गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३१६ ॥ -----

रे मानस  तू मती कर बढ़ा बढ़ी की होड़ । 
दुनिया अगुसर होइहीं ताकू पीछे छोड़ ॥३१६१ ॥ 
भावार्थ :- हे मनुष्य तू बढ़ा - बढी की प्रतिस्पर्द्धा को प्रोत्साहित मत कर । ऐसे प्रोत्साहन से ये दुनिया  तुझे  पीछे छोड़ कर स्वयं आगे बढ़ जाएगी ॥ 

दुइ बात जग होइ रही कै दिन अरु कै  रात । 
को जगा को सोए रहा को गत को आयात ॥ ३१६२ ॥ 
भावार्थ : -- संसार में दो बातें सदेव होती रही या तो दिन या रात  । कोई जगता रहा कोई सोता रहा कोई आता कोई जाता रहा ॥  

देखत देखत दिन गया निसि भी देखत जाए । 
जीउति काल दुराए के मरनी नियरे लाए ॥३१ ६३ ॥ 
भावार्थ : -- देखते देखते दिन व्यतीत हो गया रात भी व्यतीत हो जाएगी । ये रिक्त होते दिन-रात जीवन से दूर होकर मृत्यु को लक्षित हो रहे हैं ॥ 

जो तासों पिछुवाइया, करे संग दे हाथ । 
बढ़ते को पूकारिये चलो हमारे साथ ॥ ३१६४ ॥ 
भावार्थ : - जो तुमसे पीछे हो गए हों हाथ बढ़ा कर उन्हें अपने संग करो । जो तुमसे आगे निकल गए उन्हें हाँक लगा कर साथ चलने को कहो ॥ 

जब लग जीता जागता तब लग सब दए कान । 
आगिन केरि कौन सुने  छोड़ चले समसान ॥३१६५ ॥ 
भावार्थ : - जब तक जीवन है तुम्हारी कथा तब तक ही सुनी जाएगी ॥ मरणी पाछे  सब श्मसान में छोड़कर भाग जाते हैं आगे की फिर कोई नहीं सुनता है ॥ 

प्राण रहे न देह रहे रहे नहीं मुख बानि । 
मिर्तक पूनर जनम की का सो कहे कहानि ॥३१६६ ॥ 
भावार्थ : -- प्राण नहीं रहते तब काया भी नहीं रहती और मुख में वाणी भी विलोपित हो जाती है । फिर मृतक पुनर्जन्म की कथा कहे भी तो कैसे कहे किससे कहे ॥ 

जोडू मल जी चल बसा, स्वजन लगाए काड़ि । 
चलती बिरियाँ जोड़ गए घोड़ा गया न गाड़ि ॥३१ ६७ ॥ 
भावार्थ : -- जोडू मल जी मर गया मरते ही लोगों ने काड़ी ( माचिस ) लगा दी ॥ चलते समय न जोडू का जोड़ गया न घोड़े गए न गाड्डी गई ॥ 

चलता पथ जब उठि के गया कुकरमी दास । 
बाँस उठाए पडा मिला परनाले के पास ॥ ३१६८॥ 
भावार्थ : -- चलता चलता कुकर्मी दास भी उठ गया । कित्ते नहीं गया खोजा तो बांस मारता परनाले के पास पड़ा मिला ॥ 

आकासबानी हुई कि गए महात्मा चंद । 
नाचघर के संग संग मदिरालय हुए बंद ॥३१६९ ॥ 
भावार्थ : -- आकाशवाणी हुई ! क्यूँ हुई ? महात्मा चंद चल बसे इसलिए हुई । थे तब सब चालू थे जाते ही बंद हो गए ॥ 

जाकी नीयत रिति रहे भरे रहे जब पेट । 
बिलखत ऊपर चालिया धरम कर्म सब मेट ॥३१७०॥ 
भावार्थ : -- जिसकी जीवनचर्या असाधारण होती हैं और विचार दूषित होते हैं वह धर्म -कर्म का मटियामेट किए ऊपर देख कर चलता  है उसे पहले अपनी जाति अपना समाज दूसरे अपना  देश समझ में नहीं आता , फिर एक समय ऐसा आता है जब उसे यह दुनिया ही समझ में नहीं आती ॥ 


शनिवार, 26 दिसंबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३१५॥ -----

पंथ कतहूँ न जाइया पंथी आवहि जाहिं । 
बालपन आयत दरसिहि बिरधा गत दरसाहि ॥३१५१॥ 
भावार्थ : -- गतिशीलता पंथी में होती है पंथ में नहीं । गतायात पंथी का स्वभाव है पथ का नहीं । बाल्यावस्था में पंथी आता व् वृद्धावस्था में जाता दिखाई देता है ॥

पाँच पलक का  पाउना सहसहि जोग सँजोए । 
धोबा का गदहा ज्यूँ चला भार कू ढोए ॥ ३१५२॥ 
भवार्थ : -  घड़ी भर का आगंतुक और अनेकानेक वस्तुएं । ऐसा यात्री धोबी के गधे जैसा होता है जो अन्य के उपयोग हेतु भार ढोता चलता है ॥

आगे आगे जाय था पीछे पड़ा बिकास । 
चली काल की चाकरी मिलिआ खड़ा  बिनास ॥ ३१ ५३ ॥ 
भावार्थ : -- एक जणा आगे आगे जाय था बिकास का भूत उसके पीच्छे पड़ गया  । समय ने फिर ऐसा खेल खेला थोड़ा और आग्गे जाने पर उसे विनाश खड़ा मिला वो खाट पे पड़ा मिला ॥

कबहुँ चलता पीठ पीछु दीठ घुमाई देख । 
दरसे ललाम लाल सो  पाप कहत करि रेख ॥ ३१५४॥ 
भावार्थ : -- जीवन की यात्रा तय करते कभी अपने अतीत पर भी दृष्टि पात कर लेना । यदि पथ कहीं अथवा सर्वत्र रक्त से रंजीत दिखे तो उसे अपने पाप को रेखांकित करता हुवा आलेख समझना ॥

  मन मानस सँकोच रहे हरिदै रहे उदार ।
पाप किए कर भार गहे धरम किए त हरुबार ॥ ३१५५ ॥
भावार्थ : -- संकोचित मनो-मस्तिष्क पाप को प्रेरित करता है उदार हृदय धर्म को । मनोनिग्रह व् उदारशीलता से अधिकाधिक धर्म होता है । पाप यात्री के भार को बढ़ा देता है धर्म उसके भार को हल्का करता है ॥

यह मन ही है जो संसार के दुखों का कारण है......

अपना चलन भुलाए के चला चलन को और । 
अंत काल पछताइया पहुँच पराई पौर ॥ ३१५६॥ 
भावार्थ : -- जो अपना चलन बिसरा कर पराए चलन में चलता है । अंतकाल में वह पराई ड्योढ़ी को प्राप्त होकर पश्चाताप ही करता है ॥ अंग्रेज अंगेरज्जी से ब्याह करता रहा मुसल्ले से हिन्दू को सिखाता तू हिंदी से ब्याह मत कर  । मुसल्ला अपनी ढक के रखता दूसरे की उघाड़ता फिरता.....

अपने चलन बिसुर चले , आन  कही अनुहार । 
पुर्बल जहँ ते चालिआ पहुंचे सोए द्वार ॥ ३१५७ ॥ 
भावार्थ : --  दूसरों की कही में आकर जो अपने धर्म का अपने चलन का तिरस्कार करता है । जहां से चला था वह वहीं पहुँच जाता है । जीवन की यात्रा तय करने हेतु उसे किसी न किसी धर्म की आवश्यकता होगी ही होगी ॥ 

धर्म संविधान के अनुसार नहीं चलता धर्म तत्संबंधित ग्रंथों के आधार पर चलता है.....

दस पांच लोगों की सुविधाओं के लिए बनाया गया पचास साठ साल पुराना भारत का संविधान तय करेगा की तुम हिन्दू हो कि मुस्लिम हो की ईसाई हो,  फिर धर्म ग्रन्थ क्या करेंगे..... 

फलाँराम कहाए चहे बोया बिआ बबूल । 
बिरवा तैसा होइया जैसा वाका मूल ॥ ३१ ५८ ॥ 
भावार्थ : - बबुल का बोया हुवा बिरवा अब फलाराम कहलाना चाहता है । पेड़ वैसा ही होगा जैसी उसकी जड़ें होंगी जड़ कैसी होंगी जैसा बीज होगा ॥ 

फूल बोए फूलहि फरे सूल बोए तो सूल । 
 साधो धरे न होइआ फलबर नाउ बबूल ॥ ३१५९ ॥ 
भावार्थ : -  मार्ग में फूल बोएंगे तो फूल ही प्राप्त होंगे सूल बोएगे तो सूल ही प्राप्त होंगे । बबूल  का नाम आम रखने से वह आम नहीं होता ।  कहने वाले कहते हैं फल सभी एक होते हैं, होते हैं क्या.....? 

 सूल पीर दे पेलिआ फूल चरन सहलाए । 
फलाराम जहँ मेलिआ सबके छुधा मिटाए ॥३१६० ॥ 
भावार्थ : - कंटक मार्ग  को बाधित कर पीड़ा ही देता है । पुष्प उस पीड़ा को हरण कर चरण को सुख प्रदान करता  है । जहाँ कहीं कोई फलवाला मिल जाए तो वह सबकी क्षुधा हरण करता चलता है ॥ इसलिए फलफूल वाले बनो सूल वाले मत बनो । दयालू बनो सत्यवादी बनो दानी बनो त्यागी बनो मर्यादित रहो..... 
   

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

----- मिनिस्टर राजू १८० -----

" राजू !!! सत्ता से अधिक मंत्री का प्रिय होना कोई नया फैसन है क्या..... ? " 

राजू : - न न मास्टर जी ! ऎसे ऐसे फेसन पंजे ने घणैइ किए हैं..... 


शनिवार, 19 दिसंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३१४॥ -----

धर्म चरन अनुहारिहि सो तो राजसि पंथ । 
अगति को जहाँ गति मिले सो दिग्दर्सक ग्रंथ ॥ ३१४१ ॥ 
भावार्थ : -- धर्मा-चरण अर्थात जो सत्य दया तप दान का आधारित हो वह पथ जगतपति ईश्वर तक जाने के लिए  राज-पथ है । इन चरणों से विहीन पथ गड्डे वाले होते हैं जो दुर्घटना को निमंत्रित करते रहते हैं ॥ जिस धर्म- ग्रन्थ में निराश्रित को ईश्वर स्वयं बहिर्गत होकर आश्रय देते हैं वह पथप्रदर्शक होते है । जो निराश्रित को भी ईश्वर का आश्रय दे वही ग्रन्थ दिग्दर्शक है ॥

निराश्रित जैसे : -- केवट,शबरी और संत कबीर आदि.....

अभिमानि मन भगवन सों चले मिलन बरियाए । 
भाव भगति के साधनहि तासों मेल कराए ॥ ३१४२ ॥ 

भावार्थ : -- लोभी और अभिमानी मानस को ईश्वर नहीं मिला करते बलपूर्वक तो कदापि नहीं मिलते । धर्म के पंथ में भाव और भक्ति  के साधन से ही ईश्वर प्राप्त होते हैं ॥ 

कामी क्रोधी लालची जाति बरन कुल खोए । 
भकति करै को सूरवाँ इनते भक्ति न होए ॥ 
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----


यह जग जो को आइया, लगे जीउ धन जोड़ । 
कोउ पाप करि छोड़ गए कोउ धर्म करि छोड़ ॥३१४३ ॥ 

भावार्थ : -- इस संसार में जो भी आया अपनी ही पेट पूजा में लगा रहा ।  कोई पाप छोड़ गया कोई धर्म छोड़ गया ॥ 

धर्म संग  को धर्म करि पाप संग  को पाप । 
धरम जग सुख दाइया पाप देइ परिताप ॥३१४४॥ 

भावार्थ : -- धर्म से प्रेरित होकर कोई धर्म तो पाप से कोई पाप करता गया । धर्म ने इस संसार को सुखमय कर दिया और पाप ने इसमें दुःख ही दुःख भर दिया ॥ 

मरत परत पुनि मेलिआ जाने कौन सरीर । 
जग सुख भर जिए जाइये हरते बाक़ी पीर ॥ ३१४५॥ 
भावार्थ : -- मृत्यु के पश्चात फिर न जाने कौन सी देह मिले । अत: संसार में दुःख हरते व् सुख भरते हुवे जीवन की यात्रा करें॥  

निज मर्यादा भूर जो भूरे पथ मर्याद । 
चारि पांव को होइ के सो तो चले पयाद ॥३१ ४६ ॥ 
भावार्थ : -- यात्री के साथ साथ धर्मगत पथ की भी एक मर्यादा होती है जो इसका उल्लंघन करते हैं वे चार पाँव के होकर पाँव-पाँव ही चलते हैं । चार दिन चले अढ़ाई कोस अर्थात यह संसार उनसे पार नहीं होता ॥ 

बासन को हरि बास है  बाचन को हरि नाम । 
चारन हरि के चरन हैं कारन हरि के काम ॥३१४६ ॥ 
भावार्थ : - बसने को यहाँ ईश्वर का निवास वाचन  के लिए ईश्वर का नाम ही उत्तम है । चलन के लिए ईश्वर का आचरण व् करने के लिए ईश्वर के काम अर्थात हितकारी कार्य ही उत्तम हैं ॥

मानस देहाकार में चौपट करे द्वार ।
भवबन्धन बिमोचन कर भगवन कहे सिधार ॥३१४७ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य की देह गढ़कर ईश्वर ने संसार के द्वार खोल दिए । और जीवों से कहा सांसारिक बंधनों को विमोचित करो जाओ मरो ( संसार पार करो )  ॥

चैन बिसारे दिवस में नींद बिसारे रैन । 
देखे जग का चाँदना सोइ पसारे नैन ॥३१४८।। 
भावार्थ : --   जिसने परमार्थ हेतु दिवस में सुखभोग व् रयन में निद्रा को तिरोहित किया यह अंधकार मय संसार उसी के सम्मुख प्रकाशित हुवा ॥

जबलग हस्त चरन चरे हरें जगत की पीर । 
पंथि तब का कीजो जब सेवा मँगिहि सरीर ॥३१४९॥ 
भावार्थ : -- जब तक हाथ पैर चलते रहें सेवाभिरत होकर इस दुखिया संसार की पीड़ा हरण करते रहे । हे धर्म गत पंथ के पंथी जब यह शरीर ही सेवा माँगने लगे तब क्या करोगे यदि तुम किसी का दुःख हरोगे तो तुम्हरा दुःख भी कोई हरेगा ॥

पहली अवस्था में वह कार्य करें कि वृद्धा अवस्था सुखपूर्वक व्यतीत हो,जीवन पर्यन्त वह कार्य करें जिससे मरने के पश्चात भी सुख से रह सकें.....
----- ॥ विदुर ॥ -----

सब  जग जिन्हनि जानिआ  परिचित सब गन मान । 
अस परचन का कीजिये, परचित नहि भगवान  ॥ ३१५० ॥ 
भावार्थ : -- जिसे संसार भर के लोग जानते हों सभी गणमान्य से परिचय हो । यदि उसका ईश्वर  से ही परिचय नहीं है तो फिर ऐसे परिचय से क्या लाभ ?   कारण कि अंतत: जाना उसी के पास है अत: अन्य किसी से चाहे न हो किन्तु ईश्वर से परिचय अवश्य होना चाहिए ॥








रविवार, 13 दिसंबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३१३॥ -----

सागर में की माछरी काटे उदर समाए  । 
जो को मोती होइया सो सब कंठ गहाए ॥ ३१३१ ॥ 
भावार्थ : -- अपने कुकृत्यों से जो इस भवसागर की मछली बने वे कटकर उदर में समाहित हो गए । सत्कृत्यों से जो मुक्ता हुवे वे सब के कंठ लगे ॥ 

बालक हो गर्भस्थ हो बिरधा हो कि जुवान । 
यह कराल काल सबन्हि कवलिनि एकै समान ॥३१३२ ॥ 
 ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- बालक हो चाहे गर्भस्थ हो वृद्ध हो चाहे कोई युवा ही क्यों न हो । यह विकराल मृत्यु सबको एक समान उठाती है । तेरी उठौनी दुनिया से भिन्न  न होगी इसलिए भिन्न भिन्न मत कर किसी और को काट ॥ 

जग सोंहि न जाने केत गयऊ भुगतत रोग । 
तापर भयकर भोग सों डरपत नाही लोग ॥३१३३ ॥ 
॥ भावार्थ : -- रोगों के भुक्त भोगी होकर संसार से न जाने कितने ही मरते चले जाते हैं हम प्रतिदिवस टी वी में पड़ते हैं समाचार पत्रों में देखते हैं कि मत्यु भी कितनी वीभत्स होने लगी है तथापि लोग भोगवादी प्रवृत्ति से भयभीत नहीं होते ॥ 

जीवन है एक झूलना जन्म मरन दो कूल  । 
मरन कूल बिसराए के लोग रहे हैं झूल  ॥ ३०३४ ॥ 
भावार्थ : -- जीवन एक झूला है और जनम -मरण  इसके दो छोर हैं । भोगवादी युग में  लोग जीवन के आनंद में इस भांति निमग्न हैं कि उन्होंने मरण छोर को ही बिसरा दिया ॥ 

मानव धरम त्याज नित धन का करे ध्यान । 
जेहिं मन भीमन तहाँ कहँ ते आए ग्यान ॥ ३१३५ ॥  
भावार्थ : -- मानवोचित  कर्म व धर्म के अन्यथा धन के ध्यान में लगा हुवा मानव  मानवता के अभिमान में रहे तो उसे ज्ञान (  कृत्याकृत्य का बोध )  नहीं होगा, यदि ज्ञान नहीं होगा तो समस्या का समाधान  भी नहीं होगा ॥ 
बिबेक हीन सुलभ हुवे दुर्लभ हंस बिबेक । 
बाकी चाल चलत मिले काग बक एक ते एक ॥ ३१३६॥ 
भावार्थ : -- विवेक हीनता जब सुलभ हो जाती है  तब हंस विवेक दुर्लभ हो जाता है । अब तो हंस की चाल चलते  कौवें और बकुले एक से एक मिलने लगे हैं हंस नहीं मिलते ॥ हंस यदि दुर्लभ हो जाएंगे तो ज्ञान कूण देगा ॥ 

हमारे देश में तो कौंवे भूंकते हैं अर्थात हमारे देश में तो कौंवे भी कौंवे नहीं रहे आधे तितर आधे बटेर हो गए हैं..... 

यह दुनिया ईसाई और मुसलमानों से ही भरी पड़ी है ।इसलिए भीड़ न बनें भारत वंशी रहें भारतीय रहें और धार्मिक बनें.....

जनम मरण के पंथ में धाम धाम बिसराम । 
 जो पंथी पूरन परे पहुंचे मुक्ति धाम ॥३१३७ ॥ 
भावार्थ : -- जन्म- मरण के पंथ में ईश्वर के धाम (धर्मगत तीर्थ )  विश्राम गृह हैं ।  पंथी यात्रा को पूर्ण कर इसके अंतिम छोर अर्थात मुक्ति धाम तक पहुंचते है ॥

जनम मरन के पंथ में जगती पंथी रूप ।
दिग्दर्सक सद्ग्रन्थ हैं, भगवन सार सरूप ॥३१३८॥ 
भावार्थ : -- जीवन-मरण के पंथ में मनुष्य जाति यात्री है पशु-पक्षी उसके साथी-संगी हैं ॥ धर्मगत वे सद्ग्रन्थ उ पथ प्रदर्शक हैं जिसके सार में ईश्वर का स्वरूप है ॥ 

यात्री  कौन है मुक्ति धाम में प्रवेश का पात्र कौन है  : -- मनुष्य जाति यात्री है धर्मगत सम्प्रदाय मुक्ति धाम में प्रवेश के पात्र होते है ॥ क्योंकि यह धाम उन्हीं के बनाए हुवे हैं ॥

 जगति भई अगतिकागति, जगत अगम गम्भीर । 
अजहुँ पग पग देत चली रोगारत भय पीर ॥ ३१३९ ॥
भावार्थ : -- यह जगत दुर्गम है दुर्बोध है रहस्यमयी है । इससे पार जाने के लिए पन्थो की रचना की गई और ईश्वर का आश्रय निर्मित किए गए  । किन्तु वर्तमान की मनुष्य जाति दुर्दशा-ग्रस्त होकर निराश्रित हो गई निराश्रिता के कारण कुपंथचरणी होकर यह संसार को आतंक रोग पीड़ा प्रदान करते चल रही है ॥

जगती जो पथ  मेलिया सबके एकै सरीर । 
बोले तूने सुख दिया मौनी को दुःख पीर ॥ ३१४० ॥ 
भावार्थ : -  हे मानव ! जीवन-मरण के पंथ में  जो भी मिलता है वे सभी देहधारी हैं  काटो तो सभी को पीड़ा होती है तथापि तूने वाग्मित्व  को सुख दिया और मौनत्व पर अत्याचार कर उसे  दुःख व् पीड़ा दी ॥ क्यों ?  :--  क्योंकि तुम मनुष्य हो ? मनुष्य तुम्ही क्यों हो ?  और कोई क्यों नहीं ?  कभी चिंतन तो कर ॥

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३१२ ॥ -----

जीवन मरनी पाख दुइ घरि भर का घमसान । 
मरनी संगत हारि के पहुँचिहि सब समसान ॥ ३१२१ ॥ 
भावार्थ : -- जीवन और मृत्य दो पक्ष हैं दोनों में अल्पकाल का ही संग्राम होता है । इस संग्राम में मृत्यु के हाथों जीवन का पराजित होना निश्चित है सभी को श्मशान पहुंचना है ॥

जिअना तो सब जानिआ मरन न जाने कोइ । 
जो को मरनी जानिआ जिअना जानिहि सोइ ॥३१२२॥ 
भावार्थ : -- जीना तो सभी जानते हैं मरना कोई नहीं जानता । जिसे मरण ज्ञात हो गया  वस्तुत: जीवन उसी को ही ज्ञान हुवा खाना पीना और आनंद में रहना यह जीवन नहीं है ॥

देइ बिनु लगे रहे जब लेइ लेइ में लोग । 
पलछिन घाटत जाइहीं जीवन धन के जोग ॥३१२३॥ 
भावार्थ : -- जब लोग लेने में ही लगे रहेंगें देंगे कुछ नहीं अर्थात  जब जीव त्याग की अपेक्षा सुख भोग में कर्म की अपेक्षा अर्थ में अधिक प्रवृत्त रहेगा तब जीवन के आधारभूत संकलन घटते घटते समाप्त हो जाएंगे ॥

 परिश्रम कर बिनु सब किछु चाहीं ।

जग में जीवन जनमिया तिनका तिनका जोड़ । 
जेतक जिउती जोइया तेतक जइयो छोड़ ॥ ३१२४ ॥ 
कण कण के संयुग्मन से ही इस संसार में जीवन का प्रादुर्भाव हुवा । यह जीवंत रहे इस हेतु हम जितना इससे लें उतना ही इसे देकर जाएं ॥


छन भंगूरा जगत यह छन भंगूरी काए । 
जनम मरन के मध्य में जीवन है छल छाए ॥३१२५ ॥ 
भावार्थ : -- यह संसार ही जब छन भंगुर है धरती एक क्षण को भी   काया इसके सम्मुख कहाँ ठहरती है । जनम यदि सत्य है तो मरण उससे भी बड़ा सत्य है व्  मध्य में जीवन है जो असत्य है, असत्य सदैव पराजित होता है ॥

धरती अपने अक्ष  पर एक क्षण को भी ठहर गई तो समझो दुनिया गई.....ठहराऊँ ?

काल भया सो आजु था आजु भया पुनि  काल । 
काल काल फिर होइगा दसा काल का जाल ॥ ३१२६ ॥ 
भावार्थ : --  जो भूत है वह कभी वर्तमान था जो वर्तमान है लो वह भूत हो गया ।  वर्तमान को मृतकर भविष्य को भी भूत ही होना है ॥ अर्थात ये कल नहीं है ये तुम्हारा काल है ॥

मरन संजुग होए रहो जोगवना सब जोए ।
काल काल को जोगता काल करो मति कोए ॥३१२७ ॥
भावार्थ : - एक विशेष सूचना : -- यात्रीगण कृपया  सभी आवश्यक साजो -सामग्री संकलित कर  मरण-यात्रा को तैयार रहें । कल कल न करें, क्योंकि कल तो मृत्यु की प्रतीक्षा में है  कल में तो तुम्हारा अंत काल है ।।

अजहुँ त जीता जागता पलक जान का होए । 
होवनहारी काल सों निरभै रहे न कोए ॥३१२८॥ 
भावार्थ : -- अभी तो भला-चंगा है पलक में क्या होवेगा कौन जाने । इसलिए अपने कल से अपने काल से सदैव भयभीत रहें ॥ 


 मरा मरा कह रोइया मरा नहीं यहँ कोइ । 
मरता बहुर न जनमिआ, मरा जगत में सोइ ॥३१२९ ॥ 
भावार्थ : -- हाय मर गया कह कह के अपने परिजनों को सभी रोया करते हैं  किन्तु मरता कोई नहीं । मरे हुवे का पुनर्जन्म न हो तभी वास्तविक मरण है ।

जेतक खादन खाइये तेतक दे उपजाएँ । 
सोइ जगत का जोगना लिया देत जो जाए ॥ ३१३० ॥  
भावार्थ : -- जितना खाएं उतना उपजाएँ,  जितना पाएं उतना दाएं
जो जितना खाए उतना उपजाए संसार का संरक्षक  वह है जो लिया को देता जाए ॥





मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३१०- ३११ ॥ -----

अधरम कुकरम ऊँच भए नीच धरम सत काज । 
समाज हीन अगौइहैं पछोइ भया समाज ॥ ३१०१ ॥ 
भावार्थ : -- पाप व्यापित वातावरण में अधर्म व् कुकर्म ऊँचे और धरम व् सत्कर्म पददलित हो गया । अब समाज बिहीन जन आगे रहते हैं और समाज कहीं पीछे होता है ।

अब अधर्मी धर्म का व्  कुकर्मी सत्कर्म का उपदेश करते हैं समाज से बहिर्भूत समाज सुधारक कहलाते हैं ॥

नेम बधिता नेम धरे दोषी करे न्याय । 
रीति सब बिपरीत भई ऐसी बिधि बंधाए ॥ ३१०२ ॥ 
भावार्थ : - अधुनातन हम ऐसी विधि से बंधे है जिसमें नियम  का उल्लंघन  करने वाले ही नियम बना रहे  हैं अपराधी  न्याय करते हैं जो विपरीत है इस विधि में वो रीत है ॥

बहिरा बैठा कान दे गूंगा सुर समुझाए । 
कोयलिया करकस भई कौंवा रागिनि गाए  ॥ ३१०३ ॥ 

देसी भए परदेसिया  देस भया  परदेस । 
साजन कहाँ जा बिलिए, बोले होत क्लेस ॥ ३१०४॥ 
भावार्थ : -- पर्दे देख देख के शासन चलाया जा रहा है । परदेसी देसी हो गए हैं देसी बिदेसी हो गए हैं ॥ भारत की धर्मनरपेक्षता भारत वंशियों को मुसलमान व् ईसाई बना रही है..... 

अजहुँ त करम सोंह देस भयऊ अर्थ प्रधान । 
धन सम्पद हो चाहिये चाहे जेन बिधान ॥ ३१०५॥ 
भावार्थ : -- कर्म की प्रधानता विलुप्त हो चली है अब यह देश अर्थ प्रधान हो गया है । ऐसा वैसा कैसा भी हो लोगों के पास पैसा होना चाहिए ॥ 

निर्धन को दुत्कार  के धनी मान  सब दाहि । 
यह सम्पद कहँ ते आए, पूछे कोऊ नाहि ॥३१०६ ॥ 
भावार्थ : --  अर्थ  प्रधानता में निर्धन पददलित होता है और धनवान सम्मानित होता है ॥ धनवान प्रतिक्षण के नए नए वस्त्र,नए  नए वाहन,  नए नए भूषण, नए नए भाषण यह अपार धन सम्पती  कहाँ से लाता है किस पेड़ में उगाता है यह कोई नहीं पूछता ॥ 

सोइ नियंतन हीन हैं नेम नियंता जौन । 
बंधन बधिता आपहीं नेम बँधावै कौन ॥ ३१०७ ॥ 
भावार्थ : -- नियंत्रण कर्त्ता ही जब निरंकुश हों तो शासन व्यवस्था कैसे नियंत्रित होगी ।बाधक ही जब शासन प्रबंधक हो तो उसके बनाए नियमों का पालन कौन करेगा.....कोई नहीं करेगा ।  

सासन हर जब मेलिया पैसे में पै पांच । 
अँधेरी नगरी प्रगसिहीं नाना अर्थ पिसाच ॥३१०८ ॥ 
भावार्थ : - ऐसे शासन प्रबंधन में शासक ही पैसे में  पांच मिलने लगते हैं  नीति व् नियमों के अभाव रूपी अँधेरे में फिर भांति  भांति के अर्थ पिशाच प्रकट हो जाते हैं ॥  

सासन कस हो चाहिये सागर के समरूप । 
जोइ तापस चरन चरे  भरे ताल नद कूप ॥३१ ०९ ॥ 
भावार्थ : -- शासन कैसा होना चाहिए सागर के जैसा । जो टप का आचरण करत हुवे देश रूपी धरती के ताल नदी और कूप को अर्थ से भर दे जिससे वह लोकोपकारी कार्य में नियोजित हो ॥ 



प्रसासन घन हो चाहिये बरखे एक समरूप । 
खेत खेत को सींच के भरे ताल नद कूप ॥ ३११० ॥ 
भावार्थ : --  प्रशासन को ऐसा घन होना चाहिए । सागर के कार्यों में सहयोग करते जो एक रस वर्षा करे और खेत खेत को सींच कर धरती को हराभरा कर दे ॥ 

जन जन नदि नद होइयो बहियों धीरहि धीर । 
खेत खेत को सींच के मिल्यो सागर तीर ॥ ३१११ ॥ 
भावार्थ : -- जन जन को ऐसे नदि नद होना चाहिए जो व्यर्थ के नियम निबंधनों में बंधे बिना  धीरे धीरे बहे । खेत खेत को सिंचित कर जो सागर से जा मिले ॥ जहां नदी नद हों वहां ताल  तलैया निरुपयोगी होते हैं जहां नदी नद नहीं होते वहां ताल तलैया उपयोगी सिद्ध होते हैं ॥ छोटे छोटे बांध अच्छे होते हैं  लघुता में ही प्रभुता  बसती है ॥ 

कालि कमाई कुकर्मी ले गए देस बहार । 
वाका दुःख जा रोइया सासन असुअन ढार ॥ ३११२ ॥ 
भावार्थ : -- कुकर्मी कुकर्म की कमाई देस के बाहर ले जाते हैं । भारत-शासन ढाई ढाई मन आँसू  ढलका के उनके दुखड़ों को जा रोता है ॥ इसको और कोई रोने को नहीं मिलता, ये शासन है कि दुस्साशन है ॥ 

अन्न पचे काया  रचे पयसन प्रान सँजोए । 
जलमन्न सुभाषितम् तीनि रतन भू जोए ॥३११३ ॥ 
भावार्थ : - अन्न काया की रचना व् जल प्राण प्रतिष्ठित करता है । अत:पृथ्वी  में तीन ही वास्तविक रत्न ही जल अन्न और सुभाषित वचन । शासन को  इनके दुखड़े रोने चाहिए ॥ 

अर्थ के दोइ सुक्ल गति कै  त्याग कै दान । 
जो गत दुर्गत होइया  सो तो दुःख की खान ॥ ३११४ ॥ 
भावार्थ : -- अर्थ की दो ही गति कल्याणकारी होती है या तो उसका त्याग करो अथवा उससे धर्म करो ॥ अन्य गति में अर्थ की दुर्गति ही होती है ऐसी दुर्गति दुखों का भंडार होकर संसार में  रोग सोक व् आतंक का कारण बनती है ॥ 

धर्म नियंतन  हेतु है अर्थ लोकोपकार । 
काम हेतु भव भोग के मुकुत रहे संसार ॥ ३११५ ॥ 
भावार्थ : -- धर्म मनुष्य को अनुशासित कर उसे मर्यादित करने के लिए है । अर्थ संसार का भला करने के लिए है । काम सुख भोग के लिए है  ये तीनों संसार से मुक्ति के लिए है संसार में कोई जीव दुःख भोगने नहीं आता प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण वह  दुःख भोगता है  यह परिस्थितियां कर्मानुगत होती हैं ॥ 

धर्म से बड़ो अर्थ जहँ त्याग सोही भोग । 
बयस्कर निर्वासित तहँ आन बसे बहु रोग ॥३११६॥ 
भावार्थ : -- जहाँ  अर्थ धर्म से प्रधान होता है त्याग से भोग प्रधान होता है । स्वास्थ को निर्वासित कर वहां बहुंत से रोग आ बसते हैं ॥  वहां मनुष्य की आयु क्षीण होती जाती है आगे आगे यह देह पचास पचपन का ही एवरेज देगी ॥ 

जीव साधन बहुतक किए   जीवन किए बहु थोड़ । 
छोड़ छोड़ को जोड़िया जोड़ जोड़ को छोड़ ॥ ३११७ ॥ 
भावार्थ : - मनुष्य ने जीवन के साधन तो बहुंत संजो लिए जीवन थोड़े से भी थोड़ा कर दिया । जीवन को साधने के बहुंत विकल्प है किन्तु जीवन अल्प है वह त्याग करते हुवे संग्रह करे व् संग्रह करते हुवे त्याग करें ॥ 

हेरे मिलता  में सुना धन पति एक ते एक । 
हेरा कतहुँ न मेलिआ दासा मिले अनेक ॥३११८ ॥ 
भावार्थ : - सुना है कि इस दुनिया में एक से बढ़कर एक  धनपति हैं । ढूंडने निकले तो धन के दास अनेकानेक  मिले किन्तु पति कोई नहीं मिला  ॥ 

धन को दासा कारि के  रहें आप धन कंत । 
सोइ कहावन जोग है जगत माहि धनवंत ॥३११९ ॥ 
भावार्थ : -- जो धन को दास नियुक्त कर स्वयं उसका स्वामी रहे, वस्तुत: वही धनी कहलाने के योग्य है ॥  

धन सन पियजन बिहुनाए बिहुने हुए जब प्रान । 
भूरि चिता चढ़ाई के बिहनिहि देह बिहान ॥ ३१२० ॥ 
भावार्थ : -- जब प्राण  छूटेंगे तब धन भी छूटेगा और प्रियजन भी छूट जाएंगे । अंतकाल में जब चिता पर चढ़ाए जाओगे तब यह देह भी यही छूट जाएगी इसलिए पहले ही छोड़ते चलो अन्यथा अंत में तो सब कूछ  यहीं छूटना है ॥ 















बुधवार, 25 नवंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३०९ ॥ -----


अंधाधुँध दुहाई के धरा होत कृष काय । 
होवणहार सँभारियो बिसरत आपण ताए ॥ ३०९१ ॥ 
भावार्थ : -- बिना सोचे विचारे इस पृथ्वी के संचित सम्पदा का दोहन किया जा रहा है जिससे वह कृशकाय होती जा रही है ।  उसकी रक्त वाहिकाएं रूपी नदियां मलीन हो गईं हैं बाँध रूपी अवरोध हो गए हैं पर्वत रूपी अस्थियां  भंग हो गई वन रूपी केश गिरते ही जा रहें हैं समुद्र रूपी ह्रदय में नित्य आघात हो रहें हैं तापमान  में तीव्रता से वृद्धि हो रही है.....

महि संचित धन संपदा, निसदिन होत  नसान । 
भोग भोग अति भोग सों एक दिन होंहि बिहान ॥ ३०९२ ॥ 
भावार्थ : -- पृथ्वी की संचित धन सम्पदा निरंतर नष्ट हो रही है । भोग वादिता व् दुरव्यसन पूर्णित  जीवन चर्या से एक दिन यह समाप्त ही हो जाएगी ॥

 अब अपने सुख की उपेक्षा कर हम होने वाली संततियों के लिए भविष्य की चिंता करें ॥

सम्पद सब सँजोई के  धरति रहे  धनवान । 
धनी धरा सों होत  है धनी सकल संतान ॥३०९३॥ 

भावार्थ : -   द्रव्यवान पृथ्वी से ही संतति धनी होती हैं |  धन सम्पदा संचित रहेगी तो  पृथ्वी भी द्रव्यवान होगी ।। 

अर्थ  धरम बर्धन करे धर्म अर्थ बरधाए । 
कामना करत बरतिया पूरत दुहु बिनसाए ॥ ३०९४ ॥ 

भावार्थ : -- अर्थ से धर्म की व् धर्म से अर्थ की वृद्धि होती है । काम जनित भोग और विलासिता पूर्ण व्यवहार से दोनों ही नष्ट होते हैं ॥

एक बाप नै धाम शाला बनवाई लल्लो ने उसका सोपिंग कम् पलेक्स बना दिया । धर्म तो आया गया हो गया साला रह गया.....

जग के  सुख भोगत फिरा अमर आपुनो जान । 
संसार एक सरिता तू बहता सरिल समान ॥ ३०९५॥ 
भावार्थ : --मनुष्य  जग के सुखभोग में मृत्यु को विस्मृत  कर  स्वयं को अमर समझने लगता है । जिस प्रकार नीर नित नया व्  नदी वही पुरानी रहती है उसी प्रकार संसार रूपी सरिता नित्य  व्  सरिल के समान प्रत्येक मनुष्य का जीवन अनित्य है क्षणस्थायी है बह के तो उसे भी जाना होगा ॥

आजु मरता  कोए गया काल गया था कोए । 
इस जीवंतक जगत में मरन धर्मि सब होए ॥ ३०९६ ॥ 
भावार्थ : -- कल कोई मरा था आज कोई,  इस जीव जगत में सभी मरण-धर्मी हैं यह स्मरण रहे ॥ 


कूट कपट संग दरसिहि चहुँपुर पापहि पाप । 
बाताबरन भए अस जस गयऊ गरल ब्याप ॥ ३०९७ ॥ 
भावार्थ : - छल कपट दुराचार भ्रष्टाचार जैसे कदाचरण से चारों ओर  पाप ही पाप दृष्टिगत हो रहा है धर्म  का तो जैसे विलोपन ही हो गया । विद्यमान परिस्थितियों में वातावरण ऐसा प्रतीत होता ही जैसे इसमें कोई विष घोल रहा हो॥

पाप ब्यापित जगत में पून के होत  बिलोप । 
रोग सोक दुःख सों बढ़े, आतंक कर प्रकोप ॥३०९८॥ 
भावार्थ : -- पाप व्यापित इस जगत में जब धर्म को विलोप हो रहा हो  तब रोग शोक व् दुःखादि संग आतंक का प्रकोप बढ़ने लगता है ॥

विषकारी  बाताबरन मांग रहा है हूति । 
त्याग पूरित भाव सों  दावें निज भव भूति ॥ ३०९९ ॥ 
भावार्थ : -- विषाक्त  वातावरण  फिर आहुति मांगता  हैं । आने वाली संततियों के लिए सांसारिक सुखों को त्याग कर हम अपनी भव भूतियों का उपभोग न कर उनसे धर्म करें जिससे यह वातावरण अमृत मय हो जाए ॥

करे अरथ का आँगना परमारथ की छाँह । 
सुखकर सरसिक सागरी  तासों  दूरे नाह ॥३१०० ॥ 
भावार्थ : -- अर्थ का  आँगन परमार्थ की छाँव से युक्त ह तो फिर  सुख सरोजल से युक्त सरोवर उससे अधिक दूर नहीं होता ॥

सोमवार, 23 नवंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३०८ ॥ -----

पाहन की ठोकर सहे देइ नदी जल धार । अज्ञात । 
दीपक सतत बरत कहे दूर रहे अँधियार ॥ ३०८१॥ 
भावार्थ ; --  पत्थर की ठोकर सहके भी नदिया जल-धारा प्रदान कर संसार की तृष्णा शांत करती है । दीपक सतत प्रज्वलित होकर अंधकार से निवृत्ति की कामना करता है ॥ 

 तात्पर्य है प्रकृति का कण कण लोककल्याण के लिए समर्पित है मनुष्य भी जगकल्याण के लिए स्वयं को समर्पित करे ॥ 

जोग जीवती पाए पुनि रहे कृपन कर हाथ । 
हितकारी करतब करें उदारता  के साथ ॥ ३०८२ ॥ 
भावार्थ : -- शीलवान जीविका प्राप्त कर वह ( मनुष्य ) कृपणता पूर्वक रहते हुवे उदाहृदय के साथ संसार के हितकारी कर्तव्य करे ॥ 

हितकर हेतु के मद जो करे जगत के काज । 
तासों श्रीधर होइया निसदिन देस समाज ॥ ३० ८३-क  ॥ 
अपने पेट परायना छाँड़े जग के काज । 
वासों श्रीहीन होइहि निसदिन देस समाज ॥ ३० ८३-ख ॥  
भावार्थ : -- जो कोई हितकर उदेश्यों के मद सांसारिक कर्त्तव्य करता है उसके द्वारा उसका देश-समाज नित्य शोभा सौंदर्य व् समृद्धि को प्राप्त होता है ॥ इसके विपरीत जो अपने उदर के परायण सांसारिक कर्त्तव्यों का तिरस्कार करता है उसके द्वारा उसका देश-समाज श्रीहीन होकर विपन्नता को प्राप्त  होता है ॥ 

कोई धन को नष्ट करने में जो जितना आगे होता है उसके द्वारा उसका देस-समाज उतना पीछे व् नीचे होप्ता जाता है..... 

अर्थ केरी तीनी गति, दायन भोग नसान । 
दिए उत्तम भोग मध्यम नसै अधमतस जान ॥ ३०८४ ॥ 
भावार्थ : -- अर्थ के उपयोग से धन की तीन गति होती है : -- दान, भोग  और नाश 
                 सबसे उत्तम गति दान, मध्यम भोग व् अधम नाश है 

" भारतीय शास्त्रानुसार भोग व् दुरूपयोग से धन नष्ट होता है....." 

दान परायन कोइ है पेट परायन कोए । 
जगत अकारथ होइया अर्थ नसावै जोए ॥ ३०८५॥ 
भावार्थ : - कोई दान परायण है तो कोई उदर परायण । संसार में उसका जीवन हेतुरहित है जो धन को अनावश्यक कार्यों में नष्ट करता है ॥



अँधेरे में जूँ  दिया बिनु गाहे हाथ कछु नाए । 
तैसेउ सब होत जात दाने बिनु सुख नाए ॥ ३०८६ ॥  
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- अंधकार में जिसप्रकार दिया से रहित होकर कुछ  प्राप्त नहीं होता । उसी प्रकार भी संपन्न होकर भी यदि दान रूपी दिये  से रहित  हों तो उस सम्पन्नता का सुख प्राप्त नहीं होता ॥

भले को जो गहन करें बुरे को दे त्याज । 
निसदिन श्रीधर होइया वासों देस समाज ॥ ३०८६ ॥ 
भावार्थ : - जगत में व्याप्त दोषों को त्याग कर जो गुणों को ग्रहण करता है उसके द्वारा उसका  देश व् समाज निरंतर शोभान्वित  व् समृद्ध है.....

बुरे से तात्पर्य  है : -- बुरे कर्म, बुरी वृत्ति, बुरे आचार-विचार , बुरा आहार -विहार, बुरी सम्पति,  बुरी संगत, आदि आदि.....

धर्म सत्कर्म संचिये धन सम्पद को नाहि । 
न तरु जहँ संग आइया मरन परन तहँ जाहि ॥ ३०८७॥ 
भावार्थ : -- धर्म व् सतकर्म का ही संचय करो धन सम्पदा का नहीं । अन्यथा जिस नरक कुण्ड से आए हो वहीं  पहुँच जाओगो ॥

यत्किंचित धन साधना यत्किञ्चितहि सँजोउ । 
अधिकाधिक का लोभना कोऊ लाभ न होउ ॥ ३०८८ ॥ 
भावार्थ : --  जीवन धन व् जीव साधन उतने ही हो जितने जीवन हेतु के लिए आवश्यक है ।अधिक हाथ पैर फैलाने से सकेलने के लिए चार  नहीं आठ चहिए होगें । अनावश्यक का लोभ किसी के काम नहीं आता न अपने न दूसरे के ॥

अधुनातन के काल में नव नव मति बिस्तार । 
जीर्ण का उद्धरन कर जीवन जोग सँभार ॥ ३०८९ ॥ 
भावार्थ : -- वर्तमानपरिदृश्य  में जिस प्रकार की परिस्थितियां हैं उसमें नव नव संरचनाएँ  नहीं होनी चाहिए  ।  पृथ्वी की संचित निधि द्रुत गति से समाप्त हो रही है अत : नवीन विस्तार न होकर जीर्णोद्धार होना चाहिए । जीवन को संचालित करने वाले घटकों को सहेजना चाहिए जिससे पृथ्वी में जीवन का प्रादुर्भाव रहे ।

 अन्यथा ऐसे वर्तमान का भविष्य दरिद्र होगा ।

सच्ची झूठी बानि किए खोज रहा है पाणि । 
लेना देना  किछु नहीं कहता मैं मह दाणि ॥३० ९० ।।  











मंगलवार, 17 नवंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३०७ ॥ -----,

मानस केरा जीउना घरि भर का घमसान । 
सोते को अभिसाप है जागे को वरदान ॥ ३०७१ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य का जीवन क्षण मात्र का संघर्ष है । सुख भोग में आसक्ति से यह संघर्ष अभिशाप सिद्ध हो सकता है विरक्ति से वरदान ॥ 

खेलनहारा खेलिया जनम मरन के खेल । 
कच्ची सरसूँ पेलि के खली भई ना तेल ॥ ३०७२ ॥ संत कबीर दास ॥ 
भावार्थ : -- खेलन हारा जनम-मरण के खेल खेलता रहता है । अपरिपक्व देह पापपुण्य से रहित होती है मृत्यु को प्राप्त होने पर वह लेखांकित नहीं होते ॥

यदि निच्चे नहीं जाना है उप्पर ही जाणा है तो सत्यवत रहो, प्राणीमात्र पर दया करो , त्याग से परिपूर्ण तन मन धन का सत्पात्र को दान करो.....

दान मन बसन तपस तन, साँच बसन को भेस । 
दया हृदय करी बासना जीवन गह  गणवेश ॥ ३०७३॥ 
भावार्थ : -- तन मन वचन अंत:करण के क्रमश:  तप दान सत्य व् दया रूपी वस्त्र जीवन के गणवेश हैं ॥ गणवेश अनुशासन के प्रेरक होते हैं ॥ 

धरम ऊँच ले जाइया पातक नीच गिराए । 
दोउ एकसम रूप रहे मानस जीवन पाए ॥ ३० ७४ ॥ 
भावार्थ : -- शास्त्र कहते हैं कि धर्म से जीव का उत्थान व् पाप से पतन होता है अर्थात धर्म की अधिकता मनुष्य को ऊपर ले जाती है और पाप की अधिकता उसे नीचे गिराती है । पाप-पुण्य समान होने से मनुष्य योनि प्राप्त होती है जैसे : -- जीव ने जीवन पर्यन्त कुल सौ कर्म किए जिसमें पचास शुभ व् पचास अशुभ किए तब उसे मानव की योनि प्राप्त होगी ॥ 

कोई सब को खाता रहे  उसे कोई न खाए ऐसा कहीं होता है ? : - ऐसा कहीं नहीं होता 
इसलिए सब कुछ नहीं खाना चाहिए.....

जीव अपने कर्म भुगतते हैं तुम कारण मत बनो 
जिसे मरना है जैसे मरना है वह वैसे मरेगा, तुम मत मारो.....  

धरम करम के भेस जहँ  जन जन के गनवेष ।
सबहि देस माहि सबते  उत्तम सोई देस ॥३०७५ ॥ 
भावार्थ : -- धर्म कर्म रूपी वेश जहाँ जन जन का गणवेश हो देशों में वह सबसे उत्तम देश है ॥ 

धर्म कर्म परिहार के हो जो पाप अधीन । 
दिनोदिन दीन होत सो होअसि अर्थ बिहीन ॥३०७६ ॥ 
भावार्थ : -- जो देश धर्म कर्म से विहीन होकर पाप के अधीन होता है वह दिन प्रतिदिन दरिद्रता को प्राप्त होकर अर्थ विहीन हो जाता है । 

धर्म व् सत्कर्म की समृद्ध से देश समृद्ध होता है 
देश की समृद्धि से देश वासी समृद्ध होता है देश वासी की समृद्धि से देश समृद्ध नहीं होता..... 


सोई मत अनुहारिये जग हुँत होत हिताए । 
कारज सोई कारिये जो सब हुँत सुख दाए ॥ ३०७७ ॥ 

भावार्थ : -- उन्हीं धार्मिक पद्धतियों में निष्ठ होना चाहिए जिसमें समस्त जगत का कल्याण निहित हो । कर्म वही करने चाहिए जो सभी के लिए सुख प्रद हो । बुराई का प्रचार-प्रसार न करे, किसी को कष्ट न दे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में किसी के प्राण न हरे ॥

मानव जग सेवा हेतु समरथ सबहि बिधान । 
अपने पेट परायणा सो तो जंतु समान ॥ ३०७८ ॥ 

भावार्थ : - मनुष्य संसार की सेवाकर्म हेतु सभी प्रकार से ( तन मन धन से वाणी से बुद्धि से भीतर से बाहर से ऊपर से नीचे से ) समर्थ है इसका प्रादुर्भाव ही इस हेतु हुवा है कि वह संसार की सेवा कर उसका उद्धरण करे । समर्थ होने के पश्चात भी जो मनुष्य अपने उदर के परायण हो वह फिर जंतु के समान ही होगा ॥

प्रान  प्रदाय पवन बहे  बहे गंध दुर्गन्ध । अज्ञात । 
कंटक गहे सुमन कहे बिखरी रहे सुगंध ॥ ३०७९ ॥ 
भावार्थ : --  गंध दुरगंध का भार वहति पवन प्राण प्रदान करती चलती है । कटंकों का कष्ट सहते पुष्प कहते हैं उसमें सुगंध व्यापित रहे ॥ 

तपन के तपचरन संग  अलोकित सब संसार । 
सागर जर जर घन संग जीवन दे आधार ॥ ३०८० ॥ 
भावार्थ : -- सूर्यदेव की तपस्या से यह संसार आलोकित है । सागर जल जल कर घन रूप होकर जीव जीवित करता है॥ 






शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३०६॥ -----,

धनवान तो बहुतेरे सुखी न दरसा कोए । 
जाके  मन संतोष धन सुखी जगत में सोए ॥३०६१॥
भावार्थ : -- धनवान तो बहुंत हैं उनमें सुखी एक भी नहीं दिखाई देता ।  जिसके मन के कोष में संतोष रूपी धन है संसार में वही धनवान है और वही सुखी है ॥

कोउ धरम करि छाँड़ि दिए कोउ त करि करि पाप । 
दोउ पापी समुझत हैं धर्मी आपन आप ॥ ३०६२ ॥ 
भावार्थ : -- एक बोला : -- मैंणे तेरे जिसे धर्म कर कर के छोड़ दिए,
                दूसरा बोला : -- मैणे तेरे जिसे पाप कर कर के छोड़ दिए..,

मैं ने बोला : -- दोनों अपने आप को धर्मी समझते हैं वस्तुत: हैं दोनों पापी.....

जीवन भर सकलत रहे गए सो खाली हाथ । 
मनि रतन गए भवन गए गया न तन भी साथ ॥ ३०६३॥ 
भावार्थ : --    जिन्होंने जीवन पर्यंत धन संकलन किया वह भी हाथ पसारे ही गए  ।  न  मणिरत्न गए न भव्य भवन ही गए उनकी देह भी साथ नहीं गई ।

जीवन भर सकलत करे रहे पसारे हाथ । 
 सुकरम हो कि कुकरम हो चले मरे के साथ ॥३०६४ ॥ 
भावार्थ : --    जिन्होंने जीवन पर्यंत धन संकलन ही किया वह भी हाथ पसारे ही गए ।   मृत्यु -पश्चात और कुछ नहीं जाता केवल कर्म ही साथ जाते हैं ॥

मायावी  काया संग निकसे जब जब प्रान । 
चारी काँधे पर गही भसम भई समसान ॥ ३०६५ ॥  
भावार्थ : --  इस मायावी काया से जब जब जब प्राण निर्गत हुवे तब तब  वह चार कंधों पर चढ़ के  श्मशान में भस्म हो गई ॥ किसी की न्यारी काया हो तो बात दूसरी है पण हमने तो देख्यी नहीं ऐसी काया ॥

भल की कृपा बिहीनता खलजन केरी पीन । 
निर्बल को धनहीन कर करें दीन ते दीन ॥ ३०६६ ॥ 
भावार्थ : --  सज्जन की कृपा विहीनता व् दुर्जन की परिपुष्टता निर्बल को साधनहीन कर दरिद्रित करती है ॥

पाँवर पाँउ पसार के सोया नैनन मीच । 
लोग कहे ऊपर गया गया नीच ते नीच ॥ ३० ६७ ॥ 
भावार्थ : -- एक दुष्ट था एक दिन वह पाँव पसार के पलकें बंद कर सोया रहा । लोगों ने कहा उप्पर गया लोगों का इतना कहना ही था कि खाट तै नीचे आ गया । ले तू तो कह रिया था उप्पर गया ।

जीउ जुगावन आपना औरन पीर न दाए । 
जीते जी नीचे रहे मरता  ऊपर जाए ॥ ३०६८ ॥ 
भावार्थ : -- अपने जीवन को संजोने में जो अन्य किसी प्राणी को कष्ट न दे उसके प्राण न हरे । जो जीवित रूप में विनम्र रहे वह वास्तविक मृत्यु को प्राप्त होता है ॥

 दुष्टता  ऊपर नहीं नीचे ले जाती है, इसलिए भूमि पर ही प्राण त्यागना चाहिए.....

जीते जी कहा नहि तू रहा धर्म ते चूक । 
बैठा अब किन रोइया निकस गई जब फूँक ॥ ३०६९ ॥ 
भावार्थ : -- जीते जी तो रोया नहीं रे मरनेवाले तू पाप जोड़ रहा है पुण्य नहीं जोड़ रहा । जब फूँक ही निकल गई फिर  उसके लिए कैसा रोना ॥ 

अपना जिउ जमोअन में लगे रहे  दिन रात । 
भोजन बासना और न दूजी बात ॥ ३०७० ॥ 
भावार्थ : -- जो जीवन की सहेज में ही लगा रहे  भोजन वसन और वासन  के अतिरिक्त और कुछ न संकलित करे प्राण निर्गत होने के पश्चात उसके लिए फिर क्या रोना ॥ 

मनु जीवन सुख सयनिका ये जग सपन समान । 
छन माहि भंगूरा  जब तन से निकसे प्रान ॥ ३०७० ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य जीवन सुख शयनिका  है यह संसार स्वप्न के सदृश्य है । शरीर से प्राण निर्गत होते ही यह छन में ही भंगुरता को प्राप्त हो जाता हे ॥ 

 आत्मा देह क्यूँ धारण  करती है : -- दुनिया देखने के लिए  "देही बिन जग दरस न भाई "   


बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३०४-३०५॥ -----


जीव जीव सब एक अहैं एकए मरन की पीर । 
जनमत जो को जी धरे, जग में वाका सीर ॥३०४१ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य हो क़ि जीव जंतु हों सभी प्राणी एक हैं मारने पर सभी को पीड़ा होती है । इस धरती पर जिसने भी जन्म लिया है जीवन के सह उसपर उन सभी का अधिकारहै । मनुष्य को चाहिए कि वह अन्य जीव-धारियों को भी अपने प्राणों के तुल्य मान दे ॥  

निरीह व्  मूक की निर्मम हत्या कहाँ तक न्याय संगत है.....? 

जोइ धर्म कर राखिया धर्महु राखत तेहिं । 
जोइ अहिंसक होइया हिंसा हते न केहिं ॥३०४२ ॥ 
भावार्थ : -- जो धर्म की रक्षा करता है धर्म भी उसकी रक्षा करता है । निरीह की हत्या क्या धर्म है ?हिंसा हिंसक को ही लक्ष्य करती है, अहिंसक को हिंसा कभी लक्ष्य नहीं करती ॥ हत्यारे को समाप्त करने से हत्याएं समाप्त नहीं होंगी अत: हत्या के कारणों को समाप्त करना अधिक श्रेयष्कर है ॥ 

क्या धर्म-निरपेक्ष का अर्थ अधर्म के सापेक्ष है.....? 

सुबरन घड़े सुनालिया लोहा घड़े लुहारि । 
बुद्धि रन तस जयन घड़े परि बल ऊपर भारि ॥३०४३॥ 
भावार्थ : -- जिस प्रकार स्वर्ण को सुनार घडता है लोहा को लुहार उसी प्रकार बुद्धि सदैव बल पर भारी पड़ती है और विजय को घडती है ॥  

तामस रस रसियाए के बुद्धि गहे नहि कोइ । 
रावन सुबरन दीप बसा बिजय राम कर होइ ॥३०४४॥ 
भावार्थ : -- आती कहाँ से है ये बुद्धि..... ? एक महाआआआ त्मा कह गए हैं की भूखे पेट बुद्धि नहीं आती 
सत्य तो यह है कि तामस प्रवृत्ति से बुद्धि नहीं आती देना कहाँ की बुद्धिमानी है । रावण तो भूखा नहीं था वह तो स्वर्णमयी द्वीप में बसा था भूखे तो श्री राम थे जो वन वन फिर रहे थे तथापि बल व् बुद्धि की निर्बल पर विजय हुई । सात्विकता से बल व् बुद्धि दोनों प्राप्त होते हैं ॥ गरवा भईंसा खाने से नरभक्षण करने से न बल प्राप्त होता है न बुद्धि ॥ तामस रसी को रसों की अनुभूति नहीं होती उसकी रसना स्वाद हीन हो जाती है ॥ 

हनुमत भूखे उदर भए पवन जवन अवरोहि । 
सुबरन लंका जारि के लाए सिआ कर टोहि ॥३०४५॥ 
भावार्थ : -- ज्ञान व् गुणके  सागर हनुमंत क्षुधित रूप में हवा के घोड़े पर अवरोहित हुवे स्वर्ण की लंका जलाई व् माता सीता को खोज निकाला । 

भूख नल अरु नील कर सागर सेतु बँधाए । 
करिअ सागर पार प्रभो लंका गत फल खाए ॥३०४६ ॥ 
भावार्थ : -- क्षुधित नल व् नील के हाथों सागर पर परिकलन रहित रामसेतु बंधा । उस सेतु से अपार सागर को पार कर श्री राम को  लंका पहुंचाया फिर सात्विक भोजन ग्रहण किया ॥ 


जिसने रामायण का अध्ययन नहीं किया , सात्विकता के महात्मय से अनभिज्ञ होकर वही क्षुधा को बुद्धि का नाशक कहता है.....

तन के परिशोधन संग, अंतर मन की सुद्धि । 
सोधित कर धन धारिये आवै छम छम बुद्धि ॥३०४७ ॥ 
भावार्थ :--शुद्धि से बुद्धि आती है.....

तन कैसे शुद्ध होता है ? : -- 

प्रात क्रिया के  संगत किए जब प्रतिदिन अस्नान । 
तदनन्तर करि आचमन निर्मल होत मलान ॥३०४८॥ 
भावार्थ : -- प्रात क्रिया के संग प्रतिदिन स्नान करें । तदनन्तर आचमन  कर स्वच्छ परिधान धारण करें हो गया तन शुद्ध ॥ 

भगवान ने मनुष्य को बनाने के पश्चात कहा : -- दो बार नहाना एक बार खाना उसने उल्टा सुना..... 

मन कैसे शुद्ध  होता है : -- 

ऊँच नीच को विचारत,  जो मन धरे ध्यान । 
ऐसोइ अभ्यास संग  अमलिन होत मलान ॥ ३०४९ ॥ 
भावार्थ : -- शास्त्रों में कहा  गया है कि उचित-अनुचित ( यह करना, यह कहना, यह खाना उचित है कि नहीं ) का विचार कर ध्यानाभ्यास करता हुवा मनोमस्तिष्क दोषरहित होता जाता है ॥


धन कैसे शुद्ध होता है : -- 


धन के स्वामी एकही नारायन भगवान । 
उदर पूरत कर लीजो अधिक न अपना मान ॥३० ५० ॥ 
भावार्थ : -- संसार में धन के स्वामी एक ही हैं वो हैं नारायण भगवान । ऐसा उत्तम विचार करते हुवे  अधिक धन को पराया जानकर केवल निर्वाह योग्य ही धन ग्रहण करें ॥ 

संपत केतक धारिये जेतक में निर्बाह । 
अधिक पराई जान के अपनी मानिए नाह ॥३०५१ ॥ 
भावार्थ : -  सम्पती कितनी ग्रहण करनी चाहिए जितने में निर्वाह हो । अधिक पर अन्य  का अधिकार जानकर उसे पराई मानना चाहिए ॥ 

राजू : -- हाँ ! और  न जीते जी अपनी क्रिया भी कर लेनी चाहिए बाद में  कोई करे न करे, और न दो ढाई हवेली इधर-उधर पडी हों तो एक आध सलटा देनी चाहिए.....

सन्मारग कर अरजनहु, मैल मलिनई होत । 
भाव पूरित लोभ रहित दानहि धन को धोत ॥३०५२॥
भावार्थ : -- उचित मार्ग से अर्जित किए धन सम्पति में भी मलिनता होती है । भाव पूर्णित कामना रहित दान धन-सम्पत्ति को शुद्ध करता है ॥

चारि दिवस का जीउना माँग माँग मत जोड़ । 
जनम जनम सुख चाहिता देइ देइ कर छोड़ ॥ ३०५३॥ 
भावार्थ : -- अल्प काल का जीवन है मांग मांग कर मत जोड़ो । अभी तो कितने ही जन्म होने हैं यदि प्रत्येक जनम में सुख चाहते हो तो दे दे कर छोड़ो ॥

धरम पूरित धनार्जन धर्मात्मन्हि पाए । 
पाप पूरित अर्जित धन  पापी के कर जाए ॥३०५४॥ 
भावार्थ : -- धर्मानुसार अर्जित धन-सम्पत्ति  का दान धर्मात्मा को प्राप्त होता है । पाप कर्म से व् अन्याय पूर्वक अर्जित धन के दान को पापीचारी प्राप्त करता है ॥

सागर सों जूँ बादरी मोती चुनि चुनि लाए । 
वाके चरंननुहार के जीवन धन उपजाए ॥३०५५॥ 
भावार्थ : -- सागर में मल और मोती दोनों होते हैं किन्तु जिस प्रकार बदरी केवल मोतियों को चुन लाती है ।मनुष्य को भी उसी प्रकार से जीविकोपार्जन करना चाहिए ॥

बादर ऊँचे पद लहे बरखत जल कर दान । 
सागर तिन संचाए के, गहे अधम अस्थान ॥३०५६॥ 
----- ॥ पुराणों से साभार ॥ -----
भावार्थ : -- वर्षा से जल का दान करते हुवे बादल सदैव ऊँचे पद को प्राप्त होते हैं , जबकि उसी जल का संग्रह करने वाले सागरों का स्थान निम्न रहता है ॥

सागर जल संचाए के सकले मैल मलीन । 
बादर जल बरखाए के छनु छिनु होत कुलीन ॥३०५७॥  
भावार्थ : -- सागर जल का संचयन कर मलिनता का संकलन करता है । बादल उसी जल का दान कर निरंतर कुलीनता को प्राप्त होता है ॥

धर्म के मर्यादा बिनु करता अर्थ अनर्थ । 
पेट परायन आपना अर्थप होत ब्यर्थ ॥ ३०५८ ॥ 
भावार्थ : -- अर्थ में धर्म की मर्यादा न हो तो वह अनर्थ करता है ॥ जो अर्थपति अपने ही पेट के परायण हो उसका होना व्यर्थ होता है ॥ उससे किसी का हित नहीं होता ॥

जो अर्थ धर्मार्थ हुँत तासु जगत सुख पाए । 
अर्थार्थी को अर्पित होत सदा  दुखदाए ॥ ३० ५९॥ 
भावार्थ : -- जो अर्थ परोपकर के निमित्त हो वह समस्त विश्व के लिए सुखप्रद होता है । जो अर्थ, पिशाचों के निमित्त हो वह सदैव दुखप्रद होता है ॥ उससे किसी का कल्याण नहीं होता ॥

सम्पद सोई धारिये जामें जग सुख पाए । 
औरन को जीबित करे आपन जीवन दाए ॥३०६० ॥ 
भावार्थ : -- संपत्ति वही धारण करें जिससे किसी को कष्ट न हो जो जगत भर के लिए सुख प्रद हो । जो औारों के साथ स्वयं को भी जीवंत करे ॥










बुधवार, 14 अक्टूबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३०३ ॥ -----


जात संग जातीयता जात संग अभिजात । 
जात धर्म बिसराए के होत जात सम्पात ॥ ३०३१ ॥ 
भावार्थ : -- राष्ट्रीयता जन्म जात होती है प्रवास से नहीं । अपने धर्म जाति कुल में स्थिर रहने से ही आनुवांशिकता प्राप्त होती है। जो जाति-धर्म  का तिरस्कार करता है वह शनै शनै अपने कुल अपने समाज अपने राष्ट्र से पृथक होता जाता है ॥ 

चूँकि विदेशों में आनुवंशिकता का अभाव पाया जाता है बहूँतों को वहां अपने मात-पिता का नाम भी पता नहीं होता  इस लिए आनुवांशिक अभियांत्रिकी में किंचित अनुसंधान हुवे अत: इस क्षेत्र में बहुंत संभावनाएं हैं और अनुसन्धान में निश्चित ही कुछ चौंकाने वाले परिणाम प्रात होंगे.....

देस धर्म को छोड़ के अपनी जात न तोड़ । 
यह निज गुन बिनसाए के आन अगुन करि जोड़ ॥३०३२ ॥ 
भावार्थ : --अपने देश अपने आचार- विचार अपने आहार-विहार का तिरस्कार   कर किसी को भी अपनी जाति-धर्म  का त्याग नहीं करना चाहिए ।  यह त्याग  गुण की उपेक्षा कर अवगुण को ग्रहण कर गुणहीन हो जाता है ॥  

लोहा लोहा ते मिले घन बन मारए चोट । 
जो कहूँ सुबरन मेलिआ होत खरा सों खोट ॥ ३०३३ ॥ 
भावार्थ : --  लोहा लोहा से मेल करे तो घन बन के ठन ठन करके स्वर्ण को भूषण का स्वरूप देता है  
स्वर्ण से मेल करे तो वही लोहा दुष्टता का प्रतीक होकर निकृष्ट हो जाता है ॥ 

इसलिए उत्तम धातु से मिश्रित होकर निम्न धातु उत्तम नहीं न हो जाती, अधम हो जाती है और उत्तम धातु निम्न हो जाती है ॥ 

हरिआ करिआ सों मिले रंग रहए नहि कोए । 
हरिआ ते हरिआ मिले हरिआ हरिआ होए ॥३०३४ ॥ 
भावार्थ : -- हरा  काले वर्ण से मिले तो वह रंगहीन हो जाता है । वहीँ हरा यदि हरे से मिले तो वह हरा-भरा हो जाता है ॥ 

धर्म कर्म सँभारी के अपनी जाति सुधार । 
मानस कर उद्धरन  सों जगत केर उद्धार ॥३०३५ ॥ 
भावार्थ : -- धर्म-कर्म को सहेजते हुवे आहार-विहार व् आचार-विचार में परिवर्तन कर अपनी जाति  सुधारनी चाहिए । जाति  व् धर्म वह उपकरण हैं जो मनुष्य का उद्धार करते हैं, यह उद्धरण जगत के उद्धार का आधार है ॥ 

साँच रहे बिन साँच भए दाता भए बिन दान । 
दया बिनहि दयाकर भए, टप बिनु तपो निधान ॥३०३६- क॥ 
भावार्थ : -- सत्य का आचरण करे बिना जो सत्यवादी हैं, बिना दान के दातार हैं,   दया बिना ही दयाकर व् तप  बिना ही जो तपोनिधान हैं ॥ 

जाति धरम पतित ही जब समाज पति पद जोए । 
सुधरना उधरना कि तहँ  कहि बत बिरथा होए ॥ ३०३७ - ख ॥ 
भावार्थ : -- जहां ऐसे जाति-धर्म पतित समाज के पति पद को प्राप्त हो वहां सुधार- उद्धार का वार्तालाप व्यर्थं है ॥ 

कूल बँधाई नदी भली भली नदी में नाउ । 
पौर पौर सों मेलती पहुंचे पिउ के गाँव ॥३०३८ ॥ 
भावार्थ : -- तटों से बंधी हुई नदी भली होती है ऐसी भली नदी  नाव के लिए भी भली होती है । यह मर्यादित नदी व् नाव पौड़ी पौड़ी से मेल करती जिस प्रकार सीधे अपने प्रीतम के गाँव पहुंचती हैं । 

उसी प्रकार मर्यादित संप्रदाय संसार के लिए हितकर होते हैं यह अपने अनुयायियों को सौहार्द पूर्ण वातावरण में सीधे ईश्वर के पास पहुंचा देते हैं ॥ 

एक : --  सौहार्द पूर्ण वातवरण के लिए आवश्यक है कि धार्मिक संप्रदाय धर्म के आचरण ( सत्य दया तप दान ) का पालन करें , 
दो : -- अपने धर्म अपनी जाति-गत समाज में ही वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हों  । 

तीन :-- इंसान का पशुओं से भी  भाईचारा हो साईँ चारा न हो.....
 क्रमश:

आन बसे परबासिया भूर परे मर्याद । 
जोइ बिरावन बोलिया ताको संग विवाद ॥३०३९॥ 
भावार्थ : -- प्रवासी जब इस देश के निवासी होकर अपनी मर्यादा भूल गए । अब जो कोई उन्हें पराया कह देता वह विवादित हो जाता ॥

अजहुँ त मनोभाव संग  रसना भई अधीन । 
देसज अपने  देस में भयऊ बोल बिहीन ॥३०४० ॥ 
भावार्थ : -- देश स्वाधीन क्या हुवा कि अब तो विचार-अभिव्यक्ति के साथ जिह्वा भी सत्ताधारियों के अधीन हो गई । भारत वंशी अपने ही देश में देशांतरी को कुछ कहने से भी वंचित हो गए ॥























मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

----- मिनिस्टर राजू १७९ -----

" ऐ राजू ! ये पोतने वाले स्याही पोतने का क्या लेते हैं ? "

राजू : -- बीस प्रतिशत !

"थोड़ा अधिक हो गया"

राजू : -- अब आप से अधिक थोड़े न  लेंगे मास्टर जी, ये  कमाई बढ़ाने वाली स्याही है, कोई ऐसी वैसी नहीं, बीस तो यूं आ जाएंगे यूं..... 

रविवार, 11 अक्टूबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३०२ ॥ -----

अंत्यज को का बोलिए रहँ सो अंतेबास । 
कृत्याकृत्य न जानिआ पहुंचे नहीं प्रकास ॥३०२१ ॥ 
भावार्थ : -- अन्त्यज वर्ग को क्या कहें वह तो सबसे अंतिम वास में वासित था उसे कृत्याकृत्य सहित पथ्यापथ्य का ज्ञान नहीं था क्योंकि तत्काल वहां तक सभ्यता की पहुँच नहीं थी ॥

चतुर्थ वर्ग चतुर्थ वर्ग क्यों था - इसी लिए था.…। इसलिए थोड़े की उसके पास पैसा नहीं था या पद नहीं था

रयन  में जो दिनकर धर करि घन घोर घमंड । 
कृत्यकृत्य न बूझिया ऐसो को दिग्दंड ॥३०२२ ।।  
भावार्थ : -- प्रथम पंक्ति के वह लोग जो श्रेष्ठतम भवनों में रहते हैं अभिमान पूर्वक जो  स्वयं को विकसित कहते हैं सभ्य कहतें हैं लब्ध प्रतिष्ठित कहतेंहैं सुशिक्षित कहते हैं यदि उन्हें कृत्याकृत्य व् पथ्यापथ्य का ज्ञान नहीं है तो ऐसों नराधमों को धिक्कार है ॥ 

तपोन्मुखी होइया जब यह मानस जात । 
तासों देस समाज के दिन दिन होत  निपात ॥ ३०२३ ॥ 
भावार्थ : --  मानव जाति जब पतोन्मुख होती है तब उसके साथ उसका समाज व् उसका देश भी निरंतर अधोगति को प्राप्त होता है ॥ यह अधोगति पृथ्वी सहित सृष्टि को भी संकटापन्न करती है ॥ 

प्रथम बसेरी जोइ  है अंत बसेरी सोए । 
अनगढ़ दोनउ मेलिया गढ़ना सरल न होए ॥ ३०२४ ॥ 
भावार्थ : -- जिस राष्ट में कभी जो अन्तेवासी था वर्तमान में वह राष्ट्र का प्रथम नागरिक है दोनों ही परिस्थिति में यदि वह अशिष्ट व् असंस्कृत हों तो इसका अर्थ यह है कि उसे शिष्ट व् सुसंस्कृत करना अतिशय कठिन है ॥ 

कोउ त अंते बासिया  बसा सुपासा कोउ । 
कृत्याकृत्य बिबेक बिनु मिलिआ अनगढ़ दोउ ॥३०२५॥ 
भावार्थ : -- अंतेवासी अंतिम निवास में बसा था विकासी  प्रथमतस निवास में बसा है ।  कृत्याकृत्य के विवेक से रहित दोनों ही असभ्य व् असंस्कारी पाए गए.....निष्कर्ष : -अर्थ या अनर्थ से मनुष्य का उद्धार नहीं होता.....
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नीत्ति न्याय परत रहे रहे धरम के राज । 
रोग सोक ब्यापत नहीं  रहे  न कतहुँ ब्याज ॥३०२६ ॥ 
भावार्थ : - जब धर्म का शासन  होता है तब नीतिया न्यायपरक होती हैं और न्याय नीतिपरक होता है । भयोत्पादक तत्व व्याप्त नहीं होते अपराध नियंत्रित रहते हैं ॥ 

अधुनातन हिंसापरत हैं अधरम के राज  । 
चहुँ पु रोग सोक सहित ब्याप रहे ब्याज ॥३० २७ ॥ 
भावार्थ : -- अधुनातन न केवल भारत अपितु विश्वभर में हिंसा परत अधर्मी शक्तियों का ही शासन है । भयोत्पादक तत्वों का फैलाव व् अनियंत्रित अपराध इसका प्रमाण हैं । 

अहिंसा को आचरण में उतारने से हिंसा कभी लक्ष्य नहीं करती  । 

हिंसा रक्षक की विवशता है..... 

कनक कोट मनि कृत भवन गह  जस लंका होइ । 
ऐसो बिकसित अजहुँ लग जग मैं भया न कोइ ॥३०२८ ॥ 
भावार्थ : -- स्वर्णमयी  दुर्ग के भीतर मणिमय भवन , गाड़ी घोड़े रथ समूह,पुष्पक-विमान, सुन्दर सुन्दर पथ बलवती सेना,  वन, उपवन, वाटिका, स्वच्छ जल आपूर्ति, सुसभ्य नगर निवासी धारण किए जैसी विकसित लंका थी,  ऐसा अब तक कोई विकसित नहीं हुवा ॥ 

खाते क्या थे वे ? गांय-भैंस मनुष्य गदहे बकरे खाते थे.....

कलुष कलिमस राजस रस तामस करे सुभाय । 
अपने मद उन्मत रहे भूरे नीति न्याय ॥३०२९ ॥ 
भावार्थ : -- पाप कार्र्यों से विश्राम पूर्वक प्राप्त  राज सत्ता  का स्वभाव तामसी होता है । यह नीति व् न्याय विरद्ध होकर अपने ही मद में उन्मत रहती है ॥ 

 ऊंची पीठी पैठ के भूरे राम प्रताप । 
चरत आपा पंथ करत आप आप के जाप ॥३०३० ॥ 
भावार्थ : - ऊंची पीठ पर आसीत होकर तो यह  ईश्वर की संप्रभुता को ही अस्वीकार कर देती है। यह अधिनायक वाद अर्थात अनियंत्रित शासन प्रणाली को अंगीकार करते हुवे अभिमान के वशीभूत हो जाती है ॥ 

नीचे उतरते ही इसे सारे देवते स्मरण हो आते हैं..... 

 पुण्य कर्मों से व् श्रम पूर्वक प्राप्य प्रगति स्थायी होती है.....  

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३०१ ॥ -----

सहस बरस शासत करे अतिसय भोग बिलास । 
काल बरन मैं लेखि यह  पाहन कर इतिहास ॥ ३०११ ॥ 
भावार्थ : -- सहस्त्र वर्ष से भी अधिक समय तक ये प्रवासी भारत के शास्ता रहे,  काले अक्षरों में लिखा गया यह  लाल- पत्थरों का काला इतिहास इनकी अतिसय भोग विलासिता का साक्ष्य है ॥

सुरभि गंधित बारी  में फुरे फूर चौरंग । 
आन फिरंगी संग रहे परे रंग में भंग ॥ ३०१२ ॥ 
भावार्थ : -- इस सुरभित वाटिका में चौरंगी पुष्प खिला करते हैं । फिर यहाँ अंग्रेज आए और रंग में भंग पड़ गया जब भारतीय इनका विरोध करने लगे तब अंग्रेजों के सिखाने पर ये प्रवासी पुराण को पढ़े बिना ही पुराण- पंथी कह कह कर देश को बिगाड़ने में लग गए ॥

देख फिरंगी सब चरे बड़ अनुहारी होए । 
चरन चले कहँ जात हैं  देखे नाहीं कोए ॥३०१३॥ 
भावार्थ : -- फिर तो पश्चिमी सभ्यता का ऐसा अनुकरण होने लगा कि पश्चिम वाले भी चकित रह गए ॥ जो चरण कभी शमशान में जाते थे वह अब कब्रिस्तान में जाने लगे ॥ 

" शमशान जाने वाले को श्मशान जाना चाहिए कब्रिस्तान जाने वाले को कब्रिस्तान जाना चाहिए । जब मंदिर जाने वाला मंदिर जाएगा यह तभी होगा....." 

धर्म कर्म बिनसाए के बैठे भवन बिलास । 
माँसा गवासा होइए बाका नाउ बिकास ॥३०१४॥ 
भावार्थ : -- धर्म-कर्म  को नष्ट करके  विलास भवन में बैठकर वासना जनित क्रीड़ाएं करो । मदिरा पान करो,  मांस खाओ और गांय-भैंस का भक्षण कर चंडाल बन जाओ, ऐसी जीवन-चर्या विकास कहलाने लगी ॥

मानस हेतु सार सरूप यह गीता का ज्ञान । 
करम संग ही पतन है करम संग उत्थान ॥३०१५ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य जीवन हेतु श्रीमद्भगवद्गीता में  इस सारभूत ज्ञान का व्याख्यान किया गया कि  कर्मों से ही मनुष्य का पतन है और कर्मों से ही उसका उत्थान है, अर्थ से नहीं अनर्थ से तो कदापि नहीं ॥ 

करें न पतन आपन हुँत, करें आप उद्धाप । 
मानस आपन मित आप, अरु रिपु आपहि आप । ६३७। 
 ----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ६ /५॥ -----  

भावार्थ : -- मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करें, पतन न करें । क्योंकि वह ( मनुष्य) आप ही अपना मित्र है, और आप ही अपना शत्रु है ॥ 

दया दान त्याग सहित जहँ  को साँचा वाद । 
बिगड़े बासि प्रबासि के ताको संग बिबाद ॥३०१६॥ 
भावार्थ : -- दया दान त्याग व् सत्य के वाद सहित जहां धर्म- वाद होता । इन विपरीत कर प्रवासी और देशवासियों का उसके संग विवाद होता ॥ 

गाँव गाँव गौधन रहँ घर घर में गोपाल । 
कृत्याकृत्य बिबेक बिनु अजहुँ भयउ चंडाल ॥ ३०१७ ॥ 
भावार्थ : -- जहाँ कभी गाँव गाँव में गौधन था और घर घर में ग्वाले होते थे । कृत्याकृत्य के विवेक से राहित्य अब वहां चंडाल बसने लगे ॥ 

चांडाल : -- अत्यंज वर्ग की  कसाई गौभक्षी जाति सहस्त्रों वर्ष पूर्व जिसका उद्धार हो गया था.....


जीव जितना छोटा होता है उसकी आयु भी उतनी छोटी होती है, जो जितना अधिक जीव-हत्या करता है वह उतना छोटा जीव शरीर प्राप्त करता  है जितनी बार जीव मारता है उतनी बार मरता है.....

निर्दोष जीवों की हत्या का पाप बहुंत भारी होता है

यह भव भूत प्रभूत कर तामेँ काल अनंत । 
मानस तेरा जीउना दोइ घरी के रंत ॥ ३०१८ ॥ 
भावार्थ : -- एक तो  भौतिक संसार की अपरिमित प्रभुता फिर उसमें अंतहीन समय । अपरिमित संसार में मानव कण मात्र भी नहीं है अनंत समय में उसका जीवन केवल दो घड़ी का है ॥

चार दिवस का जीवना जामें दोई रात ॥ 
भोजन बासा बास हुँत किए ऐतक उत्पात ॥३०१९ ॥ 
भावार्थ : -- चार दिवस का जीवन है उसमें दो रात का समय है जो शयन में व्यय होता है । भोजन वस्त्र आवास के लिए मनुष्य फिर इतने उत्पात करता है ॥ क्या मनुष्य केवल खाने पीने व् पहनने के लिए जन्म लेता है ? ॥

अधुनै मानस जात  के दिन दिन होत निपात । 
होए पसुता तेहु परे, यह चिंतन की बात ॥ ३०२० ॥ 
भावार्थ : -- भोगवादिता के कारण ही वर्तमान समय में मानव जाति निरंतर पतन की ओर अग्रसर है । क्या उसका स्वभाव पशु से भी निम्न स्तर का हो गया है यह चिंतन का विषय है ॥

गौभक्षण अंत्यज वर्ग करता था  गांय -भैंस सहित मानव का भक्षण दानव करते थे ॥












मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३०० ॥ -----

धरम करे बिनु आपनी धरमी जहँ सब होए  । 
बिनहि मोल मदिरा मिले बिके हाट तहँ तोए ॥३००१ ॥
भावार्थ : -- जहां  धर्म करे बिना ही सभी धर्मात्मा बन जाते हैं वहां मदिरा बिना ही क्रय किए मिल जाती है जल का व्यापार होने लगता है ॥

पयस पियुष परिहार को, रकत पीब ललिहाए ।
सो जन जग मलिनाए के नित नव रोग जनाए ॥३००२॥
भावार्थ : -- जो अमृत  का त्याग कर रक्त सेवन की ही लालसा करती हैं । ऐसी पिपासु प्रवृत्ति संसार में मलिनता बढाती है जिनसे नित नए रोगों का जन्म होता है ॥

 रोगों के रोकथाम हेतु अपने आचार-व्यवहार में परिवर्तन करें.....

जग ने  अल्पहि काल में जन्मे नव नव रोग । 
रोगी कतहुँ दरसाए त  भय क्रांत सब लोग ॥३००३॥ 
भावार्थ : -- विश्व ने अल्प काल में ही नए नए रोगों को जन्म दे दिया जो एक चिंताजनक विषय है । रोग भी ऐसे रोगों से ग्रसित रोगी के दर्शन मात्र से ही लोग भयभीत हो जाते हैं ॥

सबहि कतहुँ  मिले सो तो होत सधारन धर्म । 
सत्कारज किन बोलिये जो जगहित कर कर्म ॥३००४ ॥ 
भावार्थ : --सब कहीं मिलने वाले धर्म को साधारण धर्म कहते हैं जैसे सत्य, अहिंसा, दया, दान, त्याग आदि । जिन कार्यों में विश्व का कल्याण निहित हो उन्हें ही सत्कर्म कहते हैं । जीवों की रक्षा करना, जीवन- संरक्षण जल- संरक्षण वन्य-जीव संरक्षण पालतू पशु-संरक्षण करना,प्रदुषण न करना, पेड़-पौधे लगाना इत्यादि.....

 उपासना से साधारण धर्म अथवा उत्तम भावों  का वर्द्धन होता है उपासना- पद्धतियों की विभिन्नता संप्रदायों को भिन्न करती है.....

सधारन धर्म कोष अरु  उत्तम देसाचार । 
ऊँच विचार संग करे ले परिवेस अकार ॥३००५॥ 
भावार्थ : -- साधारण धर्म का संग्रह और उत्तम आचार- व्यवहार( आहार-विहार ) , \उच्च विचारों के संगत एक उत्तम परिवेश का निर्माण करते हैं ॥

संस्कारगत होत पुनि  एक संस्कृति सँजोए । 
जगत के  सिरमौर होत  भारत उदयित होए ॥३००६ ॥ 
भावार्थ : -- पाषाण युग की मनुष्य जाति की मानसिक शिक्षा सहित समय समय पर उसका परमार्जन व् सुधारकरण के पश्चात एक सभ्य-संस्कृति ने जन्म लिया और विश्व-सिरमौर भारत-वर्ष  का प्रादुर्भाव हुवा ।|

बिलगित चारन सों रहे बिलगित सबके काज । 
एकै धर्म समूह भीत, संगठित भए समाज ॥३०० ७ ॥ 
भावार्थ : -- भिन्न भिन्न आचार-व्यवहार व् भिन्न आहार-विहार के संग सभी के कार्य भी भिन्नता लिए हुवे थे । इस प्रकार कर्म के आधार पर एक धर्म समुदाय में समाज संगठित होते गए ॥ इन समाजों  के सम्मिलन से एक राष्ट्र का निर्माण हुवा ॥

लघु कुटीरु उद्यम संग पसु पालन कृषिकार । 
वैभव विभूति सहित सुख समृद्धि के आधार ॥३००८॥ 
भावार्थ : -- लघु और कुटीर उद्योग के संग पधुपालन और कृषकर्म विभूतिमान भारत की  जगत्प्रसिद्ध सुख समृद्धि के आधार हुवे ॥

कृषिधन पसुधन संग रहँ सुख सम्पद सब काल 
भंडार भरपूर रहँ  परे नहीं अकाल ॥३००९॥ 
भावार्थ : -- इस प्रकार कृषिधन पशुधन का संग प्राप्त कर उसके सभी काल संपन्न होते गए । वह  अकाल- ग्रस्त नहीं होता अन्न के भण्डार भर पूर होते ॥

देस परिबेस लाँघि जब आन बसे परबासि । 
देस चरन बिपरीत कर होत गयउ सम भासि ॥३०१० ॥ 
भावार्थ : -- देश की सीमाओं का अतिक्रमण व् उसके परिवेश का परिच्छेदन कर फिर उपनिवेशी यहाँ आ बसे । इनकी उपासना  पद्धति भारत से पृथक थी इनके आचार- व्यवहार व् आहार-विहार भारतीय नियमों के प्रतिकूल होकर उनकी कार्य सिद्धि में बाधा उत्पन्न करते ॥ इनकी भाषा भारतीयों से समवेत होती गई ॥







----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...