मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २२०-२२१॥ -----

धूनि कर धूनि कलित किए , भावारथ भिनु भाँति ।
अस धूनि संग प्रचरिते, बहुतक भरमन भ्राँति । २२०१।
भावार्थ : -- शब्दकार ने शब्द की रचना की किन्तु उसके भाव एवं अर्थ में भिन्नता है । ऐसे शब्द अथवा शब्द- युग्म के संदर्भ में भ्रम व् भ्रांतियां प्रचलित हो जाती हैं ॥

इसलिए : --  शब्द के अर्थ व् भाव में एकरूपता होनी चाहिए अन्यथा उसके संदर्भ में कई प्रकार की भाँतियां प्रचलित हो जाती हैं ।

सासन जग जन घन भयो, भया न को गुनवंत । 
नेम नियोजन जोग कै, तिन्हनि करौ नियंत ।२२०२। 
भावार्थ : -- हे शासन ! यह  धरती जन-मानस से संकुलित हो गई है ।  यदि उसमें गुणवत्ता नहीं है तो नियम व् नियोजन के योग से उसे नियंत्रित करना चाहिए ॥

नियम : -- 

>> वयस्कता अधिनियम
>>विवाहेतर संबंधों पर निषेध ।   ऐसे संबंधों से व्युत्पन्न संतति  का दायित्व मात-पिता पर नहीं होता परिणामत: उसके गुणों का निर्धारण जटिल हो जाता है ॥
>> बाल संबंधों पर निषेध । ऐसे संबंधों से यदि संतान हो जाए तो ? कौन पालेगा ?राष्ट्र के राष्ट्रपति या राष्ट्र के प्रधानमंत्री ? या राजा ? पहले तो कुणबा पाल देता था, और रोग भी नहीं होते थे कारण ? वे पवित्र सम्बन्ध थे और घर का घी खाते थे अब अपवित्र-संबंध उसपर काले पीले द्रव्य बाला बचपन रोगी हो जाए तो कोई उपचार न हो तो बहुंत से तो हैं.....

तत्पश्चात परिवार नियोजन : -- परिवार तो है ही नहीं, जब परिवार नहीं होगा तो कुल-कुटुंब भी नहीं होगा, कुल -कुटुंब नहीं होने से सद्गुणों नहीं होगें व् संतति प्रेम व् स्नेह से वंचित होगी ॥ मात पिता में ममत्व हो बालक को कुल-कुटुंब मिले इस हेतु परिपूर्ण धर्म की आवश्यकता होती है.....

पूर्वकाल में भारत का सामाजिक परिदृश्य : -- 

एक नारि संग एक पुरुख, परिनय सूत सँजोग ।
अभिजात बरग महु सोए, कुटुम कहन के जोग ।२२०३। 
भावार्थ : - एक नारी व् एक पुरुष का सम्यक एवं परस्पर सुसम्बन्ध जो  एक पारिवारिक ईकाई का निर्माण करता हो अभिजात्य वर्ग में कुटुंब कहलाता है ॥

सद्चरित जहँ बासन हों भूषण हो जहँ लाज । 
अस कौटुम संजुत रचे एक अभिजात समाज ।२१९४।  २२०४ 
भावार्थ : -- सद्चरित्र जिसके वस्त्र हों ( सद्कर्म सद्चरित्र के निर्माण में सहायक होते हैं )  व् लज्जा जिसके आभूषण हों ( जैसे ऐसा-वैसा किया तो लोग क्या कहेंगे यह भय हो ) ऐसे कौटुम्ब संयुक्त स्वरूप में एक अभिजात्य समाज का निर्माण करते हैं ॥


" मानव शरीर चमत्कारिक इन्द्रियों 
  (ज्ञानेन्द्रिय: दृश्य, श्रव्य, गंध, स्वाद, स्पर्श;
  कर्मेन्द्रिय: कर, पद, वाक्, गुदा, उपस्थ ) 
  का स्वामी है, बुद्धि की अनंत सीमा 
  के वशीभूत परम शक्तिशाली है,
  इसे नीति-नियमों के निबद्ध से 
  आबद्ध करना अत्यंत आवश्यक है.."

अबुध कि लच्छन हीन हो, धनि हो चाहे दीन । 
नीति सुरीति संग बँधे, कौटुम होत कुलीन ।२१९५। २२०५  
भावार्थ : -- अबोध हो कि गुणहीन हो धनवंत हो चाहे दीन हो । एक कुटुंब उत्तम नियमों एवं सुंदर रीतियों के संग सम्बद्ध होकर कुलीन होता जाता है। जैसे : --  कुटुंब की  नारी अथवा पुरुष विवाह से पूर्व ब्रम्हचर्य का पालन करेंगे, रक्त सबंध स्थापित नहीं होंगे कारन कि इससे रक्त-विकार होता है व् घर की नारियां घर में ही असुरक्षित होती हैं ॥ 


नर नारी जोग जुगाए दोउ रचत परिबारु  । 
समुदाय पुनि समाज भए, परिबारु समाहार ।१५७६। २२०६ 
भावार्थ : -- " स्त्री-पुरुष के सम्यक एवं पारस्परिक सु-सम्बन्ध पारिवारिक इकाई का निर्माण करते है.."परिवारों के समाहार से समुदाय एवं समाज  निर्मित होता है ॥ 

" स्त्री-पुरुष के सम्यक एवं पारस्परिक सु-सम्बन्ध पारिवारिक इकाई का निर्माण करते है.."

" पारिवारिक जातकों द्वारा जाति- का निर्माण होता है.."

" अभिन्न जाति एकात्म समाज का पर्याय है.."

" जातियों का समष्टिकरण समाज को निर्मित करता है.."

" समवेत समाज एकीकृत राष्ट्र के निर्माण के द्योतक है.."

इस प्रकार एक राष्ट्र का निर्माण होता है.....

"  पिता पुत्र व् पौत्रों के परिवार का समूह एक संयुक्त परिवार का निर्माण करते हैं....."



पहिले संजुग कुटुम रहि सबके एकै निधान । 
पाछिन के प्रभाव संग अजहुँ भयउ अवदान ।२१९७।   २२०७ 
भावार्थ : -- विभाजन से पूर्व एवं पश्चात व् धुनातन समय तक भारतीय कुटुंब संयुक्त स्वरूप का होता था कुटुंब के सदस्यों का एक ही धन कोष होता था /है जिसमें किंचन व् अकिंचन सभी किंचित में ही पल जाते थे /हैं । ऐसा माना जाता है कि पाश्चात्य प्रभाव से यह कुटुंब विभाजित हो गए ॥ 

 प्रश्न है कि यह पाश्चात्य प्रभाव औचक उत्पन्न कैसे हुवा.....क्यों हुवा .....? 

दुःख सुख मैं सहाए बने  करे संग सब काज । 
पहिले संजुग कुटुम सम  रहहीं गाँव समाज ।२१९८। २२०८ 
भावार्थ : - विभाजन के पूर्व भरत के गांव- समाज एक संयुक्त कुटुंब के सदृश्य होता था जो दुःख सुख में सहायक होकर सभी जनोपयोगी कार्य मिलबांट कर करता था ॥ 

गाँव जात जाता रहैं  भगिनी भ्रात  समान । 
दावैं कनिआँ आपनी, अंतर बर कर दान ।२१९९ । २२०९ 
भावार्थ : - ग्राम-संघटन इतना पवित्र कि ग्राम-जातको में परस्पर भ्राता -भगिनी का सा संबंध होता । वे ग्राम वासी अपनी कन्या व् कुमार का विवाह भी अन्यत्र किसी ग्राम में करते ॥ 

पुरब समऊ अधम बरन, रहहीं दीन दुखारि । 

पुरुख सबहि धिकार गहै बंधन में रहि नारि ।२२०० । २२१० 
भावार्थ : --  कर्म एवं वैचारिक आधार पर भारतीय समाज चार वर्णों में भाजित था जिसमें चतुर्थ वर्ण दैन्य स्थिति में दुर्दशा से ग्रस्त था । पुरुषों को सर्व अधिकार प्राप्त थे नारियां इनके बंधन में थी ॥ 

----- ॥ दोहा-दशम २२१॥ -----

देस जमन जब राज किए, सहस बरस रहि काल । 
अन्न सन बिद्या धन के, बहोरि परै अकाल ।२२११  ।
भावार्थ : -- वह समय लगभग एक सहस्त्र वर्ष का था जब इस राष्ट्र की सत्ता यवनों को हस्तांतरित हो गई ॥ फिर तो अन्न धन व् विद्या का आकाल हो गया । कभी जिसे सोने की चिड़िया की उपाधि प्राप्त थी वह अब भिखारियों व् सांप-सपेरों का देश कहलाने लगा इस धरती का ये रक्त पीने लग गए ॥

रीति नीति नय भारती, बेद बिहित सब होइ । 
पुरब काल सों अजहुँ लग, फेर फिरे ना कोइ ।२२१२। 
भावार्थ : - भारत देश की रीतियाँ नीतियां समाज धर्म का आधार वेद ही थे व् हैं । पूर्व काल से लेकर यवन के शासन काल तक ( अपवाद को छोड़ कर )  इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुवा था ॥

बहोरि अयनिक बाहरी आए इहाँ जो कोइ । 
सुधार गेह बसाए के, सबहि सुधारक होइ । २२१३।  
भावार्थ : -- फिर तो यमन सहित जिस किसी बाहरी घुमक्कड़ का आगमन हुवा उसने जैसे यहाँ सुधर घर ही बसा लिया और समाज सुधारक हो गए ॥ 

बिगड़ी दीठि न आपनी, औरन देई सीख । 
जो अच्छराकृति कृत किए, तिन्हनि कहि ले लीख ।२२१ ४। 
भावार्थ : -- इन्हें अपनी विकृतियां दर्शित नहीं हुई और दूसरों के विकार को सुधारने निकल पड़े । जिसने ॐ अक्षर से अक्षर आकृति का प्रादुर्भाव किया उन्हीं को ये पढ़ाने लगे कैसे  ये अ है ये आ है इसको अलिफ़ बे बोलते हैं ॥

पढ़े चहुँपुर के आखरी, जो गुन गुने न ऐक । 
अग जग लग कहते फिरै, हमहीं जगत प्रबेक ।२२१ ५।  
भावार्थ : --  आंग्ल भाषी कहा जाता है कि इनके साम्राज्य का सूर्य कभी अस्त नहीं होता था जितनी पढ़ाई थी ये पढ़कर आए । पढ़े किन्तु न ज्ञान ग्रहण किए न कोई शिक्षा ही ली न इनको ज्ञान आता न बिज्ञान और शूकर खाने वाले ( सेक्स पियर ने लिखा है ) कहते फिरते हैं  हम जगत-श्रेष्ठ हैं ॥ और जो वे संस्कृत विद्यालय खोल के बैठे हैं इन्हें अब जा के  समझ आया कि यह कोहिनूर तो पत्थर है ॥

मातु भुइँ भई प्रतिसरा, मर मर गयउ बहूत । 
प्रतिसर के हविर् हुति बन, जीवन किए आहूत ।२२१६। 
भावार्थ : - मातृ भूमि दासी बन गई ।  स्वतंत्रता  के हवन कुण्ड की हुति बनकर जीवन को आहूत कर न जाने कितनों ने उसपर प्राण  न्यौछावर कर दिए ॥

दिए कोए एक चिनगारी, लगी देस महु आग । 
लिखि बीच एक रेख खँचे, भयऊ दोई भाग ।२२१७। 
भावार्थ : -- फिर न जाने किसने चिंगारी दिखाई, हिंसा की ज्वाला भड़क उठी । देश के बीचोबीच एक रेखा खींची गई और उसके दो भाग हो गए । ।

फिर  का हुवा ?

रागे रागिनी आपनी, अपने सुर दे तान ।
पोल ढोल बजाय के रचे एक संविधान । २२१८।
भावार्थ : -- अपनी ही रागिनी राग ( इनके छ सौ थे ) के अपने ही सप्तसुर ध र म नि र पे क्ष को तान देकर  अपने अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर एक संविधान रचा गया जो ढोल में पोल है ॥

बिगड़े कुल के धारिता भए सिँहासनासीन । 
देस सब का कलुष किए, भए सब आप कुलीन ।२२१९ । 
भावार्थ : --  बिगड़े हुवे कुल के धारिता सिंहासन पर आसीन हुवे ये  देश के भूत वर्तमान व् भविष्य का मुख मलिन (अपवित्र ) करते गए स्वयं कुलीन ( पवित्र ) होते गए ॥

फिर तो सिँहासन पर बिराजित भए ब्याज । 
परमारथ सब काज किए किए सुवारथ राज । २२२०। 
भावार्थ : -- तदनन्तर सिहासन पर छल-कपट विराजित हो गया परमार्थ कार्यकर्त्ता रहा स्वार्थ राज करता रहा ॥



















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----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...