पेट परायन भरमनी, कलुख जोनि की टोलि ।
धिंग धरम धूर्त करम ,झूठहि तिनकी बोलि ।२१११ ।
भावार्थ : -- वर्ण एवं धर्म संकर के समाज का वर्गीकरण ( चार्ल्स डार्विन का वर्गीकरण के सिद्धांतानुसार ) : -- लक्षण : -- यह अपने ही पेट के परायण होता है । यह मनोविनोद के लिए घूमता-फिरता रहता है । वंचन ही इसकी वृत्ति है, उपद्रव इसका धर्म ( स्वभाव ) है, झूठ इनकी बोली हैं पैसा ही इनका भगवान है ॥ वंचन-व्यापार से ही इसकी जीविका चलती है ॥
कालान्तर में वर्ण -संकर अंतर्देशीय शरणार्थी ( रिफ्यूजी) होंगे, धर्म-संकर अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी होंगे.....
बरासन गोसाईं बन बैठे बहुंत सुपास ।
ते पद पैह का लाह जब, रहे दास के दास । २११२ ।
भावार्थ : -- सिंहासन में स्वामी बनकर सुखपूर्वक तो विराजित हो गए हैं । ऐसे पदों को प्राप्त करने से क्या लाभ जब दास के दास ही रहें ॥ जब इतने ऊँचे पद में भी कोई दलित का दलित है तो फिर ऐसे पदों का क्या लाभ.....?
कोउ कलुखित जोनिज है, को वाका अनुहारि ।
काल करम सदकृत कहत भए कुलीन पदधारि ।२११३ ।
भवार्थ : -- विद्यमान समय में भारत को कलुषित योनिज अथवा उनके अनुयायी चला रहे हैं । ये काले काले कुकर्मों को परमार्थ कह कर कुलीन पदों को प्राप्त हुवे हैं । इनके राज में जिनको अपने बाप-दादों का नाम तक पता नहीं उन्हें ही कुलीन कहा जाता है ॥
धर्म मुखौटा धार के, ओड जात की गात ।
उदार पिसाचु सचिव सदा, किए निज हित की बात ।२११४ ।
भावार्थ : -- ये उदार-पिशाच नेता -मंत्री सदा अपने ही हित की बात करते हैं । धर्म का मुखौटा लगा कर जात की चादर ओढे ये धर्म और जाति को कपड़ों के जैसे बदलते हैं ॥
उलटी सीधी मंत्रणा उलटे सीधे मंत्र ।
उलटे सीधे जंत्र कू कहते जन गन तंत्र ।२११५ ।
भावार्थ : -- उलटी सीधी इनकी मंत्रणाएं हैं उलटे सीधे मंत्र है । उलटा सीधा नियंत्र है ऐसे को हम लोग गणतंत्र कहते हैं । और चार उलटे सीधे मंत्रियों के समूह को ही लोकतंत्र कहते हैं ॥ इन मंत्रियों को भारत की चिंता नहीं है इन्हें अपने इसी लोकतंत्र की चिंता है ॥
जल चर नभ चर थल चारि, बहोरि मानस माँस ।
कलुष चेता के हुँत एहि, खादन के परिभास ।२११६।
भावार्थ : - प्रथमतस जलचर ततपश्चात नभ व् थल चर फिर मानव माँस, दुष्टों के खानपान की यही परिभाषा है ।
नद निर्झर सर सोष कै, मरुथल किए खलिहान ।
उदारता के भेष भर, जल दैं देस प्रधान ।२११७ ।
भावार्थ : -- नदीयों झरनों तालाबों का शोषण कर, कृषकों के खेतों को लूट लूट के उन्हें मरुस्थल में परिणित कर, ये देश के प्रधान उदार वादियों का स्वांग भरे जल के दातार बने फिरते हैं ॥
राष्ट्रवादसों वासिन , के का हो परिमान ।
जथोचित नेम संग बँध रहें स्थित थितमान ।२११८ ।
भावार्थ : -- राष्ट्रवाद किसे कहना चाहिए : -- "जो राष्ट्र-निवासी यथोचित संविधान के आदेश आदि का पालन करने में संलग्न हों एवं स्थित सीमाओं के अंतर्गत कृत-संकल्प होकर स्थितिमान् रहें वह राष्ट्र वाद है....."
राष्ट का मित्र कौन हो ?
कृतज्ञं धार्मिकम् सत्यमक्षुद्रं दृढ़ भक्तिकम् ।
जितेन्द्रियं स्थितं स्थित्याम् मित्रमत्यागि चेष्यते । ५० ।
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
अर्थात : -- जो ( राष्ट्र ) कृतज्ञ, धार्मिक, सत्यवादी, उदार, दृढ-स्नेही, जितेन्द्रिय, स्थिर सीमाओं में स्थितिवान् , एवं मैत्री का त्याग न करने वाला हो वह (राष्ट्र) मित्र ता के योग्य है ॥
लोक राज दुइ तंत्र दुहु बरे बिपरीत रीति ।
एक राजा हित नीति किए दूजी जन हित नीति ।२११९ ।
भावार्थ :-लोक व् राज ये दो तंत्र हैं दोनों की विपरीत रीतियाँ हैं,एक राजा के हित की नीतियों का तथा दूसरी जन-साधारण के हित की नीतियों का वरण करती है ॥ लोकतंत्र में देश-निवासी महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि यदि एक मंत्री मर जाए तो सौ और जनम ले लेते हैं राज-तंत्र में राजा की सुरक्षा की जाती है कारण यदि राजा सुरक्षित है तो जनता को भी सुरक्षित माना जाता है ॥
देस परिगत हीन होत भयउ अपरिच्छेद ।
अपनी स्थति पर अस्थिर रहे निरंतर भेद ।२१२०।
भावार्थ : - हमारे राष्ट्र की सीमाएं जैसे आवेष्टक विहीन होकर अविच्छिन्न हो गई हैं । जो देश अपनी स्थति में अस्थिर हैं राष्ट्रवाद में जिनकी निष्ठां नहीं है वे भारत की सीमाओं का निरंतर भेदन कर रहे हैं ॥ भारत का लोकवादी इतिहास रहा है इसने स्वार्थपूर्ति हेतु किसी भी राष्ट्र की मर्यादाओं का उल्ल्ंघन नहीं किया ॥ जो देश आतंकवादी गतिविधियों के लिए विश्व भर में कुख्यात हो वह किसी की मैत्री के योग्य है ?
>> यदि नहीं तो फिर भारत-शासन ने उसके प्रधान को आमंत्रित क्यों किया गया.....?
धिंग धरम धूर्त करम ,झूठहि तिनकी बोलि ।२१११ ।
भावार्थ : -- वर्ण एवं धर्म संकर के समाज का वर्गीकरण ( चार्ल्स डार्विन का वर्गीकरण के सिद्धांतानुसार ) : -- लक्षण : -- यह अपने ही पेट के परायण होता है । यह मनोविनोद के लिए घूमता-फिरता रहता है । वंचन ही इसकी वृत्ति है, उपद्रव इसका धर्म ( स्वभाव ) है, झूठ इनकी बोली हैं पैसा ही इनका भगवान है ॥ वंचन-व्यापार से ही इसकी जीविका चलती है ॥
कालान्तर में वर्ण -संकर अंतर्देशीय शरणार्थी ( रिफ्यूजी) होंगे, धर्म-संकर अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी होंगे.....
बरासन गोसाईं बन बैठे बहुंत सुपास ।
ते पद पैह का लाह जब, रहे दास के दास । २११२ ।
भावार्थ : -- सिंहासन में स्वामी बनकर सुखपूर्वक तो विराजित हो गए हैं । ऐसे पदों को प्राप्त करने से क्या लाभ जब दास के दास ही रहें ॥ जब इतने ऊँचे पद में भी कोई दलित का दलित है तो फिर ऐसे पदों का क्या लाभ.....?
कोउ कलुखित जोनिज है, को वाका अनुहारि ।
काल करम सदकृत कहत भए कुलीन पदधारि ।२११३ ।
भवार्थ : -- विद्यमान समय में भारत को कलुषित योनिज अथवा उनके अनुयायी चला रहे हैं । ये काले काले कुकर्मों को परमार्थ कह कर कुलीन पदों को प्राप्त हुवे हैं । इनके राज में जिनको अपने बाप-दादों का नाम तक पता नहीं उन्हें ही कुलीन कहा जाता है ॥
धर्म मुखौटा धार के, ओड जात की गात ।
उदार पिसाचु सचिव सदा, किए निज हित की बात ।२११४ ।
भावार्थ : -- ये उदार-पिशाच नेता -मंत्री सदा अपने ही हित की बात करते हैं । धर्म का मुखौटा लगा कर जात की चादर ओढे ये धर्म और जाति को कपड़ों के जैसे बदलते हैं ॥
उलटी सीधी मंत्रणा उलटे सीधे मंत्र ।
उलटे सीधे जंत्र कू कहते जन गन तंत्र ।२११५ ।
भावार्थ : -- उलटी सीधी इनकी मंत्रणाएं हैं उलटे सीधे मंत्र है । उलटा सीधा नियंत्र है ऐसे को हम लोग गणतंत्र कहते हैं । और चार उलटे सीधे मंत्रियों के समूह को ही लोकतंत्र कहते हैं ॥ इन मंत्रियों को भारत की चिंता नहीं है इन्हें अपने इसी लोकतंत्र की चिंता है ॥
जल चर नभ चर थल चारि, बहोरि मानस माँस ।
कलुष चेता के हुँत एहि, खादन के परिभास ।२११६।
भावार्थ : - प्रथमतस जलचर ततपश्चात नभ व् थल चर फिर मानव माँस, दुष्टों के खानपान की यही परिभाषा है ।
नद निर्झर सर सोष कै, मरुथल किए खलिहान ।
उदारता के भेष भर, जल दैं देस प्रधान ।२११७ ।
भावार्थ : -- नदीयों झरनों तालाबों का शोषण कर, कृषकों के खेतों को लूट लूट के उन्हें मरुस्थल में परिणित कर, ये देश के प्रधान उदार वादियों का स्वांग भरे जल के दातार बने फिरते हैं ॥
राष्ट्रवादसों वासिन , के का हो परिमान ।
जथोचित नेम संग बँध रहें स्थित थितमान ।२११८ ।
भावार्थ : -- राष्ट्रवाद किसे कहना चाहिए : -- "जो राष्ट्र-निवासी यथोचित संविधान के आदेश आदि का पालन करने में संलग्न हों एवं स्थित सीमाओं के अंतर्गत कृत-संकल्प होकर स्थितिमान् रहें वह राष्ट्र वाद है....."
राष्ट का मित्र कौन हो ?
कृतज्ञं धार्मिकम् सत्यमक्षुद्रं दृढ़ भक्तिकम् ।
जितेन्द्रियं स्थितं स्थित्याम् मित्रमत्यागि चेष्यते । ५० ।
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
अर्थात : -- जो ( राष्ट्र ) कृतज्ञ, धार्मिक, सत्यवादी, उदार, दृढ-स्नेही, जितेन्द्रिय, स्थिर सीमाओं में स्थितिवान् , एवं मैत्री का त्याग न करने वाला हो वह (राष्ट्र) मित्र ता के योग्य है ॥
लोक राज दुइ तंत्र दुहु बरे बिपरीत रीति ।
एक राजा हित नीति किए दूजी जन हित नीति ।२११९ ।
भावार्थ :-लोक व् राज ये दो तंत्र हैं दोनों की विपरीत रीतियाँ हैं,एक राजा के हित की नीतियों का तथा दूसरी जन-साधारण के हित की नीतियों का वरण करती है ॥ लोकतंत्र में देश-निवासी महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि यदि एक मंत्री मर जाए तो सौ और जनम ले लेते हैं राज-तंत्र में राजा की सुरक्षा की जाती है कारण यदि राजा सुरक्षित है तो जनता को भी सुरक्षित माना जाता है ॥
देस परिगत हीन होत भयउ अपरिच्छेद ।
अपनी स्थति पर अस्थिर रहे निरंतर भेद ।२१२०।
भावार्थ : - हमारे राष्ट्र की सीमाएं जैसे आवेष्टक विहीन होकर अविच्छिन्न हो गई हैं । जो देश अपनी स्थति में अस्थिर हैं राष्ट्रवाद में जिनकी निष्ठां नहीं है वे भारत की सीमाओं का निरंतर भेदन कर रहे हैं ॥ भारत का लोकवादी इतिहास रहा है इसने स्वार्थपूर्ति हेतु किसी भी राष्ट्र की मर्यादाओं का उल्ल्ंघन नहीं किया ॥ जो देश आतंकवादी गतिविधियों के लिए विश्व भर में कुख्यात हो वह किसी की मैत्री के योग्य है ?
>> यदि नहीं तो फिर भारत-शासन ने उसके प्रधान को आमंत्रित क्यों किया गया.....?
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें