सोमवार, 29 दिसंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २१९ ॥ -----

नेता जी की ढंढसी, नेता जी के ढंग । 
पल माहि यूं फेर फिरै, जूँ गिरगिट के रंग । २१९१ । 
भावार्थ : - नेताओं का  कपट वेश व् उनका चाल-चलन ऐसे परिवर्तित होता ही जैसे गिरगिट का रंग ॥ 


पड़के चारिन आखरी, अभरे ऊंची बानि । 

समझ ग्यानि आप कू किए सो अपनी हानि ।२१९२।
 भावार्थ : - चार अक्षर पड़के उत्तम वस्त्र धारण करके अंग्रेज स्वयं को ज्ञानी समझते थे किन्तु डेढ़ सौ वर्ष में उन्होंने कुछ भी नहीं सीखा अपनी ही हानि की ॥ कौन कहता था जाति-धर्म कुछ नहीं है यही जेनेटिक इंजीन्यरिंग है ॥  

दूसरों की हानि करने से अपनी भी हानि ही होती है, लाभ नहीं होता..... 


जीवन धन हो कि साधन देइ जोग सब दान । 
 कुल मर्यादा आपनी, होत अदायनबान ।२१९३ । 
भावार्थ : -- जीवन धन एवं साधन  दान के विषय हैं । किन्तु अपने कुल की मर्यादा अदातव्य होती है अर्थात वह दान का विषय नहीं है ॥ 

सीख पराई सीख कै, गढ़ गढ़ छबि दिखलाएँ । 
बंस बिगाड़े आपुना, तिनकी सिख में आए ।२१९४। 
भावार्थ : - अपनी उत्तम शिक्षा को त्याग, परायों की अधम सीख को ग्रहण कर छबि गढ़ गढ़ के दिखाने वालों की सिख में जो आएगा वह अपना कुल अपना वंश अपने घर का सत्यानाश करेगा ।। 

चिउँटी पग घुंघरू बजे भगवन देइ सुनाए । 
इच्छा चारि सुने नहीं, कानन जा कहि आए ।२१९५। 
 भावार्थ : - चींटी के पग घुंघरू बजे भगवान तो वह भी सुन लेते हैं क्योंकि यह रामराज है । स्वेछाचारी के कान में भी कोई जा कहे तो भी सुनाई न दे ॥ 

निजोजन नियमन जोजना, नीति नियम को जोग । 
हरित पीट पट गाँठ कै, जन हित संग सँजोग ।२१९६ । 
भावार्थ : -- नियोजन, नियंत्रण, योजना, नीति व् नियम के योग  को हरित व् पीत पट से गठन कर जन हित के साथ संयोजित करना चाहिए ॥ 

ध्यान रहे कि बाराती जो हैं वही हो बाजा  न हो तो अच्छा है हम लोग हैं न  पीना-खाना न हो खाने-पीने के स्थान पर भंडारा हो.....

हरी भरी धरती रहे, जन जन मुख हरियाए । 
न तरु कलुषित धूम संग, मंद बिभौता छाए ।२१९७ । 
भावार्थ : - हरियाली प्रसन्नता की प्रतीक है हरी भरी धरती से ही जन जन के मुख पर प्रसन्नता का वास होता है। अन्यथा काले धुवें के संग वही प्रसन्नता दरिद्रता में परिणित होकर मुख को उदासीन कर देती है॥ 

जन कर खन धन कोष लए मंद विभौ को सोष । 
गगन मलिन मुख प्रभा किए सासन कलि को पोष ।२१९८। 
भावार्थ : -- सद-सम्पन्न जन का धन संकलन कर, खनिज सम्पद को व्यपहरण कर निर्धन जन का शोषण कर दूषण संग प्रदूषण कर शासन ही दुष्ट कलाओं से युक्त कल का पोषण कर रहा है ॥ 

सासन कर बाँध बँधाए, हल मारग किए सोष । 
कल के कलुषित कला हुँत, मोचित किए सब कोष ।२१ ९९ । 
भावार्थ : -- कर हो अथवा जलकर हो सारे बांध  शासन के नियंत्रण में हैं, हल मार्ग को तो  वह सुखा किए है याचना करने पर भी पानी नहीं देता, और  उद्योग पतियों के कलुषित कलाओं से युक्त कल के लिए इसने सारे कोष मुक्त कर दिए हैं ॥ 

 "अब देश का भंडार देश के लिए योजित न होकर किसान की धरती हड़पने के लिए उद्योग पतियों के घरों में जाएगा "

सो जन जग हुँत श्राप सम जिनके एकै अलाप । 
करता भया को निंदिए, करिए नहि किछु आप ।२२०० ।  
 भावार्थ : -- संसार हेतु वे लोग कलंक स्वरूप हैं जिनका एक ही अलाप है कि करता हुवा की निंदा करो स्वयं भी कुछ मत करो ॥ 





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