग । 

सुर सिंधु सिंगार करे, भरे माँग सिंधूर ।
निर्झरनी झर झर झरे,चरे संतरन तूर । घ । 

संगि सँवरत सुर सँमरे, सुपन सात को भूर । 
तीर तीर तूर्य धरे, संगति किए संतूर । ढ़ । 

सुर निर्झरणी  = आकाश गंगा  

नलिनि  नीर नुपूर बरे, चारु चरन मैं पूर । 
किए घन सयन सुपन घरे, होइहि सिरु पर सूर । च ।  

लगे नयन अगजग जगे, लगे मिले जग जोत । 
जगे नयन अगजग लगे, जगे मिले खद्योत ।२२७९ । 
भावार्थ : -- जब जागते नयन लगे तब संसार जगा हुवा था, जगती ज्योत लगती मिली । जब यह नयन जागृत हुवे संसार में सूर्य का जागरण हो चुका था ॥ 

 जगे नयन अगजग जगे जगे मिले खद्योत । 
लगे नयन तब जागिये जगे मिले जब जोत ।२२८० । 
भावार्थ : -- जब यह नयन जागे सारा संसार भी जाग गया, सूर्य देव पूर्व में ही जागृत हो चुके थे। लगे  नयन तब जगने चाहिए जब ज्योति जागती मिले ॥  
















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