उद्योग धिंग धंध भए धनपत डाकू रूप ।
अपणा कर कनिआ भई, कोसज अंधा कूप ।२०७१ ।
भावार्थ : -- उधोग धंधे गंदे हो गए..... अब वो चम्बल वाला समय गया.....उद्योग पति ही वे वाले डाकू बन गए जी । अबके डाकू दिन में चार बार नहाते हैं चौआलीस कपडे बदलते हैं । तेरा टिकस बोले तो टेक्स प्यारी सी तेरी कन्या हो गई वित्त मंत्रालय अँधा कुआँ.....धक्के थोड़े ही दे देओगो .....इसे भलाई के काम में लगइयो जिससे यह किसी भले के पास जाए, आतंकवादियों के पास न जाए ॥
रहे देस पराए खाए खर्चें देस पराए ।
धनिमानी किए कमाई , मिलहि देस कू नाए ।२०७२।
भावार्थ : - धनवान व् लब्ध प्रतिष्ठित वर्ग की कमाई देश को नही मिलती । वे विदेशी ओढ़ते हैं प्राय: विदेश में ही खाते हैं विदेशी वस्तुओं पर ही खर्च करते हैं उनका खुरदरा मूल्य व् अप्रत्यक्ष कर विदेशों को जाता है । वे जिसमें उड़ते हैं वो ईंधन भी विदेश से आता है ॥ निम्न वर्ग अन्न उपजाता है श्रम करता है पूरा का पूरा अप्रत्यक्ष कर अपने देश को देता है । मध्यम वर्ग ही किसी जन संचालन तंत्र का कौशल होता है यह न केवल प्रत्यक्ष अपितु अप्रत्यक्ष कर भी अपने देश को देता है ॥
श्रेष्ठि वर्ग जितना कर नहीं देते उससे कहीं अधिक् तो देश का खा जाते हैं..... घपले घोटाले करते हैं सो अलग..... भारत-देश के निवासीयों का आर्थिक इस उच्चतम वर्ग नामक विषैले कीटाणु के कारण है......
काल कलुषित कारज कर, ऊँचे भवन रचाए ।
ऐसी ऊंचाई संग, कवन भला हो पाए ।२०७३।
भावार्थ : -- काले कुकरम कर कर के लोग ऊँचे ऊँचे विलास भवन बनाते हैं ।ऐसी ऊंचाई से किसका भला हुवा है ।।
बर बानि धर ग्यानि बन उड़त फिरएं बैमान ।
न त कोहु कर ग्यान दैं, न काहु देवें दान ।२०७४।
भावार्थ : -उत्तम वेषभूसा धारण किये जो ज्ञानी बनकर विमानों में उड़ते फिरते हैं । वे किसी को ज्ञान नहीं देते रहतें न ही वे किसी को दान देते हैं अपितु लोग उन्हें ज्ञान-दान देते हैं । ऐसे किसी का दिया हुवा मिला हो तो बता दो ॥
ज्ञानी होना एक बात है ज्ञान देना दूसरी बात.....
दान किसको बोलते हैं.....?
भरा उदर निद्रा दरसे, निद्रा सपन दरसाए ।
जगती छुधा कला करे, रोटी कहँ सों आए ।२०७५ ।
भावार्थ : - भरे हुवे उदर को निद्रा ही दिखती है निद्रा स्वर्ग के सपने दिखाती है ॥ जागृत क्षुधा जब कल्पना करती है कि रोटी कहाँ से आए तब रोटी की रचना होती है ॥
"स्वप्नकालिक चेतना से सृजन नहीं होता, यह जागृत मन का व्यापार-विशेष है....."
गहरी नींद गहल कोउ, देखे सपन सलोन ।
जागत जगत जगती की, करे कल्पना कौन ।२०७६ ।
भावार्थ : -- कोई गहरी निद्रा में निमग्न होकर सुन्दर स्वप्न दर्श रहा है ( चराचर-जगत ) । वो कौन है जो चैतन्य स्वरूप होकर इस संसार की कल्पना कर रहा है ( ईश्वर ) ॥
भारत माता के रहे सुबरन मय इतिहास ।
सासको के कुकरम नै किए सब सत्यानास ।२०७७ ।
भावार्थ : -- भारतीयों की जननी स्वरूप इस भारतभूमि का एक स्वर्णमयी इतिहास रहा । किन्तु शासकों के कुकर्मों ने सब सत्यानाश कर दिया सारे सोने का पत्थर कर दिया ॥ ये सारे किले-काले उन्ही पत्थरों से ही बने हैं ॥
चोरक पाछु पाछु चले, ताकें चोरि चकारि ।
सिद्ध पुरुख इतरा कहे, हमरे अनुहर भारि ।२०७८।
भावार्थ : - चोरी चकारी की ताक में चोर पीछे पीछे चल रहे हैं । सिद्ध पुरुष इतरा इतराता कह रहा कह रहा है मेरे तो कितने ही अनुशरण कर्त्ता हैं ।
जन जन देस कोष चरन अरपत कह महराज ।
महराज की छूट, करें उलटे सीधे काज ।२०७९ ।
भावार्थ : - हमारा संविधान कहता है कि : - सारी जनता देश का भंडार महाराज के चरणों में अर्पित कर नतमस्तक होकर कहें महाराज !.....महाराज को पूरी पूरी छूट है कि वो उस कोष का कुछ भी करे चाहे तो अपने घर ले जाए चाहे विदेश में रखवा दे ।।
अधुना हमरी भुइ भई बहुतहि सुख संदोहु ।
आए दुहे अरु ले जाए, औने पौने जोहु ।२०८०।
भावार्थ : -- इस समय ( विभाजन के पश्चात से ) हमारी यह भारत भूमि सरलता पूर्वक दोही जाने वाली हो गई है । कोई भी औना पौंना आता है इसे दुहता है और ले जाता है ॥ शासन को जो मुंह भराई दे दे उसी के खूंटे बँध जाती है ॥
पीतरजन के कृत करम किए जो आतम सात ।
नौ बिगड़े तो बिगड़े, बिगड़े न कोइ जात ।२०८१।
भावार्थ : - उपनाम मात -पितासहित पितृजनों के सतकर्मों को आत्म सात किए होता है यह आपको आपकी जड़ों तक ले जाता है । इसलिए अपना नाम बिगड़ जाए पर जात बिगड़नी न पाए । ऐसे कर्म करने चाहिए की अपना नाम उप नाम बन जाए जैसे मायाराम, गंगाराम, बनारसीराम.....
अपणा कर कनिआ भई, कोसज अंधा कूप ।२०७१ ।
भावार्थ : -- उधोग धंधे गंदे हो गए..... अब वो चम्बल वाला समय गया.....उद्योग पति ही वे वाले डाकू बन गए जी । अबके डाकू दिन में चार बार नहाते हैं चौआलीस कपडे बदलते हैं । तेरा टिकस बोले तो टेक्स प्यारी सी तेरी कन्या हो गई वित्त मंत्रालय अँधा कुआँ.....धक्के थोड़े ही दे देओगो .....इसे भलाई के काम में लगइयो जिससे यह किसी भले के पास जाए, आतंकवादियों के पास न जाए ॥
रहे देस पराए खाए खर्चें देस पराए ।
धनिमानी किए कमाई , मिलहि देस कू नाए ।२०७२।
भावार्थ : - धनवान व् लब्ध प्रतिष्ठित वर्ग की कमाई देश को नही मिलती । वे विदेशी ओढ़ते हैं प्राय: विदेश में ही खाते हैं विदेशी वस्तुओं पर ही खर्च करते हैं उनका खुरदरा मूल्य व् अप्रत्यक्ष कर विदेशों को जाता है । वे जिसमें उड़ते हैं वो ईंधन भी विदेश से आता है ॥ निम्न वर्ग अन्न उपजाता है श्रम करता है पूरा का पूरा अप्रत्यक्ष कर अपने देश को देता है । मध्यम वर्ग ही किसी जन संचालन तंत्र का कौशल होता है यह न केवल प्रत्यक्ष अपितु अप्रत्यक्ष कर भी अपने देश को देता है ॥
श्रेष्ठि वर्ग जितना कर नहीं देते उससे कहीं अधिक् तो देश का खा जाते हैं..... घपले घोटाले करते हैं सो अलग..... भारत-देश के निवासीयों का आर्थिक इस उच्चतम वर्ग नामक विषैले कीटाणु के कारण है......
काल कलुषित कारज कर, ऊँचे भवन रचाए ।
ऐसी ऊंचाई संग, कवन भला हो पाए ।२०७३।
भावार्थ : -- काले कुकरम कर कर के लोग ऊँचे ऊँचे विलास भवन बनाते हैं ।ऐसी ऊंचाई से किसका भला हुवा है ।।
बर बानि धर ग्यानि बन उड़त फिरएं बैमान ।
न त कोहु कर ग्यान दैं, न काहु देवें दान ।२०७४।
भावार्थ : -उत्तम वेषभूसा धारण किये जो ज्ञानी बनकर विमानों में उड़ते फिरते हैं । वे किसी को ज्ञान नहीं देते रहतें न ही वे किसी को दान देते हैं अपितु लोग उन्हें ज्ञान-दान देते हैं । ऐसे किसी का दिया हुवा मिला हो तो बता दो ॥
ज्ञानी होना एक बात है ज्ञान देना दूसरी बात.....
दान किसको बोलते हैं.....?
भरा उदर निद्रा दरसे, निद्रा सपन दरसाए ।
जगती छुधा कला करे, रोटी कहँ सों आए ।२०७५ ।
भावार्थ : - भरे हुवे उदर को निद्रा ही दिखती है निद्रा स्वर्ग के सपने दिखाती है ॥ जागृत क्षुधा जब कल्पना करती है कि रोटी कहाँ से आए तब रोटी की रचना होती है ॥
"स्वप्नकालिक चेतना से सृजन नहीं होता, यह जागृत मन का व्यापार-विशेष है....."
गहरी नींद गहल कोउ, देखे सपन सलोन ।
जागत जगत जगती की, करे कल्पना कौन ।२०७६ ।
भावार्थ : -- कोई गहरी निद्रा में निमग्न होकर सुन्दर स्वप्न दर्श रहा है ( चराचर-जगत ) । वो कौन है जो चैतन्य स्वरूप होकर इस संसार की कल्पना कर रहा है ( ईश्वर ) ॥
भारत माता के रहे सुबरन मय इतिहास ।
सासको के कुकरम नै किए सब सत्यानास ।२०७७ ।
भावार्थ : -- भारतीयों की जननी स्वरूप इस भारतभूमि का एक स्वर्णमयी इतिहास रहा । किन्तु शासकों के कुकर्मों ने सब सत्यानाश कर दिया सारे सोने का पत्थर कर दिया ॥ ये सारे किले-काले उन्ही पत्थरों से ही बने हैं ॥
चोरक पाछु पाछु चले, ताकें चोरि चकारि ।
सिद्ध पुरुख इतरा कहे, हमरे अनुहर भारि ।२०७८।
भावार्थ : - चोरी चकारी की ताक में चोर पीछे पीछे चल रहे हैं । सिद्ध पुरुष इतरा इतराता कह रहा कह रहा है मेरे तो कितने ही अनुशरण कर्त्ता हैं ।
जन जन देस कोष चरन अरपत कह महराज ।
महराज की छूट, करें उलटे सीधे काज ।२०७९ ।
भावार्थ : - हमारा संविधान कहता है कि : - सारी जनता देश का भंडार महाराज के चरणों में अर्पित कर नतमस्तक होकर कहें महाराज !.....महाराज को पूरी पूरी छूट है कि वो उस कोष का कुछ भी करे चाहे तो अपने घर ले जाए चाहे विदेश में रखवा दे ।।
अधुना हमरी भुइ भई बहुतहि सुख संदोहु ।
आए दुहे अरु ले जाए, औने पौने जोहु ।२०८०।
भावार्थ : -- इस समय ( विभाजन के पश्चात से ) हमारी यह भारत भूमि सरलता पूर्वक दोही जाने वाली हो गई है । कोई भी औना पौंना आता है इसे दुहता है और ले जाता है ॥ शासन को जो मुंह भराई दे दे उसी के खूंटे बँध जाती है ॥
पीतरजन के कृत करम किए जो आतम सात ।
नौ बिगड़े तो बिगड़े, बिगड़े न कोइ जात ।२०८१।
भावार्थ : - उपनाम मात -पितासहित पितृजनों के सतकर्मों को आत्म सात किए होता है यह आपको आपकी जड़ों तक ले जाता है । इसलिए अपना नाम बिगड़ जाए पर जात बिगड़नी न पाए । ऐसे कर्म करने चाहिए की अपना नाम उप नाम बन जाए जैसे मायाराम, गंगाराम, बनारसीराम.....
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