मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम२१५-२१६ ॥ ----

कलुख जोनिज अजहुँ  भयउ भारत भू अधिकाए । 
जैसेउ धर्म ग्रन्थ कहि तेसेउ तिन्ह पाए ।२१५१। 
भावार्थ : - संकीर्ण विचार धारा वाले  कलुषित योनि अब भारत में अत्यधिक हो गईं हैं यह एक  शोध का विषय हैं धार्मिक ग्रंथों में जैसा वर्णन मिलता है, इनका स्वभाव वैसा ही है ॥

टिप्पणी = इन ग्रंथों में 'धर्म-संकर' शब्द युग्म  पठन में नहीं आया है इसका अर्थ है कि वैदिककाल तक अन्य किसी धर्म का प्रवर्तन नहीं हुवा था ॥

जीवंत जीव जगत का हत्यारा है कौन । 
शोक निमग्न धर अनंत, पूछ रहा धर मौन ।२१५२। 
भावार्थ : - इस जीवंत जीव-जगत का हत्यारा कौन है ? अनंत स्वरूप ईश्वर शोक निमग्न होकर मौन धारण किए प्रश्न कर रहा है ॥

निगमागम बेद पुरान जिन्हनि कहे बिकार । 
अधुनातन बिचार कहत खलजन करे प्रचार ।२१५३। 
भावार्थ : -- संकरता एक विकृति है, एक संकीर्ण विचार धारा है जो  मैं और मेरा तक ही सिमित है  ऐसा कहते हुवे वेदों पुराणों व् निगमागम ने जिस संकरता की भरपूर भर्त्सना की थी,  कुछ स्वार्थी जनों ने दुष्प्रचार कर उसे आधुनिकता कहा ॥

राजा हो चाहे रंक , हो चाहे को कंत । 
सत्कृति कृत सत्पथ चरे, होत सोए गुनवंत ।२१५४। 
भावार्थ : -- राजा हो चाहे रंक हो सेवक हो चाहे स्वामी हो । जो सत कर्म करते हुवे सन्मार्ग पर गतिवंत हो वही गुणवत्ता से युक्त होता है ॥

मानव जाति नीपजने, भारतीअ तकनीक । 
गुन  धर्म अनुवाद करे, बेद देखाए लीक ।२१५५। 
भावार्थ : -- मानव जाति की उन्नत उपज के लिए भारतीय कृषि तकनीक अति उत्तम है । यह वेदों की दिखाए मार्गानुसार सदगुणों की प्राप्ति के लिए आवश्यक स्वभाव के सूत्र का प्रतिपादन करती है ॥

रस लै  लै मृतका सरिस खावें अमिष अहार । 
साक पात फुर मूर फर  परछै बारहि बार ।२१५६। 
भावार्थ : --  मांसभक्षी  मांस-मिट्टी का रुचिपूर्वक भक्षण करते हैं ।  साक पात फूल मूल फल को वारंवार प्रक्षालित करते हैं कि इसमें कहीं मिटटी न लगी हो ।

प्रथम मंत्र : -- तो गुणवत्ता युक्त बीज-न्याय व् उपजाऊ-धरती के लिए उदर का  सद पोषण आवश्यक है ।
                      इससे व्यर्थ के दोषों से मुक्ति मिलती है.....

साक पात फुर मूर फर नसै खाद कहलाए । 
माटी का यह पूतला माटी माहि समाए ।२१५७। 
भावार्थ : -- शाक-पात फूल मूल फल यदि नष्ट होकर उर्वरक कहलाते हैं । जबकि मिटटी में मिलने वाला जीवधारी का मृत शरीर को मिटटी कहते है ॥

जीवन हुँत बिसराए के, चरजा रहे सँजोए । 
तिन बसति का कीजिये, रहे जहाँ ना कोए ।२१५५। 
भावार्थ : --  जीवन-हेतु भुला के शासन-प्रशासन जीवन-चर्या के हेतु का संकलन हो रहा है । उस बसेरे को बसा कर क्या करेंगे जहाँ हेतुरहित होकर बसेरी जीवित ही न रहे ॥

वैभवमान खान पान सुख कर तबहि  कहाए । 
अगज जगज हेरत फिरे, भूखा कोउ न पाए ।२१५६। 
भावार्थ : -- वैभववान खान-पान तभी सुखप्रद कहलाता है जब समस्त संसार में कोई भूखा न सोता हो ॥

छान छान छापन भोग, खाएँ ले ले सुवाद । 
जे तो जीव साधन है, पवाएँ जान  प्रसाद ।२१५७। 
भावार्थ : -- छान छान छप्पन भोग उड़ाए जा रहे हैं । रे मूर्ख किंचित क्षुधार्त्त का भी चिंतन कर ये भोजन तो जीवन का साधन मात्र है इसे प्रसाद मानकर ग्रहण करना चाहिए ॥

छुधातुर को भोजन दे तिसित कठ जल दान । 
जीव जगत के हंतृ कू, दंड सहि दे ग्यान ।२१५८। 
भावार्थ : -- क्षुधा- पीड़ित को भोजन, पिपासार्त को पयसन देना चाहिए ।  जीव जगत का जो हत्यारा हो उसे दंड सहित ज्ञान देना चाहिए ।।

माथत्रिपुण्ड सीस मुंड, को धरे लमनि केस । 
कपट भेष दे रहे बर पीठ बैठ उपदेस ।२१५९। 
भावार्थ : - माथे में त्रिपुण्ड शीश मुंडाए कोई लम्बे लम्बे केश धरे ही । भँडरिया वरासन में विराज के उपदेश दे रहे हैं ॥

साँच कहना सरल भया करना भया दुरूह । 
साँचा अजहुँ एकल भया, झूठे के सौ जूह ।२१६०। 
भावार्थ : -- यह सत्य है कि सत्य अलापना सरल हो गया, सत्यंकार कठिन हो गया ॥ कारण  की सत्यानुरक्त अधुनातन एकाकी हैं मृषावादी समूहों में संगठित  है । और एकता में ही शक्ति होती है ॥

मैं सदा सर्वदा सत्य ही कहता हूँ -- यह झूठ है,
में सदैव सत्य नहीं कहता  -- यह सत्य है,
मेरा कहा झूठा हो जाता है -- यह सत्यानृत है अर्थात असत्य  व्  सत्य का घालमेल है, माने की लेन -देन है

जिसके लिए कहे वचन को सत्य करना कठिन हो वह  ऊँचे आसन, सिंहासन के योग्य नहीं होता.....

जन जन हरिजन सिरु धरे दिएँ सम्मान बहूत । 
तिन महामन हेतु अजहुँ सो जन भयउ अछूत ।२१६१ । 
भावार्थ : -- जिस जनता जनार्दन ने अछूतों को मान दिया, सम्मान दिया, अपने शीश पर धारण किया । उन पूज्यनीय महंतो हेतु अब वही जनता अछूत हो गई है ॥

राजू : -- ठीक बिलकुल ठीक ! ढूंडते रहो अब इनको सूचना के अधिकारों में.....ये वारंवार आरक्षण  का लाभ लेते रहे अपने जनों को ही इन्होने अवसर नहीं दिया.....तो दूसरा कौन देगा.....?

ब्रम्हा सदन बिराज के , भयउ न ब्रम्हन कोए । 
ब्रम्ह भाव संग हित किए, सोइ  ब्रम्ह पद जोए  ।२१६२। 
भावार्थ : -- ब्रम्हा के सदन में विराजित होने भर से कोई ब्रम्हा नहीं होता । जो शुद्ध चैतन्यस्वरूप ज्ञान की प्राप्ति कर उससे जगत का कल्याण करे वही ब्रम्ह-पद के योग्य होता है ॥

देस मह एक देस नवल, वाके देसाचार ।
अमरत है कि गरली है, संविधान के सार ।२१६३।
भावार्थ : - भारत देश में एक नया देश खोजा गया वह है इंडिया । जैसे वेदों का सार भगवान विष्णु हैं वैसे ही यह  इंडिया एवं इसके आचार-विचार विष है या अमृत जो भी है यही संविधान का सार हैं ।।

 यह शोध का विषय है कि  इंडिया व् इसके आचार-विचार विष हैं या अमृत.....

जीव साधन जीवन धन भारत भू उपजाए । 
नवल देस के निबासी, बैठे बैठे खाए ।२१६४। 
भावार्थ : -- जीव-साधन हो थ्व जीवन -धन उसका उत्पादक भारत है । । यह जो नवल देश इंडिया है  न यह अन्न उपजाता न साधन बस इन्हें बैठे बैठे खाता है ॥

देस मैं एक नवल देस, भोगे बिषय अतीउ । 
कौन इहाँ के निबासी, कहाँ इहाँ की सींउ ।२१६५। 
भावार्थ : -भारत  देश के भीतर एक नया देश खोज गया वो है इण्डिया जो  भोग वादी है ( अर्थात खाओ पियो और मजे करो का सिद्धांत ) इसके निवासी कौन हैं.....?  इस इण्डिया की सीमाएं कहाँ हैं.....?


यह इंडिया ९०% से अधिक विमान सेवाओं का सेवन करता है  कितना ईंधन लगता है इन विमानन सेवाओं में..? इनको छूट कितनी मिलती है.... शासक-गण स्पष्ट करें.....

देस नवल भवन हैं तो बस्तु कार है कौन । 
प्रष्टा बहुरि प्रस्न  करै, संपादक है मौन ।२१६६। 
भावार्थ : - यदि यह नया देश 'इंडिया' एक भवन है तो इसका वास्तुकार कौन है.....? प्रश्नकर्त्ता वारंवार प्रश्न पूछ रहा है किन्तु भवन-संपादक मौन धारण किए है ॥

धर्म जाति अवमान किए, बोले ऊँचे बोल । 
धर्म जाति निठ चरन सन, तासु चरन को तोल ।२१६७। 
भावार्थ : -- जो धर्म-जाति की अवमानना करते हैं वही धर्म-जाति के ठिकादार बने हैं और तत्सम्बन्ध में बड़ी बड़ी बाते करते हैं । किंचित इनके आचरण से धर्म-जाति निष्ठ के आचरण का तुलनात्मक अध्ययन करें  ( इनका भेद प्रकट हो जाएगा ) ॥

पुरातन हो कि धुनातन, जोइ होत दृढ वान । 
सोइ जीवन साधन धन, पाए सकल घर मान ।२१६८। 
भावार्थ : --  पुरानी हो की नई हो वस्तु हो विचार हो व्यक्ति हो चाहे कोई हो जो दृढ होता है  घरों में वही सम्मान पाता है,  प्राय: पुरानी वस्तुएं अधिक टिकाऊ होती हैं ।।

नया नौ दिन पुराना सौ दिन.....

उजरे सँग अँधेर पाख, धूप संग जस छाइ । 
भले बुरे का संग किए, यह मानस की काइ ।२१७० । 
भावार्थ : -- शुक्ल पक्ष के संग कृष्ण पक्ष जैसे धूप के संग छाया होती ही । वैसे ही यह मनुष्य शरीर भी गुण दोषों से युक्त होता है किन्तु 'समरथ नहीं कछु दोष गोसाईं' । और दोष भी गुण बन जते हैं जैसे: नलनील का समुद्र में पत्थर फैंकना उनकी उद्दंडता थी जो कालांतर में यह उद्दंडता गुण बन गई ॥ 

कसिपु मुनिबर अदिति मातु, जन्में एक अपवाद । 
अपवादी सन जनम लिए, परम भगत प्रह्लाद ।२१६९ । 
भावार्थ : -- मुनिवरकश्यप व् देवमाता द्वारा एक अपवाद हिरण्य कश्यप का जन्म हुवा  फिर इस अपवद से परम भक्त प्रह्लाद ने जन्म लिया ॥ 

 "अपवाद एक चमत्कारिक क्रिया है जो सामान्यत: नहीं होती , इसलिए अपवाद कभी दृष्टान्त नहीं होता......"

भारत देस जुगावने केत मधुर संबंध । 
एहि हुँत जग बिख्यात है वाके गेह प्रबंध ।२१७० । 
भावार्थ : -- भारत ऐसा देश है जो न जाने कितने मधुर संबंधों को संजोए है ( जैसे गेही गृहणी दादा दादी माता पिता चाचा बुआ मामा जीजा आदि आदि (कभी सुना है मामा नाना नानी जीजा साली साला और किसी देश में ) इसी लिए इसका गृह-प्रबंध विश्व भर में विख्यात है ॥ 















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----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...