जीवन चरजा संग भए धन साधन अनुकूल ।
जन संकुल काल प्रसंग भए बय जग प्रतिकूल ।२२४१।
भावार्थ : - जीवनचर्या में जब धन व् साधन सहज सुलभ हो गए तब जन संकुलता ने समय का प्रसंग किया परिणाम स्वरूप परिस्थितियां संसार के प्रतिकूल हो गईं ॥
" वर्तमान के सौ वर्षों की जनसँख्या का योग कदाचित पूर्व के एक सहस्त्र वर्षों की संख्या के समतुल्य होगा"
बाहरि जग के सुहा सों, तामस गुन बढ़ बाढ़ि ।
अंतर जग जब सोहहीं, सातबीक गुन गाढ़ि ।२२४२।
भावार्थ : -- बाह्य- जगत की शोभा के संग तमोगुण धर्म का विस्तार होता है इस अवस्था में मनुष्य का चित्त तामस वृत्ति में प्रवृत्त रहता है ॥ अंतर जगत की शोभा सतोगुण धर्म का वर्द्धन करती है रजस गुण कहीं अल्प ही होता है मनुष्य का चित्त सत्त्वान व् विवेकशील होकर साधु-पद को प्राप्त करता है ॥
लोक तंत्र के जस भाँति करे बेद प्रतिपाद ।
सत संतुलन माहि रहे, संख्य गुनगन वाद ।२२४३।
भावार्थ : - वैदिक काल में लोकतंत्र की जिस प्रकार व्याख्या मिलती है उसके अनुसार उस तंत्र में गुणगणवाद संतुलित स्वरूप में था ॥
सभा सदन सँजोग करे, जब गुन सँख्या जोग ।
सतकर्म के संग मिले , जुगता सार सँजोग ।२२४४।
भावार्थ : --सभा सदन में जब संख्या व् गुणवाद का योग होता है तब सत कर्मों के प्रतिफल स्वरूप जन साधारण में सद्गुणों को प्राप्त करने की योग्यता का संयोग हो जाता है ॥
क्वैलिटी + क्वन्टिटी = क्वालिफेकिशन
डिस्क्वालिटी + क्वन्टिटी = डिस्क वाली फिकेशन, चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए ॥
बढ़ा बढ़ी बढ़ाई कै कहैं बढ़ो सब कोइ ।
बढ़े बढ़इया की बढ़नि सो बढ़ बढ़िया होइ ।२२४५।
भावार्थ : -- प्रतिद्वंद्विता को बढ़ा-चढ़ा के सब कोई बढ़ने को कहते हैं .....बढ़ो तो कहाँ बढ़ो ऊपर की नीचे आगे तो काल है पीछे दुकाल पड़ा है । जब बढ़ई की (वन बढ़ेंगे तो बढई बढ़ेंगे ) अथवा उन्नति करने वाले की संख्या में वृद्धि हो वह वृद्धि उत्तम है । प्रगति में बढ़ई वन घटेंगे घटेंगे घटने चाहिए ॥
सब बन तो चन्दन नहीं सूरा के दल नाहि ।
सब समुद्र मोती नहीं योंह साधु जग माहि ।।
----- ॥ संत कबीर ॥ -----
भावार्थ : -- सारे वन समूह चन्दन के नहीं होते सभी दल शूरवीरों के नहीं होते । सभी समुद्र मोतियों से नहीं भरे होते, इसी प्रकार ज्ञानवान भी सब कहीं नहीं होते ॥
जीबिका केतक चाहिए , जेतक जनित जनाए ।
एतेक जीउ धन साधन ? कहु जग कहँ ते लाए ।२२४६।
भावार्थ : -- आजीविका कितनी होनी चाहिए.....? जितने लोग हैं उतनी होनी चाहिए । इतना जोग-जुगाड़ ? यह संसार कहाँ से लाएगा ॥
"जीव- जंतु कभी आजीविका नहीं माँगते मनुष्य ही एक ऐसा धूर्त चरित्र प्राणी है जिसे सब कुछ चाहिए....."
एक तो अतेक जन सघन, तापर भोग बिलसिहि ।
तुम्हरे मूरखिमन को होवनि होतब हँसिहि ।२२४७।
भावार्थ : -- एक तो इतनी जन घनत्व उसपर उसकी भोगवादी प्रवृत्ति ( अर्थात खाओ पियो मजे करो वाला सिद्धांत अथवा संकीर्णवाद ) आने वाला समय तुम्हारी इस मूर्खता पर दुःख जनित उपहास करेगा ॥
बढ़ा बढ़ी बढ़ाई कै, कहैं बढ़ो सब कोइ ।
बढे घटिहा की बढ़नी, सो बढ़ घटिहा होइ ।२२४८ ।
भावार्थ : -- प्रतिद्वंद्विता को बढ़ा चढ़ा कर सभी बढ़ाने को कहते हैं । धोगति की ओर ले जने वलों की संख्या में वृद्धि हो वह वृद्धि अधमतस है ॥
''जैसे ये नेता हैं ऐसे को जनने से अच्छा है माताएं बाँझ ही रहें....."
बढ़ैया की बढ़नी सँग , बन बन करे बिकास ।
कढैया की कढ़नी सँग ,गहनतम भए उजास ।२२४९ ।
भावार्थ : - बढिया की बढ़नी के साथ वनों का विकास होता है । वे उसे ऐसे छाँटते हैं कि जहाँ घनघोर अँधेरा होता है वहां प्रकाश पहुँचने लगता है ॥
बने बढ़ैया की बढ़न, दिए बन काट कढ़ाइ ।
खाट चुखाट चढ़ाए के, माँगे गहन गढ़ाइ ।२२५० ।
भावार्थ : -- बने हुवे बढ़ाई अर्थात अपरम्परागत बढ़ाई को न वनभूमि से स्नेह होता न वनों से ये वन के वन काट कर उसे कढ़ाई में दे देते हैं जहां इनकी खाट चुखात बनती हैं पारिश्रमिक में गहने की गढ़ाई माँगी जाती हैं ॥
अर्थात ये पेट परायण सारे कारज कर चुके होते हैं.....
पच्चीस तीस वर्ष पूर्व तक परंपरागत बढ़ई दिख जाते थे अब तो दर्शनातीत हो चले हैं.....
बनिक गाँव के लेख कहँ बनाउटी की लीख ।
खेह खन मंद मलिन किए, घटे घटा की दीख ।२२५१।
भावार्थ : -- कहाँ वणिक ग्राम का उत्कीर्ण विवरण कहाँ बने हुवों की बही । ऐसी बही खेतों को खोद -उजाड़ कर उन्हें मलिन कर देती है जिसका दुष्परिणाम यह होता है की गगन में घटाओं को देखने वाला कोई नहीं होता अर्थात इससे किसान घटते हैं और देश में अन्न धन के अकाल की स्थिति व्युतपन्न हो जाती है ॥
कहँ दीपक का दैदीप कहँ तापक के ताउ ।
कहँ भाजी की भावना, कहँ भाजन के भाउ ।२२५२।
भावार्थ : -- कहाँ दीपक का देदीप्य कहाँ सूर्य का तेज । कहाँ भाग प्राप्त करने वाले की भावना कहाँ पात्र का स्नेह ॥
काल अनुकाल कीर्तनम् होइहि काम अनुकूल ।
जन संकुल काल प्रसंग भए बय जग प्रतिकूल ।२२४१।
भावार्थ : - जीवनचर्या में जब धन व् साधन सहज सुलभ हो गए तब जन संकुलता ने समय का प्रसंग किया परिणाम स्वरूप परिस्थितियां संसार के प्रतिकूल हो गईं ॥
" वर्तमान के सौ वर्षों की जनसँख्या का योग कदाचित पूर्व के एक सहस्त्र वर्षों की संख्या के समतुल्य होगा"
बाहरि जग के सुहा सों, तामस गुन बढ़ बाढ़ि ।
अंतर जग जब सोहहीं, सातबीक गुन गाढ़ि ।२२४२।
भावार्थ : -- बाह्य- जगत की शोभा के संग तमोगुण धर्म का विस्तार होता है इस अवस्था में मनुष्य का चित्त तामस वृत्ति में प्रवृत्त रहता है ॥ अंतर जगत की शोभा सतोगुण धर्म का वर्द्धन करती है रजस गुण कहीं अल्प ही होता है मनुष्य का चित्त सत्त्वान व् विवेकशील होकर साधु-पद को प्राप्त करता है ॥
लोक तंत्र के जस भाँति करे बेद प्रतिपाद ।
सत संतुलन माहि रहे, संख्य गुनगन वाद ।२२४३।
भावार्थ : - वैदिक काल में लोकतंत्र की जिस प्रकार व्याख्या मिलती है उसके अनुसार उस तंत्र में गुणगणवाद संतुलित स्वरूप में था ॥
सभा सदन सँजोग करे, जब गुन सँख्या जोग ।
सतकर्म के संग मिले , जुगता सार सँजोग ।२२४४।
भावार्थ : --सभा सदन में जब संख्या व् गुणवाद का योग होता है तब सत कर्मों के प्रतिफल स्वरूप जन साधारण में सद्गुणों को प्राप्त करने की योग्यता का संयोग हो जाता है ॥
क्वैलिटी + क्वन्टिटी = क्वालिफेकिशन
डिस्क्वालिटी + क्वन्टिटी = डिस्क वाली फिकेशन, चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए ॥
बढ़ा बढ़ी बढ़ाई कै कहैं बढ़ो सब कोइ ।
बढ़े बढ़इया की बढ़नि सो बढ़ बढ़िया होइ ।२२४५।
भावार्थ : -- प्रतिद्वंद्विता को बढ़ा-चढ़ा के सब कोई बढ़ने को कहते हैं .....बढ़ो तो कहाँ बढ़ो ऊपर की नीचे आगे तो काल है पीछे दुकाल पड़ा है । जब बढ़ई की (वन बढ़ेंगे तो बढई बढ़ेंगे ) अथवा उन्नति करने वाले की संख्या में वृद्धि हो वह वृद्धि उत्तम है । प्रगति में बढ़ई वन घटेंगे घटेंगे घटने चाहिए ॥
सब बन तो चन्दन नहीं सूरा के दल नाहि ।
सब समुद्र मोती नहीं योंह साधु जग माहि ।।
----- ॥ संत कबीर ॥ -----
भावार्थ : -- सारे वन समूह चन्दन के नहीं होते सभी दल शूरवीरों के नहीं होते । सभी समुद्र मोतियों से नहीं भरे होते, इसी प्रकार ज्ञानवान भी सब कहीं नहीं होते ॥
जीबिका केतक चाहिए , जेतक जनित जनाए ।
एतेक जीउ धन साधन ? कहु जग कहँ ते लाए ।२२४६।
भावार्थ : -- आजीविका कितनी होनी चाहिए.....? जितने लोग हैं उतनी होनी चाहिए । इतना जोग-जुगाड़ ? यह संसार कहाँ से लाएगा ॥
"जीव- जंतु कभी आजीविका नहीं माँगते मनुष्य ही एक ऐसा धूर्त चरित्र प्राणी है जिसे सब कुछ चाहिए....."
एक तो अतेक जन सघन, तापर भोग बिलसिहि ।
तुम्हरे मूरखिमन को होवनि होतब हँसिहि ।२२४७।
भावार्थ : -- एक तो इतनी जन घनत्व उसपर उसकी भोगवादी प्रवृत्ति ( अर्थात खाओ पियो मजे करो वाला सिद्धांत अथवा संकीर्णवाद ) आने वाला समय तुम्हारी इस मूर्खता पर दुःख जनित उपहास करेगा ॥
बढ़ा बढ़ी बढ़ाई कै, कहैं बढ़ो सब कोइ ।
बढे घटिहा की बढ़नी, सो बढ़ घटिहा होइ ।२२४८ ।
भावार्थ : -- प्रतिद्वंद्विता को बढ़ा चढ़ा कर सभी बढ़ाने को कहते हैं । धोगति की ओर ले जने वलों की संख्या में वृद्धि हो वह वृद्धि अधमतस है ॥
''जैसे ये नेता हैं ऐसे को जनने से अच्छा है माताएं बाँझ ही रहें....."
बढ़ैया की बढ़नी सँग , बन बन करे बिकास ।
कढैया की कढ़नी सँग ,गहनतम भए उजास ।२२४९ ।
भावार्थ : - बढिया की बढ़नी के साथ वनों का विकास होता है । वे उसे ऐसे छाँटते हैं कि जहाँ घनघोर अँधेरा होता है वहां प्रकाश पहुँचने लगता है ॥
बने बढ़ैया की बढ़न, दिए बन काट कढ़ाइ ।
खाट चुखाट चढ़ाए के, माँगे गहन गढ़ाइ ।२२५० ।
भावार्थ : -- बने हुवे बढ़ाई अर्थात अपरम्परागत बढ़ाई को न वनभूमि से स्नेह होता न वनों से ये वन के वन काट कर उसे कढ़ाई में दे देते हैं जहां इनकी खाट चुखात बनती हैं पारिश्रमिक में गहने की गढ़ाई माँगी जाती हैं ॥
अर्थात ये पेट परायण सारे कारज कर चुके होते हैं.....
पच्चीस तीस वर्ष पूर्व तक परंपरागत बढ़ई दिख जाते थे अब तो दर्शनातीत हो चले हैं.....
बनिक गाँव के लेख कहँ बनाउटी की लीख ।
खेह खन मंद मलिन किए, घटे घटा की दीख ।२२५१।
भावार्थ : -- कहाँ वणिक ग्राम का उत्कीर्ण विवरण कहाँ बने हुवों की बही । ऐसी बही खेतों को खोद -उजाड़ कर उन्हें मलिन कर देती है जिसका दुष्परिणाम यह होता है की गगन में घटाओं को देखने वाला कोई नहीं होता अर्थात इससे किसान घटते हैं और देश में अन्न धन के अकाल की स्थिति व्युतपन्न हो जाती है ॥
कहँ दीपक का दैदीप कहँ तापक के ताउ ।
कहँ भाजी की भावना, कहँ भाजन के भाउ ।२२५२।
भावार्थ : -- कहाँ दीपक का देदीप्य कहाँ सूर्य का तेज । कहाँ भाग प्राप्त करने वाले की भावना कहाँ पात्र का स्नेह ॥
काल अनुकाल कीर्तनम् होइहि काम अनुकूल ।
प्रगति पंथ के पथिक सुन, ए अहैं तुहरी भूल ।२२५३।
भावार्थ : -- कल का समय उचित ही होगा सभी कार्य कथनानुसार हमारे अनुकूल होंगे । रे प्रगति पंथ के विद्यमान पथिक सुन यह तुम्हारी भूल है ॥
अगहुँ बढे तो काल है पीछे पड़े दुकाल ।
प्रगति पंथ के पथिक सुन अपने चरन सँभाल ।२२५४।
भावार्थ : -यदि और आगे बढे तो दुकाल पीछे पड़ जाएगा ॥ रे प्रगति पंथ के विद्यमान पथिक सुन तू अपने चरण संभाल ।
पारस मनि हेरन चले, मिले परबतहु नाह ।
लोहकारु सब लोह किए, लाभ लब्ध की लाह ।२२५५।
भावार्थ : -- पारस मणि ढूंडने चले ? कहीं पर्वत ही नहीं मिला । जिन्हे सुमेरु पर्वत बनाने चले थे लोभ लब्धि की लोलुपता में मूरख लोहार ने उन पर्वतों का लोहा कर दिया ॥ ऐसे ऐसे मूर्खि हैं इस देस में.....
अपना चैल गवाईं के, पहने पराए चोल ।
उत्तमीअ को तोल दिए, अधम धातु लिए मोल ।२२५६।
भावार्थ : -- अपने वस्त्र को बिसरा दिए भिन्न-भिन्न वल्कल धारण कर जो उत्तमता के तोल में अधम धातु का जो क्रय करे वह कहाँ का व्यापारी हुवा ॥
दरस करष घिस घरष के, अमलाई में घोल ।
सुबरनी जस सुबरन को , लेँ सुबरन के मोल ।२२५७।
भावार्थ : -- स्वर्णकार के जैसे जो स्वर्ण को दर्श कर , खींचखांच कर, घर्षण कर फिर उसको अम्लता में घोल के फिर उसे स्वर्ण के भाव में ही ले वही सिद्ध व्यापारी है ।।
सत्याकृति सदैव फरै उभरै सत्यइ कार ।
सत्येतर ब्यानत कर, बिगराए ब्यौहार ।२२४६।
भावार्थ : -- जो सत्यानृत न करे संविदा को सदा आकृत करे वह फलता है सत्यंकार की सदैव उन्नति होती है, सत्येतर ( संविदा का व्यतिक्रम, संविदा की प्रतिज्ञा पूर्ण न करना ) व्यवहार को अव्यवहार्य कर व्यवहारी की अवनति का कारण बनता है ॥
सुभ सोई कर गाहिये, जगत हेतु जो होइ ।
लभ सोई कर लाहिये, धर्म हेतु जो जोइ ।२२४७ ।
भावार्थ : --वही शुभ ग्रहण योग्य है जिसमें जगत का हेतु निहित हो । वही लाभ लब्ध योग्य है जिसमें धर्म का हेतु निहित हों ॥
आए तो का लाए रहए, रहेउ तो का पाए ।
सोई सँजोए लीजिये, जाएँ तो संग जाए ।२२४८ ।
भावार्थ : -- आए तो क्या लाए थे रहे तो क्या क्या प्राप्त हुवा । वही संकलन संकलित करनी चाहिए जो जाने पर साथ में जाए ॥
आध भवन बँधाई में आधी भुइ को लेइँ ।
का कतहुँ को देस अबर, देखे ऐसे नेइँ । २२४९ ।
भावार्थ : -- देश वासियों का भवन बाँधना है आधे देश की बंधाई में आधा देश ले लो, कंगले पंगले सब आ जाओ । क्या कहीं किसी देश में ऐसी नीव देखी है ॥
करम चंदु के सहुँ बड़ी कर्म चंदु की बात ।
॥
भावार्थ : -- कल का समय उचित ही होगा सभी कार्य कथनानुसार हमारे अनुकूल होंगे । रे प्रगति पंथ के विद्यमान पथिक सुन यह तुम्हारी भूल है ॥
अगहुँ बढे तो काल है पीछे पड़े दुकाल ।
प्रगति पंथ के पथिक सुन अपने चरन सँभाल ।२२५४।
भावार्थ : -यदि और आगे बढे तो दुकाल पीछे पड़ जाएगा ॥ रे प्रगति पंथ के विद्यमान पथिक सुन तू अपने चरण संभाल ।
पारस मनि हेरन चले, मिले परबतहु नाह ।
लोहकारु सब लोह किए, लाभ लब्ध की लाह ।२२५५।
भावार्थ : -- पारस मणि ढूंडने चले ? कहीं पर्वत ही नहीं मिला । जिन्हे सुमेरु पर्वत बनाने चले थे लोभ लब्धि की लोलुपता में मूरख लोहार ने उन पर्वतों का लोहा कर दिया ॥ ऐसे ऐसे मूर्खि हैं इस देस में.....
अपना चैल गवाईं के, पहने पराए चोल ।
उत्तमीअ को तोल दिए, अधम धातु लिए मोल ।२२५६।
भावार्थ : -- अपने वस्त्र को बिसरा दिए भिन्न-भिन्न वल्कल धारण कर जो उत्तमता के तोल में अधम धातु का जो क्रय करे वह कहाँ का व्यापारी हुवा ॥
दरस करष घिस घरष के, अमलाई में घोल ।
सुबरनी जस सुबरन को , लेँ सुबरन के मोल ।२२५७।
भावार्थ : -- स्वर्णकार के जैसे जो स्वर्ण को दर्श कर , खींचखांच कर, घर्षण कर फिर उसको अम्लता में घोल के फिर उसे स्वर्ण के भाव में ही ले वही सिद्ध व्यापारी है ।।
सत्याकृति सदैव फरै उभरै सत्यइ कार ।
सत्येतर ब्यानत कर, बिगराए ब्यौहार ।२२४६।
भावार्थ : -- जो सत्यानृत न करे संविदा को सदा आकृत करे वह फलता है सत्यंकार की सदैव उन्नति होती है, सत्येतर ( संविदा का व्यतिक्रम, संविदा की प्रतिज्ञा पूर्ण न करना ) व्यवहार को अव्यवहार्य कर व्यवहारी की अवनति का कारण बनता है ॥
सुभ सोई कर गाहिये, जगत हेतु जो होइ ।
लभ सोई कर लाहिये, धर्म हेतु जो जोइ ।२२४७ ।
भावार्थ : --वही शुभ ग्रहण योग्य है जिसमें जगत का हेतु निहित हो । वही लाभ लब्ध योग्य है जिसमें धर्म का हेतु निहित हों ॥
आए तो का लाए रहए, रहेउ तो का पाए ।
सोई सँजोए लीजिये, जाएँ तो संग जाए ।२२४८ ।
भावार्थ : -- आए तो क्या लाए थे रहे तो क्या क्या प्राप्त हुवा । वही संकलन संकलित करनी चाहिए जो जाने पर साथ में जाए ॥
आध भवन बँधाई में आधी भुइ को लेइँ ।
का कतहुँ को देस अबर, देखे ऐसे नेइँ । २२४९ ।
भावार्थ : -- देश वासियों का भवन बाँधना है आधे देश की बंधाई में आधा देश ले लो, कंगले पंगले सब आ जाओ । क्या कहीं किसी देश में ऐसी नीव देखी है ॥
करम चंदु के सहुँ बड़ी कर्म चंदु की बात ।
॥
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