सेना खाए धन अस जस राख रहे संसार ।
देस दुआरि राखे जस, भयउ घर के द्वार ।२१२१ ।
भावार्थ : -भारतीय-सेना धन तो ऐसे खाती ही जैसे सारे संसार की यही रक्षक हो ।और सीमाओं की रक्षा ऐसे कर रही है जैसे वह कोई एक घर की रक्षक हो और उसमें भी सेंध लग जाए ॥
अपराधिन को संग किए भीतर के रखबार ।
गेह गेहनि बाहिर भए, लिए घर निज अधिकार ।२१२२ ।
भावार्थ :-- घरवाले तो बाहर हो गए और ये फूलिस ये गृह रक्षक फूलिस अपराधीन का प्रसंग प्राप्त कर घर पर अधिकार किए है ॥
अपराधी अपरिमित भए, करें बाध पर बाध ।
अपरिगनित सरूप बिगत भँवर रहे अपराध ।२१२३।
भावार्थ : -- अपराधी अपरिगणित हैं जो आतंरिक सुरक्षा को निरंतर बाधित करते ,अवबाधित गणमान्य हो गए तब अपराध सीमांत स्वरूप में निर्भय होकर विचरण करता रहा ॥
भलमन दुखिया जान के दिए अवधू कर दान ।
कपटी संकासि छल किए, लेइ उरे बैमान ।२१२४ ।
भावार्थ : -- सुहृदय ने समांत को याचिता जान स्नेह प्रकट कर वृत्ति दी। किन्तु इन कपटियों ने तो सुहृदय का ही हरण कर लिया ॥
देस बुराई जीत के दे पुनि कर धार ।
बुराई भाल तिलक किए, सोई होत उदार ।२१२५ ।
भावार्थ : - जो किसी राष्ट्र की बुराइयों पर विजय प्राप्त करे। भलाई के भाल पर राजतिलक कर उसे लौटा दे वही राष्ट्र उदारवादी होता है ॥ वह नहीं जो अपनी सीमाओं को अपरिच्छन्न कर समांतों सहित अपरान्तों को उत्पात करने दे ।
समांत = सीमावर्ती राष्ट्र
अपरान्त = पश्चिमी राष्ट्र
सभ्यता संग संस्कृति, दुहु सम सार सनेह ।
देस धर्म जल उपज जन, देस होत सम खेह ।२१२६।
भावार्थ : - कोई देश यदि कृषिक्षेत्र के समान हो तो सभ्यता व् संस्कृति उसकी मीट्टी के पोषक तत्त्व के समान होती हैं ॥ देश विशेष में प्रचलित आचार-व्यवहार उसकी जलवायु समान व् राष्ट्रजन उस क्षेत्र की उपज होते हैं ॥ खेत जैसा होगा उपज भी वैसी ही होगी ॥
भारत इस्लाम धर्म का प्रवर्तक नहीं है इसकी सभ्यता व् संस्कृति भारत की नहीं है । भारत का कोई मूल निवासी यदि अन्य धर्म स्वीकार कर ले वही भारतीय है ॥
देश हो कि बय काल हो, होअहि जेत पुरान ।
चिर चिंतक चलन सह तिन तेत सुचितई मान ।२१२७ ।
भावार्थ : -- देश हो स्थान हो समय हो देशज हो चाहे जलवायु हो वह जितने प्राचीन हों उन्हें उतना ही स्थायी शुभचिंतक सदाचारी के सह स्थिर चेतस मानना चाहिए । कारण कि पुरानी वस्तुएं जितनी दृढ होती हैं शुद्ध होती हैं सदाचारी होती है उतनी नई नहीं होती ॥
राज हो की लोक तंत्र, हेरे बैदिक काल ।
राजन बंसनुगत रहे, रहि चयनित जनपाल ।२१२७।
भावार्थ : - वर्तमान में प्रचलित राज व् लोक ये दोनों जन संचालन तंत्र वैदिक का ही अन्वेषण है ।राजतन्त्र का मुखिया वंशानुगत होता था लोकतंत्र का मुखिया चयन प्रक्रिया द्वारा नियुक्त किया जाता था, ऐसा वेदों में वर्णित है ॥
कतहुँ घन बन बीच रहे छोटे छोटे जूह ।
कतहुँ बिहरन देस संग, रहहीं बृहद समूह ।२१ २८ ।
भावार्थ: -वैदिक काल में जन-जीवन कहीं सघन विपिन के मध्य निर्बल यूथ स्वरूप, कहीं वह विकसित विहारं देशों से युक्त होकर वृहद समूहों में निवासरत था, कोई जन समूह लोकतान्त्रिक प्रणाली से, कोई राजतांत्रिक प्रणाली से संचालित होता ॥
बंसनुगत हो कि चयनित, सासक रहें कुलीन ।
जन समूह सुरच्छा हुँत, सेना करे अधीन ।२१२९ ।
भावार्थ : -- समूहों के जनपालक को 'राजन' अथवा 'जनपाल' कहा जाता ।वंशानुगत हो चाहे चयनित हो यह राजन अथवा जनपाल सदैव कुलीन वर्ग से ही होता । जनता, समूह की सुरक्षा हेतु रक्षक गण को उसके अधीन करती ॥
टिप्पणी :--प्रत्येक धनी कुलीन हो यह आवश्यक नहीं प्रत्येक कुलीन धनी हो यह भी आवश्यक नहीं.....
देस हो कि धवन धुनी कि धवज धवजिनी धानि ।
प्राग रूप कथन कहें ए भारत की रहि बानि ।२१३० ।
भावार्थ : -- 'राष्ट्र' शब्द की परिकल्पना हो चाहे राज्य अलंकरणों की, एतिहसिक चिन्ह व् वृत्तांत इसका प्रमाण हैं कि ये राज्यांग ( राजा, अमात्य,राष्ट्र, दुर्ग कोष बल मित्र ध्वज आदि ) भारत की ही संस्कृति रही है ॥
कालांतर में शासक इन राज्य अलंकरणों का दुरूपयोग करने लगे.....
गउ धन मान माँगे बिनु, सर्ब जूह हित जान ।
समदन सरूप बलि कहत देइ प्रजा कर दान । २१३१ ।
भावार्थ : - गौ को धन की देवी लक्ष्मी माना जाता व् समूह जनों के हित हेतु प्रजा मांगे बिना ही भेंट स्वरूप 'बलि' कहते हुवे कर दान करती ॥
एक सभा एक समिति रहे सभा सदस सभ्रांत ।
समिति सद चयनि सधारन, नयक कहै ईसान । २१३२।
भावार्थ : -- राजन अथवा जनपाल के परामर्श हेतु एक सभा होती एक समिति । सभासद सभ्रांत होते व् समितिसद जन साधारण होते,समिति के प्रधान को ईशान कहा जाता ॥
जीवन हेतु रहे सकल , प्रकृति बल आधार ।
मंडल प्रतीक रूप तिन देई देउ पुकार ।२१३३।
भावार्थ : -- चूँकि समूहों का आर्थिक जीवन प्राकृतिक शक्तियों पर ही आधारित था जो ऋषि मुनियों की गणना के अनुसार तैतीस करोड़ हैं जिससे पृथ्वी सहित समस्त सृष्टि संचालित होती है अत: इन्हें प्रकृति-मंडल ( स्वामी, अमात्य, सुहृद, कोष, राष्ट्र, दुर्ग व् दल ये सात राज्यांग अथवा प्रजावर्ग ) द्वारा प्रतीक स्वरूप देवी व् देवता कहकर उद्बोधित किया गया ।
इस प्रकार वैदिक धर्म का प्रवर्तन हुवा जो प्रकृति देववाद' पर आधारित है ॥ सिद्ध होता है कि यह राष्ट्र संकलित सुविचारों का अनुकरण कर सदैव प्रकृति सहित सृष्टि की रक्षा में अभिरत है अत: यह एक धार्मिक-राष्ट है ।
प्रकृति बल काल चलत गए, करत आपने काज ।
उजड्ड जन सधारन सँग, प्रगसे सिष्ट समाज ।२१३४।
भावार्थ : - प्रकृति के बल पर अपना कार्य करते काल का चक्र चलता रहा । उजड्ड, साधारण, व शिष्ट समाज का प्रादुर्भाव हुवा ॥
धीर सांत नीति मंत, रहि जो अग्याधीन ।
बिनय सील सदाचारिन समूह कहैं कुलीन ।२१३५।
भावार्थ : - धीर, शांत, मननशील, आज्ञाकारी, विनम्र व् सदाचारी समाज को ही शिष्ट समाज कहा जाता ॥
घन बन राजि ब्याल सन, घिरे रहे सब जूह ।
छत्रि तेजस लहे किछु जन, राखएँ रचत ब्यूह ।२१३६।
भवार्थ : -- चूँकि वे समूह सघन वन समूहों व् हिंसक पशुओं से आवेष्टित थे अत: इन कुलीन समाज में से कुछ शिष्टजन सामरिक पराक्रम से युक्त हो व्यूह रचना के संग उन समूहों की रक्षा करते ।
को निज जीवन हेतु हुँत, जन जीवन किएँ बाध ।
को उजड्ड अग्यान बस , करैं गहन अपराध ।२१३७ ।
भावार्थ : - कोई अपनी आजीविक हेतु जन व् वन-जीवन में बाधा उत्पन्न करता , कोई असभ्यता व् अज्ञानता वश नृशंस अपराध कर प्राकृतिक शक्तियों को बाधित करता ॥
बँसानुगत क्रमबत कर , सोई सोई काज ।
जूह समूह भीत उद्भित भयऊ जाति समाज।२१३८।
भावार्थ : -- किसी वंस के मूल पुरुषों ने जो कर्म किए उसके अनुवंस भी वही वही कर्म किए । इस प्रकार उन समूहों के अंतर से ही जातिगत समाज की उत्पत्ति हुई ॥ जैसे : - चर्मकार अनाज वाला धनुषवाला पुस्तकवाला ।
निज निज कर्मधीन धवन चारिबरन संजोए ।
सुबरन छत्री बनिक संग छुद्र बुद्धि रहे कोए ।२१३९ ।
भावार्थ : -- अपने अपने कर्त्तव्य व् धर्मानुसार 'चातुर्वर्ण्य' शब्द से संयोजित समाज में कोई स्वर्ण कोई क्षत्रिय कोई वैश्य कोई क्षुद्र ( दलित, हरिजन आदि आदि ) कहलाया ॥
बंसानुगत क्रमबत किए सङ्कृत जो को बंस ।
सो बंसज् गुनधर्म गहि ,भय बंस अवतंस । २१४०।
भावार्थ : -- किसी वंस के मूल पुरुषों सहित उसके अनुवंश, जगत कल्याण हेतु सङ्कृत करते गए । इस प्रकार चातुर्वर्ण्य समूह में गुण धर्म से युक्त कुल को ही कुलवतंस कहा जाता जैसे : -- सूर्यवंशी रघुकुल
गुण-धर्म : -- सद्गुणों की प्राप्ति हेतु आवश्यक धर्म
जैसे : -
लकड़ी विद्युत की कुचालक व् लोहा सुचालक होता है : -- यह उनका गुण-धर्म है
प्रश्न यह है कि : -लोहा व् लकड़ी ने यह गुण-धर्म कैसे प्राप्त किया
पूजत संभु बंदएँ तरु, कतहुँ स्वस्तिक चिन्ह ।
उर्बरता देई कहत पहुमी पूजन किन्ह ।२१४०- क ।
सिंधु घाटी देस धर्म सभाचार अनुहार ।
वाके अधार बिद रचे बेदिक देसाचार ।२१४०-ख ।
भावार्थ : -- कहीं शिव-पूजन, कहीं विटप-वंदना, कहीं स्वास्तिक-चीन्ह । उर्वरकता की देवी कहकर भूमि का पूजन करना । सिंधु घाटी के आचार -विचार व् परम्पराओं का अनुशरण करते हुवे वेद विद्वानों ने कदाचित घाटी की सभ्यता पर ही आधारित होकर वेदों के देशाचार रचे थे ॥ ( यदि यह सभ्यता वैदिक काल के पूर्व की हो )
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