हमारे राष्ट्र की सीमाएं जैसे आवेष्टक विहीन होकर अविच्छिन्न हो गई हैं । जो देश अपनी स्थति में अस्थिर हैं राष्ट्रवाद में जिनकी निष्ठां नहीं है वे भारत की सीमाओं का निरंतर भेदन कर रहे हैं ॥ भारत का लोकवादी इतिहास रहा है इसने स्वार्थपूर्ति हेतु किसी भी राष्ट्र की मर्यादाओं का उल्ल्ंघन नहीं किया ॥ जो देश आतंकवादी गतिविधियों के लिए विश्व भर में कुख्यात हो वह किसी की मैत्री के योग्य है ?
क्या कोई राष्ट्र अथवा राष्ट्र- समूह भारत के मित्र हैं, शत्रु हैं, तटस्थ हैं ? हैं तो कौन कौन नहीं तो कौन । यदि कोई राष्ट्र शत्रु है तो क्या उसे किसी भी राष्ट्रीय-समारोह में आमंत्रित किया जाना चाहिए.....?॥ १ ॥
हमारा संविधान कहता है कि : - सारी जनता देश का भंडार महाराज के चरणों में अर्पित कर नतमस्तक होकर कहें महाराज !.....महाराज को पूरी पूरी छूट है क्या की वो उस कोष का कुछ भी करे चाहे तो अपने घर ले जाए चाहे विदेश में रखवा दे ।। १ ॥
शाहों की वही सल्तनत है तरीका भी वही है । जागीरों-जमीं दारों की जब जफाशियारी भी वही है तो फिर यह आज़ादी का ढोंग किसलिए.....?
भावार्थ : -जब वही अस्पृश्यता है सामंत वाद भी वही है तो फिर स्वतंत्रता कहाँ है.....?
वही राजे हैं वही रजवाड़े हैं वही पुरानी प्रथाएं हैं अंतर केवल इतना है की इन कुप्रथाओं, समस्याओं ने रूप बदल लिया है ॥
>>पहले घूँघट कुप्रथा थी घूँ घट गया है और घट दिखाओ कुप्रथा है ।
>>अस्पृश्यता निर्धन रेखा के नीचे छिपी हुई है ।
>>और सामंत वाद अर्थात जमीदारी प्रथा ये उद्योग पति सामंती हो गए हैं और किसानों पर अत्याचार कर रहे हैं ॥ दुःख की बात यह है की शासन की मिली भगत से ये अत्याचार हो रहा है.....उद्योग नीति है या किसान विरोधी नीति.....विद्यमान सरकार जनता की सेवक है अथवा पिछली सरकार की.....? । १ ।
जन-सामान्य की आधार-भूत आवश्यकताओं हेतु नहीं अपितु मुट्ठी भर भोग विलासी लोगों के लिए खेतों को उखाड़-उखाड़ कर उसमें उद्योग बोए जा रहे हैं क्यों ?जबकी अन्न-जल को तरसता जन जीवन त्रस्तहोकर
अपने जीवन को जैसे भोगता हुवा जैसे मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा हो ॥ १।
जब इतने ऊँचे पद में भी कोई दलित का दलित है तो फिर ऐसे पदों का क्या लाभ.....? ॥ १ ॥
उलटी सीधी इनकी मंत्रणाएं हैं उलटे सीधे मंत्र है । उलटा सीधा नियंत्र है ऐसे को हम लोग गणतंत्र कहते हैं । और चार उलटे सीधे मंत्रियों के समूह को ही लोकतंत्र कहते हैं ॥ इन मंत्रियों को भारत की चिंता नहीं है ? इन्हें अपने इसी लोकतंत्र की चिंता है.....? । १ ॥
अपराधिन को संग किए भीतर के रखबार ।
गेह गेहनि बाहिर भए, लिए घर निज अधिकार ।२१२२ ।
भावार्थ :-- घरवाले तो बाहर हो गए और ये फूलिस ये गृह रक्षक फूलिसअपराधीन का प्रसंग प्राप्त कर घर पर अधिकार किए है ॥
एक बात तो बताइये ये गृह-मंत्री है कि कोई हवलदार है.....?
अब सत्ताधारी दल के चुप्पी को क्या समझा जाए.....?
देस मैं एक नवल देस, भोगे बिषय अतीउ ।
कौन इहाँ के निबासी, कहाँ इहाँ की सींउ ।२१६५।
भावार्थ : -भारत देश के भीतर एक नया देश खोज गया वो है इण्डिया जो अतिशय भोग वादी है ( अर्थात खाओ पियो और मजे करो का सिद्धांत ) इस इण्डिया की सीमाएं कहाँ हैं.....?
धर्म-निरपेक्ष किसे कहते हैं..... यह शब्द युग्म कहाँ से आया.....?
क्या कोई राष्ट्र अथवा राष्ट्र- समूह भारत के मित्र हैं, शत्रु हैं, तटस्थ हैं ? हैं तो कौन कौन नहीं तो कौन । यदि कोई राष्ट्र शत्रु है तो क्या उसे किसी भी राष्ट्रीय-समारोह में आमंत्रित किया जाना चाहिए.....?॥ १ ॥
हमारा संविधान कहता है कि : - सारी जनता देश का भंडार महाराज के चरणों में अर्पित कर नतमस्तक होकर कहें महाराज !.....महाराज को पूरी पूरी छूट है क्या की वो उस कोष का कुछ भी करे चाहे तो अपने घर ले जाए चाहे विदेश में रखवा दे ।। १ ॥
शाहों की वही सल्तनत है तरीका भी वही है । जागीरों-जमीं दारों की जब जफाशियारी भी वही है तो फिर यह आज़ादी का ढोंग किसलिए.....?
भावार्थ : -जब वही अस्पृश्यता है सामंत वाद भी वही है तो फिर स्वतंत्रता कहाँ है.....?
वही राजे हैं वही रजवाड़े हैं वही पुरानी प्रथाएं हैं अंतर केवल इतना है की इन कुप्रथाओं, समस्याओं ने रूप बदल लिया है ॥
>>पहले घूँघट कुप्रथा थी घूँ घट गया है और घट दिखाओ कुप्रथा है ।
>>अस्पृश्यता निर्धन रेखा के नीचे छिपी हुई है ।
>>और सामंत वाद अर्थात जमीदारी प्रथा ये उद्योग पति सामंती हो गए हैं और किसानों पर अत्याचार कर रहे हैं ॥ दुःख की बात यह है की शासन की मिली भगत से ये अत्याचार हो रहा है.....उद्योग नीति है या किसान विरोधी नीति.....विद्यमान सरकार जनता की सेवक है अथवा पिछली सरकार की.....? । १ ।
जन-सामान्य की आधार-भूत आवश्यकताओं हेतु नहीं अपितु मुट्ठी भर भोग विलासी लोगों के लिए खेतों को उखाड़-उखाड़ कर उसमें उद्योग बोए जा रहे हैं क्यों ?जबकी अन्न-जल को तरसता जन जीवन त्रस्तहोकर
अपने जीवन को जैसे भोगता हुवा जैसे मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा हो ॥ १।
जब इतने ऊँचे पद में भी कोई दलित का दलित है तो फिर ऐसे पदों का क्या लाभ.....? ॥ १ ॥
उलटी सीधी इनकी मंत्रणाएं हैं उलटे सीधे मंत्र है । उलटा सीधा नियंत्र है ऐसे को हम लोग गणतंत्र कहते हैं । और चार उलटे सीधे मंत्रियों के समूह को ही लोकतंत्र कहते हैं ॥ इन मंत्रियों को भारत की चिंता नहीं है ? इन्हें अपने इसी लोकतंत्र की चिंता है.....? । १ ॥
अपराधिन को संग किए भीतर के रखबार ।
गेह गेहनि बाहिर भए, लिए घर निज अधिकार ।२१२२ ।
भावार्थ :-- घरवाले तो बाहर हो गए और ये फूलिस ये गृह रक्षक फूलिसअपराधीन का प्रसंग प्राप्त कर घर पर अधिकार किए है ॥
एक बात तो बताइये ये गृह-मंत्री है कि कोई हवलदार है.....?
अब सत्ताधारी दल के चुप्पी को क्या समझा जाए.....?
देस मैं एक नवल देस, भोगे बिषय अतीउ ।
कौन इहाँ के निबासी, कहाँ इहाँ की सींउ ।२१६५।
भावार्थ : -भारत देश के भीतर एक नया देश खोज गया वो है इण्डिया जो अतिशय भोग वादी है ( अर्थात खाओ पियो और मजे करो का सिद्धांत ) इस इण्डिया की सीमाएं कहाँ हैं.....?
धर्म-निरपेक्ष किसे कहते हैं..... यह शब्द युग्म कहाँ से आया.....?
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