बुधवार, 24 दिसंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २१८ ॥ -----

उत्खादन सन प्रगति के गति गहेऊ अतीउ । 
मानस पार गमन करे अजहुँ समय के सींउ ।२१८१ । 
भावार्थ : -- उत्खादन के संग प्रगति की गति इतनी अधिक व अस्मयक हो गई है कि मानव जाति समय की सीमाओं को लांघ गई है जिससे जीव-जगत कहीं पीछे छूट गया है व् पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो गया है इसके गंभीर दुष्परिणाम भुगतने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए 

टिप्पणी ==युगों युगों से संचित ऊर्जा को हमने कुछ वर्षों में ही दूह लिया है, हम तो कुटिया में भी रह लेंगे  दो कपड़ों में एक समय का भोजन कर के रह लेंगे.....तुम्हारी तुम जानो..... 

 उत्पतन बिसराए पथिक आगिन आगिन बाढ़ि । 
उत्पथ चरन बढ़ाए के भयऊ सकल पिछाढ़ि ।२१८२। 


भावार्थ : -- उन्नति को विस्मृत कर प्रगति की ओर बढ़ने वाले भटके पंथी । यदि तुम ऐसे चरण बढ़ाते रहे तो शेष सब कुछ पीछे छूटता जाएगा ॥ 

प्रगति व् उन्नति का समन्वय करे तभी चराचर भी संग होगा जब चराचर संग होगा तभी हम समय के संग हैं चराचर यदि आगे है तो हम समय से पीछे चल रहे हैं रामायण युग में चराचर आगे था..... मनुष्य जाति पर संकट था फिर रामा-सेतु की रचना हुई ॥ 


कल न जाने का बीते, रहे जान का नीति । 
बीती सुमिरत आपनी, सुरत रहे सब रीति ।२१८३। 

भावार्थ : -- कल न जाने क्या बीते जाने क्या नीति नियम हो दिन हो न हो रात हो न हो दो दिन में रात हो तो क्या हो । इसलिए अपना अतीत का स्मरण के सह सभी रीतियों की समृति बनी रहे कारण रीतियों में ही ज्ञान -विज्ञानं के चमत्कार छुपे हैं ।। 

लीक पुरानी सँभारे राखे रहो सँजोए । 
भोर के निकसे पंथी साँझ बहोरी होए ।२१८३। 
भावार्थ : -- अपनी लोकरीतियां को संजो कर रखना चाहिए ये वे पगडंडियां हैं जिसपर चलकर भोर का निकला पथिक साँझ को अपने घर सकुशल पहुंच सकता है ॥ 

रामायन रचना काल बरनै पुष्पक जान । 
मनु मति अनुमति न दाइहि, ले लच्छन बिनु मान ।२१८४। 
भावार्थ : -- श्री रामायण ग्रन्थ का रचना काल कुबेर के पुष्पक वायुयान का वर्णन करता है किन्तु प्राग रूप रहित होने के कारण मन मानस उसे मानने की अनुमति नहीं देता क्यों ? क्योकि वह देश व् परिस्थियों के अनुकूल तो है किन्तु समय के अनुकूल नहीं है.....

किन्तु वह यान अवश्य था भले ही वह यांत्रिक यान न कुछ और हो.....

राम सेतु अप्रासंगिक, रहिहैं काल प्रसंग । 
मानस जाति प्रगति करत, चले समउ के संग ।२१८५। 
भावार्थ : - श्री राम सेतु भी देश व् परिस्थियों के संग प्रासंगिक तो था किन्तु उस काल के सन्दर्भ में वह अप्रासंगिक था । किन्तु यह मनुष्य- जाति की प्रगति हेतु आवश्यक हो गया था कालान्तर में मानव जाति प्रगति करते हुवे समय के संग चलने लगी..... 

टिप्पणी : -- विद्यमान काल में मानव ने प्रगति तो की किन्तु उन्नति नहीं की इसलिए वह भूगोलीय है यदि उन्नति भी की होती तो खगोलीय हो जाता..... 

एक बिषय कहैं भूगोल, दूजन कहें खगौल । 
दुनहु के अध्ययन करेँ लेइ तराजू तौल ।२१८६।  
भूगोल व् खगोल में क्या अंतर है चलो तुलनात्मक अध्ययन करें : -- भूमण्डल के अध्ययन को भूगोल कहते हैं आकाश-मंडल के अध्ययन को खगोल कहते हैं आकाश अथवा अंतरिक्ष भी मण्डलित है यह केवल भारत को ही ज्ञात है.....

ज्योग्रॉफी का अर्थ भू-ज्यामिति होता है यह मण्डलित है अंतराष्ट्रीय जगत को कालांतर में ज्ञात हुवा , कॉस्मॉस का अर्थ अंतरिक्ष होता है यह भी गोल है किसी को पता नहीं.....

बैदिक काल के मानस, अतिसय उन्नत होएँ  । 
खगोलीय भूगोल के रहे ग्यान सँजोएँ  ।२१८७ । 

भावार्थ : -- वैदिक काल में मनुष्य जाति अत्यधिक उन्नत थी वह खगोलीय अंतरिक्ष में निहित भूगोल के ज्ञान से परिपूर्ण थी इसका तात्पर्य यह हुवा कि मनुष्य की उन्नत जाति ज्ञानी योगी होती है विकसित जाति भोगी होती है ॥

चरत समय सों प्रगत भए पाछिन चरन बढ़ाहु । 
पीछु चरत होहु उन्नत,  न तरु एहि रही जाहु ।२१८८। 

भावार्थ : --  हे मानव ! अधुनातन तू अग्रगामी हो चला है एवं अधोगति की ओर अग्रसर है । एतएव पश्चागत हो इसी में तेरी उन्नति है ॥

पश्चिमी देश विकसित उन्नत नहीं, उन्नति यदि धन है तो विकसित- राष्ट्र निर्धन रेखा से नीचे हैं इनकी विकास का सम्यक वितरण होता तो पृथ्वी अति अति अति विकसित होती  भारत उन्नत था अब उन्नत-शीलता की ओर निपतित है यदि भारत की प्रगति का सम्यक वितरण होता तो यह एक अति विकसित राष्ट होता.....

विकसित कहे जाने वाले राष्ट्र वस्तुत: प्रगति में पूर्वी है उन्नति में पश्चिमी हैं.....

एक उन्नति अरु एक प्रगति, अरु एक धूनि बिकास । 
भावारथ भिनु भाँति लहि भए सब सत्यानास ।२१८९। 
भावार्थ : -- एक शब है उन्नति एक ही प्रगति और एक शब्द है विकास यदि इनके भाव एवं अर्थ में भिन्नता आ जाए तो सब सत्यानाश हो जाता है ॥

कैसे : --

मंजुल मुख मंद मुकुलित जो मन भयउ उदास ।
किए कंठ रबि केतु कलित, ब्यापत रहे बिकास ।२१९०-क ।

बरन बरन उल्लसित भए, चहुँपुर छाए बसंत ।
प्रगत प्रभो बन बसित भए, जागे प्रेम अनंत ।२१९०-ख । 

उदया तिथि उदयत लखे, चले चरन आतूर  । 
अवनत सीसोन्नत भए, निकसे नवल अँकूर ।२१९०-ग । 
भावार्थ : - जब उदया तिथि ( सूर्योदय कल की नवल तिथि ) को उठते हुवे देखा तो प्रभू के चरण तीव्रता पूर्वक बढ़ने लगे । अधोगत उन्नति को प्राप्त हुवे उनमें नवल अंकुर प्रकट होने लगे ।  
भावार्थ : -- सुंदर मुख मंद प्रभा स्वरूप में मुकुलित हैं जो मन उदासीन थे उनके कंठ रवि कुल के केतु विभूषित हुवे तत्प्श्चात्  सर्वत्र प्रसन्नता व्यापने लगी ॥

वर्ण वर्ण आह्लादित हो उठे दिशाओं दिशाओं में वसंत छा गया ( जैसे जैसे )  प्रभु आगे बढ़ते हैं वन वसित होता  जाता ही व् अनंत प्रेम का जागरण होता है ॥

विकसित का अर्थ ही प्रसन्नचित : -- हमें प्रसन्नता चाहिए सुख चाहिए विकास चाहिए शासक न प्रगति थमा दी.....










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