शनिवार, 31 जनवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २३०॥ -----,

छन भंगुर संसार तू आपा करे अपार । 
मरनि परन मटिया माहि, मिले सबहि एक सार ।२३०१। 
भावार्थ : -- यह सांसारिक प्रपंच क्षण भंगुर है और तेरा अहंकार अपरम्पार है । मरने  के पश्चात मिटटी में सभी एक जैसे ही मिलते हैं ॥ 

सार संग संसार में , चहुँ दिसि होत उजास   । 
सार रहे ना किछु रहे, देख देख के चास  ।२३०२ । 
भावार्थ : -- सार से ही यह संसार है  सार नहीं तो संसार नहीं  है सार के संग ही चारों दिशाएं उज्ज्वलित होती हैं । सारहीन संसार में अन्धकार ही व्याप्त रहता है ॥ अत:  आवश्यकता अनुसार  ही इसका उपयोग करना चाहिए ॥ 

चार ईंट का जोगना, चार ईंट दिए ढार । 
चार जुगौनी जोग के, आपा करे अपार ।२३०३ । 
भावार्थ : -- चार भित्ति के भवन में चार वस्तुएं संग्रह कर मनुष्य असंख्य अहंकार करता है ॥ 

कहाँ अजहुँ के कुसासन,कहाँ राम के राज ।
कहाँ यहु कलुखित कुकरम , कहाँ राम के काज ।२३०४।
भावार्थ : --  कहाँ तो यह लोकतांत्रिक कुशासन कहाँ राजतांत्रिक राम का राज । कहाँ तो इन कुशासकों के काले काले कुकरम, कहाँ राम के सद्कार्य ।

 रयनि चर रयन बितावै, भोर उगावै सूर । 
जाग उठए सो बावरा,बोले जब तमचूर ।२३०५। 
भवार्थग : -- चन्द्रमा के संचरण से ही रयनी व्यतीत होती है । सूर्य से ही प्रभात का उदय होता है ॥ जो मूर्गों के बोलों से जागरण करता है वह हतबुद्धि हैं ॥

भोर बतावै आँधरा, गूंगा गावै राग । 
बहरा बंधन बोधता, केसेउ होए जाग ।२३०६।
भावार्थ : -- अंधा भोर होने की सूचना देता हो , गूंगा राग भोर गाता हो  ॥ बहरा सुरों को बांधता हो बताओ फिर जागरण होए तो कैसे होए ॥

कंदील पथ उजरावै , दिसा दिखावै सूर । 
कहत चरे सो बावरा, बढे पंथ पद तूर ।२३०६। 
भावार्थ : -- प्रकाश स्तम्भ पंथ को प्रकाशमय कर रहा है  सूर्य दिशा दर्शा रहा है । वह हतबुद्धि है जो कहता चलता हो कि आगे बढ़ो जब साँझ हो जाए तब घर लौटना चाहिए ॥

अधिक पहिरै अधिक खाए अधिकाधिक जो सोए । 
तासु मरनी काल सोंह पहिले मरनी होए ।२३०७ । 
भावार्थ : -- शयन मरण के सदृश्य है जो अधिक खाता व् पहनता है अधिकाधिक शयन करता है, उसकी मृत्यु समय से पूर्व हो जाती है ॥

हरिन्मनि सोंह सोहिते कंचन सन जूँ काँच । 
साँचा संगत पाइके सोहिते तूँ असाँच ।२३०८। 
भवार्थ : --  कंचन का संग प्राप्त कर जिस प्रकार काँच  भी हिरन्मणि के जैसे शोभा देता है ।  साँच  की संगती प्राप्त कर असाँच भी उसी प्रकार से सुशोभित होता है ॥

संस्कार अरु संस्कृति, धर्म चरन जन्माइ । 
प्रथा गत लोक गति रीति, चरत चरत चलि आए ।२३०९। 
भावार्थ : -- संस्कार एवं संस्कृति की व्युत्पत्ति धर्मचर्या से ही होती है । लोक मान्यताएं अर्थात देश विशेष के आचार-विचार, धर्म का अनुशरण करते हुवे ही प्रचलित होते  हैं ॥


जीवन जस चर्जा चरे, तैसे होत बिचार ।
धर्म चरजा होइब तस, होतब लोकाचार || 
 जीवनचर्या जैसी होगी आचार-विचार भी वैसे ही होंगे, उसी प्रकार धर्मचर्या जैसी होगी लोकाचार भी वैसे ही होंगे

इतिहास में जिसका कहीं उल्लेख नहीं मिलता , जो पूर्व में कभी सुनी नहीं गई,
वह गंगा- जमुनी अर्थात दोरंगी संस्कृति क्या है.....?





----- मिनिस्टर राजू १६० -----

राजू : -- मास्टर जी ! आपके दादाजी क्या करते थे ? 

 "पता नहीं '

राजू : - मास्टर जी ! मेरे दादाजी जी न शनि ग्रह पर भेड़ बकरियां चराते चराते वहां के राष्ट्रपति बन गए थे..,

 अच्छा ! नाम क्या है तुम्हारे दादाजी का  ?" 

राजू : - मास्टर जी !  पता नहीं,

रैली में तुझे बुलाया है अब की बार जब रेला होगा तब तुम्हारे दादाजी को बुलाएंगे ठीक, 

और हाँ माई-पिल्लै के साथ तभी आना जब निमंत्रण में सपरिवार लिखा हो..... उजड्ड कहीं के .....

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

--- ॥ दोहा-दशम २२९ ॥ -----

पहिले भारत में रहे, दृढ़तस अर्थ प्रबंधु । 
भवन भवन सिवगति गहै,पति पति रहि प्रतिबंधु ।२२९१। 
भावार्थ : -- प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था अत्यधिक सुदृढ़ थी । जहाँ प्रत्येक भवन सुख समृद्धि को प्राप्त थे वहीँ भवन पतियों में परस्पर आत्मीय सम्बन्ध होता था ॥ 

खन खन कर कनखनकाए  ,बाँध बनज भुज बंध । 

सिखा बल बेनी बँधाए ,उपबन देइ सुगंध ।२२९२। 
भावार्थ : -वनोपज से युक्त होकर खंड खंड धनधान्य से भरपूर थे अर्थात अर्थ व्यवस्था कृषि-कर्म पर आधारित थी । वेणियों के सदृश पर्वत श्रेणियों से युक्त  इस भारत खंड को उपवन सुगन्धित किया करते थे ॥ 

पहिले खन खलिहान सन, रहैं सबहि धनबान । 
अजहुँ त खल धन धान बिनु , किसान रहँ न किसान ।२२९३ । 
भावार्थ : -- प्राचीन भारत में  खेत खलखण्ड के स्वामी होकर सभी भारतीय धनवान थे किसान थे । विद्यमान परिदृश्य में तो भूमि व् धनधान्य से रहित होकर किसान, किसान न रहे शासन की दमनकारी नीतियों ने उन्हें कृषिकर्म से हीन कर दिया ॥ 

अजहुँ की अर्थ नीति के, किए जब अनुसंधान । 
हलबान तो हींन मिले धनिमन मिले प्रधान ।२२९४ । 
भावार्थ : -- विद्यमान शासन की आर्थिक  नीतियों का जब अर्थानुसन्धान किया किसान अर्थहीन मिले धनवान अर्थप्रधान मिले ॥ 

अजहुँ देस बन दास भए  , ऐसेउ नय  अधीन । 
कलजीबी को पीन किए हलजीबी को दीन ।२२९५। 
भावार्थ : -- विद्यमान समय का भारत  ऐसे नियमों के अधीन हो गया । जो कलुषित कला के कलजीवी का पोषण  कर हलजीवी का शोषण कर रहे हैं  ।।  

शनिवार, 24 जनवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २२८ ॥ -----

सदन मंडपु मंडन किए, रचए नेम अनुबंध । 
बंधनु किन्ह बाँधिये, न्याय अहँ न प्रबंध ।२२८१। 
भावार्थ : -- मंडप मंडन करके सदन नेम नियम तो भतेरे रच रहा है रचे जा रहा है । पण एक बात बताओ फांसी कीन्ह चढ़ाओगे यहाँ न्याय है न शासन -प्रबंध । 
]
>> कल महा कोरट एक पेपर वाला त कह रिया था भई आतंकवादी के नाम त के लेना.... घायल ठीक होणे चाहिए.....सरकारी हस्पताल मैं..... पहले इस हस्पताल न तो ठीक कर ले.....

जहँ सिँहासन तहँ सासन मैं के करे प्रलाप   । 
जहँ पद पदबि तहँ पदानुग आपद तहँ हम आप ।२२८२ । 
भावार्थ : -- जहाँ सिंहासन होगा शासन वहीँ होगा जो मैं मैं का अनर्गल प्रलाप भी करेगा  जहाँ पद होगा पदवी होगी वहां इनके अनुयायी होंगे जहाँ आपदा होगी वहां हम और आप ही होंगे ये नहीं होंगे  ॥ क्यों होंगे मत दान के कारण ॥ 

अगजग जुगति जुगत करे, जोगे जगत समाज । 
कुल दस सदस सदन रचे, कहि ए  लोक के राज ।२२८३ । 
भावार्थ : -- जगत भर की युक्तियों को युक्त कर जगत भर के समाज को जोड़ कर कहते हैं यह लोकतंत्र है ये लोक तंत्र नहीं है परलोकतंत्र है ॥ 

 सम्प्रदाय किसे कहते हैं ?समाज किसे कहेंगे ? अथवा किसी राष्ट्र के अंतर्गत समाज की परिभाषा में कौन आते हैं.....?






मंगलवार, 20 जनवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २२६- २२७ ॥ -----

भवन भवन बन राजि भए ब्याल भयउ भुजंग । 
बिमान बियत बिहंग भए बियद पताका गंग ।२२६१ । 
भावार्थ : -- भवन-समूह ही वन के वृक्ष-समूह, हिंसा वादी उसपर लिपटे विषैल सर्प, विमान ही खग हो गए विद्युत की विद्योतक सज्जा खगंग ( आकाश-गंगा ) हो गई । जिसके आगे कुछ दृष्टिगत नहीं होता ॥

पन पति भए बन पारसा, पर्वत भयउ अटारि । 
जो परबत कर परस लिए, भयउ कोइरा कारि ।२२६२ । 
भावार्थ : -- पणपति ही वनों में पहुंचे हुवे गुरु मुनि मनीष बने हैं उनकी ऊंची ऊंची अट्टालिकाएं ही पर्वत है जी । ये जिसे भी स्पर्श कर दें वह पर्वत तथा उसके तलहटी के खेत कोयला कोयला हो जाते है ।

ब्याजु तपोधनह्वयन, बन गत बने त्यागि । 
साधु सज्जन रावन भए जन जन चरननुरागि ।२२६३ । 
भावार्थ : - धींगी तपस्वी छद्म नाम धारण किए इस वन में आकर बने हुवे त्यागि बनकर भगवान बन गए । साधु सज्जन रावण हो गए जनता इनके चरणों की अनुरागी हो गई ॥

यदि विदेशी राम हो  देसी रावण हो तो इस देश को लंका होना ही है  । भेद तो लंकापति के ही होते  है अवधेश के के भेद नहीं होते

बन राऊ का राज है बन बिनु भए बन खंड । 
भाखन हुँत बन गाँउ भए जन साधारन षंड ।२२६४ । 

भावार्थ : -- वर्त्तमान में जंगल-राज है किन्तु जंगल नहीं हैं ।  हिरन नहीं हैं भक्षण हेतु जन साधारण ही हिरण बने हैं ।

कारण : --
खेह खेट बिगारी के, दिए बिधिकार बिसार । 
बने बनाउनहार भए, बनत बने बपमार । २२६५ । 
भावार्थ : - खेतों गांवों विधिवेदज्ञ की उपेक्षा की गई । बने हुवे विधज्ञ विधि के रचयिता बने जब वह संविधान बना तो बापुमार बना ।

बुअनहार बनिहार भए, बिअ बिअ बुअन निहारी । 
बसबासा बिस्तार दए,बिआर लए बरिआरि ।२२६६। 
भावार्थ : -- कृषक दैनिक भृतक हो गए बीज अपनी बुआई की प्रतीक्षा करने लगे । विलासित वास वसति  के विस्तार हेतु इनकी कृषि योग्य भूमि  पर बल पूर्वक अधिकार किया ॥

खेह खेट लूटत करें सासन दमनादेस । 
अजहुँ होइहि बिधि सम्मत,अबैधिक उपनिबेस ।२२६७।  
भावार्थ : --अब नव निर्मित शासन ने दमनचक्र चलाते हुवे यह आदेश किया है की ये लूटी खसूटे खेत गाँव पर रचे भवन विधि सम्मत होंगे ॥ 

आल बाल  बर मनि माल भूरि भवन भुइँ बाहि । 

रहन मैं त सब किछु अहैं, कहनइ मैं किछु नाहि ।२२६८ । 
भावार्थ : -- मणि मल्लिकाओं से भरे थाल हैं, भोग विलास के साधन भी अतिसय हैं । रहने को बहुंत कुछ है कहने को कुछ भी नहीं ॥ 

कहीं ज़ेवरो-जवाहर जरगर जमीं जायद कहीं..,
रहने को बहुंत कुछ है कहने को कुछ भी नहीं..... 

एक दलपत पिता एकु पति एक जमात एकु भ्रात । 
चुनाई बिधिहि रच छल किए, एक दल के दस पात ।२२६९ । 
भावार्थ : -- एक दल के पति पति होंगे दूसरे का पिता होगा तीसरे का जमात होगा चौथे का भ्राता होगा । गिनती के  दल द्वारा ही भारत का जनतंत्र  संचालित होगा  ऐसी विधि का विधान एक ही दल के दस सदस्यों ने किया । क्या यह उचित था.....? जब संविधान लागू किया गया तब कितने दल थे ? पता नहीं 

>> क्या संविधान के निर्माता को किसी चुनावी दल से संबंधित होना चाहिए था.....? 

प्रपञ्जी लेँ बिनु पूँजी, पहने देसी चैल । 
धरा दुहन कोल्हू है, देवन जन धन बैल ।२२७०। 
भावार्थ : - अड़ोसी पड़ोसी छितिज के  अंत तक जो कोई भी हो सब इंडिया आ  जाओ बिन पैसे की बही खुलवाओ-भारत के मूल नागरिक बन जाओ । यहां जीवन के आधार भूत साधन निशुल्क मिलते  है । कहाँ से मिलते  है यह हमारी धरती हैं न इसे कोल्हू लगा कर दूहेंगे और जो वास्तव में भारत के मूल नागरिक है उनको निचोड़  कर टेक् -स पर तुम्हारा अधिकार होगा, बदले में तुम हमें मतदान देना ॥ 

और सभी दलों की इसमें मौन सहमति है क्या ये दल शासन करने के योग्य हैं.....? 

अजहुँ रावन राज भया अजहुँ बिरध भए दूर । 
कारज कारे और के, पौर काज को भूर ।२२७१ ।
भावार्थ : -- इस राष्ट्र में अब तक  रावण का ही राज रहा है जहाँ मूल नागरिक तो  दूर हो गए निर्मूल निकट हो गए । यह शासन-व्यवस्था अपने राष्ट्र को विस्मृत कर औरों के कार्य कार्यान्वित करती है ॥ 

पलक नैन जब लाग रहँ, दिवस रैन सुपनाए  । 
सुरग सम सुख जीबी को, दरस किछु नहीं आए ।२२७२। 
भावार्थ : -- स्वर्ग के समान सुखमय जीवन की परिचर्या में ज्ञान चक्षु मुकुलित होते  हैं, मुकुलित ज्ञान चक्षु स्वपन का ही प्रपंच करते हैं इस प्रपंच में जीवन का यथार्थ दर्शित नहीं होता ।


पलक नैन जब लाग रहँ, दिवस रैन सुपनाए  । 
सुरग के सुख वादी को, दरस किछु नहीं आए ।२२७३। 
भावार्थ : -- सुखमय जीवन का अनुयायी के ज्ञान चक्षु मुकुलित होते हैं मुकुलित ज्ञान चक्षु स्वपन का ही प्रपंच करते हैं इस प्रपंच में जीवन का यथार्थ दर्शित नहीं होता ।।

दासा तिन का चिंतिये, जो दासन के दास । 
चिंता वाकी कीजिये पतिपद जाके पास ।२२७४। 
भावार्थ : -- दासता हेतु उसकी क्या चिंता करना जो दासों का भी दास है । चिंता उसकी करनी चाहिए जिसके पास स्वामी का पद हो ॥

चिंतक तिन का चिंतिये, जो दासन के दास । 
चिंता वाकी कीजिये, पतिपद जाके पास ।२२७५। 
भावार्थ : -- हे चिंतक ! उसकी चिंता क्या करना जो दासानुदास हैं,  स्वामी का पद जिसके पास है चिंता उसकी करनी चाहिए ॥

संविधान जबलग अहैं , रहिहीं एही बिधान । 
एक दल नाउ पुरान है, भए सब नवा नवान ।२२७६ । 

                   ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- जब तक यह संविधान रहेगा  तब तक यही विधान रहेगा । एक पुराना दल शेष सब नए दल  तो भैया मत किसी को दो जाना पुराने के पास है ॥ 

भए भिनुसारु बिरति रयन अरु संतन  की बानि । 
पलक नयन लगि चित भवन जागत जागत जानि ।२२७७। 
भावार्थ : - अवचेतन मानस मन को रयन का विप्रलयन भोर का अभ्युदयन एवं संत-वचन संज्ञात करने  है । पहले एक जगता है । सब एक साथ नहीं जागते एक एक को जगाना पड़ता है ॥ 

कैसे : -- 

केतुपति नगपथ उतरे, बोल उठे तमचूर । 
जाग जति जग रथ उतरे, बाजए संख सुदूर । २२७८-क। 

आनइ अंकुर सिरु उपरे, बिकसे बन बन फूर । 
जाग गमन गोचर चरे हरहर की कर हूर ।ख ।  

हिमसैल सुठि सीस सिखर, देइ तिलक कर कूर । 
उद बाहन बिंदु उछरे, झूर रहे रमझूर  । ग । 

सुर सिंधु सिंगार करे, भरे माँग सिंधूर ।
निर्झरनी झर झर झरे,चरे संतरन तूर । घ । 

संगि सँवरत सुर सँमरे, सुपन सात को भूर । 
तीर तीर तूर्य धरे, संगति किए संतूर । ढ़ । 

सुर निर्झरणी  = आकाश गंगा  

नलिनि  नीर नुपूर बरे, चारु चरन मैं पूर । 
किए घन सयन सुपन घरे, होइहि सिरु पर सूर । च ।  

लगे नयन अगजग जगे, लगे मिले जग जोत । 
जगे नयन अगजग लगे, जगे मिले खद्योत ।२२७९ । 
भावार्थ : -- जब जागते नयन लगे तब संसार जगा हुवा था, जगती ज्योत लगती मिली । जब यह नयन जागृत हुवे संसार में सूर्य का जागरण हो चुका था ॥ 

 जगे नयन अगजग जगे जगे मिले खद्योत । 
लगे नयन तब जागिये जगे मिले जब जोत ।२२८० । 
भावार्थ : -- जब यह नयन जागे सारा संसार भी जाग गया, सूर्य देव पूर्व में ही जागृत हो चुके थे। लगे  नयन तब जगने चाहिए जब ज्योति जागती मिले ॥  
















रविवार, 18 जनवरी 2015

----- मिनिस्टर राजू १५९ -----

"सबका बिकास में तो अड़ोस्सी-पड़ोस्सी भी आ जाते हैं, 
साथ में कोई नहीं आता....."

राजू : -- मास्टर जी !  छब्बीस को अमरीक्का भी आ रिया सै.....

 "बिका ये अग्रेजाँ नै बुला के ही मान्नंगें "  

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

----- ॥ दोहा-दशम २२४- २२५ ॥ -----

जीवन चरजा संग भए धन साधन अनुकूल । 
जन संकुल काल प्रसंग भए बय जग प्रतिकूल ।२२४१। 
भावार्थ : - जीवनचर्या में जब धन व् साधन सहज सुलभ हो गए तब जन संकुलता ने समय का प्रसंग किया परिणाम स्वरूप परिस्थितियां संसार के प्रतिकूल हो गईं ॥

 " वर्तमान के सौ वर्षों की जनसँख्या का योग कदाचित पूर्व के एक सहस्त्र वर्षों की संख्या के समतुल्य होगा"

बाहरि जग के सुहा सों, तामस गुन बढ़ बाढ़ि । 
अंतर जग जब सोहहीं, सातबीक गुन गाढ़ि ।२२४२। 
भावार्थ : -- बाह्य- जगत की शोभा के संग तमोगुण धर्म का विस्तार होता है इस अवस्था में मनुष्य का चित्त तामस वृत्ति में प्रवृत्त रहता है ॥ अंतर जगत की शोभा सतोगुण  धर्म का वर्द्धन  करती है रजस गुण  कहीं अल्प ही होता है मनुष्य का चित्त सत्त्वान व् विवेकशील होकर साधु-पद को प्राप्त करता है  ॥

लोक तंत्र के जस भाँति करे बेद प्रतिपाद  । 
सत संतुलन माहि रहे, संख्य गुनगन वाद ।२२४३। 
भावार्थ : - वैदिक काल में लोकतंत्र की जिस प्रकार व्याख्या मिलती है उसके अनुसार उस तंत्र में  गुणगणवाद संतुलित स्वरूप में था ॥

सभा सदन सँजोग करे,  जब गुन सँख्या जोग । 
सतकर्म के संग मिले , जुगता सार सँजोग ।२२४४। 
भावार्थ : --सभा सदन में जब संख्या व् गुणवाद का योग होता है तब सत कर्मों के प्रतिफल स्वरूप जन साधारण में सद्गुणों को प्राप्त करने की योग्यता का संयोग हो जाता है ॥

क्वैलिटी + क्वन्टिटी = क्वालिफेकिशन
डिस्क्वालिटी + क्वन्टिटी = डिस्क वाली फिकेशन, चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए ॥

बढ़ा बढ़ी बढ़ाई कै कहैं बढ़ो सब कोइ । 
बढ़े बढ़इया की बढ़नि सो बढ़ बढ़िया होइ ।२२४५। 


भावार्थ : -- प्रतिद्वंद्विता को बढ़ा-चढ़ा के सब कोई बढ़ने को कहते हैं  .....बढ़ो तो कहाँ बढ़ो ऊपर की नीचे आगे तो काल है पीछे दुकाल पड़ा है । जब बढ़ई की  (वन बढ़ेंगे तो बढई बढ़ेंगे ) अथवा  उन्नति करने वाले की संख्या में वृद्धि हो वह वृद्धि उत्तम है । प्रगति में बढ़ई वन घटेंगे  घटेंगे घटने चाहिए ॥ 


सब बन तो चन्दन नहीं सूरा के दल नाहि । 
सब समुद्र मोती नहीं योंह साधु जग माहि  ।। 
 ----- ॥ संत कबीर ॥ -----

भावार्थ : -- सारे वन समूह चन्दन के नहीं होते सभी दल शूरवीरों के नहीं होते । सभी समुद्र मोतियों से नहीं भरे होते, इसी प्रकार ज्ञानवान भी सब कहीं नहीं होते ॥


जीबिका केतक चाहिए , जेतक जनित जनाए । 
एतेक जीउ धन साधन ? कहु जग कहँ ते लाए ।२२४६। 


भावार्थ : -- आजीविका कितनी होनी चाहिए.....?  जितने लोग हैं उतनी होनी चाहिए ।  इतना जोग-जुगाड़ ? यह संसार कहाँ से लाएगा ॥ 

 "जीव- जंतु कभी आजीविका नहीं माँगते मनुष्य ही एक ऐसा धूर्त चरित्र प्राणी है जिसे सब कुछ चाहिए....." 


एक तो अतेक जन सघन, तापर भोग बिलसिहि  । 
तुम्हरे मूरखिमन को होवनि होतब हँसिहि ।२२४७। 
भावार्थ : -- एक तो इतनी जन घनत्व उसपर उसकी भोगवादी प्रवृत्ति ( अर्थात खाओ पियो मजे करो वाला सिद्धांत अथवा संकीर्णवाद  ) आने वाला समय तुम्हारी इस मूर्खता पर दुःख जनित उपहास करेगा ॥ 

बढ़ा बढ़ी बढ़ाई कै, कहैं बढ़ो सब कोइ । 
बढे घटिहा की बढ़नी, सो बढ़ घटिहा होइ ।२२४८ । 
भावार्थ : -- प्रतिद्वंद्विता को बढ़ा चढ़ा कर सभी बढ़ाने को कहते हैं । धोगति की ओर ले जने वलों की संख्या में वृद्धि हो वह वृद्धि अधमतस है ॥ 

 ''जैसे ये नेता हैं ऐसे को जनने से अच्छा है माताएं बाँझ ही रहें....." 

बढ़ैया की बढ़नी सँग , बन बन करे बिकास । 
कढैया की कढ़नी सँग ,गहनतम भए उजास ।२२४९ । 
भावार्थ : - बढिया की बढ़नी के साथ वनों का विकास होता है । वे उसे ऐसे छाँटते हैं कि जहाँ  घनघोर अँधेरा होता है वहां प्रकाश पहुँचने लगता है ॥ 

बने बढ़ैया की बढ़न, दिए बन काट कढ़ाइ । 
खाट चुखाट चढ़ाए के, माँगे गहन गढ़ाइ ।२२५० । 
भावार्थ : -- बने हुवे बढ़ाई अर्थात अपरम्परागत बढ़ाई को न वनभूमि से स्नेह होता न वनों से ये वन के वन काट कर उसे कढ़ाई में दे देते हैं जहां इनकी खाट चुखात बनती हैं पारिश्रमिक में गहने की गढ़ाई माँगी जाती हैं ॥ 

अर्थात ये पेट परायण सारे कारज कर चुके होते हैं.....

पच्चीस तीस वर्ष पूर्व तक परंपरागत बढ़ई दिख जाते थे अब तो दर्शनातीत हो चले हैं.....


बनिक गाँव के लेख कहँ बनाउटी की लीख  । 
खेह खन मंद मलिन किए, घटे घटा की दीख ।२२५१। 
भावार्थ : -- कहाँ वणिक ग्राम का उत्कीर्ण विवरण कहाँ बने हुवों की बही ।  ऐसी बही खेतों को खोद -उजाड़ कर उन्हें मलिन कर देती है जिसका दुष्परिणाम यह होता है की गगन में घटाओं को देखने वाला कोई नहीं होता अर्थात  इससे किसान घटते हैं और देश में अन्न धन के अकाल की स्थिति व्युतपन्न हो जाती है ॥

कहँ दीपक का दैदीप कहँ तापक के ताउ । 
कहँ भाजी  की भावना, कहँ भाजन के भाउ ।२२५२। 
भावार्थ : -- कहाँ दीपक का देदीप्य कहाँ सूर्य का तेज । कहाँ  भाग प्राप्त  करने वाले की भावना कहाँ पात्र का स्नेह ॥

काल अनुकाल कीर्तनम् होइहि काम अनुकूल ।
प्रगति पंथ के पथिक सुन, ए अहैं तुहरी भूल ।२२५३।
भावार्थ : -- कल का समय उचित ही होगा  सभी कार्य कथनानुसार हमारे अनुकूल होंगे  । रे प्रगति पंथ के विद्यमान पथिक सुन यह तुम्हारी भूल है ॥

अगहुँ बढे तो काल है पीछे पड़े दुकाल । 
प्रगति पंथ के पथिक सुन अपने चरन सँभाल ।२२५४।  
भावार्थ : -यदि और आगे बढे तो दुकाल पीछे पड़ जाएगा ॥ रे प्रगति पंथ के विद्यमान पथिक सुन तू अपने चरण संभाल । 

पारस मनि हेरन चले, मिले परबतहु नाह । 
लोहकारु सब लोह किए, लाभ लब्ध  की लाह ।२२५५। 
भावार्थ : -- पारस मणि ढूंडने चले ? कहीं पर्वत ही नहीं मिला । जिन्हे सुमेरु पर्वत बनाने चले थे  लोभ लब्धि की लोलुपता में मूरख लोहार ने उन  पर्वतों का लोहा कर दिया ॥ ऐसे ऐसे मूर्खि हैं इस देस में.....

अपना चैल गवाईं के, पहने पराए चोल । 
उत्तमीअ को तोल दिए, अधम धातु लिए मोल ।२२५६। 
भावार्थ : -- अपने वस्त्र को बिसरा दिए भिन्न-भिन्न वल्कल धारण कर जो उत्तमता के तोल में अधम धातु का जो क्रय करे वह कहाँ का व्यापारी हुवा ॥

दरस करष घिस घरष के, अमलाई में घोल । 
सुबरनी जस सुबरन को , लेँ सुबरन के मोल ।२२५७। 
भावार्थ : -- स्वर्णकार के जैसे जो स्वर्ण को दर्श कर , खींचखांच कर, घर्षण कर फिर उसको अम्लता में घोल के फिर उसे स्वर्ण के भाव में ही ले वही सिद्ध व्यापारी है ।।

सत्याकृति सदैव फरै उभरै सत्यइ कार । 
सत्येतर ब्यानत कर, बिगराए ब्यौहार ।२२४६। 

भावार्थ : -- जो सत्यानृत न करे संविदा को सदा आकृत करे वह फलता है सत्यंकार की सदैव उन्नति होती है, सत्येतर ( संविदा का व्यतिक्रम, संविदा की प्रतिज्ञा पूर्ण न करना  ) व्यवहार को अव्यवहार्य कर व्यवहारी की अवनति का कारण बनता है ॥ 

सुभ सोई कर गाहिये, जगत हेतु जो होइ । 
लभ सोई कर लाहिये, धर्म हेतु जो जोइ ।२२४७ । 
भावार्थ : --वही शुभ ग्रहण योग्य है जिसमें जगत का हेतु निहित हो । वही लाभ लब्ध योग्य है जिसमें धर्म का हेतु निहित हों ॥ 

आए तो का लाए रहए, रहेउ तो का पाए । 
सोई सँजोए लीजिये, जाएँ तो संग जाए ।२२४८ । 
भावार्थ : -- आए तो क्या लाए थे रहे तो क्या क्या प्राप्त हुवा । वही संकलन संकलित करनी चाहिए जो जाने पर साथ में जाए ॥ 
आध भवन बँधाई में आधी भुइ को लेइँ । 
का कतहुँ को देस अबर, देखे ऐसे नेइँ । २२४९ । 
भावार्थ : --  देश वासियों का भवन बाँधना है आधे देश की बंधाई में आधा देश ले लो, कंगले पंगले सब आ जाओ । क्या कहीं किसी देश में ऐसी नीव देखी है ॥

करम चंदु के सहुँ बड़ी कर्म चंदु  की बात ।
























----- ॥ दोहा-दशम २२२-२२३ ॥ -----


तनिक काल पहिले रहै भारत देस अखंड । 
उपनिबेसित देस संग, भयऊ खंडहि खंड ।२२२१। 
भावार्थ : -- किंचित समय पूर्व तक यह राष्ट्र अखंड-भारत कहलाता था । पराए देश से आए लोगों की बस्तियां बसाते बसाते यह खंड-खंड हो गया ॥

को लूटक लूमरे को साधु भेष भर आए । 
लूट के सिँहासन चढ़े, लूट पाट के खाए ।२२२२। 
भावार्थ : - पराए कौन ? सज्जनता के वेश वे जो डाकू थे लूटेरे थे जिन्होंने यहां के मंदिरों को नहीं छोड़ा । वे लूट के सिंहासन पर चढ़े व् यहां के शांतिप्रिय लोगों को यंत्रणाएं दे दे कर उनका धन छीन-छीन कर खाते रहे ॥

उपनिबेसी देसी भए , भारत भयऊ सेष । 
लज्जाहीन परदेसी, बसे रहे एहि देस ।२२२३। 
भावार्थ : -- उपनिवेश प्रणाली का यही उद्देश्य था कि प्रवासियों की पृथक वसति हो । किन्तु शासकों ने छल किया मत के उपनिवेशी को देशज का अधिकार दे दिया ।  उपनिवेश तो बसे  किन्तु निर्लज उपनिवेशी यहाँ से गए नहीं यहीं बसे रहे ॥ परिणाम यह हुवा कि उपनिवेश प्रणाली असफल सिद्ध हुई अत: यदि अन्य किसी राष्ट्र के समक्ष यह समस्या है तो उसे प्रवासियों को उनके ही देश में लौटाना चाहिए ॥

सुजलय सुफलय मलय भुइँ ससि स्यामल सँजोए  ।
देस बनाया कोए अरु, बास बसाया कोए ।२२२४। 
भावार्थ : - तप करके, त्याग करके, सत्य के मार्ग पर चलते हुवे, प्राणी मात्र पर दया करते यहाँ के देशजों ने इस सुजलम  सुफलम् व् मलय पर्वत सी इस पावन भूमि को ( नदी-बहुल फलवती व् अनपूर्णा भूमि जहां गौधन का संकलन हो  )  एक राष्ट्र का स्वरूप दिया । उसपर बस्ती किसी और ने बसा ली ॥

देस दिए धन धान्य दिए, तापर किए उत्पात । 
निस दिन सीवाँ काँड़ कै, दिखाए अपनी ज़ात ।२२२५। 
भावार्थ : -- इन उपनिवेशी को भारत ने देश दिया धन दिया धान्य दिया और ये नित्य उत्पात करते हैं । ऐसा  कोई दिन नहीं है जब इन्होने इस देश की सीमाओं का अतिक्रमण कर अपनी जात दिखाते रहते हैं ॥

पकी पकाई मेलिबै, ताते श्रम ना होए । 
अपने बिसने बिसराए,दूजे बसने जोए ।२२२६।
भावार्थ : -- पकी पकाई जिसको मिल फिर उससे परिश्रम नहीं होता । अपना पतन अपना दुर्व्यसन अपना दुर्भाग्य पाने दोष पने अपराधों को विस्मृत कर  दूसरों के वेश को अपना वेश कहते हैं दूसरों की संस्कृति को अपनी संस्कृति कहते हैं, हम तो पता नहीं कौन थे क्या हो गए और क्या होंगें अभी, ये कुलीन हो गए ॥ 


पेट पराया पूरता पुआ पकाया कोए ।
कोउ मचाया हगनेटि, कोउ मैल मल धोए ।२२२७ । 
भावार्थ : -- पराए पेटों को भरने के लिए पुआ पकाया किसी ने खा खा के हगन हटी ( अत्यधिक मात्रा में  व्युत्पन्न होना ) मचाई किसी ने मैल धोया किसी ने । उपनिवेशियों को किसान पुकारा गया हो उन्होंने मैल धोया है ऐसा किसी ने कहीं सूना अथवा कहीं पढ़ा.....? 

हो जो कोइ आपना कि कोइ पराया होए । 
ऐसो कारज कीजिये, जिन चाहै सब कोए ।२२२८। 
भावार्थ : -- अपना देश हो कि पराया देश हो ऐसे कार्य करने चाहिए जिसे सभी चाहें । क्योकि इस देश में धर्मात्मा का सम्मान नहीं होता अपितु उनकी पूजा होती है..... 

अमौलिक को मूल करे  पोष दिए खाद्यान  । 
अमरत अम्ल मिलाई के, अम्लिन करे मलान ।२२२९। 
भावार्थ : -- इस राष्ट्र ने अमौलिक उपनिवेशियों को मौलिक कहा उसे खंड-खाद्यान देकर उसका पोषण किया । और इसने अमृत को मलिन करते हुवे उसी राष्ट्र की पवित्रता को अपवित्र किया ॥ 

बसा बसति बसबासिआ,तिनका तिनका जोए । 
बसा बसेरा बिनसिआ, तिनका तिनका होए ।२२३० । 
भावार्थ : - बसेरी ने तिनका तिनका एकत्र कर बसेरा बसाया  । इनकी करनी बसा बसेरा उजड़ कर पुनश्च तिनका तिनका हो गया अथवा तीन भाग में विभाजित होकर तिसरैत का हो गया ॥ 



दुखित ह्रदय सूखे अधर, करें न केहि जाप ।
झुधित उदर के दोउ कर करे न केहि पाप ।२२३१।
 ----- ॥ नीति वाक्य ॥ -----
भावार्थ : -- दुखी ह्रदय कौन सा जाप नहीं करता अर्थात सभी करता है । क्षुधित उदर ये दो कर कौन सा पाप नहीं करता अर्थात्त कुछ भी कर ले ॥

एक भूखे पेट की चोरी और एक सेठ की चोरी की क्या तुलना.....भूखे पेट की चोरी अपराध तो है किन्तु क्षमा योग्य है.....

मानस मन की दसा दुइ, का जागै का सोइ । 
सोए मन बुराई जोए, जगे बड़ाई होइ ।२२३२। 
भावार्थ : -- मनोमस्तिष्क की दो अवस्थाएं होती है एक सुसुप्त एक जागृत । सुसुप्त अवस्था जिसे दोष दर्शाती  है  जागृत मन उसे गुण दर्शाता है॥

जैसे : -

हे रे हेर मिले न मम जनम दात सम कोए । 
एक संतोस  पर हाँसे  दुजे कोस के रोए ।२२३३। 
भावार्थ : -- हे रे  हमरे जन्मदाता के जैसे जन्मदाता ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे । कितने संतोषी थे एक मनोदशा यह विचार कर प्रसन्न है  दूसरी कोस कोस के रोए,  छी कैसे थे ऐसा भी कोई होता है ॥

कबहुंसधान रहे कबहुँ साधन सकल सँजोग । 
छे रहे गह दीनता भोगे न कोउ भोग ।२२३४। 
भावार्थ : -- कभी ऐहिक सुख के सभी साधन सादर उपस्थित रहे कभी साधन के सभी संयोग उपस्थित रहे । तब भी घर में दीनता छाई रही कोई भोग नहीं भोगे ॥

टिप्पणी : -- मात -पिता के त्यागे हुवे साधन-संयोग व् दन की हुई वस्तु को संतति द्वारा उपयोग नहीं करनी चाहिए, अन्यथा उनका त्याग व्यर्थ हो जाता है.....

धनवान हुँत त्याग है दीन दरिद हुँत दान । 
सन्निधान हुँत ग्यान है, सन्निधात हुँत कान ।२२३५ । 
भावार्थ : -- धनवान के लिए त्याग उत्तम है दीन दरिद्र के लिए  दान उत्तम है । संचय करने वालों के लिए ज्ञान उत्तम है चोरी चकारी लूट मारी के संचय कर्त्ता के लिए न्याय-व्यवस्था ॥ 

त्याग की प्राथमिकताए : -- 

प्रथम तजन बुराई है, दूजी कूट कुटाए । 
अधमतम कर्म संग है बहोरि कौसलताए ।२२३६। 
भावार्थ : - प्रथमतस समस्त कुकर्मों का त्याग है दूसरे धंधे में छल कपट मार- पीट का त्याग । तदनन्तर  दुर्वृत्तियों के  त्याग के पश्चात साधन-संयोग के त्याग का स्थान है ( इसके लिए संतोष का होना आवश्यक है ) ॥ 

कुकर्म ही नही त्यागे तो दान का क्या अर्थ  ! 

पाप कमाए पाप खाए पापहि को कर दाए । 
ताते पापी पाप किए, पाप बहुरि कर आए ।२२३७ । 
भावार्थ : - पाप कमाने से मनुष्य पाप ही खाता है व् पाप का ही दान करता है । पाप का दान पापी ही ग्रहण करता है वह उस दान से पुनश्च पाप करता है इस प्रकार दाता को दान के फल में पाप ही प्राप्त होता है पुण्य नहीं ॥ 

जाके घर सब संपदा, सब दिन करे उपास । 
तहँ सुख संतोख संग, श्रीहरि करे निबास ।२२३८। 
भावार्थ : -जिसके घर में सभी प्रकार की सम्पदाएँ हों, गृहस्थ उसका उपभोग न करता हो । वहां सुख व् संतोष के संग श्रीहरि निवास करते हैं ॥ 

बहरि सुहा तब लग रहै, जब लग रहैं सरीर । 
साधौ सुहा अंतर की, रहैं सदा जग थीर ।२२३९ । 
भावार्थ : -- बाह्य जगत का सौंदर्य देह के संग ही लक्षित होता है, अंतर्जगत का सौंदर्य सदैव परिलक्षित रहता है ॥



न बिग्यान का मान होए, न ग्यान की मान । 
कहै साकट सोए मने, जो मोरे अनुमान ।२२३१ । 
भावार्थ : -- न विज्ञान की मान हो न ज्ञान की । स्वार्थी अभक्त-अज्ञानी कहता है संसार में वही मने जो मेरा अनुमान हो ॥ 

में जानूँ धनि मरि गया, दिया चिता मैं फूँक । 
मरा उठा पीछू लगा, रहा गली मैं भूँक ।२२३२। 
भावार्थ : -- संसार के लिए तो सेठ मर गया चिता मैं फूँक दिया गया । किन्तु ये क्या वह तो मरा नहीं उठ के गली मैं भूँक रहा है कह रिहा है, मैं सेठ हूँ गली बोली तेरी थोड़े ही मनेगी जो सेठानी बोलेगी वही मनेगी ॥ 


प्राग रूप बृत्त मानबन जब अनुमति दे नाहि । 
अस  अमान के अर्थ एहि ते जन मति नहि आहि ।२२३५। 
भावार्थ : -- प्राग् रुपित वृत्तांत को यदि कोई अमान्य करता हो तो ऐसी अमान्यता का अर्थ यह है कि उसमें बुद्धि ही नहीं है ॥

जैसे बासा बासिये, तैसे बास बसाए । 
जैसा बासा पहरिये, तैसे नाच नचाए ।२२३६। 
भावार्थ : -जैसे वास  में निवास होगा वैसे ही वासन का वास होगा । जैसा वासन के वश होगे वह वैसा ही नाच नचाएगा ॥

बास बसाई कनइका, बासस बसे बसंत । 
बासक सज्जा साज के बासर मुख भए कंत ।२२३७। 
भावार्थ : -- कन्या ( दिन की कन्या =रात्रि )  ने घर बसाया नहीं कि गृहाक्ष के आवरण में जैसे वसंत वासित हो गया ॥ श्रृंगार कर कन्या प्रतीक्षा करती है कन्या का स्वामी अब पिता बनने वाला है ॥ पता नहीं कन्या होगी की कन्नू होगा /प्रभात उसके कंत हुवे ॥

कला कलित का कबित किए, कबिबर अर्थ न पाए ।
भरम भाव के गति कहए दूजे भाग बँधाए ।२२३८।
भावार्थ : -- कला का विभूषण कर कविवर ने कल- कविता रची किन्तु कविता का उसे अर्थ प्राप्त न हुवा । भ्रमित भाव की गति ने कहा  इसमें दूसरे का भाग बँधा है ॥

करतन कारन फल संग जग अपकीरिति होइ । 
भय प्रसंग स्वनिर्यनै ,प्रान हनै निज कोइ ।२२३९ । 
भावार्थ : -- मानस मनस जब किसी कार्य कारण व् परिणाम से जग दुष्कीर्ति  के भय प्रसंग आत्म निर्णायक होकर स्वयं को मृत्यु का दंड देता है उसे आत्महत्या कहते हैं । यह एक अपराधिक कृत्य है किन्तु दंडनीय नहीं है  कार्य कारन व् निवारण ही इसका समाधान है 

स्पष्टीकरण १ : -- आत्महत्या का नाटक एक दंडनीय कृत्य है 
स्पष्टीकरण २ : -- कार्य कारण यदि विधि द्वारा विहित उपबंधों में कोई अपराध है तब अभियुक्त उतने दंड का ही भागी होगा.....

लाग रहैं न लाग रहें, रहँ सुर मैं सब कोए । 
रागिनी कर राग गहै, ऐसो सरगम होए ।२२४० । 
भावार्थ : -ऐसी सरगम होनी चाहिए जो सारेबाजों में बजे  ॥ 

हिंसारत आँगन फिरए किए घर घर समसान । 
सासक दल के बल संग,भयउ सकल बलबान ।२२४१ । 
भावार्थ : - हिंसा वादी आँगन में फिर रहे हैं और घर घर को श्मशान किए हैं प्रधान सेवक को बन में दिखाई दे रहे हैं । सत्ता धारी दलों का बल प्राप्त कर ही देश में हिंसा बलवती हुई हैं ॥ 

हिंसा वादी हैं ये दल.....

पुरंजई पुर पुर जाएँ, काज कहेँ सब कोइ । 
पुरंजनी पूछ बुझाएं जे कारज कस होइ । २२४२- क। 
भावार्थ : -- पुरों को जीतने वाले जब कहीं जाते उनको सब काम बताते हैं  ( जैसे : - हमारा  कार्य कर दो )प्रज्ञावान जब कहीं जाते हैं तब उनसे यही पूछा जाता है कि यह कार्य कैसे होगा ॥ 

नटता को कहत नचाए करेँ न कारज कोइ । 
नत नागर पूछ बुझाएं जे कारज कस होइ ।२२४२ -ख  । 
भावार्थ : --  नटता को ( अथवा नाटक नौटंकी वाले से अनुरोध करते हैं ये संवाद सुनाओ न वो नाच दिखाओ न ) यह कह कह के नचाते हैं कुछ नहीं करता और किसी चतुर व्यक्ति से पूछते ये काज कैसे होगा ले दे के होता हो तो तू बोल के करवा दे ॥ 

पावन पुनीत सत्कर्म भयऊ गरभ निपात । 
ए  राजा की राजकता, एहि राजा की जात ।२२४३। 
भावार्थ : -- गर्भपात कराना  पुनीत पवित्र व् पुण्य का काम हो गया ।  महाराज की राजकता यही है । यही उनकी जात है.....? 

मत सम्मत के दान अरु गार गवाँरू गोठ ।  
दातारू  को छोट किए, गहई को किए पोठ ।२२४४ । 
 भावार्थ : -- अपात्र को दिया गया मतदान व् गाली दाता को छोटा करते हैं ग्राही को बड़ा। पात्र को देने से दोनों एक समान हो जाते हैं ॥   

सबहीं पदबी पदक पद ऊँचे पद पौराए । 
जब पद देखे आपने, तहँ लग पहुंच न पाए ।२२४५। 
भावार्थ : -- सभी पदवी पदक व् पद ऊँचे स्थान पर रखे हुवे थे । जब अपने चरण देखे तो वे वहां तक पहुंचे ही नहीं ॥ 
सत्याकृति सदैव फरै उभरै सत्यइ कार । 
सत्येत्तर सोंह इतर, दुबरै दोइ असार ।२२४६। 
भावार्थ : -- जो सत्यानृत न करे सत्य को सदा आकृत करे वह फलता है सत्यंकार की सदैव उन्नति होती है ।। सत्याकृति की अस्वीकृति से अधोगति की प्राप्ति होती है ॥ 

सत्याकृति = पण ठहराना,
















----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...