बुधवार, 31 दिसंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २२२ ॥ -----


तनिक काल पहिले रहै भारत देस अखंड । 
उपनिबेसित देस संग, भयऊ खंडहि खंड ।२२२१। 
भावार्थ : -- किंचित समय पूर्व तक यह राष्ट्र अखंड-भारत कहलाता था । पराए देश से आए लोगों की बस्तियां बसाते बसाते यह खंड-खंड हो गया ॥

को लूटक लूमरे को साधु भेष भर आए । 
लूट के सिँहासन चढ़े, लूट पाट के खाए ।२२२२। 
भावार्थ : - पराए कौन ? सज्जनता के वेश वे जो डाकू थे लूटेरे थे जिन्होंने यहां के मंदिरों को नहीं छोड़ा । वे लूट के सिंहासन पर चढ़े व् यहां के शांतिप्रिय लोगों को यंत्रणाएं दे दे कर उनका धन छीन-छीन कर खाते रहे ॥

उपनिबेसी देसी भए , भारत भयऊ सेष । 
लज्जाहीन परदेसी, बसे रहे एहि देस ।२२२३। 
भावार्थ : -- उपनिवेश प्रणाली का यही उद्देश्य था कि प्रवासियों की पृथक वसति हो । किन्तु शासकों ने छल किया  उपनिवेशी को मतदान  का अधिकार दे कर उसे देशज घोषित कर दिया ।  उपनिवेश तो बसे  किन्तु ये तथाकथित देशज यहाँ से गए नहीं यहीं बसे रहे ॥ परिणाम यह हुवा कि उपनिवेश प्रणाली असफल सिद्ध हुई । वर्त्तमान में यदि अन्य किसी राष्ट्र के समक्ष यह समस्या है तो उसे प्रवासियों को उनके ही देश में लौटाना चाहिए ॥

सुजलय सुफलय मलय भुइँ ससि स्यामल सँजोए  ।
देस बनाया कोए अरु, बास बसाया कोए ।२२२४। 
भावार्थ : - तप करके, त्याग करके, सत्य के मार्ग पर चलते हुवे, प्राणी मात्र पर दया करते यहाँ के देशजों ने इस सुजलम  सुफलम् व् मलय पर्वत सी इस पावन भूमि को ( नदी-बहुल फलवती व् अनपूर्णा भूमि जहां गौधन का संकलन हो  )  एक राष्ट्र का स्वरूप दिया । उसपर बस्ती किसी और ने बसा ली ॥

देस दिए धन धान्य दिए, तापर किए उत्पात । 
निस दिन सीवाँ काँड़ कै, दिखाए अपनी ज़ात ।२२२५। 
भावार्थ : -- इन उपनिवेशी को भारत ने देश दिया धन दिया धान्य दिया और ये नित्य उत्पात करते हैं । ऐसा  कोई दिन नहीं है जब इन्होने इस देश की सीमाओं का अतिक्रमण कर अपनी जात दिखाते रहते हैं ॥

पकी पकाई मेलिबै, ताते श्रम ना होए । 
अपने बिसने बिसराए,दूजे बसने जोए ।२२२६।
भावार्थ : -- पकी पकाई जिसको मिल फिर उससे परिश्रम नहीं होता । अपना पतन अपना दुर्व्यसन अपना दुर्भाग्य पाने दोष पने अपराधों को विस्मृत कर  दूसरों के वेश को अपना वेश कहते हैं दूसरों की संस्कृति को अपनी संस्कृति कहते हैं, हम तो पता नहीं कौन थे क्या हो गए और क्या होंगें अभी, ये कुलीन हो गए ॥ 


पेट पराया पूरता पुआ पकाया कोए ।
कोउ मचाया हगनेटि, कोउ मैल मल धोए ।२२२७ । 
भावार्थ : -- पराए पेटों को भरने के लिए पुआ पकाया किसी ने खा खा के हगन हटी ( अत्यधिक मात्रा में  व्युत्पन्न होना ) मचाई किसी ने मैल धोया किसी ने । उपनिवेशियों को किसान पुकारा गया हो उन्होंने मैल धोया है ऐसा किसी ने कहीं सूना अथवा कहीं पढ़ा.....? 

हो जो कोइ आपना कि कोइ पराया होए । 
ऐसो कारज कीजिये, जिन चाहै सब कोए ।२२२८। 
भावार्थ : -- अपना देश हो कि पराया देश हो ऐसे कार्य करने चाहिए जिसे सभी चाहें । क्योकि इस देश में धर्मात्मा का सम्मान नहीं होता अपितु उनकी पूजा होती है..... 

अमौलिक को मूल करे  पोष दिए खाद्यान  । 
अमरत अम्ल मिलाई के, अम्लिन करे मलान ।२२२९ । 
भावार्थ : -- इस राष्ट्र ने अमौलिक उपनिवेशियों को मौलिक कहा उसे खंड-खाद्यान देकर उसका पोषण किया । और इसने अमृत को मलिन करते हुवे उसी राष्ट्र की पवित्रता को अपवित्र किया ॥ 

बसा बसति बसबासिआ,तिनका तिनका जोए । 
बसा बसेरा बिनसिआ, तिनका तिनका होए ।२२३० । 
भावार्थ : - बसेरी ने तिनका तिनका एकत्र कर बसेरा बसाया  । इनकी करनी बसा बसेरा उजड़ कर पुनश्च तिनका तिनका हो गया अथवा तीन भाग में विभाजित होकर तिसरैत का हो गया ॥ 












मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २२०-२२१॥ -----

धूनि कर धूनि कलित किए , भावारथ भिनु भाँति ।
अस धूनि संग प्रचरिते, बहुतक भरमन भ्राँति । २२०१।
भावार्थ : -- शब्दकार ने शब्द की रचना की किन्तु उसके भाव एवं अर्थ में भिन्नता है । ऐसे शब्द अथवा शब्द- युग्म के संदर्भ में भ्रम व् भ्रांतियां प्रचलित हो जाती हैं ॥

इसलिए : --  शब्द के अर्थ व् भाव में एकरूपता होनी चाहिए अन्यथा उसके संदर्भ में कई प्रकार की भाँतियां प्रचलित हो जाती हैं ।

सासन जग जन घन भयो, भया न को गुनवंत । 
नेम नियोजन जोग कै, तिन्हनि करौ नियंत ।२२०२। 
भावार्थ : -- हे शासन ! यह  धरती जन-मानस से संकुलित हो गई है ।  यदि उसमें गुणवत्ता नहीं है तो नियम व् नियोजन के योग से उसे नियंत्रित करना चाहिए ॥

नियम : -- 

>> वयस्कता अधिनियम
>>विवाहेतर संबंधों पर निषेध ।   ऐसे संबंधों से व्युत्पन्न संतति  का दायित्व मात-पिता पर नहीं होता परिणामत: उसके गुणों का निर्धारण जटिल हो जाता है ॥
>> बाल संबंधों पर निषेध । ऐसे संबंधों से यदि संतान हो जाए तो ? कौन पालेगा ?राष्ट्र के राष्ट्रपति या राष्ट्र के प्रधानमंत्री ? या राजा ? पहले तो कुणबा पाल देता था, और रोग भी नहीं होते थे कारण ? वे पवित्र सम्बन्ध थे और घर का घी खाते थे अब अपवित्र-संबंध उसपर काले पीले द्रव्य बाला बचपन रोगी हो जाए तो कोई उपचार न हो तो बहुंत से तो हैं.....

तत्पश्चात परिवार नियोजन : -- परिवार तो है ही नहीं, जब परिवार नहीं होगा तो कुल-कुटुंब भी नहीं होगा, कुल -कुटुंब नहीं होने से सद्गुणों नहीं होगें व् संतति प्रेम व् स्नेह से वंचित होगी ॥ मात पिता में ममत्व हो बालक को कुल-कुटुंब मिले इस हेतु परिपूर्ण धर्म की आवश्यकता होती है.....

पूर्वकाल में भारत का सामाजिक परिदृश्य : -- 

एक नारि संग एक पुरुख, परिनय सूत सँजोग ।
अभिजात बरग महु सोए, कुटुम कहन के जोग ।२२०३। 
भावार्थ : - एक नारी व् एक पुरुष का सम्यक एवं परस्पर सुसम्बन्ध जो  एक पारिवारिक ईकाई का निर्माण करता हो अभिजात्य वर्ग में कुटुंब कहलाता है ॥

सद्चरित जहँ बासन हों भूषण हो जहँ लाज । 
अस कौटुम संजुत रचे एक अभिजात समाज ।२१९४।  २२०४ 
भावार्थ : -- सद्चरित्र जिसके वस्त्र हों ( सद्कर्म सद्चरित्र के निर्माण में सहायक होते हैं )  व् लज्जा जिसके आभूषण हों ( जैसे ऐसा-वैसा किया तो लोग क्या कहेंगे यह भय हो ) ऐसे कौटुम्ब संयुक्त स्वरूप में एक अभिजात्य समाज का निर्माण करते हैं ॥


" मानव शरीर चमत्कारिक इन्द्रियों 
  (ज्ञानेन्द्रिय: दृश्य, श्रव्य, गंध, स्वाद, स्पर्श;
  कर्मेन्द्रिय: कर, पद, वाक्, गुदा, उपस्थ ) 
  का स्वामी है, बुद्धि की अनंत सीमा 
  के वशीभूत परम शक्तिशाली है,
  इसे नीति-नियमों के निबद्ध से 
  आबद्ध करना अत्यंत आवश्यक है.."

अबुध कि लच्छन हीन हो, धनि हो चाहे दीन । 
नीति सुरीति संग बँधे, कौटुम होत कुलीन ।२१९५। २२०५  
भावार्थ : -- अबोध हो कि गुणहीन हो धनवंत हो चाहे दीन हो । एक कुटुंब उत्तम नियमों एवं सुंदर रीतियों के संग सम्बद्ध होकर कुलीन होता जाता है। जैसे : --  कुटुंब की  नारी अथवा पुरुष विवाह से पूर्व ब्रम्हचर्य का पालन करेंगे, रक्त सबंध स्थापित नहीं होंगे कारन कि इससे रक्त-विकार होता है व् घर की नारियां घर में ही असुरक्षित होती हैं ॥ 


नर नारी जोग जुगाए दोउ रचत परिबारु  । 
समुदाय पुनि समाज भए, परिबारु समाहार ।१५७६। २२०६ 
भावार्थ : -- " स्त्री-पुरुष के सम्यक एवं पारस्परिक सु-सम्बन्ध पारिवारिक इकाई का निर्माण करते है.."परिवारों के समाहार से समुदाय एवं समाज  निर्मित होता है ॥ 

" स्त्री-पुरुष के सम्यक एवं पारस्परिक सु-सम्बन्ध पारिवारिक इकाई का निर्माण करते है.."

" पारिवारिक जातकों द्वारा जाति- का निर्माण होता है.."

" अभिन्न जाति एकात्म समाज का पर्याय है.."

" जातियों का समष्टिकरण समाज को निर्मित करता है.."

" समवेत समाज एकीकृत राष्ट्र के निर्माण के द्योतक है.."

इस प्रकार एक राष्ट्र का निर्माण होता है.....

"  पिता पुत्र व् पौत्रों के परिवार का समूह एक संयुक्त परिवार का निर्माण करते हैं....."



पहिले संजुग कुटुम रहि सबके एकै निधान । 
पाछिन के प्रभाव संग अजहुँ भयउ अवदान ।२१९७।   २२०७ 
भावार्थ : -- विभाजन से पूर्व एवं पश्चात व् धुनातन समय तक भारतीय कुटुंब संयुक्त स्वरूप का होता था कुटुंब के सदस्यों का एक ही धन कोष होता था /है जिसमें किंचन व् अकिंचन सभी किंचित में ही पल जाते थे /हैं । ऐसा माना जाता है कि पाश्चात्य प्रभाव से यह कुटुंब विभाजित हो गए ॥ 

 प्रश्न है कि यह पाश्चात्य प्रभाव औचक उत्पन्न कैसे हुवा.....क्यों हुवा .....? 

दुःख सुख मैं सहाए बने  करे संग सब काज । 
पहिले संजुग कुटुम सम  रहहीं गाँव समाज ।२१९८। २२०८ 
भावार्थ : - विभाजन के पूर्व भरत के गांव- समाज एक संयुक्त कुटुंब के सदृश्य होता था जो दुःख सुख में सहायक होकर सभी जनोपयोगी कार्य मिलबांट कर करता था ॥ 

गाँव जात जाता रहैं  भगिनी भ्रात  समान । 
दावैं कनिआँ आपनी, अंतर बर कर दान ।२१९९ । २२०९ 
भावार्थ : - ग्राम-संघटन इतना पवित्र कि ग्राम-जातको में परस्पर भ्राता -भगिनी का सा संबंध होता । वे ग्राम वासी अपनी कन्या व् कुमार का विवाह भी अन्यत्र किसी ग्राम में करते ॥ 

पुरब समऊ अधम बरन, रहहीं दीन दुखारि । 

पुरुख सबहि धिकार गहै बंधन में रहि नारि ।२२०० । २२१० 
भावार्थ : --  कर्म एवं वैचारिक आधार पर भारतीय समाज चार वर्णों में भाजित था जिसमें चतुर्थ वर्ण दैन्य स्थिति में दुर्दशा से ग्रस्त था । पुरुषों को सर्व अधिकार प्राप्त थे नारियां इनके बंधन में थी ॥ 

----- ॥ दोहा-दशम २२१॥ -----

देस जमन जब राज किए, सहस बरस रहि काल । 
अन्न सन बिद्या धन के, बहोरि परै अकाल ।२२११  ।
भावार्थ : -- वह समय लगभग एक सहस्त्र वर्ष का था जब इस राष्ट्र की सत्ता यवनों को हस्तांतरित हो गई ॥ फिर तो अन्न धन व् विद्या का आकाल हो गया । कभी जिसे सोने की चिड़िया की उपाधि प्राप्त थी वह अब भिखारियों व् सांप-सपेरों का देश कहलाने लगा इस धरती का ये रक्त पीने लग गए ॥

रीति नीति नय भारती, बेद बिहित सब होइ । 
पुरब काल सों अजहुँ लग, फेर फिरे ना कोइ ।२२१२। 
भावार्थ : - भारत देश की रीतियाँ नीतियां समाज धर्म का आधार वेद ही थे व् हैं । पूर्व काल से लेकर यवन के शासन काल तक ( अपवाद को छोड़ कर )  इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुवा था ॥

बहोरि अयनिक बाहरी आए इहाँ जो कोइ । 
सुधार गेह बसाए के, सबहि सुधारक होइ । २२१३।  
भावार्थ : -- फिर तो यमन सहित जिस किसी बाहरी घुमक्कड़ का आगमन हुवा उसने जैसे यहाँ सुधर घर ही बसा लिया और समाज सुधारक हो गए ॥ 

बिगड़ी दीठि न आपनी, औरन देई सीख । 
जो अच्छराकृति कृत किए, तिन्हनि कहि ले लीख ।२२१ ४। 
भावार्थ : -- इन्हें अपनी विकृतियां दर्शित नहीं हुई और दूसरों के विकार को सुधारने निकल पड़े । जिसने ॐ अक्षर से अक्षर आकृति का प्रादुर्भाव किया उन्हीं को ये पढ़ाने लगे कैसे  ये अ है ये आ है इसको अलिफ़ बे बोलते हैं ॥

पढ़े चहुँपुर के आखरी, जो गुन गुने न ऐक । 
अग जग लग कहते फिरै, हमहीं जगत प्रबेक ।२२१ ५।  
भावार्थ : --  आंग्ल भाषी कहा जाता है कि इनके साम्राज्य का सूर्य कभी अस्त नहीं होता था जितनी पढ़ाई थी ये पढ़कर आए । पढ़े किन्तु न ज्ञान ग्रहण किए न कोई शिक्षा ही ली न इनको ज्ञान आता न बिज्ञान और शूकर खाने वाले ( सेक्स पियर ने लिखा है ) कहते फिरते हैं  हम जगत-श्रेष्ठ हैं ॥ और जो वे संस्कृत विद्यालय खोल के बैठे हैं इन्हें अब जा के  समझ आया कि यह कोहिनूर तो पत्थर है ॥

मातु भुइँ भई प्रतिसरा, मर मर गयउ बहूत । 
प्रतिसर के हविर् हुति बन, जीवन किए आहूत ।२२१६। 
भावार्थ : - मातृ भूमि दासी बन गई ।  स्वतंत्रता  के हवन कुण्ड की हुति बनकर जीवन को आहूत कर न जाने कितनों ने उसपर प्राण  न्यौछावर कर दिए ॥

दिए कोए एक चिनगारी, लगी देस महु आग । 
लिखि बीच एक रेख खँचे, भयऊ दोई भाग ।२२१७। 
भावार्थ : -- फिर न जाने किसने चिंगारी दिखाई, हिंसा की ज्वाला भड़क उठी । देश के बीचोबीच एक रेखा खींची गई और उसके दो भाग हो गए । ।

फिर  का हुवा ?

रागे रागिनी आपनी, अपने सुर दे तान ।
पोल ढोल बजाय के रचे एक संविधान । २२१८।
भावार्थ : -- अपनी ही रागिनी राग ( इनके छ सौ थे ) के अपने ही सप्तसुर ध र म नि र पे क्ष को तान देकर  अपने अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर एक संविधान रचा गया जो ढोल में पोल है ॥

बिगड़े कुल के धारिता भए सिँहासनासीन । 
देस सब का कलुष किए, भए सब आप कुलीन ।२२१९ । 
भावार्थ : --  बिगड़े हुवे कुल के धारिता सिंहासन पर आसीन हुवे ये  देश के भूत वर्तमान व् भविष्य का मुख मलिन (अपवित्र ) करते गए स्वयं कुलीन ( पवित्र ) होते गए ॥

फिर तो सिँहासन पर बिराजित भए ब्याज । 
परमारथ सब काज किए किए सुवारथ राज । २२२०। 
भावार्थ : -- तदनन्तर सिहासन पर छल-कपट विराजित हो गया परमार्थ कार्यकर्त्ता रहा स्वार्थ राज करता रहा ॥



















सोमवार, 29 दिसंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २१९ ॥ -----

नेता जी की ढंढसी, नेता जी के ढंग । 
पल माहि यूं फेर फिरै, जूँ गिरगिट के रंग । २१९१ । 
भावार्थ : - नेताओं का  कपट वेश व् उनका चाल-चलन ऐसे परिवर्तित होता ही जैसे गिरगिट का रंग ॥ 


पड़के चारिन आखरी, अभरे ऊंची बानि । 

समझ ग्यानि आप कू किए सो अपनी हानि ।२१९२।
 भावार्थ : - चार अक्षर पड़के उत्तम वस्त्र धारण करके अंग्रेज स्वयं को ज्ञानी समझते थे किन्तु डेढ़ सौ वर्ष में उन्होंने कुछ भी नहीं सीखा अपनी ही हानि की ॥ कौन कहता था जाति-धर्म कुछ नहीं है यही जेनेटिक इंजीन्यरिंग है ॥  

दूसरों की हानि करने से अपनी भी हानि ही होती है, लाभ नहीं होता..... 


जीवन धन हो कि साधन देइ जोग सब दान । 
 कुल मर्यादा आपनी, होत अदायनबान ।२१९३ । 
भावार्थ : -- जीवन धन एवं साधन  दान के विषय हैं । किन्तु अपने कुल की मर्यादा अदातव्य होती है अर्थात वह दान का विषय नहीं है ॥ 

सीख पराई सीख कै, गढ़ गढ़ छबि दिखलाएँ । 
बंस बिगाड़े आपुना, तिनकी सिख में आए ।२१९४। 
भावार्थ : - अपनी उत्तम शिक्षा को त्याग, परायों की अधम सीख को ग्रहण कर छबि गढ़ गढ़ के दिखाने वालों की सिख में जो आएगा वह अपना कुल अपना वंश अपने घर का सत्यानाश करेगा ।। 

चिउँटी पग घुंघरू बजे भगवन देइ सुनाए । 
इच्छा चारि सुने नहीं, कानन जा कहि आए ।२१९५। 
 भावार्थ : - चींटी के पग घुंघरू बजे भगवान तो वह भी सुन लेते हैं क्योंकि यह रामराज है । स्वेछाचारी के कान में भी कोई जा कहे तो भी सुनाई न दे ॥ 

निजोजन नियमन जोजना, नीति नियम को जोग । 
हरित पीट पट गाँठ कै, जन हित संग सँजोग ।२१९६ । 
भावार्थ : -- नियोजन, नियंत्रण, योजना, नीति व् नियम के योग  को हरित व् पीत पट से गठन कर जन हित के साथ संयोजित करना चाहिए ॥ 

ध्यान रहे कि बाराती जो हैं वही हो बाजा  न हो तो अच्छा है हम लोग हैं न  पीना-खाना न हो खाने-पीने के स्थान पर भंडारा हो.....

हरी भरी धरती रहे, जन जन मुख हरियाए । 
न तरु कलुषित धूम संग, मंद बिभौता छाए ।२१९७ । 
भावार्थ : - हरियाली प्रसन्नता की प्रतीक है हरी भरी धरती से ही जन जन के मुख पर प्रसन्नता का वास होता है। अन्यथा काले धुवें के संग वही प्रसन्नता दरिद्रता में परिणित होकर मुख को उदासीन कर देती है॥ 

जन कर खन धन कोष लए मंद विभौ को सोष । 
गगन मलिन मुख प्रभा किए सासन कलि को पोष ।२१९८। 
भावार्थ : -- सद-सम्पन्न जन का धन संकलन कर, खनिज सम्पद को व्यपहरण कर निर्धन जन का शोषण कर दूषण संग प्रदूषण कर शासन ही दुष्ट कलाओं से युक्त कल का पोषण कर रहा है ॥ 

सासन कर बाँध बँधाए, हल मारग किए सोष । 
कल के कलुषित कला हुँत, मोचित किए सब कोष ।२१ ९९ । 
भावार्थ : -- कर हो अथवा जलकर हो सारे बांध  शासन के नियंत्रण में हैं, हल मार्ग को तो  वह सुखा किए है याचना करने पर भी पानी नहीं देता, और  उद्योग पतियों के कलुषित कलाओं से युक्त कल के लिए इसने सारे कोष मुक्त कर दिए हैं ॥ 

 "अब देश का भंडार देश के लिए योजित न होकर किसान की धरती हड़पने के लिए उद्योग पतियों के घरों में जाएगा "

सो जन जग हुँत श्राप सम जिनके एकै अलाप । 
करता भया को निंदिए, करिए नहि किछु आप ।२२०० ।  
 भावार्थ : -- संसार हेतु वे लोग कलंक स्वरूप हैं जिनका एक ही अलाप है कि करता हुवा की निंदा करो स्वयं भी कुछ मत करो ॥ 





----- मिनिस्टर राजू १५८ -----

राजू ! ये बता इस आत्महत्या की जात क्या है..,

राजू : -- मास्टर जी ! मुझे क्या पता मैं विधि का विद्यार्थी थोड़े न हूँ..,

" संविधान लागू हुवे पैसठ बरस हो गए ये सत्तर बार जात बदल चुकी है कभी ये पाप हो जाती है कभी पुण्य हो जाती है एक बार तो लिखते लिखते हो गई थी..,

राजू : -- मास्टर जी ! फिर का हुवा

" फिर का  होना था किताबी कीड़े अटक गए साठ प्रतिसत से नीचे वाले निकल लिए.....

राजू : -- मास्टर जी ! आप तो निकले हुवे महादेव निकले.....

" अब ये बता खाली बैठा बनिया क्या करता है..?

राजू : -- मास्टर जी ! इदर के बर्तन उदर करता है..?
" अच्छा ! जो बणा हुवा बणिया खाली हो तो.."

राजू : -- मास्टर जी ! इदर के बर्तन इदर और उदर के उदर करता है.....

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

----- मिनिस्टर राजू १५७ -----

राजू ! शासकों ने घूस घपलों घोटालों को 'दवा- दारू' बणा दिया

राजू :-- वो कैसे मास्टर जी ?

 "जहाँ भी जाता हूँ लोग कहते हैं ये क्या हाल बणा रखा है कुछ लेते क्यूँ नहीं....."

एक बात बता जो संसद छबि गृह है जहां पहले 'जिस देस में गंगा बहती है" दिखाई गई यदि  मध्यांतर में गंगा मैली दिखाई जाएगी ( भई सूटिंग चल री है न ) तो अंत में क्या दिखेगा..?

राजू : -- मास्टर जी ! "आ अब लौट चले"

"हाआआआआ तेरा सनीमा ज्ञान तो बहूँत है.....' 

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम २१८ ॥ -----

उत्खादन सन प्रगति के गति गहेऊ अतीउ । 
मानस पार गमन करे अजहुँ समय के सींउ ।२१८१ । 
भावार्थ : -- उत्खादन के संग प्रगति की गति इतनी अधिक व अस्मयक हो गई है कि मानव जाति समय की सीमाओं को लांघ गई है जिससे जीव-जगत कहीं पीछे छूट गया है व् पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो गया है इसके गंभीर दुष्परिणाम भुगतने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए 

टिप्पणी ==युगों युगों से संचित ऊर्जा को हमने कुछ वर्षों में ही दूह लिया है, हम तो कुटिया में भी रह लेंगे  दो कपड़ों में एक समय का भोजन कर के रह लेंगे.....तुम्हारी तुम जानो..... 

 उत्पतन बिसराए पथिक आगिन आगिन बाढ़ि । 
उत्पथ चरन बढ़ाए के भयऊ सकल पिछाढ़ि ।२१८२। 


भावार्थ : -- उन्नति को विस्मृत कर प्रगति की ओर बढ़ने वाले भटके पंथी । यदि तुम ऐसे चरण बढ़ाते रहे तो शेष सब कुछ पीछे छूटता जाएगा ॥ 

प्रगति व् उन्नति का समन्वय करे तभी चराचर भी संग होगा जब चराचर संग होगा तभी हम समय के संग हैं चराचर यदि आगे है तो हम समय से पीछे चल रहे हैं रामायण युग में चराचर आगे था..... मनुष्य जाति पर संकट था फिर रामा-सेतु की रचना हुई ॥ 


कल न जाने का बीते, रहे जान का नीति । 
बीती सुमिरत आपनी, सुरत रहे सब रीति ।२१८३। 

भावार्थ : -- कल न जाने क्या बीते जाने क्या नीति नियम हो दिन हो न हो रात हो न हो दो दिन में रात हो तो क्या हो । इसलिए अपना अतीत का स्मरण के सह सभी रीतियों की समृति बनी रहे कारण रीतियों में ही ज्ञान -विज्ञानं के चमत्कार छुपे हैं ।। 

लीक पुरानी सँभारे राखे रहो सँजोए । 
भोर के निकसे पंथी साँझ बहोरी होए ।२१८३। 
भावार्थ : -- अपनी लोकरीतियां को संजो कर रखना चाहिए ये वे पगडंडियां हैं जिसपर चलकर भोर का निकला पथिक साँझ को अपने घर सकुशल पहुंच सकता है ॥ 

रामायन रचना काल बरनै पुष्पक जान । 
मनु मति अनुमति न दाइहि, ले लच्छन बिनु मान ।२१८४। 
भावार्थ : -- श्री रामायण ग्रन्थ का रचना काल कुबेर के पुष्पक वायुयान का वर्णन करता है किन्तु प्राग रूप रहित होने के कारण मन मानस उसे मानने की अनुमति नहीं देता क्यों ? क्योकि वह देश व् परिस्थियों के अनुकूल तो है किन्तु समय के अनुकूल नहीं है.....

किन्तु वह यान अवश्य था भले ही वह यांत्रिक यान न कुछ और हो.....

राम सेतु अप्रासंगिक, रहिहैं काल प्रसंग । 
मानस जाति प्रगति करत, चले समउ के संग ।२१८५। 
भावार्थ : - श्री राम सेतु भी देश व् परिस्थियों के संग प्रासंगिक तो था किन्तु उस काल के सन्दर्भ में वह अप्रासंगिक था । किन्तु यह मनुष्य- जाति की प्रगति हेतु आवश्यक हो गया था कालान्तर में मानव जाति प्रगति करते हुवे समय के संग चलने लगी..... 

टिप्पणी : -- विद्यमान काल में मानव ने प्रगति तो की किन्तु उन्नति नहीं की इसलिए वह भूगोलीय है यदि उन्नति भी की होती तो खगोलीय हो जाता..... 

एक बिषय कहैं भूगोल, दूजन कहें खगौल । 
दुनहु के अध्ययन करेँ लेइ तराजू तौल ।२१८६।  
भूगोल व् खगोल में क्या अंतर है चलो तुलनात्मक अध्ययन करें : -- भूमण्डल के अध्ययन को भूगोल कहते हैं आकाश-मंडल के अध्ययन को खगोल कहते हैं आकाश अथवा अंतरिक्ष भी मण्डलित है यह केवल भारत को ही ज्ञात है.....

ज्योग्रॉफी का अर्थ भू-ज्यामिति होता है यह मण्डलित है अंतराष्ट्रीय जगत को कालांतर में ज्ञात हुवा , कॉस्मॉस का अर्थ अंतरिक्ष होता है यह भी गोल है किसी को पता नहीं.....

बैदिक काल के मानस, अतिसय उन्नत होएँ  । 
खगोलीय भूगोल के रहे ग्यान सँजोएँ  ।२१८७ । 

भावार्थ : -- वैदिक काल में मनुष्य जाति अत्यधिक उन्नत थी वह खगोलीय अंतरिक्ष में निहित भूगोल के ज्ञान से परिपूर्ण थी इसका तात्पर्य यह हुवा कि मनुष्य की उन्नत जाति ज्ञानी योगी होती है विकसित जाति भोगी होती है ॥

चरत समय सों प्रगत भए पाछिन चरन बढ़ाहु । 
पीछु चरत होहु उन्नत,  न तरु एहि रही जाहु ।२१८८। 

भावार्थ : --  हे मानव ! अधुनातन तू अग्रगामी हो चला है एवं अधोगति की ओर अग्रसर है । एतएव पश्चागत हो इसी में तेरी उन्नति है ॥

पश्चिमी देश विकसित उन्नत नहीं, उन्नति यदि धन है तो विकसित- राष्ट्र निर्धन रेखा से नीचे हैं इनकी विकास का सम्यक वितरण होता तो पृथ्वी अति अति अति विकसित होती  भारत उन्नत था अब उन्नत-शीलता की ओर निपतित है यदि भारत की प्रगति का सम्यक वितरण होता तो यह एक अति विकसित राष्ट होता.....

विकसित कहे जाने वाले राष्ट्र वस्तुत: प्रगति में पूर्वी है उन्नति में पश्चिमी हैं.....

एक उन्नति अरु एक प्रगति, अरु एक धूनि बिकास । 
भावारथ भिनु भाँति लहि भए सब सत्यानास ।२१८९। 
भावार्थ : -- एक शब है उन्नति एक ही प्रगति और एक शब्द है विकास यदि इनके भाव एवं अर्थ में भिन्नता आ जाए तो सब सत्यानाश हो जाता है ॥

कैसे : --

मंजुल मुख मंद मुकुलित जो मन भयउ उदास ।
किए कंठ रबि केतु कलित, ब्यापत रहे बिकास ।२१९०-क ।

बरन बरन उल्लसित भए, चहुँपुर छाए बसंत ।
प्रगत प्रभो बन बसित भए, जागे प्रेम अनंत ।२१९०-ख । 

उदया तिथि उदयत लखे, चले चरन आतूर  । 
अवनत सीसोन्नत भए, निकसे नवल अँकूर ।२१९०-ग । 
भावार्थ : - जब उदया तिथि ( सूर्योदय कल की नवल तिथि ) को उठते हुवे देखा तो प्रभू के चरण तीव्रता पूर्वक बढ़ने लगे । अधोगत उन्नति को प्राप्त हुवे उनमें नवल अंकुर प्रकट होने लगे ।  
भावार्थ : -- सुंदर मुख मंद प्रभा स्वरूप में मुकुलित हैं जो मन उदासीन थे उनके कंठ रवि कुल के केतु विभूषित हुवे तत्प्श्चात्  सर्वत्र प्रसन्नता व्यापने लगी ॥

वर्ण वर्ण आह्लादित हो उठे दिशाओं दिशाओं में वसंत छा गया ( जैसे जैसे )  प्रभु आगे बढ़ते हैं वन वसित होता  जाता ही व् अनंत प्रेम का जागरण होता है ॥

विकसित का अर्थ ही प्रसन्नचित : -- हमें प्रसन्नता चाहिए सुख चाहिए विकास चाहिए शासक न प्रगति थमा दी.....










----- ॥ दोहा-दशम २१७ ॥ -----

नवल माहि भारत देस  करिहउ फेर फिरान । 
चरन हीन सन होइही, सकल धर्म अवसान ।२१ ७१ । 
भावार्थ : -- यदि भारत  को पूर्णत: इंडिया (जहाँ कलुष योनिज का वास है जिसकी घर वापसी हो जाए वो सुखी है ) बना दें तो होगा क्या ? आचरण हीन इण्डिया होगा, भारत में प्रवर्तित धर्म सहित सभी जातियां समाप्त हो जाएंगी । 

फिर तो माँ से प्यार हो जाएगा बहन से मुहब्बत होगी बेटी से इश्क हो जाएगा । खेती बाड़ी का सत्यानाश  हो जाएगा सब ओर काला धुवाँ उगलती धरती दिखाई देगी अन्य सभी देश अपने-अपने धर्म में निष्ठ होकर जाति वाले हो जाएंगे । फिर इन धर्मनिष्ठों में से कोई आएगा, दास बनाएगा, और  कान पकड़ कर समझाएगा इसको अब्बु कहते हैं इसको अम्मी कहते हैं ये मदर है ये फादर है ये डेड है ये मोम है । बिजली होगी नहीं इंडियंस ही कोल्हू के बैल होंगे । जल अन्न व् सुभाषित उसके  देश पहुंचेगा वो शाकाहरी होगा इंडियन एक टुकड़े मांस व् दो घूंट पानी को भी तरसेंगे.....

इन कलुष-योनिज की चौथी या पांचवी पीढ़ी का क्या होगा जब इन्हें पता चलेगा कि इनकी इस अवस्था का कारण ये हैं..... 


धर्म ही ईश्वर के नाम का निरूपण करता है जैसे : -  यह श्री राम है खुदा है ईशा- मसीह हैं 
धर्म मनुष्य के नाम का भी निरूपण करता है यह राम है यह रहीम है यह न्यूटन है 

ईसाईयों में कोई पीर क्यों नहीं है.....? वहां पवित्रता न्यूनतम है.....रक्त संबंधों से रक्त अपवित्र होता है पवित्रता के लिए सर्वप्रथम जाति ततपश्चात गोत्र होना चाहिए गोत्र उपकरण से मनुष्य में रक्त संबंध नहीं होता  । ब्राम्हण इसलिए ब्राम्हण हैं क्योंकि वह पुत्र-पुत्रियों के विवाह में सात गोत्र स्थगित करते थे /

धर्मागत निरूपन किए भगत बछर के नाम । 
नाम बतावै जनि जनित्र,बरन बतावै काम ।२१७२ । 
भावार्थ : -  धर्मग्रंथ के द्वारा धर्म ही ईश्वर के नाम का निरूपण करते हैं यह मनुष्य के  नाम का भी निरूपण कर उसके उद्गम स्त्रोत का परिचय देता है ।  जाति-वर्ण से उसके पैतृक कर्म का बोध होता है ॥ 

धर्माचारि अगम लिखे, भगवन भयउ न सार । 
हित  बिचार अनुहार के, हरिहरि करौ सुधार ।२१७३ । 
भावार्थ : -  धर्माचार्य ने धर्म ग्रन्थ लिखा किन्तु  ईश्वर सार में न हुवे । तब हितोपदेशो का अनुशरण कर उस धर्मग्रन्थ में समय समय पर शनै: शनै:  इस प्रकार सुधार करना चाहिए कि उसके सार में ईश्वर हों ॥ 

धर्मागत मिलिबै जोइ भगवन सार सरूप । 
ज्ञान नयन पट खोल के, दरसो वाके रूप ।२१७४ । 
भावार्थ : -  धर्म ग्रन्थ में यदि भगवान सार स्वरूप मिल भी जाएं तो चैतन्य स्वरूप होकर ज्ञान लोचन उसका रूप दर्शना चाहिए  ईश्वर का स्वरूप सुंदर होना चाहिए कष्टमय नहीं ॥ 

अहिंसा परमो धर्म: को आधार मान कर धर्म ग्रन्थ में सुधार करें अन्यथा सार में या तो ईश्वर होंगे नहीं होंगे तो कष्टमय स्वरूप में होंगे । धर्म के मार्ग में प्रभु की रचितसृष्टि को क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए.....

ग्यान अन्तरात्मना, पंच भूत बिग्यान । 
जब दोउ के मेल मिले, गर्भ गहे तब प्रान ।२१७५।  
भावार्थ : -- यह आत्मा ही ज्ञान रूप चिदानंद घन है पंच भूत विज्ञान है । जब इनका परस्पर मेल होता है तब जीव गर्भ में प्राण ग्रहण करता है ॥  

सुबरन जाति को चाहिए, संकलित सद विचार । 
सातबिक़ आहार संग, एक बर देसाचार ।२१७६। 
भावार्थ : -- मनुष्य की उत्तम प्रजाति प्राप्त करने हेतु एक संकलित सद-विचार (जिसे धर्म कहते हैं ) की आवश्यकता होती है, जिसका वह अनुशरण करे । इसके सह एक उत्तम आचार-व्यवहार सहित उसका आहार प्रकृति के सारूप्य होना चाहिए ॥ 
इसका अर्थ यह हुवा : -- केवल आहार मात्र से प्रजातियां गुणवंत नहीं होतीं .....

धर्म गहि कुल चारि चरन, गावहि बेद पुरान । 
तासु  चिन्ह नुहार मिले, सुठि सरूप भगवान ।२१७७। 
भावार्थ : -- आप्त-श्रुतियों ने धर्म की ( जो संकलित सद विचारों का एक समूह है )  व्याख्या करते हुवे कहा है कि वही धर्म परिपूर्ण धर्म है जो सत्य, शौच, दया व् दान रूपी चार स्तम्भों में अवस्थित हो । ऐसे धर्म का अनुशरण करने से ईश्वर सुंदर स्वरूप में प्राप्त होते हैं ॥

सत्य =परमार्थिक सत्ता
शौच/तप = शुचिता जीवन में, आचरण, में सहचरण में
दया = प्राणी मात्र पर करुणा,अहिंसा
दान = दयावश अथवा धर्मतस देने या त्यागने की क्रिया.....में उचित मार्ग से सौ रुपय कमाने में समर्थ हूँ किन्तु मैं एक रुपया ही कमाऊं शेष किसी अन्य अल्पसमर्थ के लिए त्याग दूँ यह त्याग है | एक में से आधा धर्मार्थ किसी पात्र को दे दूँ यह दान है.....

जननि जनक सोंह उपजै, जो नव सद्गुन कोए । 
मनसा वाचा कर्मना, जनिमन तिन्ह सँजोए ।२१७८। 
भावार्थ : -- यदि जन्मदाता अथवा मात-पिता में कोई नया सद्गुण अथवा दुर्गुण उत्पन्न होते ही वह चित्त से वचनों से, व् कर्म से गुणसूत्र में संचयित हो जाता है ॥ 

जैसे : --  पूर्वजों ने केवल दान किया किन्तु माता -पिता ने त्याग भी किया तो यह एक नया सद्गुण व्युत्पन्न हुवा ॥ संतति जो कुछ गर्भ में, कुल में, गुरुकुल में, ज्ञान वाणी में देखती सुनती है उसका अनुशरण करती है  --यह चित्त है, मेरे पूर्वज अथवा मात-पिता ऐसा कहते थे, यह वाचा है,  वे ऐसा करते थे यह कर्मणा है..... 

जननि जनक कहि आपनी,आपही न अपनाए । 
तासु जने जनिमनहु तिन,पग पग दए बिसराए ।२१७९। 
भावार्थ : --यदि जन्मद अपने कहे सदवचनों का स्वयं अनुशरण नहीं करते । तब संतति भी चरण चरण पर उन वचनों को विस्मृत करती जाती है ॥ 

धनार्जन का उचित मार्ग क्या हो इस पर एक पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है

जीवन हेतु साधन हो बस्न बस तीनि चारि । 
लघु कुटुम को कुटि बहूँत, रत ब्रत एक नर नारि ।२१८० । 
भावार्थ : -- एक गृहस्थ की आधार भूत आवश्यकताएं कितनी होनी चाहिए : -- जीवन सुचारू रूप से संचालित हो और साधु भी भूखा न जाए इतना अन्न होना चाहिए, तीन चार वस्त्र होने चाहिए ,  एक नारी व् एक ही पुरुष व्रत के नियम का पालन करते हुवे  एक लघु कुटुंब को कुटिया भी पर्याप्त, अट्टालिकाएँ भी अपर्याप्त .....

ये तो चरन्नी में आ जाता होगा शेष कहाँ जाता हैं ? पिछले किए कुकर्मों के ऋण मोचन में आधा रुपया व्यय हो जाता है इसलिए कुकरम मत करो कुटिया में रहो..... 






जस तस ब्यबहार रीति तेसिउ प्रीति

जीवाधार तस बिचार नयक तेसेउ नीति

मृषावादी संजुत होत असुरी संपत जोए ।

जब जब आसुरि सम्पत् बाढ़ि ।      
तब तब तापस गुन अति गाढ़ि ।।

-----॥ पृच्छा-परीक्षा २ ॥ -----

>> किस आतंकवादी संगठन से संबंधित हैं ये सत्ताधारी दल .....?  

>> जो अपने  मंत्रियों की बेटियों के लिए क्रूरकर्मी आतंकवादियों को मुक्त करते हैं.....


>> कौन था वह राष्ट्रद्रोही निर्मोही मंत्री जिसे इस राष्ट्र से अधिक अपनी बेटी प्रिय लगी.....? 

>> कौन था वो राष्ट्रद्रोही निर्मोही प्रधानमंत्री जिसे इस राष्ट्र से अधिक अपना मंत्री अपना सिंहासन प्रिय लगा .....?
>> क्या संविधान के निर्माता को किसी चुनावी दल से संबंधित होना चाहिए था.....? 

>> इस्लाम, धर्म  है कि जाति है.....?
यदि यह धर्म है तो इसको जाति मानने वालों का धर्म क्या है.....? 

>>  इस्लाम धर्म के अनुयायी किस आधार पर अल्पसंख्यक हैं.....?

>>  सम्प्रदाय किसे कहते हैं ? समाज किसे कहेंगे ? अथवा किसी राष्ट्र के अंतर्गत समाज की परिभाषा में कौन आते हैं.....?

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

----- मिनिस्टर राजू १५६ -----

 राजू ! क्या कर रहे हो.....?

राजू : -- मास्टर जी ! पुस्तक लिख रहा हूँ..,

  "तू और पुस्तक ? कौन सी पुस्तक लिख रहे हो..,

राजू : -- मास्टर जी !  "नेहरू के सपणों का इंडिया"..,

  लिख लिख ऐसी ऐसी पुसतकेँ तू ही लिख सकता है, एक बात बता  यदि इंडिया में नेहरू की अध्यक्षता  वाली कं ग्रेस का  डी एन ए है तो कांग्रेस में किसका डी एन ए है..?

राजू : - मास्टर जी ! मुझे क्या पता मैं कोई डाकटर थोड़े ही हूँ.....

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम२१५-२१६ ॥ ----

कलुख जोनिज अजहुँ  भयउ भारत भू अधिकाए । 
जैसेउ धर्म ग्रन्थ कहि तेसेउ तिन्ह पाए ।२१५१। 
भावार्थ : - संकीर्ण विचार धारा वाले  कलुषित योनि अब भारत में अत्यधिक हो गईं हैं यह एक  शोध का विषय हैं धार्मिक ग्रंथों में जैसा वर्णन मिलता है, इनका स्वभाव वैसा ही है ॥

टिप्पणी = इन ग्रंथों में 'धर्म-संकर' शब्द युग्म  पठन में नहीं आया है इसका अर्थ है कि वैदिककाल तक अन्य किसी धर्म का प्रवर्तन नहीं हुवा था ॥

जीवंत जीव जगत का हत्यारा है कौन । 
शोक निमग्न धर अनंत, पूछ रहा धर मौन ।२१५२। 
भावार्थ : - इस जीवंत जीव-जगत का हत्यारा कौन है ? अनंत स्वरूप ईश्वर शोक निमग्न होकर मौन धारण किए प्रश्न कर रहा है ॥

निगमागम बेद पुरान जिन्हनि कहे बिकार । 
अधुनातन बिचार कहत खलजन करे प्रचार ।२१५३। 
भावार्थ : -- संकरता एक विकृति है, एक संकीर्ण विचार धारा है जो  मैं और मेरा तक ही सिमित है  ऐसा कहते हुवे वेदों पुराणों व् निगमागम ने जिस संकरता की भरपूर भर्त्सना की थी,  कुछ स्वार्थी जनों ने दुष्प्रचार कर उसे आधुनिकता कहा ॥

राजा हो चाहे रंक , हो चाहे को कंत । 
सत्कृति कृत सत्पथ चरे, होत सोए गुनवंत ।२१५४। 
भावार्थ : -- राजा हो चाहे रंक हो सेवक हो चाहे स्वामी हो । जो सत कर्म करते हुवे सन्मार्ग पर गतिवंत हो वही गुणवत्ता से युक्त होता है ॥

मानव जाति नीपजने, भारतीअ तकनीक । 
गुन  धर्म अनुवाद करे, बेद देखाए लीक ।२१५५। 
भावार्थ : -- मानव जाति की उन्नत उपज के लिए भारतीय कृषि तकनीक अति उत्तम है । यह वेदों की दिखाए मार्गानुसार सदगुणों की प्राप्ति के लिए आवश्यक स्वभाव के सूत्र का प्रतिपादन करती है ॥

रस लै  लै मृतका सरिस खावें अमिष अहार । 
साक पात फुर मूर फर  परछै बारहि बार ।२१५६। 
भावार्थ : --  मांसभक्षी  मांस-मिट्टी का रुचिपूर्वक भक्षण करते हैं ।  साक पात फूल मूल फल को वारंवार प्रक्षालित करते हैं कि इसमें कहीं मिटटी न लगी हो ।

प्रथम मंत्र : -- तो गुणवत्ता युक्त बीज-न्याय व् उपजाऊ-धरती के लिए उदर का  सद पोषण आवश्यक है ।
                      इससे व्यर्थ के दोषों से मुक्ति मिलती है.....

साक पात फुर मूर फर नसै खाद कहलाए । 
माटी का यह पूतला माटी माहि समाए ।२१५७। 
भावार्थ : -- शाक-पात फूल मूल फल यदि नष्ट होकर उर्वरक कहलाते हैं । जबकि मिटटी में मिलने वाला जीवधारी का मृत शरीर को मिटटी कहते है ॥

जीवन हुँत बिसराए के, चरजा रहे सँजोए । 
तिन बसति का कीजिये, रहे जहाँ ना कोए ।२१५५। 
भावार्थ : --  जीवन-हेतु भुला के शासन-प्रशासन जीवन-चर्या के हेतु का संकलन हो रहा है । उस बसेरे को बसा कर क्या करेंगे जहाँ हेतुरहित होकर बसेरी जीवित ही न रहे ॥

वैभवमान खान पान सुख कर तबहि  कहाए । 
अगज जगज हेरत फिरे, भूखा कोउ न पाए ।२१५६। 
भावार्थ : -- वैभववान खान-पान तभी सुखप्रद कहलाता है जब समस्त संसार में कोई भूखा न सोता हो ॥

छान छान छापन भोग, खाएँ ले ले सुवाद । 
जे तो जीव साधन है, पवाएँ जान  प्रसाद ।२१५७। 
भावार्थ : -- छान छान छप्पन भोग उड़ाए जा रहे हैं । रे मूर्ख किंचित क्षुधार्त्त का भी चिंतन कर ये भोजन तो जीवन का साधन मात्र है इसे प्रसाद मानकर ग्रहण करना चाहिए ॥

छुधातुर को भोजन दे तिसित कठ जल दान । 
जीव जगत के हंतृ कू, दंड सहि दे ग्यान ।२१५८। 
भावार्थ : -- क्षुधा- पीड़ित को भोजन, पिपासार्त को पयसन देना चाहिए ।  जीव जगत का जो हत्यारा हो उसे दंड सहित ज्ञान देना चाहिए ।।

माथत्रिपुण्ड सीस मुंड, को धरे लमनि केस । 
कपट भेष दे रहे बर पीठ बैठ उपदेस ।२१५९। 
भावार्थ : - माथे में त्रिपुण्ड शीश मुंडाए कोई लम्बे लम्बे केश धरे ही । भँडरिया वरासन में विराज के उपदेश दे रहे हैं ॥

साँच कहना सरल भया करना भया दुरूह । 
साँचा अजहुँ एकल भया, झूठे के सौ जूह ।२१६०। 
भावार्थ : -- यह सत्य है कि सत्य अलापना सरल हो गया, सत्यंकार कठिन हो गया ॥ कारण  की सत्यानुरक्त अधुनातन एकाकी हैं मृषावादी समूहों में संगठित  है । और एकता में ही शक्ति होती है ॥

मैं सदा सर्वदा सत्य ही कहता हूँ -- यह झूठ है,
में सदैव सत्य नहीं कहता  -- यह सत्य है,
मेरा कहा झूठा हो जाता है -- यह सत्यानृत है अर्थात असत्य  व्  सत्य का घालमेल है, माने की लेन -देन है

जिसके लिए कहे वचन को सत्य करना कठिन हो वह  ऊँचे आसन, सिंहासन के योग्य नहीं होता.....

जन जन हरिजन सिरु धरे दिएँ सम्मान बहूत । 
तिन महामन हेतु अजहुँ सो जन भयउ अछूत ।२१६१ । 
भावार्थ : -- जिस जनता जनार्दन ने अछूतों को मान दिया, सम्मान दिया, अपने शीश पर धारण किया । उन पूज्यनीय महंतो हेतु अब वही जनता अछूत हो गई है ॥

राजू : -- ठीक बिलकुल ठीक ! ढूंडते रहो अब इनको सूचना के अधिकारों में.....ये वारंवार आरक्षण  का लाभ लेते रहे अपने जनों को ही इन्होने अवसर नहीं दिया.....तो दूसरा कौन देगा.....?

ब्रम्हा सदन बिराज के , भयउ न ब्रम्हन कोए । 
ब्रम्ह भाव संग हित किए, सोइ  ब्रम्ह पद जोए  ।२१६२। 
भावार्थ : -- ब्रम्हा के सदन में विराजित होने भर से कोई ब्रम्हा नहीं होता । जो शुद्ध चैतन्यस्वरूप ज्ञान की प्राप्ति कर उससे जगत का कल्याण करे वही ब्रम्ह-पद के योग्य होता है ॥

देस मह एक देस नवल, वाके देसाचार ।
अमरत है कि गरली है, संविधान के सार ।२१६३।
भावार्थ : - भारत देश में एक नया देश खोजा गया वह है इंडिया । जैसे वेदों का सार भगवान विष्णु हैं वैसे ही यह  इंडिया एवं इसके आचार-विचार विष है या अमृत जो भी है यही संविधान का सार हैं ।।

 यह शोध का विषय है कि  इंडिया व् इसके आचार-विचार विष हैं या अमृत.....

जीव साधन जीवन धन भारत भू उपजाए । 
नवल देस के निबासी, बैठे बैठे खाए ।२१६४। 
भावार्थ : -- जीव-साधन हो थ्व जीवन -धन उसका उत्पादक भारत है । । यह जो नवल देश इंडिया है  न यह अन्न उपजाता न साधन बस इन्हें बैठे बैठे खाता है ॥

देस मैं एक नवल देस, भोगे बिषय अतीउ । 
कौन इहाँ के निबासी, कहाँ इहाँ की सींउ ।२१६५। 
भावार्थ : -भारत  देश के भीतर एक नया देश खोज गया वो है इण्डिया जो  भोग वादी है ( अर्थात खाओ पियो और मजे करो का सिद्धांत ) इसके निवासी कौन हैं.....?  इस इण्डिया की सीमाएं कहाँ हैं.....?


यह इंडिया ९०% से अधिक विमान सेवाओं का सेवन करता है  कितना ईंधन लगता है इन विमानन सेवाओं में..? इनको छूट कितनी मिलती है.... शासक-गण स्पष्ट करें.....

देस नवल भवन हैं तो बस्तु कार है कौन । 
प्रष्टा बहुरि प्रस्न  करै, संपादक है मौन ।२१६६। 
भावार्थ : - यदि यह नया देश 'इंडिया' एक भवन है तो इसका वास्तुकार कौन है.....? प्रश्नकर्त्ता वारंवार प्रश्न पूछ रहा है किन्तु भवन-संपादक मौन धारण किए है ॥

धर्म जाति अवमान किए, बोले ऊँचे बोल । 
धर्म जाति निठ चरन सन, तासु चरन को तोल ।२१६७। 
भावार्थ : -- जो धर्म-जाति की अवमानना करते हैं वही धर्म-जाति के ठिकादार बने हैं और तत्सम्बन्ध में बड़ी बड़ी बाते करते हैं । किंचित इनके आचरण से धर्म-जाति निष्ठ के आचरण का तुलनात्मक अध्ययन करें  ( इनका भेद प्रकट हो जाएगा ) ॥

पुरातन हो कि धुनातन, जोइ होत दृढ वान । 
सोइ जीवन साधन धन, पाए सकल घर मान ।२१६८। 
भावार्थ : --  पुरानी हो की नई हो वस्तु हो विचार हो व्यक्ति हो चाहे कोई हो जो दृढ होता है  घरों में वही सम्मान पाता है,  प्राय: पुरानी वस्तुएं अधिक टिकाऊ होती हैं ।।

नया नौ दिन पुराना सौ दिन.....

उजरे सँग अँधेर पाख, धूप संग जस छाइ । 
भले बुरे का संग किए, यह मानस की काइ ।२१७० । 
भावार्थ : -- शुक्ल पक्ष के संग कृष्ण पक्ष जैसे धूप के संग छाया होती ही । वैसे ही यह मनुष्य शरीर भी गुण दोषों से युक्त होता है किन्तु 'समरथ नहीं कछु दोष गोसाईं' । और दोष भी गुण बन जते हैं जैसे: नलनील का समुद्र में पत्थर फैंकना उनकी उद्दंडता थी जो कालांतर में यह उद्दंडता गुण बन गई ॥ 

कसिपु मुनिबर अदिति मातु, जन्में एक अपवाद । 
अपवादी सन जनम लिए, परम भगत प्रह्लाद ।२१६९ । 
भावार्थ : -- मुनिवरकश्यप व् देवमाता द्वारा एक अपवाद हिरण्य कश्यप का जन्म हुवा  फिर इस अपवद से परम भक्त प्रह्लाद ने जन्म लिया ॥ 

 "अपवाद एक चमत्कारिक क्रिया है जो सामान्यत: नहीं होती , इसलिए अपवाद कभी दृष्टान्त नहीं होता......"

भारत देस जुगावने केत मधुर संबंध । 
एहि हुँत जग बिख्यात है वाके गेह प्रबंध ।२१७० । 
भावार्थ : -- भारत ऐसा देश है जो न जाने कितने मधुर संबंधों को संजोए है ( जैसे गेही गृहणी दादा दादी माता पिता चाचा बुआ मामा जीजा आदि आदि (कभी सुना है मामा नाना नानी जीजा साली साला और किसी देश में ) इसी लिए इसका गृह-प्रबंध विश्व भर में विख्यात है ॥ 















गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम२१४॥ ----

सासक दल के इतिहास, जस सद मुख उद्भास । 
भरत के पावन भूमि, अहहै एहि इतिहास।२१४१ । 
भावार्थ : -यहाँ जितने भी चुनावी दल हैं इनके सदस्यों का मुख जो कह दे वही इतिहास है । किन्तु भारत की इस पावन भूमि का यही इतिहास है ॥ 

उदर परायन आपने, माने धर्म न जात । 
धर्म परायन हुँत करैं ऊँची ऊँची बात ।२१४२। 
भावार्थ : -  अपने पेट के परायण  होकर धर्म और जाति को नहीं मानने वाले,  अपनी स्थिति में स्थिर रहने वाले धर्म व् जाति-निष्ठ जनों के लिए ऊँची ऊंची बात करते हैं, उपदेश देते हैं, बुद्धि भी सिखाते हैं । यहाँ मंदीर बनेगा यहाँ मस्जिद बनेगी ॥ 

बियाहन में एहि कारन बर्जित हैं सम गोत । 
बंसागत सो होइहीँ, एकै दीप के जोत ।२१४३।  
भावार्थ : - विवाह में समान गोत्र इस हेतु वर्जित किया गया हैं कि विवाह्य एक ही वंस कृत के उद्भव होते हुवे एक ही कुल दीपक के ज्योति होते हैं अर्थात समान गोत्र का अर्थ है उनका मूल पितृपुरुष एक ही है । 

कोउ खात फुल फल पात, कोउ हाथ अरु लात । 
जुगीरा जिउ जोरन मैं, होत सकल उत्पात  ।२१४४। 

भावार्थ : -- कोई फूल, कोई फल कोई केवल पत्र  खा रहा है, कोई उत्खात कर हाथ व् लात खा रहा है । साधू ! जीवन- हेतु ही ये समस्त उत्पात होते हैं ॥ 

जी अधार जीवात्मन ,जीउ अधार अहार । 
आहार अधारे जीउति, जीउति करम अधार ।२१४५। 

भावार्थ : -- जीवन जीवात्मन पर, जीव जीवातु पर, जीवातु जीवति पर, जीवति कर्म पर अधिष्ठित है ॥ 

जी = जीवन 
जीवात्मन = व्यष्टि आत्मा 
जीवातु = आहार 
जीवति = आजीविका 


जीव साधन उदर भरे चरजा करे पुकार । 
अधिकाधिक की लाह मेँ,बिगड़े देसाचार ।२१४६। 
भावार्थ : -- जीव शाधन से उर संतुष्ट हो तो जीवन-चर्या आह्वान करती है । अधिकाधिक की लिप्सा से आचार-विचार विकृत हो जाते हैं ॥ 

विचार वां होने के लिए लिप्सा का त्याग आवश्यक  है 

पहले भोजन फिर बसन फिर भवन फिर भजन..... 
को जीवक जीबिका 
को जीउ साधन सँजोग  । 
को हिंसालु हिंसा रत,  भव भूमि रहे भोग ।२१४७ । 
भावार्थ : --कोई ब्याज काटने वाला जीविका दबाए बैठा है,  कोई जीवन जीवनक को संग्रह किए बैठा है । नाश,घात, हत्या, क्षति,लूट, चोरी आदि दुष्कृत्यों में कोई अनुरक्त होकर हिंसावादी संसार के सुख-ऐश्वर्यों  उपभोग कर रहा  है  ॥ 

ऐसे कृत्यों से परिवार का पालन-पोषण करने वाले की आनेवाली संतानें क्या महात्मा होंगी.....?   

जग कारन ईस जद्यपि, सबहि जीबी जनाए । 
जो जनिक जो सँजोए जनिमन सोइ सुवारस पाए ।२१४८। 
भावार्थ : -- समस्त जीवों की उत्पत्ति यद्यपि सृष्टि के कारण रूप ईश्वर से ही होती है । तथापि जन्म दाता मात-पिता संग पूर्वजों के जो स्वारस्य होते हैं संततियों में भी वही स्वारस्य हस्तांतरित होते जाते हैं ॥ 

इस हेतु ऐसा कोई दुर्गुण उत्पन्न नहीं करना चहिए जिससे की वह वंशानुगत हस्तांतरित हो 

स्वारस्य = स्वाभाविक प्रकृति 


अंतर सदन सँभार किए संकलित सद विचार । 
सँभरे सदन संग होत बाहिर के सिंगार ।२१४९ । 
भावार्थ : -- संकलित सद्विचार अंतर जगत को व्यवस्थित करते हैं व्यवस्थित अंतर जगत ही जगत को व्यवथित करने में सक्षम होता है ॥ 


बाह्य जगत :-आचार-व्यवहार 



सर्बसस स्वीकरनीअ सोई फेर फिरान । 
अपने सन जो सर्वथा होत हेतु कल्यान ।२१५०। 
भावार्थ : -- वही परिवर्तन सर्वश: स्वीकार योग्य है जो चराचर जगत सहित स्वयं हेतु सर्वथा कल्याणकारी हो ॥ 










मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

----- ॥ दोहा-दशम२१२-२१३ ॥ -----


सेना खाए धन अस जस राख रहे संसार । 
देस दुआरि राखे जस, भयउ घर के द्वार ।२१२१ । 
भावार्थ : -भारतीय-सेना धन तो ऐसे खाती ही जैसे सारे संसार की यही रक्षक हो ।और सीमाओं की रक्षा ऐसे कर रही है जैसे वह कोई एक घर की रक्षक हो और उसमें भी सेंध लग जाए ॥ 

 अपराधिन को संग किए भीतर के रखबार । 
गेह गेहनि बाहिर भए, लिए  घर निज अधिकार ।२१२२ । 
भावार्थ :-- घरवाले तो बाहर हो गए और ये फूलिस ये गृह रक्षक फूलिस अपराधीन का  प्रसंग प्राप्त कर घर पर अधिकार किए है ॥ 

अपराधी अपरिमित भए, करें बाध पर बाध । 
अपरिगनित सरूप बिगत भँवर रहे अपराध ।२१२३। 
भावार्थ : -- अपराधी अपरिगणित हैं जो  आतंरिक सुरक्षा को निरंतर बाधित करते ,अवबाधित गणमान्य हो गए तब  अपराध  सीमांत स्वरूप में निर्भय होकर विचरण करता रहा ॥ 

भलमन दुखिया जान के दिए अवधू कर दान । 
कपटी संकासि छल किए, लेइ उरे बैमान ।२१२४ । 
भावार्थ : -- सुहृदय ने समांत को याचिता जान स्नेह प्रकट कर वृत्ति दी। किन्तु इन कपटियों ने तो सुहृदय का ही हरण कर लिया ॥

देस बुराई जीत के दे पुनि कर धार । 
बुराई भाल तिलक किए, सोई होत उदार ।२१२५ । 
भावार्थ : - जो किसी राष्ट्र की बुराइयों पर विजय प्राप्त करे। भलाई के भाल पर राजतिलक कर उसे लौटा  दे वही राष्ट्र उदारवादी होता है ॥ वह नहीं जो अपनी सीमाओं को अपरिच्छन्न कर समांतों सहित अपरान्तों को उत्पात करने दे । 

समांत = सीमावर्ती राष्ट्र 
अपरान्त = पश्चिमी राष्ट्र 

सभ्यता संग संस्कृति, दुहु सम सार सनेह ।
देस धर्म जल उपज जन,  देस होत सम खेह ।२१२६। 
भावार्थ : - कोई देश यदि कृषिक्षेत्र के समान हो तो सभ्यता व् संस्कृति उसकी मीट्टी के पोषक  तत्त्व के समान होती हैं ॥  देश विशेष में  प्रचलित आचार-व्यवहार उसकी जलवायु समान व्  राष्ट्रजन उस क्षेत्र की उपज होते हैं  ॥ खेत जैसा होगा उपज भी वैसी ही होगी ॥ 

भारत इस्लाम धर्म का प्रवर्तक नहीं है  इसकी सभ्यता व् संस्कृति भारत की नहीं है ।  भारत का कोई मूल निवासी यदि अन्य धर्म स्वीकार कर ले वही भारतीय है ॥ 

देश हो कि बय काल हो, होअहि जेत पुरान । 
चिर चिंतक चलन सह तिन तेत सुचितई मान ।२१२७ । 
भावार्थ : -- देश हो स्थान हो समय हो देशज हो  चाहे जलवायु हो वह जितने प्राचीन हों उन्हें उतना ही स्थायी शुभचिंतक सदाचारी के सह स्थिर चेतस मानना चाहिए । कारण कि पुरानी वस्तुएं जितनी दृढ होती हैं शुद्ध होती हैं सदाचारी होती है उतनी नई नहीं होती ॥

राज हो की लोक तंत्र, हेरे बैदिक  काल । 
राजन बंसनुगत रहे, रहि चयनित जनपाल ।२१२७। 
भावार्थ : - वर्तमान में प्रचलित राज व् लोक ये दोनों जन संचालन तंत्र वैदिक का ही अन्वेषण है ।राजतन्त्र का मुखिया वंशानुगत होता था लोकतंत्र का मुखिया चयन प्रक्रिया द्वारा नियुक्त किया जाता था, ऐसा वेदों में वर्णित है  ॥ 


कतहुँ घन बन बीच रहे छोटे छोटे जूह । 
कतहुँ बिहरन देस संग, रहहीं बृहद समूह ।२१ २८ । 
भावार्थ: -वैदिक काल  में जन-जीवन कहीं सघन विपिन के मध्य निर्बल यूथ स्वरूप, कहीं वह विकसित विहारं देशों से युक्त होकर वृहद समूहों में निवासरत था, कोई जन समूह लोकतान्त्रिक प्रणाली से, कोई राजतांत्रिक प्रणाली से संचालित होता ॥ 

बंसनुगत हो कि चयनित, सासक रहें कुलीन । 

जन समूह सुरच्छा हुँत, सेना करे अधीन ।२१२९  । 
भावार्थ : --  समूहों के जनपालक को 'राजन' अथवा  'जनपाल' कहा जाता ।वंशानुगत हो चाहे चयनित हो यह राजन अथवा जनपाल सदैव कुलीन वर्ग से ही होता । जनता, समूह की सुरक्षा हेतु रक्षक गण को उसके अधीन करती ॥ 

टिप्पणी :--प्रत्येक धनी कुलीन हो यह आवश्यक नहीं प्रत्येक कुलीन धनी हो यह भी आवश्यक नहीं.....

देस हो कि धवन धुनी कि  धवज धवजिनी धानि । 
प्राग रूप कथन कहें ए भारत की रहि बानि ।२१३० । 
भावार्थ : -- 'राष्ट्र' शब्द की परिकल्पना हो चाहे राज्य अलंकरणों की, एतिहसिक चिन्ह व् वृत्तांत इसका प्रमाण हैं कि ये राज्यांग ( राजा, अमात्य,राष्ट्र,  दुर्ग कोष बल मित्र  ध्वज आदि ) भारत की ही संस्कृति रही है ॥

कालांतर में शासक इन राज्य अलंकरणों का दुरूपयोग करने लगे.....

गउ धन मान माँगे बिनु, सर्ब जूह हित जान । 
समदन सरूप बलि कहत देइ प्रजा कर दान । २१३१ । 
भावार्थ : - गौ को धन की देवी लक्ष्मी माना जाता व् समूह जनों के हित हेतु प्रजा मांगे बिना ही भेंट स्वरूप 'बलि' कहते हुवे कर दान करती ॥

एक सभा एक समिति रहे सभा सदस सभ्रांत । 
समिति सद चयनि सधारन, नयक कहै ईसान । २१३२। 
भावार्थ : -- राजन अथवा जनपाल के परामर्श  हेतु एक सभा होती एक समिति । सभासद सभ्रांत होते व् समितिसद  जन साधारण होते,समिति के प्रधान को ईशान कहा जाता ॥

जीवन हेतु रहे सकल , प्रकृति बल आधार । 
मंडल प्रतीक रूप तिन देई देउ पुकार ।२१३३। 
भावार्थ : -- चूँकि  समूहों का आर्थिक जीवन प्राकृतिक शक्तियों पर ही आधारित था जो ऋषि मुनियों की गणना के अनुसार तैतीस करोड़ हैं जिससे पृथ्वी सहित समस्त सृष्टि संचालित होती है अत: इन्हें प्रकृति-मंडल ( स्वामी, अमात्य, सुहृद, कोष, राष्ट्र,  दुर्ग व् दल ये सात राज्यांग अथवा प्रजावर्ग ) द्वारा प्रतीक स्वरूप  देवी व् देवता कहकर उद्बोधित किया गया ।

इस प्रकार वैदिक धर्म का प्रवर्तन हुवा जो प्रकृति देववाद' पर आधारित है ॥ सिद्ध होता है कि  यह राष्ट्र संकलित सुविचारों का अनुकरण कर सदैव प्रकृति सहित सृष्टि की रक्षा में अभिरत है अत: यह एक धार्मिक-राष्ट है ।
प्रकृति बल काल चलत गए, करत आपने काज । 
उजड्ड जन सधारन सँग, प्रगसे सिष्ट समाज ।२१३४। 
भावार्थ : - प्रकृति के बल पर अपना कार्य करते काल का चक्र चलता रहा ।  उजड्ड, साधारण, व शिष्ट समाज का प्रादुर्भाव हुवा ॥

धीर सांत नीति मंत, रहि जो अग्याधीन । 
बिनय सील सदाचारिन  समूह  कहैं कुलीन ।२१३५। 
भावार्थ : -  धीर, शांत, मननशील,  आज्ञाकारी, विनम्र व् सदाचारी समाज  को ही शिष्ट समाज कहा जाता ॥

घन बन राजि ब्याल सन, घिरे रहे सब जूह । 
छत्रि तेजस लहे किछु जन, राखएँ रचत ब्यूह ।२१३६।  
भवार्थ : -- चूँकि वे समूह सघन वन समूहों व् हिंसक पशुओं से आवेष्टित थे अत: इन कुलीन समाज में से कुछ शिष्टजन सामरिक  पराक्रम से युक्त हो व्यूह रचना के संग उन समूहों की रक्षा करते ।

 को निज जीवन हेतु हुँत,  जन जीवन किएँ बाध । 
को उजड्ड अग्यान बस , करैं गहन अपराध ।२१३७ । 
भावार्थ : - कोई अपनी आजीविक हेतु जन व् वन-जीवन में बाधा उत्पन्न करता , कोई असभ्यता व् अज्ञानता वश नृशंस अपराध कर प्राकृतिक शक्तियों को बाधित करता  ॥

बँसानुगत क्रमबत कर , सोई सोई काज । 
जूह समूह भीत उद्भित भयऊ जाति समाज।२१३८। 
भावार्थ : -- किसी वंस के मूल पुरुषों  ने जो कर्म किए उसके अनुवंस  भी वही वही कर्म किए । इस प्रकार उन समूहों  के अंतर से ही जातिगत समाज की उत्पत्ति हुई ॥ जैसे : -  चर्मकार अनाज वाला धनुषवाला पुस्तकवाला  ।

निज निज कर्मधीन धवन  चारिबरन संजोए । 
सुबरन छत्री बनिक संग छुद्र बुद्धि रहे कोए ।२१३९ । 
भावार्थ : --  अपने अपने कर्त्तव्य व् धर्मानुसार 'चातुर्वर्ण्य' शब्द से संयोजित समाज में कोई स्वर्ण कोई क्षत्रिय कोई वैश्य कोई क्षुद्र ( दलित, हरिजन आदि आदि )  कहलाया ॥

बंसानुगत क्रमबत किए सङ्कृत जो को बंस । 
सो बंसज् गुनधर्म गहि ,भय बंस अवतंस । २१४०। 
भावार्थ : -- किसी वंस के मूल पुरुषों सहित उसके अनुवंश, जगत कल्याण हेतु सङ्कृत करते गए । इस प्रकार चातुर्वर्ण्य समूह में गुण धर्म से युक्त कुल को ही कुलवतंस कहा जाता  जैसे : -- सूर्यवंशी रघुकुल

गुण-धर्म : -- सद्गुणों की प्राप्ति हेतु आवश्यक धर्म
जैसे : -
लकड़ी विद्युत की कुचालक व् लोहा सुचालक होता है : -- यह उनका गुण-धर्म है
प्रश्न यह है कि : -लोहा व् लकड़ी ने यह गुण-धर्म कैसे प्राप्त किया

पूजत संभु बंदएँ तरु, कतहुँ स्वस्तिक चिन्ह  ।   
उर्बरता देई कहत पहुमी पूजन किन्ह ।२१४०- क ।  

सिंधु घाटी देस धर्म सभाचार अनुहार । 
वाके अधार बिद रचे बेदिक देसाचार ।२१४०-ख । 
भावार्थ : -- कहीं शिव-पूजन, कहीं विटप-वंदना, कहीं स्वास्तिक-चीन्ह ।  उर्वरकता की देवी कहकर भूमि का पूजन करना । सिंधु घाटी के आचार -विचार व् परम्पराओं का अनुशरण करते हुवे वेद विद्वानों ने कदाचित घाटी की सभ्यता पर ही आधारित होकर वेदों के देशाचार रचे थे ॥ ( यदि यह सभ्यता वैदिक काल के पूर्व की हो )











सोमवार, 8 दिसंबर 2014

----- मिनिस्टर राजू १५५ -----

राजू :-- मास्टर जी ! ये बहन जी  'बहन जी' क्यों बनी..?

" इसलिए की इसको कोई छूता नहीं था "

राजू : --अच्छा ! मास्टर जी ! ये हाथी  घोड़े तोप तुपक से क्यों घिरी है..,

" इसलिए की इसको कोई न छूवे"

राजू : --ऐ ! इसकी प्राबलम  क्या है.....मास्टर जी !    

रविवार, 7 दिसंबर 2014

-----॥ पृच्छा-परीक्षा १ ॥ -----

  हमारे राष्ट्र  की सीमाएं जैसे आवेष्टक विहीन होकर अविच्छिन्न हो गई हैं । जो देश अपनी स्थति में अस्थिर हैं  राष्ट्रवाद में जिनकी निष्ठां नहीं है  वे भारत की सीमाओं का निरंतर भेदन कर रहे हैं ॥  भारत का लोकवादी इतिहास रहा है इसने स्वार्थपूर्ति हेतु  किसी भी राष्ट्र की मर्यादाओं का उल्ल्ंघन नहीं किया ॥  जो देश आतंकवादी गतिविधियों के लिए विश्व भर में कुख्यात हो वह किसी की मैत्री के योग्य है ? 

क्या कोई राष्ट्र अथवा राष्ट्र- समूह भारत के मित्र हैं, शत्रु हैं, तटस्थ हैं  ? हैं तो कौन कौन नहीं तो कौन । यदि कोई राष्ट्र शत्रु है तो क्या उसे किसी भी राष्ट्रीय-समारोह में आमंत्रित किया जाना चाहिए.....?॥ १ ॥  

 हमारा संविधान कहता है कि : - सारी जनता देश का भंडार महाराज के चरणों में अर्पित कर नतमस्तक होकर कहें महाराज !.....महाराज को  पूरी पूरी छूट है क्या की वो उस कोष का कुछ भी करे चाहे तो अपने घर ले जाए चाहे विदेश में रखवा दे ।। १ ॥ 

शाहों की वही सल्तनत है  तरीका भी वही है । जागीरों-जमीं दारों की जब जफाशियारी भी वही है तो फिर यह आज़ादी का ढोंग किसलिए.....? 

भावार्थ : -जब वही अस्पृश्यता है सामंत वाद भी वही है तो फिर स्वतंत्रता कहाँ है.....?  

वही राजे हैं वही रजवाड़े हैं वही पुरानी प्रथाएं हैं अंतर केवल इतना है की इन कुप्रथाओं, समस्याओं  ने रूप बदल लिया है ॥ 

>>पहले घूँघट कुप्रथा थी घूँ घट गया है और  घट दिखाओ कुप्रथा है  । 

>>अस्पृश्यता निर्धन रेखा के नीचे छिपी हुई है । 

>>और सामंत वाद अर्थात जमीदारी प्रथा ये उद्योग पति सामंती हो गए हैं और  किसानों पर अत्याचार कर रहे हैं ॥ दुःख की बात यह है की शासन की मिली भगत से ये अत्याचार हो रहा है.....उद्योग नीति है या किसान विरोधी नीति.....विद्यमान सरकार जनता की सेवक है अथवा पिछली सरकार की.....? । १ ।   


जन-सामान्य की आधार-भूत आवश्यकताओं हेतु नहीं अपितु मुट्ठी भर भोग विलासी लोगों के लिए खेतों को उखाड़-उखाड़ कर उसमें उद्योग बोए जा रहे हैं क्यों ?जबकी  अन्न-जल को तरसता जन जीवन त्रस्तहोकर 
अपने जीवन को जैसे भोगता हुवा जैसे मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा हो ॥ १। 

जब इतने ऊँचे पद में भी कोई दलित का दलित है तो फिर ऐसे पदों का क्या लाभ.....? ॥ १ ॥  

उलटी सीधी इनकी मंत्रणाएं हैं उलटे सीधे मंत्र है । उलटा सीधा नियंत्र है ऐसे को हम लोग गणतंत्र कहते हैं । और चार उलटे सीधे मंत्रियों के समूह को ही लोकतंत्र कहते हैं ॥ इन मंत्रियों को भारत की चिंता नहीं है ? इन्हें अपने इसी लोकतंत्र की चिंता है.....? । १ ॥ 

अपराधिन को संग किए भीतर के रखबार । 
गेह गेहनि बाहिर भए, लिए  घर निज अधिकार ।२१२२ । 
भावार्थ :-- घरवाले तो बाहर हो गए और ये फूलिस ये गृह रक्षक फूलिसअपराधीन का  प्रसंग प्राप्त कर घर पर अधिकार किए है ॥ 

एक बात तो बताइये ये गृह-मंत्री है कि कोई हवलदार है.....?   

अब सत्ताधारी दल के चुप्पी को क्या समझा जाए.....?

देस मैं एक नवल देस, भोगे बिषय अतीउ । 
कौन इहाँ के निबासी, कहाँ इहाँ की सींउ ।२१६५। 
भावार्थ : -भारत  देश के भीतर एक नया देश खोज गया वो है इण्डिया जो अतिशय भोग वादी है ( अर्थात खाओ पियो और मजे करो का सिद्धांत ) इस इण्डिया की सीमाएं कहाँ हैं.....?

धर्म-निरपेक्ष किसे कहते हैं..... यह शब्द युग्म कहाँ से आया.....?














----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...