गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम२१४॥ ----

सासक दल के इतिहास, जस सद मुख उद्भास । 
भरत के पावन भूमि, अहहै एहि इतिहास।२१४१ । 
भावार्थ : -यहाँ जितने भी चुनावी दल हैं इनके सदस्यों का मुख जो कह दे वही इतिहास है । किन्तु भारत की इस पावन भूमि का यही इतिहास है ॥ 

उदर परायन आपने, माने धर्म न जात । 
धर्म परायन हुँत करैं ऊँची ऊँची बात ।२१४२। 
भावार्थ : -  अपने पेट के परायण  होकर धर्म और जाति को नहीं मानने वाले,  अपनी स्थिति में स्थिर रहने वाले धर्म व् जाति-निष्ठ जनों के लिए ऊँची ऊंची बात करते हैं, उपदेश देते हैं, बुद्धि भी सिखाते हैं । यहाँ मंदीर बनेगा यहाँ मस्जिद बनेगी ॥ 

बियाहन में एहि कारन बर्जित हैं सम गोत । 
बंसागत सो होइहीँ, एकै दीप के जोत ।२१४३।  
भावार्थ : - विवाह में समान गोत्र इस हेतु वर्जित किया गया हैं कि विवाह्य एक ही वंस कृत के उद्भव होते हुवे एक ही कुल दीपक के ज्योति होते हैं अर्थात समान गोत्र का अर्थ है उनका मूल पितृपुरुष एक ही है । 

कोउ खात फुल फल पात, कोउ हाथ अरु लात । 
जुगीरा जिउ जोरन मैं, होत सकल उत्पात  ।२१४४। 

भावार्थ : -- कोई फूल, कोई फल कोई केवल पत्र  खा रहा है, कोई उत्खात कर हाथ व् लात खा रहा है । साधू ! जीवन- हेतु ही ये समस्त उत्पात होते हैं ॥ 

जी अधार जीवात्मन ,जीउ अधार अहार । 
आहार अधारे जीउति, जीउति करम अधार ।२१४५। 

भावार्थ : -- जीवन जीवात्मन पर, जीव जीवातु पर, जीवातु जीवति पर, जीवति कर्म पर अधिष्ठित है ॥ 

जी = जीवन 
जीवात्मन = व्यष्टि आत्मा 
जीवातु = आहार 
जीवति = आजीविका 


जीव साधन उदर भरे चरजा करे पुकार । 
अधिकाधिक की लाह मेँ,बिगड़े देसाचार ।२१४६। 
भावार्थ : -- जीव शाधन से उर संतुष्ट हो तो जीवन-चर्या आह्वान करती है । अधिकाधिक की लिप्सा से आचार-विचार विकृत हो जाते हैं ॥ 

विचार वां होने के लिए लिप्सा का त्याग आवश्यक  है 

पहले भोजन फिर बसन फिर भवन फिर भजन..... 
को जीवक जीबिका 
को जीउ साधन सँजोग  । 
को हिंसालु हिंसा रत,  भव भूमि रहे भोग ।२१४७ । 
भावार्थ : --कोई ब्याज काटने वाला जीविका दबाए बैठा है,  कोई जीवन जीवनक को संग्रह किए बैठा है । नाश,घात, हत्या, क्षति,लूट, चोरी आदि दुष्कृत्यों में कोई अनुरक्त होकर हिंसावादी संसार के सुख-ऐश्वर्यों  उपभोग कर रहा  है  ॥ 

ऐसे कृत्यों से परिवार का पालन-पोषण करने वाले की आनेवाली संतानें क्या महात्मा होंगी.....?   

जग कारन ईस जद्यपि, सबहि जीबी जनाए । 
जो जनिक जो सँजोए जनिमन सोइ सुवारस पाए ।२१४८। 
भावार्थ : -- समस्त जीवों की उत्पत्ति यद्यपि सृष्टि के कारण रूप ईश्वर से ही होती है । तथापि जन्म दाता मात-पिता संग पूर्वजों के जो स्वारस्य होते हैं संततियों में भी वही स्वारस्य हस्तांतरित होते जाते हैं ॥ 

इस हेतु ऐसा कोई दुर्गुण उत्पन्न नहीं करना चहिए जिससे की वह वंशानुगत हस्तांतरित हो 

स्वारस्य = स्वाभाविक प्रकृति 


अंतर सदन सँभार किए संकलित सद विचार । 
सँभरे सदन संग होत बाहिर के सिंगार ।२१४९ । 
भावार्थ : -- संकलित सद्विचार अंतर जगत को व्यवस्थित करते हैं व्यवस्थित अंतर जगत ही जगत को व्यवथित करने में सक्षम होता है ॥ 


बाह्य जगत :-आचार-व्यवहार 



सर्बसस स्वीकरनीअ सोई फेर फिरान । 
अपने सन जो सर्वथा होत हेतु कल्यान ।२१५०। 
भावार्थ : -- वही परिवर्तन सर्वश: स्वीकार योग्य है जो चराचर जगत सहित स्वयं हेतु सर्वथा कल्याणकारी हो ॥ 










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