बुधवार, 3 दिसंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २०८ ॥ -----

राजा हो कि रंक हो भए सब देस प्रधान । 
समस्याएँ सौमुंह खड़ी, पूछ रहि समाधान ।२०८१। 
भावार्थ : - राजा हो चाहे  रंक हो अब तो सभी देश के मुखीया बन गए हैं  । समस्याएं हैं की सम्मुखखड़ी  अपना समाधान पूछ रही हैं ।  समाधान  मिल जाए तो चाय वाला ठीक है नहीं तो.....? अब तक समाधान तो कोई मिला नहीं समस्याएं और गहरी हो चली हैं..... 

अपशब्द सह चार लखें , राखे चौंसठ राख । 
जिभ्या जब  बस मैं करी,लाखे लाखों लाख ।२०८२ ।  
 भावार्थ : - अपशब्दों के प्रयोग से चौसठ रक्षक भी चार ही दिखाई देते हैं । यदि जिह्वा वश में रहे तो यह चौंसठ रक्षक भी लाखों लाख दिखते हैं ॥ 

पद के ऊंचाई संग आसित भयउ कुलीन । 
नीची करनी कारि के, करे पदक कुल हीन ।२०८३ । 
भावर्थ : - पद की ऊंचाई को प्राप्त कर पदासीन तो कुलीन हो जाता है । किन्तु अपनी नीची करनी से उस पद को
कुलहीन कर के जाते हैं ॥ 

नीचासय आसन संग भयउ पद पत हीन । 
पत तो पीठासीन के, ऊँचे कर्म अधीन ।२०८४। 

भावार्थ : -- तुच्छ विचारक की आसंदी से पदों की प्रतिष्ठा धूमिल होती है । पदों की प्रतिष्ठा बाह्य अलंकरण  से नहीं अपितु आसंदी के सद्कर्मों से पुष्ट होती है । 

ऊंची पदबी पाए के, करें बहुंत अभिमान । 
नीची बोली बोल किए अपना ही अपमान ।२०८५। 
भावार्थ  : -- ऊंची पदवी प्राप्तकर अहंकार के वशीभूत जो  अपशब्दों  का प्रयोग करे वह अपना अपमान स्वयं करता है ॥  


निर्धन धनी पदासीन कहु को जोग महंत । 
निज सरबस बलिहार के पाए जोइ पद कंत ।२०८६ । 
भावार्थ : - निर्धन व् धनी कुबेर दोनों पदासीत् हैं श्रेष्ठ महंत कौन हो  । जो अपना सर्वस्व न्योछार दे व् सेवक से स्वामी के पद को प्राप्त हो वही श्रेष्ठ मुखिया है ॥ 

बाहरी सिंगार संग होत  न पदक कुलीन । 
पद पदक के कुलीनता, आसीत कृत अधीन ।२० ८७ । 
भावार्थ : - पदों की प्रतिष्ठा बाह्य अलंकरण से नहीं अपितु आसंदी के सद्कर्मों से पुष्ट होती है । 

सोइ राजे रजवाड़े,सोइ पुरनइ प्रथाएँ  । 
अहहैं ऐतक अंतर कि रूप बदल सों आए ।२०८८ । 
भावार्थ : -- वही राजे हैं वही रजवाड़े हैं वही पुरानी प्रथाएं हैं अंतर केवल इतना है की इन कुप्रथाओं, समस्याओं  ने रूप बदल लिया है ॥ 

>>पहले घूँघट कुप्रथा थी घूँ घाट गया है और  घट दिखाओ कुप्रथा है  । 

>>अस्पृश्यता निर्धन रेखा के नीचे छिपी हुई है । 

>>और सामंत वाद अर्थात जमीदारी प्रथा ये उद्योग पति सामंती हो गए हैं और  किसानों पर अत्याचार कर रहे हैं ॥ दुःख की बात यह है की शासन की मिली भगत से ये अत्याचार हो रहा है.....उद्योग नीति है या किसान विरोधी नीति.....विद्यमान सरकार जनता की सेवक है अथवा पिछली सरकार की.....?  

भोग बिलासि धनिमन हुँत, खेत लगे उदयोग । 
जन जीवन तरसत अन्न, रहे जीउ को भोग ।२०८९ । 
भावार्थ : -- जन-सामान्य की आधार-भूत आवश्यकताओं हेतु नहीं अपितु मुट्ठी भर भोग विलासी लोगों के लिए खेतों को उखाड़-उखाड़ कर उसमें उद्योग बोए जा रहे हैं ।  अन्न-जल को तरसता जन जीवन त्रस्तहोकर अ पने जीवन को जैसे भोगता हुवाजैसे मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है ॥ 

हिम खंड को ताप लगे, अँगारी सिरु स्वेद । 
काल कलुखित जोनिज जब पड़ा रहे हों बेद ।२०९० । 
भावार्थ : -- बर्फ को गरमी लगती ही शोलों को पसीना आने लगता है । जब धर्म संकरज  मलेक्छ जिन्हें कुरान का कु भी ज्ञात नहीं वे वेद पड़ा रहे हैं । कैसे : - ये दलित है ये वैश्य है ये क्षत्रिय है ये गोल्ड है.....  

तू क्या है  : -- डायमंड ? 
कुरान में कितने खंड  होते हैं ? = तीस 

सीवारा क्या है.....?  

ये यमन तो फिर भी पराए देश के हैं  ? तुम कलुष योनिज लोग तो कहीं के नहीं हो..... 
   










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