बुधवार, 24 दिसंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २१७ ॥ -----

नवल माहि भारत देस  करिहउ फेर फिरान । 
चरन हीन सन होइही, सकल धर्म अवसान ।२१ ७१ । 
भावार्थ : -- यदि भारत  को पूर्णत: इंडिया (जहाँ कलुष योनिज का वास है जिसकी घर वापसी हो जाए वो सुखी है ) बना दें तो होगा क्या ? आचरण हीन इण्डिया होगा, भारत में प्रवर्तित धर्म सहित सभी जातियां समाप्त हो जाएंगी । 

फिर तो माँ से प्यार हो जाएगा बहन से मुहब्बत होगी बेटी से इश्क हो जाएगा । खेती बाड़ी का सत्यानाश  हो जाएगा सब ओर काला धुवाँ उगलती धरती दिखाई देगी अन्य सभी देश अपने-अपने धर्म में निष्ठ होकर जाति वाले हो जाएंगे । फिर इन धर्मनिष्ठों में से कोई आएगा, दास बनाएगा, और  कान पकड़ कर समझाएगा इसको अब्बु कहते हैं इसको अम्मी कहते हैं ये मदर है ये फादर है ये डेड है ये मोम है । बिजली होगी नहीं इंडियंस ही कोल्हू के बैल होंगे । जल अन्न व् सुभाषित उसके  देश पहुंचेगा वो शाकाहरी होगा इंडियन एक टुकड़े मांस व् दो घूंट पानी को भी तरसेंगे.....

इन कलुष-योनिज की चौथी या पांचवी पीढ़ी का क्या होगा जब इन्हें पता चलेगा कि इनकी इस अवस्था का कारण ये हैं..... 


धर्म ही ईश्वर के नाम का निरूपण करता है जैसे : -  यह श्री राम है खुदा है ईशा- मसीह हैं 
धर्म मनुष्य के नाम का भी निरूपण करता है यह राम है यह रहीम है यह न्यूटन है 

ईसाईयों में कोई पीर क्यों नहीं है.....? वहां पवित्रता न्यूनतम है.....रक्त संबंधों से रक्त अपवित्र होता है पवित्रता के लिए सर्वप्रथम जाति ततपश्चात गोत्र होना चाहिए गोत्र उपकरण से मनुष्य में रक्त संबंध नहीं होता  । ब्राम्हण इसलिए ब्राम्हण हैं क्योंकि वह पुत्र-पुत्रियों के विवाह में सात गोत्र स्थगित करते थे /

धर्मागत निरूपन किए भगत बछर के नाम । 
नाम बतावै जनि जनित्र,बरन बतावै काम ।२१७२ । 
भावार्थ : -  धर्मग्रंथ के द्वारा धर्म ही ईश्वर के नाम का निरूपण करते हैं यह मनुष्य के  नाम का भी निरूपण कर उसके उद्गम स्त्रोत का परिचय देता है ।  जाति-वर्ण से उसके पैतृक कर्म का बोध होता है ॥ 

धर्माचारि अगम लिखे, भगवन भयउ न सार । 
हित  बिचार अनुहार के, हरिहरि करौ सुधार ।२१७३ । 
भावार्थ : -  धर्माचार्य ने धर्म ग्रन्थ लिखा किन्तु  ईश्वर सार में न हुवे । तब हितोपदेशो का अनुशरण कर उस धर्मग्रन्थ में समय समय पर शनै: शनै:  इस प्रकार सुधार करना चाहिए कि उसके सार में ईश्वर हों ॥ 

धर्मागत मिलिबै जोइ भगवन सार सरूप । 
ज्ञान नयन पट खोल के, दरसो वाके रूप ।२१७४ । 
भावार्थ : -  धर्म ग्रन्थ में यदि भगवान सार स्वरूप मिल भी जाएं तो चैतन्य स्वरूप होकर ज्ञान लोचन उसका रूप दर्शना चाहिए  ईश्वर का स्वरूप सुंदर होना चाहिए कष्टमय नहीं ॥ 

अहिंसा परमो धर्म: को आधार मान कर धर्म ग्रन्थ में सुधार करें अन्यथा सार में या तो ईश्वर होंगे नहीं होंगे तो कष्टमय स्वरूप में होंगे । धर्म के मार्ग में प्रभु की रचितसृष्टि को क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए.....

ग्यान अन्तरात्मना, पंच भूत बिग्यान । 
जब दोउ के मेल मिले, गर्भ गहे तब प्रान ।२१७५।  
भावार्थ : -- यह आत्मा ही ज्ञान रूप चिदानंद घन है पंच भूत विज्ञान है । जब इनका परस्पर मेल होता है तब जीव गर्भ में प्राण ग्रहण करता है ॥  

सुबरन जाति को चाहिए, संकलित सद विचार । 
सातबिक़ आहार संग, एक बर देसाचार ।२१७६। 
भावार्थ : -- मनुष्य की उत्तम प्रजाति प्राप्त करने हेतु एक संकलित सद-विचार (जिसे धर्म कहते हैं ) की आवश्यकता होती है, जिसका वह अनुशरण करे । इसके सह एक उत्तम आचार-व्यवहार सहित उसका आहार प्रकृति के सारूप्य होना चाहिए ॥ 
इसका अर्थ यह हुवा : -- केवल आहार मात्र से प्रजातियां गुणवंत नहीं होतीं .....

धर्म गहि कुल चारि चरन, गावहि बेद पुरान । 
तासु  चिन्ह नुहार मिले, सुठि सरूप भगवान ।२१७७। 
भावार्थ : -- आप्त-श्रुतियों ने धर्म की ( जो संकलित सद विचारों का एक समूह है )  व्याख्या करते हुवे कहा है कि वही धर्म परिपूर्ण धर्म है जो सत्य, शौच, दया व् दान रूपी चार स्तम्भों में अवस्थित हो । ऐसे धर्म का अनुशरण करने से ईश्वर सुंदर स्वरूप में प्राप्त होते हैं ॥

सत्य =परमार्थिक सत्ता
शौच/तप = शुचिता जीवन में, आचरण, में सहचरण में
दया = प्राणी मात्र पर करुणा,अहिंसा
दान = दयावश अथवा धर्मतस देने या त्यागने की क्रिया.....में उचित मार्ग से सौ रुपय कमाने में समर्थ हूँ किन्तु मैं एक रुपया ही कमाऊं शेष किसी अन्य अल्पसमर्थ के लिए त्याग दूँ यह त्याग है | एक में से आधा धर्मार्थ किसी पात्र को दे दूँ यह दान है.....

जननि जनक सोंह उपजै, जो नव सद्गुन कोए । 
मनसा वाचा कर्मना, जनिमन तिन्ह सँजोए ।२१७८। 
भावार्थ : -- यदि जन्मदाता अथवा मात-पिता में कोई नया सद्गुण अथवा दुर्गुण उत्पन्न होते ही वह चित्त से वचनों से, व् कर्म से गुणसूत्र में संचयित हो जाता है ॥ 

जैसे : --  पूर्वजों ने केवल दान किया किन्तु माता -पिता ने त्याग भी किया तो यह एक नया सद्गुण व्युत्पन्न हुवा ॥ संतति जो कुछ गर्भ में, कुल में, गुरुकुल में, ज्ञान वाणी में देखती सुनती है उसका अनुशरण करती है  --यह चित्त है, मेरे पूर्वज अथवा मात-पिता ऐसा कहते थे, यह वाचा है,  वे ऐसा करते थे यह कर्मणा है..... 

जननि जनक कहि आपनी,आपही न अपनाए । 
तासु जने जनिमनहु तिन,पग पग दए बिसराए ।२१७९। 
भावार्थ : --यदि जन्मद अपने कहे सदवचनों का स्वयं अनुशरण नहीं करते । तब संतति भी चरण चरण पर उन वचनों को विस्मृत करती जाती है ॥ 

धनार्जन का उचित मार्ग क्या हो इस पर एक पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है

जीवन हेतु साधन हो बस्न बस तीनि चारि । 
लघु कुटुम को कुटि बहूँत, रत ब्रत एक नर नारि ।२१८० । 
भावार्थ : -- एक गृहस्थ की आधार भूत आवश्यकताएं कितनी होनी चाहिए : -- जीवन सुचारू रूप से संचालित हो और साधु भी भूखा न जाए इतना अन्न होना चाहिए, तीन चार वस्त्र होने चाहिए ,  एक नारी व् एक ही पुरुष व्रत के नियम का पालन करते हुवे  एक लघु कुटुंब को कुटिया भी पर्याप्त, अट्टालिकाएँ भी अपर्याप्त .....

ये तो चरन्नी में आ जाता होगा शेष कहाँ जाता हैं ? पिछले किए कुकर्मों के ऋण मोचन में आधा रुपया व्यय हो जाता है इसलिए कुकरम मत करो कुटिया में रहो..... 






जस तस ब्यबहार रीति तेसिउ प्रीति

जीवाधार तस बिचार नयक तेसेउ नीति

मृषावादी संजुत होत असुरी संपत जोए ।

जब जब आसुरि सम्पत् बाढ़ि ।      
तब तब तापस गुन अति गाढ़ि ।।

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